Thursday, July 30, 2009

ज्याउल, उरस की मूफल्ली, मोर्रम और ब्रिच्छारौपड़ - ६

लफ़त्तू और मैं हरिया हकले की छत फांद ही रहे थे जब पीछे से बन्टू की आवाज़ आई: "रुको मैं भी आ रहा हूं यार." ज़ीना उतर कर हम दूधिये वाली संकरी गली में थे. सरदारनी का स्कूल की तरफ़ जाने के बजाए हम बाईं तरफ़ वाली गली में मुड़ गए जहां से हमें सीधे घासमंडी पहुंच जाना था. घासमंडी की तमाम दुकानों के आगे लोग मोर्रम के जुलूस के वहां तक पहुंच जाने की प्रतीक्षा में थे. हम लालसिंह की दुकान पर पहुंचे ही थे कि बन्टू पर भय का दौरा सा पड़ा. वह वापस घर जाने की बात करने लगा तो लफ़त्तू ने थूकते हुए कहा: "दलपोक थाला."

डरपोक कहे जाने से बन्टू का स्वाभिमान आहत हुआ और उसने वापस जाने की योजना मुल्तवी कर दी.

"अब यईं पल लुके लओ" लफ़त्तू साधिकार बोला.

जुलूस हमारे घर से आगे निकल रहा था और हम तक पहुंचा ही चाहता था. रात घिर आने के बावजूद बैन्डगाड़ी के आगे सीना पीट रहे छोटे बच्चों में से कुछ के परिचित चेहरे पहचाने जा सकते थे. मोर्रम के जुलूस को छत से देखना और बात थी यहां उसे रू-ब-रू अपने नज़दीक आते देखना और. ढोलों की धमक जैसे हमारे पेटों से उठती हुई दिमाग तक पहुंचती लग रही थी. यह रोंगटे खड़े कर देने वाली आवाज़ें थीं.

बैन्डगाड़ी के एक तरफ़ दो बड़ी बड़ी देगचियां रखी हुई थीं. बच्चे देगची-इन्चार्ज के पास जाते, उसकी चिरौरी करते और मुठ्ठी भर कुछ माल पा-खा कर पुनः सीनाफोड़ीकरण में लग जाते.

बैन्डगाड़ी हमारे ऐन सामने थी. देगची-इन्चार्ज को मैंने पहचान लिया. बन्टू ने भी. वह बन्टू लोगों के घर चलती रहने वाली शाश्वत मरम्मतों का निर्देशन करने वाला बहरा मिस्त्री था जो बार-बार बताए जाने के बावजूद कुछ न कुछ ऐसी वास्तुशिल्पीय गड़बड़ कर दिया करता था कि घर लौटने पर बन्टू के पापा उसे काला चश्मा लगाए लगाए ही डांटना शुरू कर दिया करते थे.

देगची-इन्चार्ज ने भी हमें दूर से ताड़ लिया और इशारे से अपने नज़दीक बुलाया. बन्टू ने एक पल की भी देर नहीं लगाई और हम बैन्डगाड़ी के ऐन बगल में थे. बहरे मिस्त्री ने खूब बड़े बड़े तीन पत्तलों में माल भर कर हमें थमाया और हम बिजली की गति से घासमंडी के उस तरफ़ पसू अस्पताल से सटे एक टीले की तरफ़ भाग चले.

पत्तलों में जलेबी वाली गरम गरम बूंदियां भरी हुई थीं. बन्टू ने बूंदी के मुसलमान होने का ज़िक्र किया तो लफ़त्तू ने हिकारत से उस से कहा : "मैंने का ता तुदते अपने थात आने को? तुदे वापत दाना ऐ तो दा. हता थाले को!"

बन्टू वाकई डरपोक निकला और भागता हुआ वापस अपने घर चला गया. हम बूंदी के मज़े लेने की प्रोसेस के चरम पर पहुंचने को ही थे जब अचानक एक कर्रा तमाचा खोपड़ी पर पड़ा. जब तक मैं इस प्रहार से सम्हल पाता दूसरा तमाचा पड़ा. दो सेकेन्ड के भीतर हम दोनों बांकुरे ज़मीन पर थे. दो जोड़ी बड़े बड़े हाथों ने हमारे पत्तल समेट कर कूड़े की तरह उछाल दिए.

एक लफ़त्तू का बड़ा भाई था एक उसका बीड़ीखोर दोस्त.

हमारे कान दूधिये वाली गली तक नहीं छोड़े गए. छत पर की भीड़ आखिरी ताजियों को निकलता देखने में मशगूल थी. दूधिये वाली गली के मुहाने पर हमारे कान छोड़े गए जो लगता था दो-दो हिस्सों में बंट चुके थे. लफ़त्तू के भाई ने मुझे चेताते हुए कहा कि मुझ होस्यार बच्चे को उसके भाई जैसे हौकलेट से दूर रहना चाहिये. यह भी मुसलियों के हाथ की बनी मिठाई खा चुकने के बदले में शायद कल सुबह तक हमारे हाथ झड़ जाएंगे. और यह भी कि लफ़त्तू को तो अब घर पर देखा जाएगा.

दर्द, अपमान और छोटा होने की विवशता के बावजूद मुझे लफ़त्तू के बड़े भाई के अज्ञान और गधेपन पर तरस आया. हाथ झड़ने होते तो अब तक झड़ चुके होते. मुझे भाषण दिया ही जा रहा था जब अचानक बिजली की तेज़ी से लफ़त्तू अपने भाई की गिरफ़्त से निकला और "हत थाले!" कह कर आगे अन्धेरों की तरफ़ भागता चला गया. दोनों बड़े उसे पकड़ने भागे तो मैंने अपने दुखते कान पर हाथ लगाया. वह सलामत था. जुलूस की आवाज़ अब उतनी कानफोड़ू नहीं रही थी. मैं चोरों की तरह हरिया हकले का ज़ीना चढ़कर ढाबू की छत फलांगता अपनी छत के क्रिकेट मैदान वाले हिस्से की तरफ़ आ कर टंकी की ओट हो गया. रात के खाने की योजनाएं बनाती आपस में बतियातीं मन्थर कदमों से नीचे उतरती औरतें थीं. मैदान साफ़ था. मैंने थोड़ा ऊंची आवाज़ में कुछ गाना सा गुनगुनाना शुरू कर दिया ताकि वे मेरी उपस्थिति से वाकिफ़ हो रहें

"अब कब तक छत पर रहेगा. चल हाथ मुंह धो के किताब हिताब पढ़! बहुत हो गया मुसलियों का ताजिया फाजिया. कल से स्कूल भी है."

नींद रह रह कर टूटती रही रात भर . मुझे सपना दिखता था कि लफ़त्तू की धुनाई हो रही है और वह "बचाओ बचाओ" की गुहार लगा रहा है. लेकिन सुबह वह अपना बस्ता थामे लफ़ंडरसंकेत "बी...यो...ओ...ओ...ई.." के साथ मुझे बुला रहा था.

उसका चेहरा सूजा हुआ सा लग रहा था. मैंने उसके भाई द्वारा बाद में किये गए व्यवहार के बारे में जानना चाहा पर झेंप महसूस हुई. उसने मेरा हाथ पकड़कर आंख मारते हुए कहा: "हात तो नईं धला यार तेला मुछलियों के हात की बूदी खा के बी!"

स्कूल में असेम्बली के समय प्रिंसीपल साहब के साथ एक सज्जन खड़े थे. खाकी वर्दी पहने ये सज्जन पुलिस तो कतई नहीं लग रहे थे. पर एक तरह की अफ़सरी धज उनके भीतर से ज़रूर टपक रही थी. राष्ट्रगान के बाद प्रिंसीपल साहब ने कहना शुरू किया: "बच्चो आज आप को जंगलात विभाग से पधारे सिरी जोसी जी कुछ अच्छी अच्छी बातें बताएंगे. पहले उनके स्वागत में आप लोग गीत गाएं." मुर्गादत्त मास्टर ने हारमोनियम सम्हाल लिया. इस तरह अचानक गीत गाने की हम में से किसी की तैयारी न थी. नतीज़तन मास्टर देबानन मुर्गादत्त की कर्कश ध्वनि सबसे अलग सुनाई दे रही थी. हार्मोनियम जैसे रेलगाड़ी की बग़ल में रेंग रही मालगाड़ी जैसा अलग स्वरमंजरियों का खौफ़नाक समां बांधे था. हवा में करीब तीन हज़ार बच्चों के तीन हज़ार आरोह अवरोह एक दुसरे को काट-पीट-खसोट-नोच रहे थे "आपि का सुआगत है सिरीमान. आपि का सुआगत है सिरीमान ..."

इस भीषण राग नोचखसोट के बारहताला द्रुततम ताल पर आने के उपरान्त खाकी जोसी जी ने एक एक कर पहले तो सारे मास्टरों का नाम ले ले कर धन्यवाद कहा. उसके बाद गला खंखार कर करीब आधे घन्टे हमारी ऐसी तैसी की. हमारी समझ में इतना ही आया कि हमें पेड़ लगा कर धरा को बचाना है. और पेड़ लगाने का यह काम चौबीस घन्टे, ताज़िन्दगी करते जाना है जभी धरा बचेगी.

खाकी जोसी के माइक से हटने पर एक बार पुनः प्रिंसीपल साहब ने मोर्चा सम्हाला. "जोसी साहब के निर्देशन में आज कच्छा छै और सात के बच्चे ब्रिच्छारौपड़ हेतु कोसी डाम पे जाएंगे. ब्रिच्छारौपड़ के उपरान्त बच्चे चाएं तो स्कूल आ जावें चाएं अपने घर चले जावें. कल को कच्छा आठ और नौ के बच्चे यही कारजक्रम करेंगे ..."

यानी छुट्टी. ब्रिच्छारौपड़ शब्द का मतलब लफ़त्तू की समझ में नहीं आया तो उसने मुझ से पूछा. मैंने उसे बतलाया तो वह बोर होता हुआ बोला: "इत्ता सा पौदा लगाने का इत्ता बला नाम. बली नाइन्तापी है."

चीखते, चिल्लाते धूल उड़ाते हमारा काफ़िला डाम पर पहूंचा. डाम के बगल में बने बच्चा पार्क के बगल से एक रास्ते पर हमें ऊपर चढ़ने को कहा गया. आगे लकड़ी का एक गेट था. गेट पर करीब पांच मनहूस आदमी खड़े थे जो सूरत से ही कामचोर और चपरासी लग रहे थे. उन्होंने डपटकर हमें "एक-एक कर के सालो!" कह कर एक-एक पौधा थमाया. ज़्यादातर पौधों की पत्तियां सूखी हुई थीं और वे भयानक तरीके से मरगिल्ले लग रहे थे.

आधे पौन घन्टे में इन पौधों को जैसे-तैसे ज़मीन में दफ़ना कर हम नीचे पार्क में थे जहां खाकी जोसी, मुर्गादत्त मास्टर और नेस्ती मास्टर उर्फ़ विलायती सांड कहीं से ले आई गई कुर्सियों पर विराजमान हो चुके थे. उनके सामने एक मेज़ धरी हुई थी. और आगे हम बच्चों के बैठने को दरी बिछा दी गई थी. जब सारे बच्चे सैटल हो गए और हल्लागुल्ला कम हुआ तो विलायती सांड खड़ा हुआ और प्रारम्भिक अनुष्ठान के तौर पर उसने पहले ख्वाक्कध्वनि के साथ थूक का गोला अपने पीछे की धरा पर उछाला, एक डकार जैसी ली और हमें सूचना दी - "अब सारे बच्चों को ब्रिच्छारौपड़ कारजक्रम के सटफिकट बांटे जाएंगे."

दो घन्टे तक नाम पुकारे जाते रहे. हर बच्चा मेज़ पर जाता और खाकी जोसी से सटफिकट ग्रहण करता. शुरू के चालीस पचास बच्चों तक तो उत्साह बना रहा उसके बाद बच्चे धीरे धीरे अधमरे होना शुरू हो गए. धूप अलग थी. मेज़ पर लगातार चाय की सप्लाई जारी थी.

जब मेज़ पर धरी सटफिकटों की गड्डी खत्म होने को थी, एक जीप बगल में आ रुकी. जीप से पेटियां निकाली गईं और बच्चों को एक एक कर एक केला और एक समोसा थमाते हुए अपना मुंह काला कर घर फूट लेने का आदेश दिया गया.

लफ़त्तू इस सब से इस कदर चट चुका था कि उसने पार्क से बाहर आते ही समोसा और केला नहर की तरफ़ "हता थाले को!" कहते हुए उछाल दिये.

और दिन होते तो लफ़त्तू ने मेज़ कुर्सी पर बैठी सतत चाय सुड़कती त्रयी की कितनी ही मज़ाकें उड़ा ली होतीं लेकिन वह पिछले कुछ दिनों से किसी दूसरी आकाशगंगा के किसी दूसरे सौरमन्डल के सुदूरतम ग्रह में जा बसा था.

ब्रिच्छारौपड़ कारजक्रम के चौथे दिन असेम्बली में गोबरडाक्टर की उपस्थिति ने हमारी दिलचस्पी को ज़रा सा हवा दिखाई. उस दिन बारहवीं क्लास ने ब्रिच्छारौपड़ करने जाना था. गोबरडाक्टर ने भी पेड़, पानी, धरती वगैरह के बारे में अपना ज्ञान बघारते हुए ब्रिच्छारौपड़ कारजक्रम की महत्ता को रेखांकित किया. नकली तालियों के बाद प्रिंसीपल साहब ने बच्चों को सूचित किया कि गोबरडाक्टर का स्थानान्तरड़ हो गया है और यह कि सारा शहर उनकी याद में आने वाले कई सालों तक रोता रहेगा. पंडित रामलायक 'निर्जन' ने अपनी रची एक गीत-श्रॄंखला सुनाई जिसका आशय यह निकलता था कि चांद सूरज तो तब भी रोज़ आते रहेंगे लेकिन रामनगर की सड़कें गोबरडाक्टर के बिना कब्रिस्तान में तब्दील जाएंगी क्योंकि वे अब कभी यहां नहीं आएंगे.

रामलायक 'निर्जन' ने पहले से ही मनहूस इस असेम्बली को मनहूसतर बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी.

छुट्टी जल्दी घोषित कर दी गई. मैंने लफ़त्तू से बमपकौड़ा खाने चलने को कहा तो वह मान गया. मेरे पास थोड़े पैसे थे. बमपकौड़ा खा कर हम मन्थर गति से घर की तरफ़ जा रहे थे जब सामने से दौड़ता हुआ लालसिंह हम तक पहुंचा.

"तुम साले मौज काट रहे हो वहां तुम्हारे माल हल्द्वानी जा रहे हैं. एक बार देख तो लो हरामियो उन को!"

अजीब सी नासमझ बदहवासी में हम भागते हुए पसू अस्पताल के गेट पर पहुंचे. ट्रक में सामान लादा जा चुका था और गोबरडाक्टर की गाड़ी की गतिमान झलक भर 'असफाक डेरी केन्द्र और सेन्टर' के मोड़ पर नज़र आई.

हम दोनों वहीं बैठ गए. लफ़त्तू का चेहरा सफ़ेद पड़ा हुआ था और ऐसा लग रहा था कि वह अब रोया तब रोया. मैं तो नकली आसिक था सो मुझे कुच्चू गमलू के चले जाने का ऐसा कोई अफ़सोस नहीं हो रहा था. मुझे लफ़त्तू की चिन्ता हुई.

घरघर करता ट्रक जब चल दिया तो हम हारे जुआरियों की तरह पसू अस्पताल के अहाते में प्रविष्ट हुए. वहां श्मशान जैसी मुर्दनी छाई हुई थी. गोबरडाक्टर के घर के अन्दर कोई झाड़ू कर रहा था. अगले डाक्टर के रहने के लिए घर तैयार किये जाने की तैयारी शुरू हो चुकी थी.

घर के बाहर पुरानी पेटियां, एकाध दरियां और कूड़ा कचरा बिखरा था. लफ़त्तू ने अचानक कुछ देखा और भागकर कूड़े से उसने अपना रत्तीपइयां बाहर निकाला. ये वही रत्तीपइयां था जिसे उसने उस दिन कार की सवारी खाने के बाद "हाउ क्यूट! हाउ क्यूट!" कहती हमारी एक स्कर्टधारिणी भाबी पर न्यौछावर कर दिया था.

"हता थाले को! हता थाले को! ... हता! " कहते आवेग में लफ़त्तू ने रत्तीपइयां के तार को बुरी तरह टेढ़ामेढ़ा बना दिया. रत्तीपइयां को लेकर वह नहर की दिशा में भागा. मैंने उसका अनुसरण किया. वह मेरे पहुंचने से पहले ही रत्तीपइयां को नहर के हवाले कर चुका था. उसने एक रुंआसी निगाह मुझ पर डाली और भागता हुआ भवानीगंज की तरफ़ निकल पड़ा.

अगले दिन इतवार था. हमारा दिगम्बरदल तैराकी कार्यक्रम के उपरान्त कायपद्दा भी खेल चुका था. यानी घर जाकर कुछ खाने का समय हो गया था. लफ़त्तू पानी के भीतर नंगा निश्चेष्ट लेटा था. सब जा चुके तो मैंने उस से घर चलने को कहा.

"तू दा याल. मैं कुत थोत रा ऊं." कह कर उसने तेज़-तेज़ तैरना शुरू कर दिया जब तक कि वह मेरी निगाहों से ओझल न हो गया.

28 comments:

Ancore said...

"इत्ता सा पौदा लगाने का इत्ता बला नाम. बली नाइन्तापी है."


Really nice.

Please keep it up.

Ashok Pande said...

पिछली पोस्ट पर मैंने जो आखिरी किस्त का ज़िक्र किया था वह तो इस विशेष एपीसोड की आख़िरी किस्त है.

आपके सरोकार का मैं आदर करता हूं. यह लफ़त्तूनामे की आख़िरी पोस्ट नहीं है.

महेन said...

जे हुई न बात. आण दो दाज्यू.

दीपा पाठक said...

हार्मोनियम जैसे बगल में रेंग रही मालगाड़ी जैसा अलग स्वरमंजरियों का खौफ़नाक समां बांधे था.

"आपि का सुआगत है सिरीमान. आपि का सुआगत है सिरीमान ..."

"जोसी साहब के निर्देशन में आज कच्छा छै और सात के बच्चे ब्रिच्छारौपड़ हेतु कोसी डाम पे जाएंगे.

"अब सारे बच्चों को ब्रिच्छारौपड़ कारजक्रम के सटफिकट बांटे जाएंगे."

...कि चांद सूरज तो तब भी रोज़ आते रहेंगे, रामनगर की सड़कें गोबरडाक्टर के बिना कब्रिस्तान में तब्दील जाएंगी क्योंकि वे अब कभी यहां नहीं आएंगे.


अद्भुत़ .....इसके अलावा कोई शब्द नहीं मिल रहा कहने को। मेरा अपना स्कूल भी बिल्कुल इसी में का था। बहुत ही बढ़िया पोस्ट, हंस-हंस कर पेट सचमुच दुख रहा है।

vineeta said...

ham to pahale se hi kyal hain...aur kya kahen. bhut badhiya

IamTarun said...

Behatreen.................... wakai kafi umda lekhak hai aap ashok da...... Keep posting..........main tumahare lekho ko collect kar raha hu..........

लोकेन्द्र बनकोटी said...

Waah! Ashok da. Waah!

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

तहानी बड़ी दुथद हो दयी हियाँ पै.

मुनीश ( munish ) said...

I have read all six today and i must say that it has been very enriching experience to read these memoirs as there were hardly any muslims in the area where i grew up . Nobody said anything against them in my surroundings as they simply did not exist in that part of Haryana. U have literary licence to say what u like ,but i didn't like their area being called Pakistan or addressing them with derogatory acronyms here; even if these were used by narrow minded people in ur part of UP. Such descriptions will only further the cause of communal hatred . The story has lost its innocence. It will,however, fetch u an award for sure .

मुनीश ( munish ) said...

Craft ,however, is flawless as usual. Very enticing , simply superb! If u r not writing for silver screen or t.v. that's ur choice Ashok bhai ,but i have not come across anyone other that the great M.S.Joshi ji who has this mastery over dialects and the local flavour . My reservations about some contents are entirely personal .

आर. अनुराधा said...

यह सब ब्लॉगर्स से परे लोगों तक भी पहुंचना चाहिए। स्मृतियां सभी के पास होती हैं, पर इस तरह शब्दचित्र खींचना सबके बस का नहीं। शानदार!

Udan Tashtari said...

बली नाइन्तापी है.

--सॉलिड आईटम!! जारी रहो महाराज..ऐसा भी क्या है!!

डॉ .अनुराग said...

कई शब्द ऐसे है ......के बस दो मिनट रुक कर ठहरने का मन करता है ........लत्तु की एक तस्वीर भी हमने मन में खीच ली है ....वाकई एक उपन्यास रूप में ओर पाठको तक पहुचना चाहिए ऐसा अद्भुत लेखन ....

Vidyadhar said...

please share more memories ...

"In Search of...." said...

अशोक जी ,

सबसे पहले डॉ अनुराग का धन्यावाद करूंगा ,डॉ अनुराग के ब्लॉग के माध्यम से ही मैं आपके ब्लॉग तक पहुंचा ! मैं आपके इस लेख या कहूँ इन यादों के पिरोने के तरीके का कायल हो गया हूँ !
मुझे बार बार ये लगा जैसे "इस लिख को पढ़े बिना मैने आजतक उस लेखनी और भाषा के दर्शन नहीं किये जो कि हिन्दी भाषा में स्थानीय स्वाद को इस कदर भर देते हैं कि पाठक एक पल के लिए भी उस स्थान से बाहर ही नहीं जा पाता"
आपका अभिव्यक्तिकरण ,भाषा ,विषय, भावानात्मकता,सूक्ष्तम बात की गहराई , बहादुरी और इतना विस्तृत लेख दिल कि गह्याईयों में कुछ उस तरह से बस गया जैसे प्रत्येक हिन्दी पाठक के दिल में "गुनाहों का देवता " "मुझे चाँद चाहिए " "शेखर " या फिर "गोदान" के अमिट छाप रह जाती है !

मुझे ये समझ नहीं आ रहा कि मेरा आपके लेख की तारीफ़ करना किसी भी स्तर पर आपकी लेखनी के चमत्कार के सामने कुछ मायने रखता भी है या नहीं मगर मैं इस लेख के पश्चात जैसे अभिभूत सा हो गया हूँ ! मैं सभी पाठकों से सहमत हूँ कि "इस लेख को लघु-उपन्यास रूप में हिन्दी साहित्य जगत में आना ही चाहिए , यह हिन्दी साहित्य को चार चाँद ही लगायेगा "

"लफतू के चरित्र में जैसे इतनी गहराई है कि वह किसी भी नायक से कम नहीं !"

तहे दिल से आपके इस लेख के लिए धन्यवाद !!

दर्शन मेहरा

निशाचर said...

अशोक जी, इतना लम्बा इन्तजार तो पहले कभी नहीं करवाया आपने. अब अगली किस्त पोस्ट कर ही दीजिये.

Ancore said...

"हता थाले को! हता थाले को! ... हता! "

Amit Joshi said...

hata thale ko itte din ho gaye ek bhi blog nahin... bali nainchaapi hai....

Dharmendra Lakhwani said...

इत्ते दिन ते एक बी पोस्तीग नई, बड़ी नाइंसाफी हे दद ताब.... अशोकजी आपकी अगली पोस्ट का बेसब्री से इंतज़ार है, कृपया अपना ईमैल पता देने का कष्ट करे, धन्यवाद.

Dharmendra

Ajay said...

सिरिमान असोक जी ,
हम सबके बचपन के इस समय मे जिसका वर्णन आपने किया है एक लफत्तु होता है कुछ होसियार बच्चे होते हैं ...कुछ मुर्गदत्त मास्साब होते हैं ! स्कूल का हारमोनियम सुबह की प्रार्थना ....

अपनी स्मृतियों से हमे वंचित ना करें ! ४-५ माह का अंतराल काफ़ी होता है! ये स्मृतियाँ साहित्य की वो धरोहर हैं जिन्हे हर कोई सहेज कर रखना चाहेगा अपने निजी संग्रह मे !

अपनी व्यस्तता से कुछ पल हम जैसे मुरीदों के लिए भी निकाल लीजिए ....अगली किश्त शीघ्र प्रकाशित करें !

RMB said...

काफी दिनों से कहानी आगे नहीं बढ़ रही. बेसब्री से इंतजार है. फिर क्या हुआ?
RMB

Amit Joshi said...

Ab Hadd Paar ho chuki hai.... lekin ham chup baithney walon mein se nahin hein...
ham hadtaal karengey... putley phookengey ... pathraav karengey....
naya post... hamara adhikaar hai..

DHARMENDRA LAKHWANI said...

ashokjee, "laftu" ki holi padhne ko milti to mazaa aa jaata.

Happy Holi

Ashish Shrivastava said...

अशोक जी ,

अगली किस्त का बेसब्री से इंतज़ार है.

बली नाइन्तापी है.

DHARMENDRA LAKHWANI said...

बेसब्री से इंतजार है. फिर क्या हुआ?

शहरोज़ said...

आप बेहतर लिख रहे/रहीं हैं .आपकी हर पोस्ट यह निशानदेही करती है कि आप एक जागरूक और प्रतिबद्ध रचनाकार हैं जिसे रोज़ रोज़ क्षरित होती इंसानियत उद्वेलित कर देती है.वरना ब्लॉग-जगत में आज हर कहीं फ़ासीवाद परवरिश पाता दिखाई देता है.
हम साथी दिनों से ऐसे अग्रीग्रटर की तलाश में थे.जहां सिर्फ हमख्याल और हमज़बाँ लोग शामिल हों.तो आज यह मंच बन गया.इसका पता है http://hamzabaan.feedcluster.com/

DHARMENDRA LAKHWANI said...

Ashokjee, jitnee besabri se mein aapki nayee post ka intzaar kar raha hu shayad hi koi our kar raha hoga.... ab to raham thoda karo bacche par. :-)

nikhil said...

bahut dino ka gap ho gaya hai....bekarari se intzaar hai kuch nayi post ka