Thursday, May 19, 2016

चुस्सू, दोतीनपांच और गंगा की सौगंध

लफत्तू की तबीयत सुधर रही थी और उसके परिवार के साथ उसके रिश्ते भी. यहाँ तक कि उसका जल्लाद भाई भी यदा-कदा उसकी मिजाजपुर्सी में लगा दिख जाया करता. मुझे और पूरे मित्रमंडल को उसके घर पर हिकारत से नहीं बल्कि बहुत सम्मान के साथ देखा जाने लगा था और हमें वहां कभी भी जाने की छूट मिल गयी थी. हम दिन भर लफत्तू के बिस्तर को अपना खेल का मैदान बनाए रखते – लूडोसांपसीढ़ीकैरमबोट जैसे सदाबहार खेलों के साथ-साथ उसके भाई ने हमें ताश की अब तक हमारे लिए वर्जित गड्डी के साथ जोड़पत्ती और पद जैसे खेल सिखा दिए. जोड़पत्ती बहुत बचकाना खेल था जबकि पद में सामने वाले को पूरी तरह चिलमनग्न बना देने का आकर्षण उसे एक महान खेल बनाता था. पद से चट चुकने के बाद हमने कोटपीस और दहल-पकड़ नामक राष्ट्रीय ख्याति के खेल भी सीख लिए जबकि रमी जैसे क्लासिक खेल के रामनगरीय संस्करण – चुस्सू – तक पहुँचने में हमें उसके बाद फ़क़त एक सप्ताह लगा और उसे बाकायदा जुए की सूरत देने में लफत्तू को चौबीस घन्टे.

चुस्सू के खेल में खिलाड़ियों की संख्या के मुताबिक़ नौ से लेकर सत्रह पत्ते हरेक खिलाड़ी के हिस्से आते और उन्हीं के हिसाब से तीन-तीन पत्तों के तीन से लेकर पांच हाथ बनाने होते थे. यह खासा चुनौतीपूर्ण खेल था और उसे खेलने में बहुत दिमाग लगाना पड़ता था. लफत्तू लेटा-लेटा कमेंट्री करता रहता और बेबात ठहाके मारा करता. अपने सबसे नज़दीक बैठे खिलाड़ी के लिए वह सलाहकार का काम भी करता था और दो ही दिनों में यह मान लिया गया कि उसकी बगल में बैठा खिलाड़ी हार ही नहीं सकता. हार जाने पर जगुवा पौंक रुआंसा हो जाता और लफत्तू पर बेमांटी करने का झूठा इलज़ाम लगाता. लफत्तू की तरह ही फुच्ची भी खेल को नहीं खेलता था. वह अपने शाश्वत कुटैव अर्थात कप्तानी करने की आदत से बाज़ नहीं आता था और अपने को लफत्तू के सामने बैठे दोस्तों की टीम का कप्तान बना लेता और बारी-बारी से सबके पत्ते देखा करता. तीसरे दिन ही लफत्तू ने आइडिया दिया कि क्यों न इस खेल के स्कोर बाकायदा कापी में लिखे जाएं ताकि हार-जीत का सही-सही पता चल सके. लफत्तू ने स्वयं ही स्कोरर का पद भी सम्हाल लिया और पहली शाम खेल ख़त्म होने पर जो नतीजा सामने आया उसके हिसाब से मुन्ना खुड्डी मुझ से तीन हाथ और जगुवा से सात हाथ आगे थाबंटू खेल के बीच में ही किसी बात पर खफा होकर अपने घर चला गया था.

लफत्तू ने अपने घायल हाथ वाली कोहनी को मुन्ना खुड्डी की कमर में खुभोते हुए चुहल की – “आत्तो भौत तीनदोपांत बना ला थे बे.
चुस्सू के स्थानीय नियमानुसार पत्तों के क्रम में सबसे ऊपर ट्रेल होती थी. ट्रेल के बाद दूसरे नंबर पर तीन दो पांच का नंबर आता था. यह तीन दो पांच टॉप यानी इक्का बाश्शा बेगम से भी बड़ा होता था. इक्का बाश्शा गुलाम को टिमटॉम कहते थे जबकि इक्का बेगम गुलाम को सिमसॉम. इक्का नहल दहल को लंगड़ी माना जाता था और इक्का दुग्गी तिग्गी को सबसे छोटी रन. ईंट की दुग्गी के बदले जोकर वाला पत्ता उठाया जा सकता था और सारे पत्ते जीतने पर फाड़ मानी जाती थी. किसी एक पत्ते के चारों रंग जैसे  चार सत्ते या चार पंजे आ जाने को चौरेल कहते थे. फाड़ और चौरेल करने वाले को विशिष्ट इनामात और सुविधाएं दिए जाने का प्रचलन था. सारे चव्वों को साहजी कहा जाता था जबकि चिड़ी के चव्वे को बिशम्भर साहजी के नाम से संबोधित कर विशिष्ट सम्मान दिया जाता. चिड़ी का गुलाम पद्मादत्त कहलाता था जबकि पान की बेगम हेलन. पान की बेगम का नाम हेलन से बदलकर मालासिन्ना रख दिया गया. दो तीन पांच के स्टेटस को लेकर अक्सर बंटू भड़क जाता था. उसके हिसाब से उसके इंग्लैण्ड-निवासी मामा ही इस खेल के जनक थे और वे दो चार पांच को ट्रेल के बाद मानते थे.

बंटू के मामा का नाम जब-जब आता लफत्तू बड़ी हिकारत से उसे देखता हुआ कहता – “तेला मामा गया बेते बित्तोलिया के यहाँ झालू लगाने. गब्बल के यहाँ खेलना ऐ तो गब्बल का ई लूल मानना पलेगा. बत्तों की तले लो मत बेते. खेलना ऐ तो खेल बलना लामनगल के धाम पे कू निकल्ले.” वह थोरी मास्साब की बढ़िया नक़ल बना लेता था. रामनगर के धामों का ज़िक्र चलने पर हम सब थोरी मास्साब की इकठ्ठे नक़ल बनाने लगते – “और रामनगर के चार धाम सुन लो बे! इस तरफ़ कू खताड़ी और उस तरफ़ कू लखुवा. तीसरा धाम हैगा भवानीगंज और सबसे बड़ा धाम हैगा कोसी डाम.” हमारी समवेत हंसी फूटने को ही होती कि लफत्तू जोर से चेताता - "औल जो थुत्ला तिवाली मात्ताब की नजल में इन चाल धाम पल आ गयाउतको व्हंईं थलक पे जिन्दा गाल के लात्ता हुवां से बना दूंवां ..." बंटू रुआंसा पड़ जाता और हम सब बेकाबू होकर अपने पेट थामे हंसी से दोहरे हो जाते.

खैर मुन्ना खुड्डी उस दिन मुझसे तीन हाथ से जीता था और लफत्तू ने तय किया कि अगले दिन का खेल मुन्ना के पक्ष में क्रमशः तीन और सात हाथ के एडवान्टेज से शुरू होगा और गर्मी की छुट्टियां ख़तम होने तक हर रोज़ का स्कोर इसी तरह लिख कर अन्त में चुस्सू चैम्पियन को उचित पारितोषिक दिया जाएगा. पारितोषिक की बाबत कोई ठोस सूरत पेश न किये जाने पर खुड्डी उखड़ गया और बोला – “मने जीतने वाले को पतई नहीं कि उसने क्या जीता. ये तो बेमांटी है.” बात सही थी. लफत्तू ने कुछ देर सोचा और तय किया कि चार हाथ को एक बमपकौड़े के बाराबर माना जाएगा. यानी छुट्टी ख़त्म होने पर अगर कोई चालीस हाथ से आगे रहता है तो उसे दस बमपकौड़ों का इनाम मिलेगा. यह एक ललचाने वाला प्रोस्पेक्ट था जिसके नतीजे में हम सब उन गर्मियों में चुस्सू में इतने पारंगत हो गए थे कि उसके बाद दीवाली वगैरह के टाइम बड़ों के असली यानी जुए वाले चुस्सू में खिलाड़ी कम हो जाने पर हम में से किसी को भी सुविधा के मुताबिक़ ससम्मान तलब कर लिया जाता और हमारे पैसे भी भरे जाते.  

चुस्सू की बमपकौड़ा ट्रॉफी की डीटेल्स तय हो जाने पर लफत्तू बोला – “वो कां ग्या थाला तीनदोपांत?”

मैंने नासमझी में उसकी तरफ देखा तो उसने अपनी आँख को चौथाई दबाते हुए कमीनगी के साथ कहा – “बोई तेला इंग्लैंदिया मुग्लेआदम. ऑल कौन.

इस तरह मई-जून के उन गर्म महीनों के एक ऐतिहासिक दिन बंटू के दो-दो नामकरण किये गए. उसके बाद से उसे इंग्लैडिया मुग्लेआजम और तीनदोपांच के अलावा किसी और नाम से नहीं पुकारा गया. तीनदोपांच का नाम उस पर बुरी तरह फबता भी था क्योंकि उसका कद हम सब में छोटा था और अपनी शातिर हरामियत के चलते वह बड़े-बड़े इक्के बाश्शे बेगमों को उल्लू बना सकने में पारंगत था और मैंने गौर किया कि वह दीखता भी तीन दो पांच जैसा ही था.

बनवारी मधुवन पिक्चर हॉल से आगे थोड़ी सी उतराई थी जिसके बाद कोसी डाम से आने वाली नहर मिलती थी. नहर के ऊपर एक चौड़ी पुलिया थी जिस पर हमें लफत्तू ने बिना गाड़ी की गाड़ी चलाना सिखा रखा था. इस कार्यक्रम के लिए आपको पुलिया के किनारे पर लगी रेलिंग से लग खड़े हो कर अपनी निगाहों को बहते पानी पर एकटक लगा देना होता था. थोड़ी देर में पुलिया गाड़ी बन जाती थी और आप रफ़्तार के मज़े ले सकते थे. गाड़ी की रफ्तार डाम से उस दिन छोड़े गए पानी की मात्रा पर निर्भर करती थी. कम पानी छोड़े जाने पर रफ़्तार बढ़ जाती थी क्योंकि नहर में पानी का स्तर छिछला होता था और उसकी रफ़्तार ज्यादा. जिस दिन लबालब पानी छोड़ा गया होतानहर पुलिया कि तकरीबन छूती हुई बह रही होती और ऐसे में मंद-मंद रफ़्तार पर गाड़ी चलाना एक दिव्य अनुभव होता था. लफतू ने हमें उस उम्र में मेडिटेशन करते हुए गाड़ी चलाना सिखा दिया था जब किसी के पास गाड़ी होने को विस्मय और तनिक ईर्ष्या के साथ देखा जाता था. पुलिया और उसके नीचे बहने वाली नहर हम सब की गाड़ी थी जिसे उस दिन चलाता हुआ मैं मुन्ना खुड्डी की प्रतीक्षा कर रहा था. हमने दिन भर लफत्तू के घर मौज की थी और शाम के सामय मुन्ना ने मुझसे एक नई जगह दिखाने का वायदा किया था.

मेरे घर से यह पुलिया काफी आगे पड़ती थी और मैं पहली बार इतनी दूर अकेला आया था.

गाड़ी का भरपूर लुत्फ़ उठा चुकने के बाद मैंने आँखें उठाकर बनवारी मधुवन की तरफ देखा तो बड़ा टायर चलाता मुन्ना खुड्डी तेज़-तेज़ आता दिखा. उसके हाथ में लकड़ी का छोटा सा अटल्ला था जिसे वह एक्सीलेटर की तरह इस्तेमाल कर रहा था. टायर चलाने के बारे में मैंने कभी सोचा नहीं था क्योंकि वह रतीपइयां के मुकाबले बहुत गंवार और घामड़ लगा करता था लेकिन जिस कौशल के साथ मुन्ना खुड्डी टायर का संचालन कर रहा थामुझे वह थोड़ा आकर्षक लगा.

बहुत नक्शेबाजी और अदा के साथ टायर को मेरे नज़दीक लाकर तीन-चार बार टेढ़ा घुमाने के बाद वह स्थिर हुआ तो बहुत देशी टाइप के अंदाज़ में बोला – “और गुरुमजा?”

मैं भी उसी स्टाइल में बोला – “हां गुरुमजा. मने भौते मजा.

मुन्ना मुझसे लिपटने को सा हुआ पर उसकी गंदी बनियान देखकर मैं थोड़ा पीछे हट गया. उसने बुरा नहीं माना. हमने पुलिया पार की और नहर की बगल वाली मुख्य चौड़ी सड़क पर आ गए. मैं सड़क पर पहुँचते ही डाम की दिशा में जाने को हुआ तो उसने मेरा हाथ पकड़ लिया और बोला – “गुरुउधर नहींइधर ... इधर.

उधर मतलब पाकिस्तानियों के बगीचे में! मेरी फूंक सरक गयी.

अरेआप मने डरिये मत. हम आपको वहां थोड़े ही ले जा रहे हैं. आप डरते बहुत हैं.” वह अपनी सुपरिचित टेरिटरी में ले जाने की धौंस से मुझे आतंकित करने का प्रयास कर रहा था. डाम की और जाने के बजाय हम थोड़ी दूर तक उल्टी दिशा में भवानीगंज की तरफ चले और बाईं तरफ नहर की उल्टी तरफ सीढियां आने पर नीचे उतर गए. ऊपर सड़क से यह हिस्सा नज़र नहीं आता था. बीसेक सीढ़ी उतरने के बाद एक रौखड़नुमा मैदान आया. बाँध का गेट बंद था और सारा पानी नहर में छोड़े जाने के कारण रौखड़ से थोड़ी दूरी पर नदी की दुबली सी धारा बह रही थी. धारा के थोड़ा सा आगे एक ऊंचा सा टीला था. मुन्ना ने मुझे अपने पीछे आने का संकेत किया और उसी पतली धारा की तरफ बढ़ने लगा. उसने अपना टायर शिवजी के सांप की तरह गले में डाल लिया था और अपने धारीदार पजामे के पांयचे आधी जाँघों तक खींच लिए थे. हाफपैंट और पौलिएस्टर की कमीज़ पहने बाबूसाहब बना हुआ मैं उसके पीछे चल रहा था. मुन्ना की देह थोड़ी बेडौल थी -  उसके कूल्हे उसकी मरगिल्ली टांगों के अनुपात के हिसाब से काफी स्थूल थे और उसकी चाल में एक नैसर्गिक लेकिन भौंडी लचक थी.

मैंने पलटकर देखा – नहर वाली सड़क काफी पीछे जा चुकी थी जिनमें इक्का-दुक्का लोग टहलते दिखाई दे रहे थे.  बाईं तरफ निगाह डालने पर ज्याउल के घर वाली कॉलोनी की छतें नज़र आ रही थीं और उनकी और बाईं तरफ डाम. मेरे सामने रूखी पथरीली ज़मीन थी और मैं मुन्ना खुड्डी के नेतृत्व में कहीं जा रहा था. मुझे अचानक डर लगना शुरू हुआ और शर्म भी आने लगी कि मैं कल ही रामनगर आये इस छोकरे के कहने पर अनजान जगह पर जा रहा हूँ. घर में इस बाबत पूछे जाने पर मैं क्या उत्तर दूंगा – इस सवाल से भी मुझे भय लग रहा था. मैं ठिठक गया मगर जब मुन्ना ने मुझे रुका हुआ देखकर अपनी दो उँगलियों से मुझे अपमानित करने की कोशिश करता परिचित रामनगरी इशारा कियामैंने फैसला कर लिया कि चाहे जो होखुड्डी से पहले टीले तक पहुँच जाऊंगा. आगे जो होगा देखा जाएगा.

मैंने अपनी चप्पलें हाथों में थामे और धारा की तरफ दौड़ चला. मैं मुन्ना के पास पहुंचा तो उसने भी दौड़ना शुरू कर दिया. धारा में बस टखनों की ऊंचाई तक का बहुत शीतल पानी था जिसे पार करने में हमें कोई आधा मिनट लगा. अब हम दोनों हंस रहे थे और धारा के उस तरफ थे. टीले की जड़ हमारे सामने थी. एक ठूंठनुमा पेड़ के तने के निचले हिस्से पर किसी ने काजल जैसी कोई चीज़ पोत दी थी. नियमित रूप से धूप-अगरबत्तियां जलाए जाने के अवशेष और दर्ज़नों हुक्केचिलमें और मिट्टी की बहुत छोटी सुराहियाँ इधर-उधर बिखरी हुई थीं. यह थोड़ा आकर्षक और पर्याप्त रहस्यमय माहौल था. नाटकीय अंदाज़ में मुन्ना ने पेड़ के तने पर लगे काजल पर अपना काला अंगूठा फिराया और उससे लगी कालिख को अपने काले ही माथे पर किसी टीके की तरह लगा लिया. वह अजीब हौकलेट नज़र आने लगा था. उसकी देहभाषा अचानक बदली और वह पास में ही पड़े एक बड़े से पत्थर पर जांघ पर जांघ धरे उसी तरह बैठ गया लिस तरह लफत्तू रामलीला में रावण का पाट खेलता ढाबू की छत पर बैठा करता था.

चम्बल क्या करने आये हो ठाकुरये जीवा का इलाका है! जीवा ने गंगा की सौगंध खाई है कि जसवंत सिंह की बोटी-बोटी चील-कौवों को खिला कर ही अपनी माँ का बदला लेगा.

मुन्ना खुड्डी लुफ्त की मौज के चरम पर आकर किसी पिक्चर के डायलॉग की कॉपी कर रहा है - इतना तो समझ में आया पर यह पता नहीं चला कि किस पिक्चर की.

मैंने आपका नमक खाया है मालिक!” और गोली खाने का इंतज़ार करता हुआ मैं गब्बर का नालायक-निखिद्द डाकू बन गया.

खुड्डी पाए से उखड़ता बोला – “मने आप रामनगर वाले हर बात में गब्बर सिंह को पेल देते हैं. हम अमीताबच्चन का डायलॉग कह रहे हैं तो आपको चाहिए कि आप पराण नहीं तो कम से कम शेट्टिया तो बन ही न सकते हैं. हैं मने ...

अपने को रामनगर वालों से श्रेष्ठ समझने की उसकी इस फौंस पर मैंने उससे वापस लौटने की बात करना शुरू कर दिया. इस पर गब्बर और शेट्टी की बात तुरन्त  भुलाकर वह मेरा हाथ थामे टीले के उस पार लेकर गया.

एक पथरीला मैदान था जो टीले की बनावट के कारण किसी भी और जगह से नज़र नहीं आता था. मैदान पर डाम बनाते समय की बची खुची सामग्री बिखरी पड़ी थी – खस्ता हो चुकीं पत्थर ढोने वाली दसियों छोटी-छोटी दुपहिया गाड़ियांसीढ़ियाँसीमेंट के विशालकाय चौकोर स्लैब और सीमेंट की परत लगी बाल्टियाँ और भी जाने क्या-क्या.    

ये है हमारा चम्बल गुरु. यहीं ठोका था टुन्ना झर्री ने उनको. तब से यहाँ आने की अपने अलावा किसी की हिम्मत नहीं होती.” उंगली की कैंची बनाकर आँख मारते मुन्ना ने कहा.

मैंने ढंग से जगह का मुआयना किया. जगह अद्भुत गलैमर से भरपूर थी. शोले के गब्बर के अड्डे से किसी भी सूरत में कम नहीं. लेकिन देर हो रही थी. मुझे शाम ढलने से पहले घर पहुंचना होता था – यह बात मुन्ना को भी मालूम थी. जल्द ही फिर सारी टीम के साथ यहाँ आने की योजना बनाते हम वापस लौटे. बनवारी मधुवन तक आते-आते मुन्ना खुड्डी ने मुझे हिमालय में लगी नई पिक्चर ‘गंगा की सौगंध’ की पूरी कहानी सुना दी थी.  

कल सुबे चलते देखने यार मुन्ना. पैसे नहीं हैं मगर मेरे पास.” – मुझे बौने के चालीस पैसे के उधार की बात भी याद थी.

अरे पैसे की अपन को कब कमी हुई उस्ताद! ... चलिए थोड़ा सा काम निबटा लेटे हैं घर जाने से पहले पंडिज्जी!” मुन्ना मुझे ठेलते हुए दाईं तरफ कटने वाली गली में घुस गया. एक चहारदीवारी के अन्दर गेरुवा पुते हुए बरगद के पेड़ को देखते ही मालूम पड़ जाता था कि वह कोई मंदिर है. मैंने इस वाले मंदिर को पहले कभी नहीं देखा था.

मुन्ना और मैं मंदिर के अहाते में थे. एक छोटे से मकाननुमा मंदिर के अहाते में घुटने टेढ़े किये हुए अधलेटा एक दढ़ियल बुड्ढा बांस का बना पंखा झल रहा था. गेरुवा कपड़े धारे एक बूढ़ी अम्मा बर्तन मांज रही थी. जहाँ-तहां घन्टे टंगे हुए थे. बाहर खुले बरामदे में बरगद के पेड़ के नीचे खूब कालिख और तेल-सनी गाद दिखती थी जिसके बीचोबीच एक दिया जल रहा था.

मुन्ना उस जगह के जुगराफिए से परिचित था. वह सीधा बुढ्ढे के पास गया और उसके पैर छूकर बोला – “पांय लागी बाबाजी.” वहां से उड़ता हुआ सा वह बर्तन धोती माई के पास पहुंचा और वहां भी उसने पांयलागी किया और बुढ़िया को माई कहकर पुकारा. सेकेण्ड से पहले वह फिर से बुढ्ढे के पास था. मैं वहीं चहारदीवारी के पास ठिठका खड़ा था. मैं हैरान था कि बुढ्ढे-बुढ़िया ने अब तक मुझे देखकर कोई प्रतिक्रया नहीं दी थी.

बैठो भगत! बहुत दिनों बाद आये भगत! जय जय गर्जिया माता! जय भोले! जय बम! बम बम! जय जय! हरिओम हरिओम ... ” ऊटपटांग बातें कहताडकार लेटा बुढ्ढा अपने हाथों से जिस तरह सामने की ज़मीन टटोल रहा था मुझे तुरंत पता चल गया कि वह अंधा है. यही बात मैंने बुढ़िया को गौर से ताड़ते ही समझ ली. वह भी अंधी थी. बाबा मुन्ना के सर पर हाथ रखकर उसे आशीष देता और डकारें लेता जाता था. बुढ़िया भी अब तक वहां आ  चुकी थी और मुन्ना पर लाड़ से हाथ फेर रहे थी.

पांचेक मिनट बाद “घर पर परसाद दे देना भगत!” कहते हुए बुढ्ढे ने अपने सर के नीचे धरी पोटली की गाँठ खोलकर उसमें से थोड़े से परवल के दाने और गुड़ का एक टुकड़ा निकालकर मुन्ना के हाथ में थमा दिए. “अब घर जाओ भगतसंध्या की वेला हो गयी!

मैं तब तक बरगद की छाँह में आ गया था. मैंने चोर निगाह से पेड़ के तले रखे दिए के नीचे पड़े कुछ सिक्के ताड़ लिए थे. लेकिन वह भगवानजी का घर था.

मुन्ना ने सधे हुए तरीके से दुबारा चरण-स्पर्श कार्यक्रम किया और मेरे पास आ गया. बिजली की फुर्ती से उसने वे सारे सिक्के अपनी नन्ही हथेली में दबोचे और कुशल चोर की तत्परता से मंदिर कॉम्प्लेक्स से बाहर निकल गया.  

बाहर निकला तो भगवान जी घर में किये गए पाप में ट्वेंटी परसेंट की हिस्सेदारी कर चुकने के अपराध की वजह से मेरी घिग्घी बंधी हुई थी. मुन्ना की अलबत्ता बत्तीसी खिली हुई थी और वह सिक्के गिन रहा था – “गंगा मैया की सौगंधआज खजाना लूट लिया जीवा ने! 

Wednesday, May 18, 2016

भोर सुहानी चंचल बालक और जैहनूमान

लफ़त्तू अब भी मुरादाबाद में भर्ती था और उसकी सलामती की बाबत न लालसिंह के पास कोई सूचना थी न फ़ुच्ची के पास. मेरी बहनें लफ़त्तू की बहनों की दोस्त थीं और उनसे कुछ पूछना मुझे गवारा न था क्योंकि लफ़त्तू को हमारे घर पर बहुत बड़ा चोट्टा समझा जाता था. जब-तब उसके पापा गांठ-लगा थैला किए मुरादाबाद जाने वाली बस के इन्तज़ार में बस अड्डे पर खड़े नज़र आते और मेरा कलेजा गले में किसी फांस की तरह अटक जाया करता. कायपद्दातैराकीबैटमिन्डल और क्रिकेट वगैरह सारी गतिविधियों पर विराम लग चुका था और मेरा मन लगातार किसी आसन्न बुरी ख़बर से कांपा करता.

गर्मियां आया चाहती थीं और लम्बी छुट्टियां भी. गर्मियों का मतलब होता था जुल्मी की बक्से वाले वाली कुल्फीलाला की पिस्ते वाली लस्सीपोदीने वाला गन्ने का रसआमतरबूजलम्बी दोपहरियाँ और घर आने वाले मेहमानों की बाढ़ का बंद हो जाना. मेरे घर पर जाड़ों भर रिश्तेदार-मेहमानों का तांता लगा रहता जो पता नहीं कहाँ-कहाँ से आकर हमारे घर के अलग-अलग कमरों में अपनी-अपनी सुविधा के हिसाब से नत्थी होते रहते थे – चूंकि घर से नेरा ताल्लुक सिर्फ खाने और सोने तक महदूद हुआ करता थाइन अतिथियों के समय-समय आते रहने से मुझे बहुत दिक्कत नहीं होती थी. बस माँ और बहनों को बुरादे की अंगीठी के सामने बैठे-बैठे हर रात एक करोड़ रोटियाँ बेलते-सेंकते देखना मुझे नहीं भाता था.

हमारे एक दद्दा थे जिनकी खुराक अड़तीस-चालीस रोटी की हुआ करती थीएक चचा कहीं से आते थे और बड़े भाई को अहर्निश बस त्रिकोण-वर्ग-आयत कराते रहते थेएक मामू थे जिनकी पीठ सदैव फोड़े-फुंसियों की कॉलोनी बनी रहती थी जिनके इलाज के लिए वे हर साल हफ्ता-दस दिन रामनगर के हर डाक्टर-वैद्य-हकीम के दर पर सवाली बने रहने के उपरान्त थैला भर ट्यूबेंलेपगोलियांकाढ़े वगैरह लेकर वापस अपने घर जाते थेबाबू के बचपन के एक दोस्त थे जो हर होली से हफ्ते भर पहले घर के बैठकखाने पर पड़े तखत को अपना अड्डा बना लेते – इस तखत पर वे दिन भर अधमरे पड़े-लेटे रहते लेकिन शाम होने से लेकर सोने तक उनके भीतर पता नहीं कहाँ से के. एल. सहगल की आत्मा घुस जाती और वे अपनी तनिक नक्कू और अचारी आवाज़ में ‘भोर सुहानी चंचल बालक’ और ‘एक राजे का बेटा’ जैसे सड़ियल क्लासिक गाने गाते रहते. पिताजी वक्त पर घर आ चुके होते तो उनके साथ बैठे ‘वाह साब’ का जाप करते अपनी फाइलें निपटाते रहते वरना सहगल साब खुली खिड़की से बाहर बस अड्डे-खेल मैदान और आटे की चक्की का विहंगम दृश्य देखते ‘प्रीतम आन मिलो’ करते रहते. इस दौरान उन्हें लगातार पानी सी सप्लाई करते रहना होती थी क्योंकि उन्हें पानी की प्यास केवल शाम के बाद से लगना शुरू होती थी. स्टील के बिना हैंडल वाले जग में भर-भर कर पानी उन तक पहुंचाने की जिम्मेदारी बड़े भाई की हुआ करती. लफत्तू उन्हें लगातार तखत पर बैठे देखता तो अपने पापा से सीखी हुई एक कविता फुसफुसाकर बेकाबू हंसता हुआ दोहरा हो जाया करता था-

आइये हुजूर
खाइए खजूर
बैठिये तखत पर
पादिये बखत पर

एक बाबाजी आते थे जिनके आने पर हमें अपनी अंग्रेज़ी ग्रामर की किताबें निकाल कर उनके सामने बैठ जाना होता था. वे घंटों हमें आई एन जी लगाने के नुस्खे सिखाया करते और टाफियां देते जाते. वे कभी-कभार बांसुरी निकाल लेते और उससे कुत्ते के रोने की जैसी आवाजें निकाला करते और हमसे साथ-साथ ‘गोपालागोपाला’ गाने को कहते. टाफी और बांसुरी के इस बेढब सामंजस्य का आकर्षण एक बार लफत्तू को भी मेरे घर बाकायदा कापी-किताब समेत लेकर आया लेकिन उसी शाम को कायापद्दा खेलते हुए उसने बाबाजी को हॉकलेट घोषित करते हुए मुझे चेताया कि बुढ्ढा बाबा हमारे घर पर डकैती डालने की योजना बना रहा है. 

लफत्तू का बीमार होकर यूं मेरे संसार से मुरादाबाद चले जाना बहुत कचोटा करता और उसके बिना रामनगर की हर शै आकर्षणविहीन हो गयी थी. फुच्ची ने मेरे घर पर आकर मुझे अपने साथ ले जाने को कुछ दिनों से नियम बना लिया था. मैं उसके साथ केवल इस वजह से चला जाया करता कि उसके पास पैसे होते थे और मौका-बेमौका गम गलत करने को वह बमपकौड़ा खिलवा दिया करता था. लफत्तू के घर के सामने वाले मकान में नए किरायेदार आ गए थे जिनकी कॉलेजगामिनी मुटल्ली लड़की का नाम फुच्ची ने प्रत्यक्ष कारणों से जीनातमान रख दिया था.

इस मुटल्ली जीनातमान की दोस्ती रामनगर आते ही उसके घर के सामने वाले पप्पी मांटेसरी स्कूल वाली मेरी और फुच्ची की पुरानी लौ अर्थात मधुबाला मास्टरानी से ही गयी थी और ये दोनों हीरोइनें यदा-कदा साथ-साथ जुल्मी के बक्से की कुल्फी खातींफिक्क-फिक्क हंसतीं अपने दुपट्टे संभालतीं नज़र आ जाया करतीं. फुच्ची मुझे हर शाम लफत्तू के घर के सामने से होकर ही कहीं ले जाया करता. कई बार तो एक ही शाम हम उसके सामने से छः-सात बार तक गुज़रा करते. फुच्ची को जीनातमान में न जाने क्या नज़र आता था कि लार टपकाता वह उसके घर की तरफ इतनी बार देखने की नीयत से उसी रास्ते पर से गुज़रता हुआ भी बोर नहीं होता था. एक दिन जब हम साह जी की चक्की से फुच्ची के घर का आटा पिसवा कर लौट रहे थेचौराहे के उस तरफ हाथीखाने की तरफ से जीनातमान और मधुबाला आती नज़र आईं . उनके आगे-आगे हाथी चल रहा था.  फुच्ची ने धप से आटे का थैला नीचे धरा और मेरा हाथ थामकर हाथीखाने की राह लग लिया. हाथी हमसे करीब बीस मीटर दूर था और उसकी टांगों के बीच से दोनों हीरोइनों को देखा जा सकता था. वे बेमतलब मटकती हुईं ,गपियाती हमारी तरफ को आ रही थीं. मैंने एक निगाह फुच्ची के चेहरे पर डाली तो पाया कि उसकी वाकई में लार टपक रही थी. मुझे हंसी आने को हुई कि हाथी अचानक  रुका और उसने बीच सड़क पर ढेर सारा गोबर कर दिया. फुच्ची का सारा रोमांस हाथी के गोबर ने गोबर बना दिया और अचानक हुए इस सार्वजनिक गजगोबरीकरण से हकबकाया नायिकाद्वय अपने होंठों को दुपट्टे से ढांपता वहीं बगल में रहनेवाले पुरिया चोर के घर घुस गया.

नसीम अंजुम का मेरे और मेरी बहनों की जिंदगानियों में आना किसी तिलिस्म की तरह घटा. उसके पापा जंगलात के बहुत बड़े अफसर थे और लखीमपुर से हमारे पड़ोस में हाल ही में शिफ्ट हुए थे. नसीम अंजुम मेरी मंझली बहन की क्लास में पढ़ती थी और हमारे घर पहली बार आने के पंद्रह मिनट के भीतर ही उसने अपनी ठसकेदार भाषा और मुस्कान से घर के हर सदस्य को अपना बना लिया था. वह खुद को कभी भी केवल नसीम कहकर नहीं बल्कि नसीम अंजुम कहकर संबोधित करती थी और अपने बारे में इस तरह बोलती थी जैसे वह खुद कोई और हो – “तो आन्टी अम्मी ने हमसे कहा कि नसीम अंजुम आपका दिमाग खराब हो गया है. अब नसीम अंजुम किसी को कैसे बताएं कि हुआ क्या था. आप ही बताइये आन्टी घर पर जब कोई मेहमान आया हो तो उसे बिना कुछ खिलाये-पिलाए कैसे जाने दे सकते हैं. तो अम्मी घर पे थी नहीं और हमने जोशी अंकल को चाय के साथ वो रात वाले समोसे गरम करके परोसने की ठान ली. अब नसीम अंजुम को क्या पता कि बिजली का हीटर कैसे चलता है. बस लग गया करंट. ये देखिये कित्ता तो बड़ा दाग लगा था.” ऐसा कहकर उसने अपनी नन्हीं सी कलाई को उघाड़कर लखीमपुर में तीन साल पहले लगे करंट के निशान को उरियां किया. “तो जब नसीम अंजुम अब्बू के साथ अस्पताल से वापस घर पहुँचीं तो अम्मी बोलीं नसीम अंजुम आपका दिमाग खराब हो गया है. बताइये ऐसे कोई बोलता है आन्टीतो नसीम अंजुम ने फैसला किया ...” खिलखिलाती हुई वह बकबक करती जाती थी और सामने रखे बिस्कुटों को एक के ऊपर एक रखकर पहले कुतुबमीनार सी बनाती फिर गिराती जाती. उसकी पतली-पतली सुन्दर उँगलियों में से एक पर लगी चमचम करती छोटी सी अंगूठी के नगीने पर जब-जब शाम की धूप सीधी पड़ जातीउसकी नाक के नुकीले छोर पर पर सतरंगी दिपदिप झलमलाने लगती. वह उस वक़्त मुझे अप्रतिम सुन्दर लगी लेकिन बाहर से फुच्ची का “बीयो ... ओ ... ओ ... ई ...” वाला आमंत्रण संकेत दूसरी दफ़ा आते ही मुझे निकलना पड़ा.

फुच्ची के कोयला चेहरे पर पसीने की मोटी-मोटी बूँदें थीं और वह काफी उत्तेजित और व्यग्र लगता था. वह मुझे देखते ही सीधा लालसिंह की दुकान की दिशा में बढ़ चला. पीछे-पीछे मैं पहुंचा तो लालसिंह पहले से ही बाहर खड़ा होकर बस अड्डे की तरफ निगाहें गड़ाए थे. मैंने भी उस तरफ देखा. पहलवान के ठेले पर लफत्तू के माँ-बाप लाल कम्बल में लपेटे लफत्तू को लिटा रहे थे.

मेरे ख़याल से लफत्तू लिकल्लिया!” लालसिंह ने बेहद खतरनाक आवाज़ निकालते हुए थूक गटका.

क्या मतलब बे!” यह फुच्ची था.

मेरी ईजा को भी बाबू ऐसे ही लाये थे मुरादाबाद से.

तेरी ईजा तो बुढ्ढी थी बे. लफत्तू ऐसे कैसे ...

वही तो मैं कह रहा हूँ फुच्चन बेटे. देख कम्बल ज़रा भी हिल नहीं रहा. गया लफत्तू ...” 

लालसिंह दुकान के बाहर धरी बेंच पर अधपसर सा गया. इस वार्तालाप को आगे सुनने की मेरे भीतर ताकत नहीं बची थी और मैं खेलमैदान की तरफ भाग गया. मेरी रुलाई फूट रही थी जबकि चारों तरफ बच्चे साइकिल चला रहे थे. अभी लफत्तू होता तो उस छोटे से बच्चे को साइकिल सिखाने लगता जिससे गद्दी पर नहीं बैठा जा रहा था. मैं भागता भागता बौने के ठेले तक पहुँच गया जहाँ उसके दोनों अधनंगे बच्चे अखबार के टुकड़ों से नाव और जहाज़ बनाने का खेल खेल रहे थे. बौना एक और अखबार का पंखा झल रहा था और उसकी मैली बनियान पसीने से भीगकर भूरी पड़ चुकी थी. उसने मुझे देखा तो तुरंत हरकत में आ गया मसालेदार आलू का गोला बनाने लगा.

जैसे ही मैं उसके ऐन सामने आया उसने मेरी बहती हुई आँखें ताड़ लीं और खुशामदी लहजे में बोला – “सब ठीक तो है ना बाबूजी!

वो लफत्तू ...

इतनी बड़ी त्रासदी घट गयी थी और बौना आलू के गोले को बेसन के घोल में डुबो रहा था.

बहुत दिनों से बड़े वाले बाबूजी नहीं आ रहे ...

उसी की बात तो बता रहा हूँ. लफत्तू मर गया आज ...” यह कहते कहते मैं इतनी जोर जोर से रोने लगा कि साइकिल चला रहे एकाध बच्चों तक ने मेरी तरफ निगाह डाली अलबत्ता वे अपने काम में लगे रहे. बमपकौड़े अब गरम तेल की कढ़ाई में खदबदाने लगे थे और आसपास की हवा सुपरिचित गंध से भारी होती जा रही थी.

ऐसे थोड़े ही होता है बाबूजी. बड़े बाबूजी के घरवाले हनूमान जी के भगत हैं. हनूमान जी ऐसे ही थोड़ी होने दे सकते हैं. बड़े बाबूजी को कुछ नहीं होगा. मुझे पता है ...” बौना ज्ञान गाँठ रहा था और पत्तल बना रहा था.

मेरा रोना अब तकरीबन बंद हो चुका था और बौने के हाथों में धरा पत्तल मेरे सामने था : “खाइए बाबूजी ... पैसे की कोई बात नहीं ...

एक पल को असमंजस हुआ कि दोस्त के मरने पर इतना बेशर्म कैसे हुआ जा सकता है लेकिन बमपकौड़े की महक के आगे मेरी हार हुई और बौना जीत गया. इस फ़ोकट पार्टी के बाद मेरा चित्त थोड़ा शांत हुआ. मैंने पहली बार अकेले बौने के ठेले पर यह कारनामा अंजाम दिया था. अब मुझे दुःख भी कम हो रहा था. पिक्चर देखने का मन कर रहा था. बौने ने एक बार उकसाया तो मैंने फ़ौरन फर्श पर अपना गाल टिकाया और हॉकलेट धरमेंदर की कोई पिक्चर देखने लगा. पिक्चर बीसेक मिनट में धरमेंदर और मुच्छड़ पुलिसवाले के बीच हुई लम्बी वार्ता और जीनातमान के साथ उसके गाना गाने के साथ ख़तम हो गयी.

मैं कपड़े सही करने लगा तो बौना बोला : “चालीस पैसे हुए बाबूजी. अगली बार दे दीजियेगा. अब घर जाइए. हनूमान जी भली करेंगे.” बौने ने अपना सफल व्यापारी रूप दिखाया और जैहनूमान ग्यानगुनसागर गुनगुनाने लगा. दोस्त की मौत के बाद बमपकौड़ा खाना और पिक्चर देखना और वो भी उधार में – अपराधबोध से अटा हुआ मैं जब घर के दरवाज़े पर पहुंचा तो शाम धुंधला चुकी थी. एक निगाह लालसिंह की दुकान की दिशा में डाली तो वहां कुछ भी उल्लेखनीय होता नज़र नहीं आया. मुंह में बीड़ी चिपकाए लालसिंह के बाबू चाय की केतली के मुंह पर फंसे अदरक के टुकड़े को निकाल रहे थे और मेरे दोस्तों का नामोनिशान तक नहीं था. मैं समझ गया वो लफत्तू के घर गए होंगे.

मैं जीना चढ़ ही रहा था कि माँ और मेरी दोनों बहनें एक साथ दरवाज़े से बाहर निकले.

तू था कहाँ ... हर जगह देख आये तुझे. चल अंकल जी के घर चलना है. लफत्तू की मम्मी बुला रही तुझको.

लफत्तू के घर छोटा-मोटा मजमा लगा हुआ था जैसा बंटू के दादाजी के मरने पर लगा था. लफत्तू की बहनें एक कोने में खड़ी थीं और उसका जल्लाद भाई सियाबर बैद जी के कानों में मुंह सटाए जोर-जोर से कुछ कह रहा था. परसूराम मास्साब और विलायती सांड भी नज़र आ रहे थे. माँ ने मेरा और छोटी बहन का हाथ थामा हुआ था और वह वैसे ही हमें घसीटते हुए लफत्तू के घर के भीतर ले गयी. बाहर के कमरे की कुर्सियों पर लफत्तू के पापा और कुछ पड़ोसी विराजमान थे. माँ हमें भीतर के कमरे में ले गयी.

लफत्तू जिंदा था और उसकी नाक बह रही थी. उसकी मम्मी उसे मुसम्मी का शरबत पिला रही थी.   

लफत्तू मरा नहीं था क्योंकि उसको बौने के हनूमानजी ने बचा लिया था.

लफत्तू बहुत बीमार और दुबला दिख रहा था पर मुझ पर निगाह पड़ते ही उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गयी. उसकी मम्मी के इशारे पर मैं आगे बढ़कर लफत्तू की बगल में बिस्तर पर बैठ गया. मैं उसे गले लगा कर और खूब रोना-पीटना करके अपना जी हल्का कर लेना चाहता था. मैं अपने मन की सारी भावनाएं उसके उसके सामने उड़ेल कर उसका हाथ भी थामे रहना चाहता था लेकिन मैं पैदाइशी घुन्ना था और चुपचाप फर्श पर निगाहें लगाए औरतों की बातें सुनता दुखी होता रहा.

लफत्तू को अगले छः महीने तक स्कूल जाने की इजाजत नहीं थी. उसे हर पंद्रह दिन पर मुरादाबाद ले जाया जाना था. उसके भोजन और दवा में हज़ार तरह की सावधानियां बरती जानी थीं.

दो दिन की देर हुई होती तो हमारा बच्चा तो ...” लफत्तू की मम्मी मेरी माँ को बता रही थीं. “अब की सोमवार को गर्जिया माता के दरबार में हाजिरी लगानी है दिदी! अब तो माता का ही सहारा हुआ हमें ...

कम्बल के नीचे से लफत्तू ने अपना हाथ बाहर निकाला तो कलाई पर चिपकी हुई प्लास्टिक की एक मशीननुमा चीज़ ने मुझे आकर्षित किया.

इसी में डाल के हज़ारों इंजेक्सन लगाए मेरे बच्चे को जल्लादों ने ... इसी में डाल के दिदी ...” लफत्तू की माँ ने अब रोना शुरू कर दिया था. देखादेखी मेरी माँ ने भी वही काम शुरू कर दिया. ज़मीन पर बैठी दो मुटल्ली औरतों ने भी इस कार्यक्रम में शरीक होना अपना फ़र्ज़ समझा और मिनट के भीतर-भीतर कमरे में बकौल लफत्तू मोर्रम का जल्सा शुरू हो गया. बस औरतों के छाती पीटने की कमी बची थी. औरतों की इस बेपरवाह नाटकीयता के चक्कर में मैं लफत्तू को सीधे देख सकने की हिम्मत जुटा सका. मैं उसे देखता हुआ अपने चेहरे को भरसक मनहूस बनाने की कोशिश कर रहा था कि मौके का फायदा उठाकर उसने इंजेक्सन से जख्मी अपने हाथ से मेरी पिद्दी पिछाड़ी पर जोर की चिकोटी काटी और आँख मार कर मंद-मंद मुस्कराने लगा. उसने उंगली से मेरी कमीज़ के आगे के उस हिस्से को छुआ जिस पर मेरे द्वारा अभी अभी किये गए अपराध का सबूत चस्पां था. कमीज़ पर गिरी हुई मिर्चीदार हरी चटनी अब तक सूखी नहीं थी जिसे देखकर उसने अपना पुराना डायलॉग फुसफुसाया “थाले गब्बल के बिना मौद कात लए तुम थब.

अब मुझे सच्ची मुच्ची का रोना आ गया.  

तू जल्दी से ठीक हो जा यार लफत्तू. मेरा कहीं भी मन नहीं लगता.” ऐसे ही एकाध वाक्य मेरे मुंह से निकल सके. लफत्तू ने अपने घायल हाथ से मेरा हाथ थामा और कम्बल के भीतर कर लिया. उसकी हथेली पसीने से भीग गयी थी लेकिन उसने एकाध मिनट तक मेरा हाथ नहीं छोड़ा. उसकी पलकों के कोरों पर भी एक नन्हा सा आंसू ठिठक सा गया था. यह उस्ताद और शागिर्द के दरम्यान लम्बे अरसे बाद हो रहा मूक लेकिन भावपूर्ण संवाद था जिसने आगे के दिनों में हमारी गर्मी की छुट्टियों और नए मोहब्बतनामों की दिशा तय करनी थी. 


लफत्तू की तबीयत का हाल जानने को हमारी समूची मंडली कितनी व्याकुल थी इसका पता दूधिये वाली गली से लगातार आ रही "बीयोओओओई ..." की बेचैन आवाजों से चल रहा था जो बताती थीं कि फुच्ची, मुन्ना खुड्डी, बंटू, लालसिंह, जगुवा पौंक और बागड़बिल्ला वगैरह व्याकुल होकर लफंडर-यूथ बनाए मेरे बाहर आने की प्रतीक्षा कर रहे थे.   

Wednesday, February 27, 2013

स्टेट बैंक ऑफ धकियाचमन

लफत्तू के भाई ने इन पैसों को अपने पापा की जेब से चुराया था जिन्हें पराक्रमी लफत्तू उसकी जेब से अंटी कर लाया था. मेरे लिए यह कल्पना ही सिहरा देने वाली थी की लफत्तू अपने भाई जैसे जल्लाद की जेब काट सकने का कारनामा अंजाम दे सकता था. इस में डबल खतरा था लेकिन लफत्तू कहता था की बेते बखत एता ई एगा दब कोई किती के कते पे पेताब बी फ़ोकत में नईं कलता और गब्बल के किसी न डरने की उसकी ऐंठ तो थी ही.

इसी सम्मलेन को जारी रखते हुए हम घर की राह पर थे जब लालसिंह की दूकान आ गई. फुच्ची और कलूटे गेटकीपर की संगत में लालसिंह बीड़ी पीना सीख चुका था. सो वे तीनों दूकान के सामने, लालसिंह के पापा की अनुपस्थिति की मौज काटते हुए नवधूमकेतुवतार बने हुए छुट्टी के बाद स्कूल से घर न लौटने वाले नौसिखुवा घुच्ची खिलाड़ियों का प्रदर्शन देखते हुए जब तब कोई सलाहनुमा गाली सज्जित टुकड़ा उनकी दिशा में प्रक्षेपित करते हुए नए लौंडों को अपने अनुभव से आतंकित किए जाते थे.

“अबे ह्वां से खड़ा होके टौंचा लगा बे मिद्दू के ...”

“मने ये तो बम्बाघेर से लौट कर आए हैं ससुरे टुन्ना की ससुराल से ...”

कलूटा गेटकीपर उम्र में इन तीनों में सब से सयाना था और एक आँख घुच्चीक्रीड़ा पर लगाए दूसरी से स्कूल से घर ही लौट रहे मालों को ताड़ भी रहा था. मासूम लेकिन शर्तिया प्रतिभासंपन्न जुआरी बच्चे कुछ देर तक इन वरिष्ठ खिलाड़ियों की बातें सुनते रहे पर उनमें जो सबसे दबंग टाइप का छोकरा था, वह इस अनावश्यक व्यवधान से जब ख़ासा आजिज आ गया तो उसने “बीड़ी सूतते रहो दद्दा और बतख के बच्चे को गोता लगाना ना सिखाओ. हम भवानीगंज से आए हैं और जो ये पिक्चर हॉल वाले दद्दा जो इसके अलावे कर रहे हैं उन्हें बता दीजो कि तुम्हारे खताड़ी वाले आसिक साईं बाबा मंजूर को हमने जित्ते फत्तर मारे हैं उत्ते इन्ने टिकट ना काटे होंगे. ...”

यह एक आसन्न अन्तर्मोहल्लीय युद्ध के शुरू होने लायक उकसावा था. यानी घुच्ची के क्षेत्र में अरसे से सर्वमान्य चैम्पियन माने जाने वाले भवानीगंज के स्कूली छोकरे अब खताड़ी आकर अपनी धौंस दिखा रहे थे और वो भी फुच्ची कप्तान और लालसिंह जैसे वेटरनों के सामने. “तेरी ...” कहते हुए ज्यों ही गेटकीपर इस बदकार लौंडे की तरफ बढ़ने को हुआ भवानीगंज के सूरमा ने झुके झुके ही मुठ्ठी भर मिट्टी ज़मीन से उठाकर उसकी तरफ फेंकी. कलूटा गेटकीपर अर्ध चित्त होकर गिरने को ही हुआ कि घुच्चीदल अपने अपने पांच पैसों के खजाने उठाकर नहर की दिशा वाले शॉर्टकट से भवानीगंज की तरफ भाग चला.

लफत्तू इस सारे घटनाक्रम को निर्विकार भाव से देखता रहा और उसने एक बार भी अपनी किसी भी तरह की राजनैतिक प्रतिबद्धता ज़ाहिर नहीं की. मैं तनिक हैरान था जबकि लालसिंह आहत लग रहा था. कलूटा गेटकीपर अर्धचित्तावस्था में ही एक एक को देख लेने की बातें करता हुआ आँखें मल रहा था. लालसिंह ने उसे लोटा भर पानी दिया. अपनी आँखें वगैरह धो चुकने के बाद “आ बे” कहकर वह फुच्ची को अपने साथ तकरीबन धकियाता हुआ भवानीगंज के उसी शॉर्टकट की राह निकल चला. दो-चार मिनट की इस अप्रत्याशित वारदात के बाद जब माहौल सामान्य सा हुआ तो लालसिंह ने सवालिया निगाहों से लफत्तू पर नज़र डाली.

लफत्तू बिना कुछ कहे मेरा हाथ थामे दूकान के भीतर घुसा और पटरेनुमा बेंच पर बैठते हुए उसने लालसिंह से कुछ न कहते हुए मंथर स्वर में ज़मीन से कहना चालू किया “बीली पीना छई बात नईं ऐ बेते. औल बीली पी के गाली देना भौत गलत. ऊपल थे बत्तों को. गेतकीपल का काम ऐ पित्तल तलाना औल गब्बल का काम ऐ दकैती कलना. ...” अपना प्रवचन जारी रखते हुए उसने अपनी नेकर की भीतरी जेबनुमा जुगाड़ से पांच का वही नोट लालसिंह से समक्ष प्रस्तुत कर दिया.

“अबे हरामी! ... ये कहाँ से चाऊ किया बे? ...” लालसिंह अभी अभी घटी पराजय को जैसे सेकेण्ड भर में भूल गया और नोट को उलट पुलट कर देखने लगा.

“तूलन वाला नईं ऐ बेते ... औल अथली ऐ ... औल बेते येल्ले ...” उसी गुप्त जुगाड़स्थल से इस दफा उसने दस का उस से ज्यादा मुड़ातुड़ा नोट निकाल कर मेरी और लालसिंह दोनों की हवा सरका दी.

यानी पंद्रह रुपए! उफ़!

एक पिक्चर में बैंक लूटने के बाद विलेन जब खुशी में ठठा कर हँसता था उसी तरह हँसने की इच्छा हो रही थी. सामने पिछले हफ्ते हुई बारिश की वजह से बन गए एक गंदले चहबच्चे में सूअर के कोई दर्जन भर बच्चे अपना मेकअप कर रहे थे और पन्द्रह रूपए थामे अतीव प्रमुदित लालसिंह कभी हमें कभी सूअर के बच्चों को देखता. लफत्तू ने बैंक डकैती का खुलासा करते हुए बताया कि दस का वह अतिरिक्त नोट भी उसने घर की दुछत्ती में मौजूद अपने बड़े भाई के उस खजाने से गायब किया था जिसे वह पापा की जेब काट काट भरा करता था.

“बला हलामी बनता ऐ थाला!” इतनी दफा पिट चुकने और जहां-तहां अपमानित किए जा चुकने के बाद लफत्तू के मन में भाई के लिए हिकारत के सिवा कुछ नहीं बच रह गया था.

अब सवाल था इतनी बड़ी रकम का किया क्या जाए. पिक्चर, बमपकौड़ा, किराए की साइकिल और घुच्ची वगैरह पर रईसों की तरह खर्च करने पर भी हद से हद दो-तीन रुपए फुंक सकने थे. लालसिंह ने स्वयंसेवी बैंकर बनने का प्रस्ताव दिया तो डकैतदल ने तुरंत अपनी सहमति दे दी. “हरामी हो पर प्यारे बहुत हो तुम सालो ...” कहते हुए लालसिंह ने जताया कि सब कुछ ठीकठाक है और हमारे सम्बन्ध उतने ही मीठे बने रहने वाले हैं.

घर जाने से पहले दूध-बिस्कुट का आख़िरी भोग लगाते हुए लालसिंह ने हमें कुच्चू और गमलू की बाबत ज़रा सा छेड़ना चाहा पर कुछ सोचकर वह चुपा गया.

***

लफत्तू के घर के सामने वाले घर में इधर जल्द ही एक नए माल के आने का चर्चा क्या छिड़ा रामनगर भर के सारे छिछोरे इस नई बला के बारे में खुसरफुसरलीन हो गए. मोहब्बत में दोहरी-तिहरी मार खा चुके मुझ जन्मजात आसिक के लिए, बावजूद लफत्तू के टूटे हुए दिल के, यह दिलासा देने वाली खबर थी. कम से कम अब यह तो न होगा कि लालसिंह की दूकान से चोरों की तरह पसू अस्पताल की तरफ मनहूस चेहरा बनाए अपनी महबूबा की एक चोर झलक पाने के चक्कर में घंटों गदहापच्चीसी में व्यस्त रहा जाए. लफत्तू के घर की खिड़की से सामने वाले घर का विहंगम दृश्य दिखाई देता था. इसी महीने उस घर में रहने वाली दो प्रौढ़ तोंदियल दंपत्ति-आत्माएं ट्रांसफर होकर कहीं चली गयी थीं. अगला किरायेदार परिवार अगले महीने आना वाला था और वह एक दफा आकर घर का मुआयना कर गया था. उक्त मुआयने के वक़्त बदकिस्मती से मैं मौके पर मौजूद न था, न ही लफत्तू. हाँ फुच्ची कहता था कि वह वहाँ था और यह भी कि आने वाले माल के “इतने बड़े बड़े हैं मने ...” कहता हुआ लार टपकाने की एक्टिंग करता हुआ वह हमें लैला मंजूर वाली नौटंकी के पोस्टर की याद दिलाना न भूलता. अलबत्ता इत्ते बड़े बड़े हमारे किसी काम के न थे. हमें तो आसिकी करनी थी – सच्ची मुच्ची वाली – हीरा खा कर जान दे देने वाली आसिकी.

लफत्तू इस नए माल के इंतज़ार को लेकर न तो उत्साहित दीखता था न आश्वस्त – हमारी बेहद अन्तरंग बातचीतों में जब भी मैं चोर दरवाज़े से कुच्चू-गमलू का ज़िक्र करता, उसका चेहरा बुझ जाया करता और ऐसा करने से अब मैं गुरेज़ करता था.

घासमंडी के मुहाने के ठीक ऊपर जिस स्पॉट पर मोर्रम की बूंदी खाते हुए हमारी सुताई हुई थी, स्कूल के छुट्टी हो जाने के कारण आज वहाँ पर समय जाया करने की नीयत से पढ़ाई का खेल चल रहा था. पढ़ाई का खेल माने सबने एक अक्षर से शुरू होने वाली चीज़ों, फिल्मों, और शहरों-देशों-नदियों इत्यादि के नाम बताने होते थे. खेल में मेरे और लफत्तू के अलावा बंटू, जगुवा पौंक और नॉन-प्लेइंग खिलाड़ी के तौर फुच्ची कप्तान और उसके साथ आया उसका छोटा भाई मुन्ना खुड्डी मौजूद थे.

नियम यह था कि अपनी बारी आने पर जवाब न दे सकने वाले को पहले ‘डी’ की पदवी हासिल होती थी. दूसरी असफलता पर यह ‘डी ओ’ हो जाती और छः पराजयों के बाद ‘डी ओ एन के ई वाइ’ यानी डोंकी यानी गधे की पदवी मिलते ही खेल से बाहर हो जाना था.

‘र’ से रामनगर ‘ब’ से बम्बई जैसी आसान राहों से चलता खेल जब तक ‘ज्ञ’ से ज्ञानपुर जैसे पड़ावों तक पहुंचा तब तक मैं और जगुवा खेल से बाहर होकर गधे बन चुके थे. बंटू और लफत्तू के बीच ‘ज’ को लेकर चैम्पियनशिप के फाइनल की जंग जारी थी. हारने की कगार पर पहुँच चुके लफत्तू ने जब ‘ज’ से दंगलात यानी जंगलात कहा तो बंटू ने विरोध जताते हुए कहा कि ऐसी कोई जगह नहीं होती. लफत्तू का दावा था कि होती है. बंटू हारने से डरता था और उसने अपनी पुरानी टैक्टिक्स अपनाते हुए झूठमूठ रोने का बहाना करते हुए घर चले जाने की धमकी दी. लफत्तू ने अपनी हार मान ली और बंटू से वापस लौटने को कहा. बंटू तुरंत लौट आया.

आगामी कार्यक्रम अर्थात पितुवा के बाग में चोरी के नीबू सानने को लेकर कोई बात चलती फुच्ची का भाई मुन्ना खुड्डी बोला – “कोई हमसे मने खेल के दिखइए न. आप तो बहुत्ते बच्चा गेम खेलते हैं.”

इस चुनौती को लफत्तू ने अन्यमनस्क तरीके से स्वीकार किया क्योंकि इस नए छोकरे को भी खताड़ी में एंट्री लेने से पहले सबक सिखाया जाना ज़रूरी था. जब दोनों खिलाड़ी कोई दस मिनट की कुलेल के बाद भी बराबरी पर थे और हम बाकी बोरियत से भर चुके थे, लफत्तू ने माहौल भांपते हुए मुझे अस्थाई जज बनाकर एक निर्णायक सवाल पूछने को कहा.

दिमाग पर खूब जोर डाल कर मैंने सबसे मुश्किल अक्षर यानी ‘ढ’ से शुरू होने वाले शहर का नाम बताने का चैलेन्ज फेंका. पहली बारी मुन्ना खुड्डी की थी. थोड़ी देर रुआंसा सा होकर वह बोला “इस से कोई नाम होता ही नहीं ... बेईमानी मत कीजिये न.”

लफत्तू ने ठठाकर कहा “ अबे याल धिकुली” – और वह जीत गया. मुन्ना की निराशा अकथनीय थी क्योंकि इन दिनों उसके पापा रामनगर से दसेक किलोमीटर दूर ढिकुली में ही बिजनेस कर रहे थे.

रुआंसे मुन्ना के बड़े भाई की हैसियत से फुच्ची ने एक और चुनौती दी – “अरे बच्चे को हरा के खुस होइएगा ... तनी एक ठो नाम और बतइए जो जानें ...”

“तू बता दे याल. मैं तो गब्बल ऊं बेते ...”

“अब टालिए नहीं न ... कह दीजिए नहीं आता बात खतम ...”

“तूतिया थाले ... तुदे अपने ई गाँव का नाम नईं मालूम - धकियातमन!”

लफत्तू को याद था कि पिछले ही हफ्ते फुच्ची ने हमें अपने गाँवनुमा कस्बे ढकियाचमन के बारे में बताया था. दोनों ढकियाचमनगौरव अपनी ही ज़मीन पर हार गए थे. इसके पहले कि उनका नैराश्य चरम पर पहुँचता लफत्तू ने सबको इस जीत की खुशी में बमपकौड़ा खिलाने की दावत दी. फुच्ची ने तनिक संशय से पहले लफत्तू को फिर हम सब को देखा.

“अले भौत पेते एं बेते गब्बल के पात. औल गब्बल अपने पेते अब बैंक में लकता ऐ ...”

फुच्ची कुछ नहीं समझा. लेकिन दावत बकायदा हुई. बौने ने पैसे नहीं मांगे और “ठीक है बाबू जी!” कह कर हमारे तृप्त शरीरों को विदा किया.

मैकेनिकों वाली गली के आगे से गुजरते हुए उसने मुन्ना के कंधे पर हाथ रख कर कहा “दलते नईं एं बेते ... किती ते नईं ... और आप थमल्लें इत्ता खलाब बखत तल्लिया दब कोई किती के कते पे पेताब बी फ़ोकत में नईं कलता ... बी यो ओ ओ ओ ओ ई ...!”

Friday, November 26, 2010

दैने बाले सिरी भगवान और इन्तलनेछनल फकील

हफ़्ते के एक नियत दिन खताड़ी और उसके आसपास के मोहल्लों में भीख मांगने आने वाला एक बूढ़ा इतनी ज़्यादा दफ़े अपनी बेहद सड़ियल और भर्राई हुई आवाज़ में दैने बाले सिरी भगवान ... दैने बाले सिरी भगवान कहते हुए भीषण बोर किया करता था कि उसके सिरी भगवान का जाप सुनते ही लोग आटा-चावल इत्यादि के कटोरे लेकर अपने घरों से बाहर निकल आते ताकि बूढ़ा जल्दी दफ़ा हो और कानों की खाल न उतार पाए. बूढ़ा लोगों की दयालुता को स्वीकारने और किसी प्रकार का आशीर्वचन इत्यादि देने में विश्वास नहीं करता था. वह उसी असंपृक्त शैली में दैने बाले सिरी भगवान ... दैने बाले सिरी भगवान का जाप करता हुआ आगे बढ़ता जाता और लोग बूढ़े को जल्दी मर जाने का मूक आशीर्वचन देते हुए अपने किवाड़ बन्द कर लिया करते.

लफ़त्तू को यह बूढ़ा कुछ ज़्यादा ही पसन्द था और वह उसके खताड़ी पार करते ही भाग कर उसके पास जाता और उस से ठिठोली किया करता. "चल्लिया क्यून कबल कलने?" बूढ़ा एकाध बार तो उसकी बात सुनता पर उसके बाद उसका पारा चढ़ता और वह ज़मीन पर पड़े किसी ढेले से लफ़त्तू की मुण्डी को निशाना बनाने की असफल कोशिश करता. तब तक "बीयो ओ ओ ओ ...ई" कहता लफ़त्तू सेफ़्टी ज़ोन में प्रवेश कर चुकता.

उन जाड़ों में हिमालय में धरमेन्दर और बमफटाका मालासिन्ना की पिक्चर आंखें लगी. एक बार पुनः लालसिंह की अद्भुत सोशियल नैटवर्किंग के चलते हमें बाकायदे हॉल के भीतर स्क्रीन से आंखें सटाकर देखने का फोकट सुअवसर प्राप्त हुआ. गेटकीपर लालसिंह का जाननेवाला था और बड़ा लौंडियाबाज़. यह दूसरी सूचना हमें लालसिंह और केवल लालसिंह ने दी थी. हमें लालसिंह के साथ पिक्चर हॉल के गेट पर खड़ा देख बौना तनिक बौखलाया क्योंकि उसके बिज़नेस पर छोटा सा खतरा भिन्नौटायमान होने को था लेकिन जब लफ़त्तू ने बौने को जल्दी-जल्दी तीन पत्तल बनाने का ऑर्डर दिया तो बौने के आत्मविश्वास में ज़रा बढ़ोत्तरी हुई. अभी लीजिये बाबूजी कहकर वह अपने महानकलाकर्म में सन्नद्ध होने को ही था कि फ़ुच्ची कप्तान से भी ज़्यादा कलूटा एक भुसकैट टाइप का लौंडा लालसिंह के पास आया और उन्होंने आपस में बेहद भद्दी भद्दी गालियों का आदान प्रदान करते हुए अपनी अंतरंग मित्रता के ऐफ़ीडैविट को सार्वजनिक किया. कलूटे ने बौने की पीठ पर हल्की धौल सी जमाते हुए उसे भी एक भद्दी गाली दी और एक बेपरवाह नज़र हम दो पिद्दियों पर डालकर लालसिंह और हमसे अपने पीछे आने को कहा.

कलूटा हमें एक गुप्त द्वार से भीतर ले गया और थर्ड क्लास की सबसे आगे वाली पांत में हमें बिठाकर नड़ी हो गया. बिना टिकट पिक्चर देखने का आनन्द द्विगुणित हो गया जब हमें इन्टरवल में कोकोला और मूमफली का फोकट भोग लगाने को मिला. कुल मिलाकर पिक्चर अब तक बढ़िया चल रही थी. बमफटाका मालासिन्ना के आते ही लफ़त्तू मेरा हाथ कस कर थाम लेता और कुछ अंडबंड फुसफुसाने लगता. धरमेन्दर हमेशा की तरह उतना ही हॉकलेट था जैसा उसे होने का श्राप मिला हुआ लगता था. लेकिन जब जब कॉमेडी के दृश्य आते हम पर मस्ती छा जाती - पिक्चर में मैमूद भी था और मदनपुरी भी और आंएयांयांहांहांयांयां करते रहने से रोगग्रस्त काइंयां जीवन भी.

लुफ़्त का क्लाइमेक्स तब आया जब मैमूद और बमफटाका हाथगाड़ी में टेपरिकॉर्डर जैसा एक बचकाना सा वैज्ञानिक उपकरण ले कर भीख मांगने का नाटक करते हुए दे दाता के नाम तुझको अल्ला रक्खे गाने लगे. पहले स्टैन्ज़ा के ख़त्म हो चुकने पर लफ़त्तू की समझ में धुन बैठ गई और उसने अगले स्टैन्ज़े के चालू होते ही अपनी सीट से खड़े होकर बाकायदा कूल्हे मटकाने का कार्यक्रम शुरू कर दिया. पीछे की सीटों से "ओए बैठ जा बे लौंडे!" का उच्चार विभिन्न शैलियों-गालियों में होने लगा. लालसिंह ने डपटकर लफ़त्तू को सीट पर बिठाया पर अब पिक्चर में मन किसका लगना था. उसने मुझे चिकोटियां काटते हुए बेफ़ालतू हंसना जारी रखा. जैसे तैसे पिक्चर निबटी. लालसिंह ने हमसे जल्दी-जल्दी निकल लेने को कहा ताकि कोई परिचित हमें वहां देख घरों पर चुगली न कर बैठे. वह स्वयं कलूटे से एक दफ़ा मिलकर उसका आभार व्यक्त करने की मंशा रखता था.

हिमालय से बाहर निकलकर हम सीधे घर न जाकर बम्बाघेर की राह लग लिये. मेरे पूछने पर लफ़त्तू ने बस आंख भर मारी और दे दाता के नाम का जाप करना जारी रखा. दस मिनट में हम जगुवा पौंक के घर के बाहर थे. निर्धन जगुवा हमसे इस मायने में अमीर था कि उसके पास बैरिंगगाड़ी थी. ऐसी गाड़ी मेरे पास अल्मोड़े में थी पर रामनगर में हमारी मित्रमंडली में ऐसी गाड़ी सिर्फ़ जगुवा के पास थी. लफ़त्तू इस गाड़ी को जगुवा से कुछ दिन उधार मांगने की नीयत से आया था. जगुवा ने अहसान मानते हुए बहुत खुशी खुशी यह सत्कर्म किया.

अगले कई दिन हमारी शामें इस बैरिंगगाड़ी की सवारी करने में बीतती थी. घासमंडी के आगे अस्पताल की थोड़ी सी चढ़ाई थी. हम लकड़ी के फट्टों और ट्रकों के बैरिंगों से बनी इस गाड़ी को साइड में दबाकर अस्पताल तक ले जाते और वहां से उसकी सवारी करते तेज़फ़्तार से सीधा घासमंडी के मुहाने पहुंच जाया करते. बंटू इसे बहुत छोटा काम मानता था और हमें बैरिंगगाड़ी थामे देखते ही अपने घर में घुस जाता. उसे डर लगता था कि कुछ आंयबांय कहकर लफ़त्तू उसकी बेज्जती खराब कर देगा. हां इस कार्यक्रम में हमारे साथ बागड़बिल्ला, गोलू और यदा कदा मौका निकालकर आया फुच्ची भी शामिल हो जाया करते. एकाध बार जगुवा निर्देशक की हैसियत से हमें बैरिंगगाड़ी की तकनीकी जटिलताएं सिखा गया था कि कैसे ज़्यादा स्पीड में गाड़ी के आते ही फट्टों से बने प्लेटफ़ॉर्म के आगे लगे एक छेद से छोटी से लकड़ी को सड़क पर छुआ देने से रफ़्तार कम की जा सकती है.

एक बार मैं गाड़ी थामे अस्पताल की चढ़ाई चढ़ रहा था और लफ़त्तू घासमंडी पर अभी अभी मौज काट कर मेरा इन्तज़ार कर रहा था. उसे कुछ आइडिया सूझा और उसने भागकर मेरे पीछे आकर कहा "नीचे लक दे गाली" मेरे कुछ समझने से पहले उसने मेरे हाथ से छीन कर गाड़ी ज़मीन पर रखी और मुझे उस पर बैठ जाने का आदेश दिया. मैं कुछ सकुचाता सा उस पर बैठा ही था कि उसने मुझे बमय गाड़ी के आगे को ठेलना शुरू किया. उस पर मैमूद वाली मौज छा गई और उसने मुझे धकेलने के साथ साथ कहना शुरू किया "दे दे, दे दे भगबान के नाम पे दे दे. इन्तलनेछनल फकील आए एं ... तुदको लक्के लाम तुदको अल्ल लक्के ... अल्ला लक्के ... अल्ला लक्के ..." आसपास चल रहे लोगों में से कुछ ने अजीब सी दिलचस्पी से हमारी तरफ़ निगाहें डालीं और कुछ ने "हरामी लौण्डे" कहकर लफ़त्तू का उत्साहवर्धन और मेरा अपमानीकरण किया. जिस गति से मुझे ठेला जा रहा उससे जाहिर था कि मुदित लफ़त्तू नाच रहा था. कुछेक आवारा बच्चे हमारे टोले में शामिल हो गए. अचानक सामने से लफ़त्तू के बड़े भाई के आते ही हमारा कार्यक्रम समाप्त हो गया. कार्यक्रम का अन्त वैसा ही हुआ जैसा पहले होता आया था - लफ़त्तू की ठुकाई, मुझे उसके साथ न रहने की मनहूस सलाह और बैरिंगगाड़ी को उसके मालिक के पास तुरन्त पहुंचाने का फ़रमान.

लुटे-पिटे से हम बैरिंगगाड़ी को थामे भवानीगंज पहुंचे ही थे कि बाजार वाली एक गली से दैने बाले सिरी भगवान कहता हुआ लुच्चे भिखारी नमूदार हुआ. लफ़त्तू को क्या सूझी उसने अपनी जेब से दस-बीस पैसे निकाल कर भिखारी से कहा कि वह उसे ये पैसे जभी देगा जब वह बैरिंगगाड़ी में बैठकर हमारे साथ बम्बाघेर तक चलेगा. भिखारी ने आंखें मिचमिचाकर लफ़त्तू और मुझे पहचानने का प्रयास किया और कुछ देर सोचने के बाद पैसे थाम कर अपनी पोटली समेत गाड़ी में बैठ गया. लफ़त्तू ने भिखारी को ठेलने का प्रयास किया पर बह खासा भारी था सो मुझे भी लगना पड़ा. लफ़त्तू ने उसे सलाहें देना शुरू किया "कित्ते दिन येई कैता रएगा ... तू बोल भौत कलता ए ... ऐता कल मैं तुदे एक नया गाना छुनाता ऊं ... इतको याद कल्लेगा तो भौत पैते मिलेंगे ..." एकदम से अभी अभी हुई सुताई भूलकर उसने ज़ोर ज़ोर से मैमूद-प्रोग्राम स्टार्ट किया "दे दे, दे दे भगबान के नाम पे दे दे. इन्तलनेछनल फकील आए एं ... तुदको लक्के लाम तुदको अल्ल लक्के ... अल्ला लक्के ... अल्ला लक्के ..." भवानीगंज के सारे भड़ई दुकानों से बाहर आकर इस दृश्य को देख कर ठठाकर हंस रहे थे. इस से लफ़त्तू और उत्साहित हुआ और उसकी आवाज़ में और जोश भर गया. अतीक भड़ई हमें पहचान गया और बोला "हरामियो काए तंग कर रए हो बुड्ढे को." लफ़त्तू ने आंख मार कर उस के बड़े होने से डरे बिना कहा "बिदनेत ए थबका अपना अपना बेते ..."

भिखारी सम्भवतः काफ़ी थक और चट चुका था और एक जगह ज़रा सी चढ़ाई आने पर बैरिंगगाड़ी के ठहरते ही अपनी पोटली समेत भाग खड़ा हुआ.

हम जगुवा की गाड़ी लौटा कर वापस घर लौट रहे थे. रास्ते में अतीक भड़ई ने हमें एक मोटी गाली देते हुए चेताया कि वह दुर्गादत्त मास्साब से हमारी शिकायत करेगा कि हम कैसे एक बूढ़े भिखारी को परेशान कर रहे थे. लफ़त्तू ने निर्विकार भाव से जवाब दिया "अपना अपना बिदनेत ए बेते ..."

हाथ आए किसी खज़ाने को मजबूरी में वापस लौटा आने का शोक हमारे बीच पसरा हुआ था. अचानक लफ़त्तू बोला "बेते मौद आई?" "हां यार आई लेकिन तेरा भइया बहुत हरामी है."

"हलामी है थाला मगल गब्बल छे जादा नईं" कहकर उसने जेब से पांच का मुड़ातुड़ा नोट निकाल कर दिखाया. कई दिनों बाद इतनी बड़ी रकम देखी थी तो मुझे गश जैसा आया. "क्या बेचा तूने?" मैंने जानबूझकर बेपरवाह बनने का ड्रामा करते हुए उस से पूछा.

(जल्दी ही आगे की कहानी पेश करता हूं साहेबान. कुछ घरेलू विवशताओं ने हाथ थामा हुआ है. धैर्य धरने के लिए धन्यवाद.)

Thursday, April 29, 2010

नागड़ादन्गल और दली को आग कैते ऐं

सियाबर बैद जी के रेज़ीडेन्स-कम-औषधालय का बरामदा शामों को मोहल्ले के बड़े लोगों के बीड़ी फूंकने और गपबाज़ी का सबसे प्रिय स्थान था. इस स्थान हमारा वास्ता बस तभी पड़ता था जब कभी कभार क्रिकेट की गेंद के वहां चली जाया करती. बैद जी को देखकर लगता था कि वे पैदा भी गांधी टोपी पहन कर हुए होंगे. बड़ों की गप्पों को सुनते हुए यह पता चलता था कि आज़ादी से कुछ साल पहले बैदजी अंग्रेज़ों से लड़ते हुए एक बार एक दिन को जेल हो आए थे. इस बात से रामनगर भर में बैदजी का में बड़ा रसूख था और आज़ादी के बाद से लगातार हर स्वतन्त्रता दिवस पर उन्हें किसी न किसी स्कूल में मुख्य अतिथि बनाए जाने का रिवाज़ चल चुका था. इतने सारे सालों तक स्वतन्त्रता दिवसों को स्कूलों में मुख्य अतिथि बनने रहने के बावजूद उनके मुख्य अतिथि बनने के उत्साह में कोई कमी नहीं आई थी. रामनगर में पिछले कोई तीस सालों के दौरान पढ़ाई कर चुके हर किसी शख़्स को उनका भाषण करीब करीब याद हो चुका था. पिछले साल इस अवसर पर हमारे स्कूल में उनके आते ही समूचे स्टाफ़ और सीनियर बच्चों में ख़ौफ़नाक चुप्पी छा गई. प्याली मात्तर के जुड़वां भाई जैसे दिखाई देने वाले बैदजी की ज़बान भी ज़रा सा लगती थी. उन्होंने हमारा ऐसीतैसीकरण कार्यक्रम चालू करते हुए बड़ी देर तक प्याले बच्चो, आदरणीए गुरुजन वगैरह किया और हमें बताया था कि उस दिन स्वतन्त्रता दिवस था और हम उसे मना रहे थे. "ऐते बोल्लिया जैते आप छमल्लें हम कोई दंगलात से आए हैं. थब को पता ए बेते आद के दिन गांदी बुड्डा पैदा हुआ था. ..." फुसफुस ज़ुबान में लफ़त्तू सतत बोले चला जा रहा था. जब मैंने उससे कहा कि गांधी बुड्ढा दो अक्टूबर को पैदा हुआ था तो उसने मुझे डिसमिस करते हुए आधिकारिक लहज़े में वक्तव्य जारी किया : "एकी बात ऐ बेते."

अचानक बैदजी एकताल से द्रुत ताल पर आ गए.

"बली बली योजनाएं बन रई ऐं बच्चो देश के बिकास के लिए ... हमाले पैले पलधानमन्त्री नेरू जी ने दिश के बिकास के लिए बली बली योजनाएं बनाईं ... बली बली मशीनें बिदेस से मंगवाईं ... रेलगाड़ियां और मोटरें मंगवाईं ... पानी के औल हवा के जआज मंगवाए ... तब जा के हमाला बिकास हो रा ए ..." अचानक मैंने सीनियर लौंडसमुदाय के भीतर हो रही गतिविधि पर गौर किया. ऐसा लग रहा था कि वे बैदजी के मुंह से पिछले किसी स्वतन्त्रता दिवस के दौरान सुनी हुई किसी मनोरंजक बात के बोले जाने का बेसब्री से इन्तज़ार कर रहे थे. उनके मुखमण्डल बतला रहे थे कि उन पर हंसी का दौरा पड़ा ही चाहता है.

"नेरू जी ने रामनगर में कोसी नदी पर डाम बनाया ... और ऐसे ई कितने ई सारे डाम बनाए ... यहां से बहुत दूर एक जगे पर उन्ने नागड़ा दन्गल जैसा डाम बनाया ... नागड़ा दन्गल जैसा डाम हमारे देश में ई नईं साली दुनिया में नईं ऐ ..." उनके आख़िरी वाक्य को दबी हुई आवाज़ों में एक साथ कई सारे सीनियर लौंडों ने बाकायदा रिपीट किया और हंसी के दौरे चालू हो गए. मुझे लग रहा था कि अब सामूहिक सुताई अनुष्ठान प्रारम्भ होगा लेकिन मुर्गादत्त मास्टर और प्रिंसिपल साहब के अलावे कई सारे मास्टरों के चेहरों पर भी मुस्कराहट थी. इन अध्यापकों ने सम्भवतः यह भाषण इतनी दफ़ा सुन लिया था कि उनकी बला से बच्चे हंसें या जो चाहे करें. बैदजी अपमान की सारी सीमाओं को पार कर चुके थे और नागड़ा दन्गल जैसे कई दन्गल जीत चुकने के बाद शायद गामा पहलवान से भी नहीं डरते थे.

बैदजी का भाषण अभी और चला. दुर्गादत्त मास्साब ने बेशर्मी की हद पार करते हुए कर्नल रंजीत निकाल लिया था और असहाय प्रिंसिपल साहब अपने रिश्ते के मामू की स्थूल तौंद को उठता-गिरता देखने के अतिरिक्त कुछ भी कर पाने से लाचार थे. मौका ताड़कर बेख़ौफ़ लफ़त्तू बैठे बैठे ही घिसटता हुआ ऑडिटोरियम से बाहर निकल चुका था और सम्भवतः अपने प्रिय डेस्टीनेशन तक पहुंच चुका था. बैदजी के बैठ जाने के बाद मुर्गादत्त मास्टर ने हारमोनियम पर अपने घिसे पिटे दोनों गाने बजाए और हमने भी मजबूरी में उनका यथासम्भव बेसुरा साथ दिया. बांसी कागज़ की तेल से लिथड़ी थैलियों में बूंदी के दो-दो लड्डू थमाकर मिष्ठान्न वितरण हुआ और हम अपने घरों की तरफ़ निकल पड़े.

लफ़त्तू रास्ते में ही टकरा गया. उसकी बहती नाक और मिट्टीसनी कमीज़ बता रहे थे कि वह बमपकौड़े का भरपूर लुत्फ़ उठाने के साथ साथ इधर हिमालय टाकीज़ में लगी फ़िल्म विश्वनाथ का अपना फ़ेवरिट सीन देखकर आ रहा था क्योंकि मुझे देखते ही उसने सतरूघन सिन्ना का परम लफ़ाड़ी पोज़ धारण कर लिया और एक हाथ से अपने बालों को तनिक सहलाते हुए सीरियस आवाज़ में कहा: "दली को आग कैते ऐं औल बेते बुदी को लाक ... और उछ आग से निकले बारूद को विछ्छनात कैते हैं" सतरूघन सिन्ना से वह उन दिनों इस कदर इम्प्रैस्ड था कि ज़ेब में हमेशा एक काली स्कैच पैन रखा करता और मौका मिलते ही अपने होंठों पर उसी की शैली की मूंछें बना लेता.

नज़दीक आकर उसने मेरी पीठ पर धौल जमाई और मज़े लेते हुए पूछा: "बन गया बेते थब का नागलादन्गल. तूतिया ऐं थब छाले." फिर उसने ज़मीन पर गिरा एक कागज़ का टुकड़ा उठाया और उसे मोड़कर अपने सिर पर गांधीटोपी की तरह पहन लिया और बैदजी जैसा मनहूस चेहरा बनाते हुए भाषण देना चालू किया: "बली बली योदनाएं बन लई ऐं ... बले आए नेलू जी ... बले बले दाम बन लए ऐं ... तूतिया थाले नेलू जी ... जाज खलीद लए ऐं ... कूला खलीद लए ऐं ... मेले कद्दू में गए छाले बैदजी और नेलू जी ... तल तैलने तलते ऐं याल" उसके चेहरे पर परम हरामियत का भाव आ चुका था और चाल में दान्त तत वाली ठुमक. एक तो बैदजी के भाषण से मैं चटा हुआ था दूसरे बहुत ज़ोरों की भूख लगी हुई थी सो मैंने उसके साथ नहर जाने के उसके प्रस्ताव पर ज़्यादा तवज्जो नहीं दी और अनमना सा होकर घर के भीतर घुसा.

लड्डू वाली थैली मेरी जेब में किसी मरे मेंढक का सा आभास दे रही थी. ऐसे मरे हुए दो-तीन और मेढक घर पर और धरे हुए थे जिन्हें मेरी बहनें अपने अपने स्कूलों से लाई थीं.

बन्टू के दादाजी के मर जाने की वजह से उसके मम्मी पापा अपने गांव गए हुए थे. इन दिनों बन्टू और उसकी बहन हमारे ही घर खाना खाने आया करते और दोपहरों को मेरा ज़्यादातर समय बन्टू लोगों के घर रामनगर के हिसाब से काफ़ी आलीशान उनके ड्राइंगरूम में सजी वस्तुओं को देखने और बन्टू की ढेर सारी मिन्न्तें करने के बाद रिकार्ड प्लेयर पर मुग़ल ए आज़म के डायलाग सुनने में बीतने लगा था. रिकार्ड के शुरू होते ही "मैं हिन्दोस्तान हूं ..." वाली कमेन्ट्री चालू हो जाती और मेरा मन उर्दू की मीठी मीठी आवाज़ों में हलकोरें खाने लगता. कभी कभार मैं उसके पापा के पुस्तक संग्रह पर निगाह मारा करता. इन किताबों के कवर दुर्गादत्त मास्साब की किताबों जैसे ही बल्कि उनसे भी ज़्यादा खतरनाक हुआ करते थे. इन आवरणों को सुशोभित करती नारियों के बदन पर और भी कम कपड़े होते थे.

इस बाबत जब मैंने लफ़त्तू से उसकी राय पूछी तो उसने फिर वही डिसमिस करने वाली टोन में कहा: "सई आदमी नईं ऐं बन्तू के पापा. आप छमल्लें काला तत्मा पैनने वाला आदमी कबी सई नईं हो सकता.

(जारी)

Thursday, April 15, 2010

गब्बल थे बी खतलनाक इन्छान कताई मात्तर

लफ़त्तू की हालत देख कर मेरा मन स्कूल में कतई नहीं लगा. उल्टे दुर्गादत्त मास्साब की क्लास में अरेन्जमेन्ट में कसाई मास्टर की ड्यूटी लग गई. प्याली मात्तर ने इन दिनों अरेन्जमेन्ट में आना बन्द कर दिया था और हमारी हर हर गंगे हुए ख़ासा अर्सा बीत चुका था. कसाई मास्टर एक्सक्लूसिवली सीनियर बच्चों को पढ़ाया करता था, लेकिन उसके कसाईपने के तमाम क़िस्से समूचे स्कूल में जाहिर थे. कसाई मास्टर रामनगर के नज़दीक एक गांव सेमलखलिया में रहता था. अक्सर दुर्गादत्त मास्साब से दसेक सेकेन्ड पहले स्कूल के गेट से असेम्बली में बेख़ौफ़ घुसते उसे देखते ही न जाने क्यों लगता था कि बाहर बरसात हो रही है. उसकी सरसों के रंग की पतलून के पांयचे अक्सर मुड़े हुए होते थे और कमीज़ बाहर निकली होती. जूता पहने हमने उसे कभी भी नहीं देखा. वह अक्सर हवाई चप्पल पहना करता था. हां जाड़ों में इन चप्पलों का स्थान प्लास्टिक के बेडौल से दिखने वाले सैन्डिल ले लिया करते.

कसाई मास्टर की कदकाठी किसी पहलवान सरीखी थी और दसवीं बारहवीं तक में पढ़ने वाले बच्चों में उसका ख़ौफ़ था. थोरी बुड्ढे और मुर्गादत्त मास्टर के धुनाई-कार्यक्रम कसाई मास्टर के विख्यात किस्सों के सामने बच्चों के खेल लगा करते. बताया जाता था कि कसाई मास्टर की पुलिस और सरकारी महकमों में अच्छी पहचान थी और उसके ख़िलाफ़ कुछ भी कह पाने की हिम्मत किसी की नहीं हुआ करती थी. लफ़त्तू के असाधारण सामान्यज्ञान की मार्फ़त मुझे मालूम था कि अगर कभी भी कसाई मास्टर का अरेन्जमेन्ट में हमारी क्लास में आना होगा तो हमें बेहद सतर्क रहना होगा क्योंकि कसाई मास्टर का दिमाग चाचा चौधरी की टेक पर कम्प्यूटर से भी तेज़ चला करता था. यह अलग बात है कि कम्प्यूटर तब केवल शब्द भर हुआ करता था - एक असम्भव अकल्पनीव शब्द जिसके ओरछोर का सम्भवतः भगवान को भी कोई आइडिया नहीं था. लफ़त्तू के कहने का मतलब होता था कि कसाई मास्टर को स्कूल भर में पढ़ने वाले हर बच्चे के विस्तृत बायोडाटा ज़बानी याद थे. "बला खतलनाक इन्छान है कताई मात्तर बेते! बला खतलनाक! गब्बल थे बी खतलनाक!"

तो गब्बरसिंह से भी खतरनाक इस कसाई मास्टर की क्लास में एन्ट्री कोई ड्रामाई नहीं हुई. कसाई ने खड़े खड़े ही बहुत आराम से ख़ुद ही अटैन्डैन्स ली और जब "प्यारे बच्चो!" कहकर कुर्सी पर अपना स्थान ग्रहण किया, मुझे लफ़त्तू की बातों पर से अपना विश्वास एकबारगी ढहता सा महसूस हुआ. कसाईमुख को थोड़ा गौर से देखने पर पता चलता था कि उसकी दाईं आंख बागड़बिल्ले की भांति एलएलटीटी यानी लुकिंग लन्डन टॉकिंग टोक्यो यानी ढैणी थी. बाईं भौंह के बीचोबीच चोट का पुराना निशान उस मुखमण्डल को ख़ासा ख़ौफ़नाक बनाता था. सतरुघन सिन्ना टाइप की मूंछें धारण किये, ऐसा लगता था, मानो कसाई अपने आप को जायदै ही इस्माट समझने के कुटैव से पीड़ित था. कसाई के अधपके बाल प्रचुर मात्रा में तेललीपीकरण के बावजूद किसी सूअर के बालों की तरह कड़े और सीधे थे. उन दिनों पराग पत्रिका में एक उपन्यास धारावाहिक छप कर आ रहा था. उपन्यास का नायक भारत की राष्ट्रीय पोशाक यानी पट्टे के घुटन्ने के अतिरिक्त किसी भी तरह के मेक अप में विश्वास नहीं रखता था. कसाई के अटैन्डेन्स लेते लेते छिप कर देखते हुए एकाध मिनट से भी कम समय में मुझे यकीन हो गया कि उक्त उपन्यास के लेखक ने कसाई मास्टर के चेहरे का विषद अध्ययन करने के बाद ही उपन्यास के नायक का वैसा हुलिया खींचा होगा. मुझे यह कल्पना करना मनोरंजक लगा कि कसाई मास्टर केवल घुटन्ना पहने कैसा नज़र आएगा.

अटैन्डेन्स हो चुकी थी और "प्यारे बच्चो!" कहते हुए कुर्सी में बैठते ही कसाई मास्टर किसी ख्याल में संजीदगी से तल्लीन हो गया. क्लास के बाकी बच्चों की तरह मैं भी अगले दो पीरियड के दौरान किसी भी स्तर के कैसे भी हादसे का सामना करने को तैयार था. अचानक कुर्सी से एक अधसोई सी आवाज़ निकली: "पत्तल में खिचड़ी कितने बच्चों ने खाई है?"

कुछ समय से क्लास में बस कभी कभी ही आने वाले लालसिंह के सिवाय किसी भी बच्चे का हाथ नहीं उठा. लालसिंह के उठे हुए हाथ को ख़ास तवज्जो न देते हुए कसाई मास्टर ने कहा - "यहां से कुछ दूरी पर कालागढ़ का डाम हैगा. मैं सोच रहा हूं कि तुम सारे बच्चों को किसी इतवार को म्हां पे पिकनिक पे ले जाऊं. आशीष बेटे, ह्यां कू अईयो जरा!" आशीष क्लास में नया नया आया था और वह भी अपने आप को जायदै ही इस्माट समझने के कुटैव से पीड़ित था. उसका बाप रामनगर का एसडीएम टाइप का बड़ा अफ़सर था और यह तथ्य उसकी हर चालढाल में ठसका ठूंसने का वाज़िब और निहायत घृणास्पद कारण था. कि कसाई मास्टर आशीष को नाम से जानता है, हमारे लिए क्षणिक अचरज का विषय बना. आशीष कसाई मास्टर की बगल में खड़ा था. मास्टर का अभिभावकसुलभ प्रेम से भरपूर हाथ उसकी पीठ फेर रहा था. "आशीष के पिताजी रामनगर के सबसे बड़े अफ़सर हैंगे. कल मुझे इनके घर खाने पर बुलवाया गया था. व्हईं मुझे जे बात सूझी की आशीष की क्लास के सारे बच्चों को कालागढ़ डाम पे पिकनिक के बास्ते ले जाया जाबै. और साहब ने सरकारी मदद का मुझे कल ही वादा भी कर दिया है. तो बच्चो अपने अपने घर पे बतला दीजो कि आने बालै किसी भी इतवार को पिकनिक का आयोजन किया जावैगा. पिकनिक में देसी घी की खिचड़ी बनाई जाएगी और उसे पत्तलों में रखकर सारे बच्चे खावेंगे. खिचड़ी खाने का असल आनन्द पत्तल में है. ..."

खिचड़ी, पत्तल, देसी घी, कालागढ़, डाम, साहब, आशीष, पिकनिक इत्यादि शब्द पूरे पीरियड भर बोले गए और कसाई मास्टर का हाथ लगातार आशीष की पीठ को सहलाता रहा. घन्टी बजने ही वाली थी जब "ऐ लौंडे, तू बो पीछे वाले, ह्यां आइयो तनी!"

पैदाइशी बौड़म नज़र आने वाले इस लड़के का नाम ज़्यादातर बच्चे नहीं जानते थे. उसकी पहचान यह थी कि उसके एक हाथ में छः उंगलियां थीं. कसाई मास्टर की टोन से समझ में आया कि पैदाइशी बौड़म को कुछ खुराफ़ात करते हुए देख लिया गया था. वह मास्टर की मेज़ तक पहुंचा, कसाई ने एक बार उसे ऊपर से नीचे तक देखा. "जरा बाहर देख के अईयो धूप लिकल्लई कि ना." क्लास का दरवाज़ा खुला था और अच्छी खासी धूप भीतर बिखरी पड़ी थी. पैदाइशी बौड़म की समझ में ज्यादा कुछ आया नहीं लेकिन डर के मारे कांपते हुए कक्षा के बाहर जाकर आसमान की तरफ़ निगाह मारने अलावा उसके पास कोई चारा नहीं था. वापस लौटकर उसने हकलाते हुए कहा "न्न्निकल रही मास्साब..."

"तो जे बता कि धूप कां से लिकला करे?" पैदाइशी बौड़म ने फिर से हकलाते हुए कहा "स्स्सूरज से मास्साब ..."

"जे बता रात में क्या निकला करे?" पैदाइशी बौड़म के उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना कसाई ने कहा: "रात में लिकला करै चांद. और चांद की वजै से रात में तारे भी लिकला करै हैं. तारे वैसे तो दिन में भी लिकला करै हैं पर सूरज की वजै से दिखाई ना देते."

पैदाइशी बौड़म के कन्धे पर हाथ रखकर क्रूर आवाज़ में कसाई मास्टर बोला: "इस बच्चे को दिन में तारे देखने का जादै सौक हैगा सायद जभी तो खीसें निपोर रिया था." इतना कहते कहते उसने अपनी कमीज़ की जेब से एक नई पेन्सिल निकाली और पैदाइशी बौड़म के छः उंगली वाले हाथ को ज़ोर से अपनी मेज़ पर रख दिया. किसी कुशल कारीगर की भांति उसने पैदाइशी बौड़म की उंगलियों के बीच एक ख़ास स्टाइल में पेन्सिल फ़िट की और अगले ही क्षण अपने दूसरे हाथ से पैदाइशी बौड़म के हाथ को इतनी ज़ोर से दबाया कि उसकी आंखें बाहर आने आने को हो गईं. उसकी बाहर निकलने को तैयार आंखों के कोरों से आंसू की मोटी धार बहना शुरू हो गई थी. करीब आधा मिनट चले इस जघन्य पिशाचकर्म को भाग्यवश पीरियड की घन्टी बजने से विराम मिला. मास्साब ने पेन्सिल वापस अपनी जेब में सम्हाली और वापस लौटते पैदाइशी बौड़म की पिछाड़ी पर एक भरपूर लात मारते हुए हमें चेताया: "सूअर के बच्चो! मास्साब की बात में धियान ना लगाया और जादै नक्सा दिखाया तो एक एक को नंगा कर के लटका दूंगा."

पैदाइशी बौड़म के प्रति किसी प्रकार की सहानुभूति व्यक्त करने का मौका नहीं मिल सका क्योंकि तिवारी मास्साब क्लास के बाहर खड़े थे. तिवारी मास्टर उर्फ़ थोरी बुड्ढे ने गुलाबी तोता बनाने में हमें पारंगत बना चुकने के बाद इधर दोएक महीनों से इस्कूल जाती लौण्डिया बनवाना चालू किया था. कन्धे पर बस्ता लगाए और दो हाथों में गुलदस्ता थामे स्कर्ट-ब्लाउज़ पहनने वाली घुंघराले बालों वाली यह बदसूरत लौण्डिया बनाना ज़्यादातर बच्चों को अच्छा लगता था. लफ़त्तू की रफ़ कॉपी इस्कूल जाती लौण्डिया के बेडौल अश्लील चित्रों से अटी पड़ी थी.

किसी तरह स्कूल खत्म हुआ. मैं मनहूसियत और परेशानी का जीता जागता पुतला बन गया था लफ़त्तू के बिना. घर पहुंच कर बेमन से मैंने कुछ दूध नाश्ता समझा और कपड़े बदल कर नहर की तरफ़ चल दिया. मैं नहर की दिशा में मुड़ ही रहा था कि घासमण्डी के सामने की अपनी दुकान से लालसिंह ने आवाज़ लगाकर मुझे बुलाया. अभी वह स्कूल की पोशाक में ही था. उसके पापा कहीं गए हुए थे और वह लफ़त्तू को लेकर चिन्तित था. उसने मुझे लफ़त्तू का सबसे करीबी दोस्त समझा, इतनी सी बात से ही मेरी मनहूसियत कुछ कम हो आई. सही बात तो यह थी कि मुझे पता ही नहीं था कि लफ़त्तू को असल में क्या हुआ था. वह बीमार था और बहुत बीमार था. बस. मैंने लालसिंह को सुबह वाली बात बता दी कि कैसे मैंने लफ़त्तू के मम्मी-पापा को उसे मुरादाबाद वाली बस की तरफ़ ले जाते देखा था और कैसे वह कांप रहा था गर्मी के बावजूद.

लफ़त्तू के बारे में दसेक मिनट बातें करने के बाद मेरे मन से जैसे कोई बोझा उतरा. लालसिंह ने दूध-बिस्कुट सुतवाया. पेट भरा होने के बावजूद लालसिंह की दुकान का दूध बिस्कुट कभी भी पिरोया जा सकता था. दूध-बिस्कुट सूतते हुए अचानक मेरी निगाह पसू अस्पताल की तरफ़ गई. जब से गोबरडाक्टर कुच्चू गमलू नाम्नी हमारी काल्पनिक प्रेयसियों के साथ हल्द्वानी चला गया था, मेरी उस तरफ़ देखने की इच्छा तक नहीं होती थी.

मुझे अनायास उस तरफ़ देखता देख लालसिंह कह उठा - "ये नया गोबरडाक्टर साला अपने बच्चों को लेकर नहीं आनेवाला है बता रहे थे. नैनीताल में पढ़ती है इसकी लौण्डिया. भौत माल है बता रहा था फ़ुच्ची ..."

फ़ुच्ची! यानी फ़ुच्ची कप्तान! नैनीतालनिवासिनी कन्या के बाबत चलने ही वाली मसालापूरित बातचीत को मैंने काटते हुए लालसिंह से पूछा कि फ़ुच्ची कप्तान कहां है. "अबे कल ही वापस आया है फ़ुच्ची रामनगर. साला और काला हो गया है. ..."

फ़ुच्ची के रामनगर पुनरागमन के समाचार ने मुझे काफ़ी प्रसन्न किया. फ़ुच्ची मेरे उस्ताद लफ़त्तू का भी उस्ताद था सो उसके माध्यम से लफ़त्तू के स्वास्थ्य के बारे में आधिकारिक सूचना प्राप्त कर पाने की मेरी उम्मीदों को बड़ा सहारा मिला. लालसिंह की दुकान से नहर की तरफ़ जाने के बजाय मैं अपने घर की छत पर पहुंच गया. दर असल मैं कुछ देर अकेला रहना चाहता था. बन्टू को वहां न पाकर मुझे तसल्ली हुई. अपनी छत फांदकर मैं ढाबू की छत पर मौजूद पानी की टंकी से पीठ टिकाए बैठने ही वाला था कि उधर हरिया हकले वाली छत की साइड से बागड़बिल्ला आ गया. लफ़त्तू और फ़ुच्ची जैसे घुच्ची-सुपरस्टारों की गैरमौजूदगी के कारण बागड़बिल्ला अब तकरीबन बेरोजगार हो गया था और दिन भर आवारों सूअरों की तरह यहां वहां भटका करता. नीचे सरदारनी के स्कूल में मधुबाला ट्य़ूशन पढ़ने आए बच्चों को कोई इंग्लिश पोयम रटा रही थी. कुछ देर इधर उधर की बातें करने के बाद बागड़बिल्ले ने असली बात पर आते हुए मुझसे आर्थिक सहायता का अनुरोध किया. दर असल उसे घर से अठन्नी देकर दही मंगवाया गया था. हलवाई की दुकान तक पहुंचने से पहले ही घुच्ची खेल रहे बच्चों को देख कर उससे रहा नहीं गया जहां वह पांच मिनट में सारे पैसे हार गया. बागड़बिल्ले जैसे टौंचा उस्ताद का घुच्ची में हारना आम नहीं होता था. मेरे पास पच्चीस तीस पैसे थे जो मैंने उसे अगले दिन वापस किये जाने की शर्त पर उसे दे दिये, हालांकि मैं जानता था कि बागड़बिल्ला किसी भी कीमत पर उन पैसों को वापस नहीं चुका सकेगा. वह बहुत गरीब परिवार से था और उसकी मां इंग्लिश मास्टरानी के घर बर्तन-कपड़े धोने का काम किया करती थी. जाते जाते उसने एक बात कहकर मुझे उत्फुल्लित कर दिया - "फ़ुच्ची तुझे याद कर रहा था यार!" मेरे यह पूछने पर कि फ़ुच्ची कहां मिलेगा उसने अपनी चवन्नी जैसी आधी आंख को चौथाई बनाते हुए दोनों हाथों की मध्यमा उंगलियों को मिला कर घुच्ची का सार्वभौमिक इशारा बनाते हुए कहा - "वहीं! और कहां!"

मैं नीचे उतर कर भागता हुआ साह जी की आटे की चक्की के आगे से होता हुआ घुच्चीस्थल पहुंचा पर खेल निबट चुका था और खिलाड़ियों के बदले वहां नाली पर पंगत बनाकर बैठे छोटे बच्चे सामूहिक निबटान में मुब्तिला थे. ये इतने छोटे थे कि उनसे अभी अभी सम्पन्न हुए खेल और उसके खिलाड़ियों के बारे में कोई जानकारी हासिल हो पाने का कोई मतलब नहीं था.

घुच्चीस्थल से आगे का जुगराफ़िया मेरे लिए ज़्यादा परिचित न था सो मैं मन मारे वापस घर की तरफ़ चल दिया. बस अड्डे पर आखिरी गाड़ी आ लगी थी. और दिन होता तो लफ़त्तू और मैं डिब्बू तलाशने वहां ज़रूर जाते. माचिस के लेबेल इकठ्ठा करने के शौक को किनारे कर हमने तीन चार महीनों से डिब्बू यानी सिगरेट के खाली डिब्बे इकठठा करने का शौक पाल लिया था. डिब्बू इकठ्ठा करना माचिस के लेबेल इकठ्ठा करने की बनिस्बत ज़्यादा एडल्ट माना जाता था क्योंकि डिब्बुओं के साथ भी घुच्ची जैसा एक जुए वाला खेल खेला जा सकता था.

इतने में मेरी निगाह बस से बाहर उतरते मनहूस सूरत बनाए लफ़त्तू के पापा पर पड़ी. बस से बाहर उतरने वाले वे आखिरी आदमी थे. यानी लफ़त्तू और उसकी मां वहीं हैं मुरादाबाद में. मेरा अनुमान गलत भी हो सकता था क्योंकि यह सम्भव था कि वे दोनों दिन के किसी पहर वापस लौट आए हों और ... और ...

गांठ लगा वही थैला लफ़त्तू के पापा के कन्धे पर टंगा था. दिन भर की पस्ती और थकान उनके चेहरे और देह पर देखी जा सकती थी. मेरे लिए यह निर्णायक क्षण था. मैं लपकता हुआ उनके सामने पहुंचा और "नमस्ते अंकल" कह कर उनके सामने स्थिर हो गया. उन्होंने अपना धूलभरा चश्मा आंखों से उतारा और मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए मरियल आवाज़ में कहा "जीते रहो बेटे, जीते रहो."

"अंकल लफ़त्तू ..."

"भर्ती करा दिया बेटा मुरादाबाद में उसको. तेरी आन्टी भी वहीं है ..."

मुझे लफ़त्तू को अस्पताल में भर्ती कराए जाने की इमेज काफ़ी मैलोड्रैमैटिक और फ़िल्मी लगी और मुझे पिक्चरों में देखे गए सफ़ेद रंग से अटे अस्पतालों और मरीज़ों वाले सारे सीन याद आने लगे. मैं कुछ और पूछता, वे मेरे सामने से घिसटते से अपने घर की दिशा में चल दिए.

Thursday, April 8, 2010

बेते हाती हाती होता ऐ औल दानवल दानवल

लफ़त्तू की सतत उदासी और उसका ज़्यादातर ख़ामोश रहना मेरी बरदाश्त से बाहर हो गया था. तैराकी की मौज के बाद हम जब भी कायपद्दा खेलने की शुरुआत करते, लफ़त्तू बिना कोई नोटिस दिए नहर से बाहर आकर पिछले रास्ते से हाथीखाने की तरफ़ निकल जाया करता. हाथीखाना मुझे बहुत आकर्षित करता था लेकिन मुझे घर से वहां तक जाने की इजाज़त नहीं थी क्योंकि हाथीखाना पाकिस्तान के पिछवाड़े में स्थित था.

रोज़ सुबह हमारे स्कूल जाने से पहले एक हाथी अपने महावत के साथ घर के बाहर से गुज़रा करता. हाथी जाहिर है वैसा ही था जैसा कि हाथी होता है. रामनगर के अपने बिल्कुल शुरुआती दिनों में मेरे और मेरी बहनों के लिए वह दुनिया का सबसे बड़ा अजूबा था. एकाध किताबों में मैं उसे देख चुका था पर वह इतना बड़ा होगा, मेरी कल्पना से बाहर था. धीरे धीरे वह रोज़मर्रा की ज़िन्दगी का हिस्सा बन गया और हमें उसकी ऐसी आदत पड़ गई थी कि अपने ऐन बगल में गुज़रते हाथी को देख कर भी हम कभी कभी उसे नहीं देखते थे. हां अगर चाचा या मामा वगैरह के बच्चे किन्हीं छुट्टियों में हमारे घर आते तो हम उन्हें सबसे पहले बताते कि हमारे घर के सामने से रोज़ सुबह हाथी गुज़रता है - सच्ची मुच्ची का हाथी. ऐसा बताते हुए हमें अपार गर्व महसूस होता और काफ़ी सारा सुपीरियोरिटी कॉम्प्लेक्स भी. तब लगता था जैसे वह हमारा अपना हाथी हो.

जंगलात डिपार्टमेन्ट के इस हाथी के मुतल्लिक मेरी चन्द ऑफ़ीशियल उत्सुकताओं के बाबत मुझे लफ़त्तू कई जीकेनुमा जानकारियां मुहैय्या करवा चुका था. मसलन "हाती एक बाल में इत्ती तत्ती करता ऐ बेते कि नगलपालिका का बमपुलिछ दो बाल भल जाए" या "छुबै नाछ्ते में एक पेल खाता ऐ हाती" "हाती का द्लाइबल हाती की पीथ पल ई तोता ऐ क्यूंकि दलाइबल के बिना उतको नींद नईं आ छकती." इस लास्ट वाली सूचना को लेकर एक दफ़ा बागड़बिल्ले और लफ़त्तू के बीच एक सेमिनार कायपद्दा खेलते वक़्त आयोजित किया जा चुका था. बागड़बिल्ले का विचार था कि हाथी पहली बात तो सोते ही नहीं और अगर सोते हैं तो लेट कर और वो भी उल्टा लेट कर. ऐसे में महावत के उसकी पीठ पर सोने की बात तर्कसंगत नहीं लगती थी. बागड़बिल्ला यह भी कहा करता था कि अगर महावत का दिमाग खराब होगा तभी वह बैठ कर सोने की नौकरी करेगा. वह भी एक जानवर की पीठ पर. लफ़त्तू हारने हारने को था जब उसने अपनी प्रत्युत्पन्नता का परिचय दिया. "बेते मैं तो बैथ के बी छो छकता ऊं औल खले हो के बी."

कायपद्दे को संक्षिप्त ब्रेक देकर उसने खड़े होकर आंखें मूंदीं और बाकायदा खर्राटे निकाले. मिनट भर यह ठेटर करने के उपरान्त वह एक पेड़ के ठूंठ पर बैठा और फिर से आंखें मूंद कर खर्राटे मारने लगा. जब तक बागड़बिल्ला कुछ तर्क सोच पाता लफ़त्तू चिल्लाकर आंख मारता हुआ बोला "औल बेते हाती हाती होता ऐ औल दानवल दानवल ... बी यो ओ ओ ओ ई ..."

लफ़त्तू के उदासीन हो जाने से बन्टू भीतर ही भीतर ज़्यादा प्रसन्न और सन्तुष्ट लगने लगा था. चूंकि मेरे पास लफ़त्तूसान्निध्यरहित समय कुछ ज़्यादा रहने लगा था, बन्टू मेरे जीवन में चरस बोने का काम ज़्यादा सिन्सियरिटी के साथ करने लगा था. अपने विदेशी मामा के लाए पुराने सामान में से उसने एक टूटा हुआ विदेशी परकार मुझे बतौर उपहार दिया. इस टूटे परकार में पेन्सिल फंसाने वाले हिस्से की कील टूट गई थी और किसी भी जुगाड़ टैक्नीक के प्रयोग से उसकी मदद से किसी भी तरह का गोला नहीं बनाया जा सकता था. इस टूटे परकार का यू एस पी यह था कि उसकी मूठ पर अंग्रेज़ी में साफ़ साफ़ ’मेड इन इंग्लैण्ड’ लिखा हुआ था. मेरे पर्सनल कलेक्शन में यह पहली इम्पोर्टेड चीज़ थी. तनिक झेंप और अस्थाई ग्लानि के बावजूद मुझे बन्टू का ऐसा करना अच्छा लग रहा था. मुझे पता था कि लफ़त्तू इस काम का हर हाल में सार्वजनिक विरोध करता.

बन्टू के संसर्ग में अजीब हॉकलेट टाइप की चीज़ों में मन लगाना पड़ता था. इधर कुछ दिनों से मेरी पेन्सिल की मांग ज़्यादा हो गई थी और मां हर रोज़ पेन्सिल मांगने पर सवालिया निगाहों से देखा करने लगी थी. मैं उसे पिछले ही दिन ली गई तकरीबन खत्म हो चुकी पेन्सिल दिखा कर कहता कि उनको बार बार छीलना पड़ रहा है क्योंकि उनकी नोंकें छीलते ही टूट जाया कर रही हैं.

दर असल बन्टू ने कहीं से यह वैज्ञानिक सूचना प्राप्त कर ली थी कि पेन्सिल की छीलन को दो हफ़्तों तक पानी में डुबो कर रखा जाए तो वे रबर में तब्दील हो जाती हैं. सो हम दिम भर अपनी पेन्सिलें छीलते और अपने अपने प्लास्टिक के टूटे डब्बों में छीलन को इकठ्ठा करते जाते. ये डब्बे ढाबू की छत के एक मुफ़ीद हिस्से में रखे जाते थे जहां जाकर हर शाम को अपने अपने छीलभण्डार का मुआयना किया जाता. दसेक दिन में हम दोनों के डब्बे तकरीबन भर गए. एक दिन बाकायदा नियत किया गया और इन डिब्बों में पानी डाला गया.

जैसा तैसा खेल वगैरह चुकने के बाद घर जाते समय हम इन डब्बों को नाक तक ले जाते और गहरी सांसों से सूंघा करते. दो तीन दिन तक तो कोई खास बू नहीं आई पर उसके बाद छीलन सड़ने लगी और डब्बों से गन्दी बास सी आने लगी. "मेरे मामा का लड़का बता रहा था कि शुरू में बदबू आएगी पर पन्द्रह दिन में वह मटेरियल खुशबूदार रबड़ में तब्दील हो जाएगा."

मैं असमंजस में रहता कि बन्टू की बात का यक़ीन करूं या नहीं.

इधर लफ़त्तूने न सिर्फ़ स्कूल आना बन्द कर दिया था, वह हमारे साथ तैरने आना भी बन्द कर चुका था. यह बदलाव मेरे लिए एक बहुत बड़ी पर्सनल ट्रैजेडी था.

एक दिन तैराकी के बाद जब हम कायपद्दा खेलने को पितुवा लाटे के आम के बगीचे का रुख कर रहे थे तो मैंने लफ़त्तू को धीमी चाल से हरिया हकले की छत की तरफ़ जाते देखा. वह खासा मरियल हो गया था या लग रहा था. न उसकी चाल में वह मटक बची थी न शरारतों में उसकी कोई दिलचस्पी.

अड्डू का पीछा करते दौड़ते हुए भी चोर निगाह से मैंने उसे हरिया हकले का ज़ीना चढ़ते हुए देख लिया. दसेक मिनट बाद मैंने बहाना बनाकर हरिया हकले के ज़ीने की राह ली. हरिया की छत पर पहुंचते ही मैंने जिस पहली चीज़ पर ग़ौर किया वह थी हवा में फैली टट्टी की मरियल सी गन्ध. उसके बाद मेरी निगाह लफ़त्तू पर गई जो हमारी छत पर जा चुकने के बजाय ढाबू की छत पर खड़ा बड़ी हिकारत से किसी चीज़ को ध्यान से देख रहा था. उसने मुझे देखा तो उसके चेहरे की हिकारत एक डिग्री बढ़ गई.

हमारी छत की तरफ़ कूदते हुए उसने मुझसे पूछा: "ये दब्बे में कुत्ते की तत्ती तूने लखी थी लबल बनाने को?"

मेरे दबी ज़ुबान में हां कहने पर उसने ज़मीन पर थूका और कहने लगा "तूतिया थाला! मैंने का ता ना कि ये बन्तू के चक्कल में पलेगा तो तूतिया बन दाएगा"

मैं ढाबू की छत पर था. हमारे दोनों डिब्बों के भीतर का बदबूदार गोबर सरीखा असफल वैज्ञानिकी उत्पाद बिखरा पड़ा था और वाक़ई बहुत बास मार रहा था.

मैं जब तक कुछ कहता मुझे अपने पीछे आ चुके बन्टू की आवाज़ सुनाई दी "ये किसने किया बे?"

बन्टू को सुनते ही लफ़त्तू पलटा. बन्टू बोल रहा था "आज रात की बात थी बे. मेरे मामा का लड़का बता रहा था कि कल से इसमें खुशबू आ जाती और बढ़िया रबर बन जाता." वह वहीं खड़ा हुआ था और बास के बावजूद गोबर के बगल में खड़ा बना हुआ था.

विदेशी मामा के बेटे का ज़िक्र आते ही लफ़त्तू फट पड़ा "तेले मामा के इंग्लैन्द में बनाते होंगे कुत्ते की तत्ती छे लबल छाले. गब्बल कोई तूतिया ऐ बेते! ... और छुन ..." इतने दिनों तक अदृश्य रहे लफ़त्तू का यह रूप मुझे बहुत अच्छा लग रहा था. मेरा मन कर रहा था कि उसका हाथ थाम कर सीधा बमपकौड़े वाले ठेले तक भाग चलूं. लफ़त्तू ने हाल में सीखा हुआ डायलाग जारी किया " बन्तू बेते वो दमाने लद गए दब गधे पकौली हगते थे."

लफ़त्तू द्वारा बन्टू को डांटे जाने का सिलसिला कोई दो मिनट और चला और ज़रा देर में हम दोनों वाकई बमपकौड़े के ठेले की तरफ़ जा रहे थे. मैं आश्वस्त था कि लफ़त्तू के पास पैसे ज़रूर होंगे. लफ़त्तू के सिर्फ़ एक बमपकौड़ा मंगवाया. मेरे वास्ते. "याल मुदे मना कला ऐ दाक्तल ने. तू खा."

पकौड़ा उसी दिव्य स्वाद से लबरेज़ था. लेकिन उस से मिली ऊर्जा के बावजूद मैं लफ़त्तू की बीमारी के बारे में उस से पूछने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था. मैं ’दोस्ती’ फ़िल्म का कोई डायलाग भी याद करने की कोशिश कर रहा था.

चुपचाप घर का रुख करते हुए लफ़त्तू ने बस अड्डे पर रुकी एक बस की ओट में पेशाब करते समय मुझे बताया कि उसे रोज़ रात को भयानक बुखार आता है और वह सो नहीं पाता और यह भी कि शायद कल उसे किसी बड़े डाक्टर को दिखाने मुरादाबाद ले जाया जाने वाला है.

मुझे रात को बहुत देर नींद नहीं आई. सुबह मैं स्कूल जाने को सड़क पर उतरा तो देखा कि एक हाथठेले पर लेटे लफ़त्तू को बस अड्डे की तरफ़ ले जाया जा रहा था. हाथ में गांठ लगा एक थैला थामे उसके पापा आगे आगे थे. ठेला धकेलने वाले पहलवान के पीछे सुबकती हुई उसकी दुबली मां थी और उसकी बड़ी बहन. उन के ठीक पीछे एक और ठेला चला अ रहा था जिसमें रोज़ की तरह भैंस का मीट ले जाया जा रहा था. शेरसिंह की दुकान के इस हिस्से से मन्द गति से आ रहे हाथी की सूंड़ दिखाई देने लगी थी.

मैंने असहाय निगाहों से लफ़त्तू की तरफ़ देखा. वह बुरी तरह कांप रहा था और गर्मी के मौसम के बावजूद उसने कम्बल ओढ़ा हुआ था. मुझ से और नहीं देखा गया. अपनी भर आई आंखों के किनारों को जल्दी जल्दी पोंछता हुआ मैं स्कूल की तरफ़ भाग चला.