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Monday, March 9, 2009

...उहुं ... उहुं .. दान्त तत माई बादी ... उहुं ... उहुं ...

कुच्चू और गमलू में से किसी एक पर मेरे और किसी दूसरी पर लफ़त्तू के दिल के आ जाने के दिनों मैं ख़ैर मनाया करता था कि कहीं ऐसा न हो कि हम दोनों के टारगेट अन्त में जाकर एक ही न निकल आवें. मैं तो पैदाइशी बेवफ़ा और मोहब्बत का मारा था सो मुझे खुद से ज़्यादा लफ़त्तू की चिन्ता होती थी. उन्हीं दिनों बस अड्डे के बाहर वाले धूलमैदान में नौटंकी लगी. पिछले साल की नौटंकी के गीतों को कंठस्थ कर चुकने और घर पर उन्हें गा बैठने का अक्षम्य अपराध करने के बाद हुई अपनी धुनाई मुझे अच्छे से याद थी, इसी वजह से "लौंडा पटवारी का बड़ा नमकीन" अब भी मेरा फ़ेवरेट बना हुआ था. इस दफ़ा नौटंकी पाल्टी वाले अपने साथ बड़े-बड़े होर्डिंगनुमा पोस्टर ले कर आए थे जिनमें एक बेहद भौंडा सा दिख रहा दढ़ियल फटा कुर्ता पहने नज़र आया करता था. दढ़ियल के मुंह के एक कोने से खून की लकीर निकला चाहती थी. पोस्टर का अलबत्ता सबसे आकर्षक हिस्सा वह था जिसमें लाल लिपिस्टिक और सुनहरे बेलबूटोंवाली लाल पोशाक धारण किए, गालों में लाली लगाए एक उरोजा देवी चस्पां थी. उरोजा देवी की आंखों की कोरों पर आंसुओं की एक-एक जोड़ी बूंदें थमी हुई थीं. लेकिन एक अदद डिटेल्ड चेहरा होने के बावजूद कलाकार ने ऐसा तिलिस्म तैयार किया था कि उक्त महिला सिर से कमर तक सिर्फ़ उरोजों की एक जोड़ी नज़र आती थी, दीगर है कि इस दर्ज़े की जोड़ी ने अभी हमारे तसव्वुरों पर उस तरह छा जाना बाकी था.

नौटंकी पाल्टी इस दफ़े लैला-मन्जूर का खेल ले कर आई थी और लाउडस्पीकर पर ख़ून-ए-दिल पीने और लख़्त-ए-जिगर खाने के बयानात लगातार जारी किये जाते थे. खेल के बीच में इन्टरवल होता तो एक मसख़रा "डान्ट टच माई बाडी मोहन रसिया" नामक अश्लील गान सुना कर श्रोताओं और दर्शकों की वाहवाही लूटा करता. लफ़त्तू ने इस सुपरहिट का "...उहुं ... उहुं .. दान्त तत ... उहुं ... उहुं ..." की टेक से शुरू होने वाला इम्प्रोवाइज़्ड संस्करण तैयार करने में फ़कत एक रात लगाई. हम दोस्त लोग शाम के शो के श्रोता होते थे.

एक शाम हम, हम माने लफ़त्तू बन्टू और मैं, घासमण्डी के कोने पर खड़े होकर पसू अस्पताल की दिशा में नज़रे गड़ाए थे. पसू अस्पताल के कम्पाउन्ड के भीतर ही कुच्चू-गमलूपिता गोबर डाक्टर को सरकारी क्वाटर मिला हुआ था. अचानक पीछे से किसी ने लफ़त्तू को नाम लेकर पुकारा. लालसिंह था. लालसिंह के पापा की घासमण्डी में चाय-बिस्कुट की दुकान थी - यह तथ्य हमारी नज़रों से न जाने कैसे छूट गया था. उसके पापा बीमार थे और इन दिनों दुकान का काम उसके सिपुर्द था. उसने करीब करीब बड़े भाई का सा लाड़ दिखाते हुए हमें दुकान में गल्ले वाली जगह पर बिठाया और दूध-बिस्कुट खाने को दिया. हमने मौज लूटना शुरू ही किया था कि नौटंकी चालू हो गई. इस घटना ने लफ़त्तू पर तुरन्त असर डाला और उसका "...उहुं ... उहुं .. दान्त तत ... उहुं ... उहुं ..." अपने नैसर्गिक लुच्चपने के साथ चालू हो गया. लालसिंह ने लफ़त्तू को देख कर ठहाका लगाया और बामोहोब्बत "साला हरामी" कहकर उसकी कला की दाद दी. बन्टू शरीफ़ बच्चा था सो वह "पापा आ गए होंगे" कहकर भाग लिया. मैं न सरीफ़ था न बदमास और मेरा स्टेटस मेरी अपनी निगाहों में लफ़त्तूशिष्य से ऊपर नहीं जा सका था सो जैसी वस्ताद की इच्छा.

लालसिंह ने आंख मार कर लफ़त्तू से पूछा: "पसू अस्पताल में क्या देख रया था?"

"अपने माल का इंत्दाल कल्लिया ता औल क्या!" वयस्क किस्म की बेपरवाही से लफ़त्तू ने जवाब दिया.

"कौन से वाले का: छोटे का या बड़े वाले का?" यह सवाल ट्रिकी था. कुछ दिन पहले लफ़त्तू क्लास में गोबर डाक्टर की एक लड़की से अपने वन साइडेड चक्कर की घोषणा कर चुका था. फ़ुच्ची कप्तान की टोन में उसने सबको चुनौती देते हुए कहा था: "तुम थब की भाबी बनाऊंगा उतको बेतो!"

लालसिंह के सवाल का जवाब देने हेतु आवश्यक पर्याप्त ज्ञान का अभाव था लफ़त्तू के पास. इस कदर जुड़वां दो लड़कियों में कैसे बताया जाए कि 'बड़ा' कौन सा वाला है और 'छोटा' कौन सा. जब लफ़त्तू उन सुन्दर लड़कियों को माल कहता था तो मुझे ऐसा-वैसा लगने लगता. अपनी मोहब्बत नम्बर तीन को मैं तब तक पोशीदा रखना चाहता था जब तक कि यह सर्टेन न हो जाए कि लफ़त्तू वाला माल कौन सा है. उसके बाद बचे हुए माल (किंवा कुच्चू/गमलू में से एक) के प्रति मुझे अपनी भावनाएं अभिव्यक्त कर पाने की वैधता हासिल हो जानी थी.

जब तक लफ़त्तू कोई जवाब सोचता, लालसिंह ने हरामीपने से हंसते हुए कहा: "हरिया हकले से फंसे हुए हैं दोनों माल!" लफ़त्तू ने हरिया हकले के प्रति एक बड़ी गाली हवा में विसर्जित करते हुए सड़क पर थूक दिया.

लफ़त्तू को यह परमज्ञान प्राप्त हुए अर्सा बीत चुका था कि हमारी भाबी हरिया हकले से फंसी हुई है पर मेरा चोर मन कहता था कि उनमें से एक अब भी ख़ाली है. और उस ख़ाली वाली को चाहने का मेरा पूरा अधिकार है.

जो भी हो यह सारा वार्तालाप मेरे लिए एक ऑलरेडी बड़ी पहेली को और भी बड़ा बना रहा था. लालसिंह और लफ़त्तू ने आपस में कानाफूसी करते हुए एडल्ट किस्म की बात करना शुरू कर दिया था. लालसिंह ने अपनी छाती पर दोनों हाथ ले जा कर कुछ इशारा किया जिसका मतलब भी एडल्ट रहा होगा क्योंकि उसके ऐसा करते ही लफ़त्तू परमानन्दावस्था को प्राप्त हो कर उठ बैठा और कूल्हे मटकाता हुआ "...उहुं ... उहुं .. दान्त तत माई बादी ... उहुं ... उहुं ..." करने लगा.

नौटंकी के शाम वाले शो के समय अगले तीन-चार दिन हमने लालसिंह की दुकान पर दूध-बिस्कुट का फ़ोकट लुत्फ़ काटने, और 'लैला-मन्जूर' के गीतों को कंठस्थ करने में व्यतीत किए. कुच्चू-गमलू केन्द्रित चर्चा के लिए भी समय निकाला जाता. एक दिन लफ़त्तू मालवार्ता का रस ले रहा था कि दोनों लड़कियां हमेशा की तरह एक ही रंग की छैलछबीली पोशाकें पहने दुकान के सामने आ गईं. वे मेरे घर की दिशा से आ रही थीं और अपने घर जा रही थीं. तमाम बातें करते हुए हमारी आंखें पसू अस्पताल की ही तरफ़ लगी हुई थीं. इन दो नायिकाओं ने विपरीत दिशा से आकर हमें एकबारगी हकबका दिया.

छिपने का जतन करता लफ़त्तू काउन्टर के पीछे नीचे ज़मीन पर बैठ गया. मेरा मन हुआ कि धरती में गड़ जाऊं. मुझे लग रहा था कि कुच्चू-गमलू ने हमारी सारी गन्दी बातें सुन ली हैं और अगर वे हरिया हकले से नहीं भी फंसी हैं तो हमारा चान्स अब तो नहीं ही बचा है.

"बाहर आ जा बे. गये माल." लालसिंह ने कहा तो लफ़त्तू बाहर आया. "इत्ते डरपोक साले बड़े मन्जूर बन्नए."

विदा करने से पहले लालसिंह ने हमें काफ़ी लताड़ लगाई और अन्ततः पढ़ाई में मन लगाने की नसीहत भी दी. उसने फ़रमान जारी किया कि ऐसा न करने की सूरत में हमारी हालत भी उस जैसी हो जाएगी. उसे यह नहीं मालूम था कि उसकी इन्डिपेन्डेन्स से मुझे कितना रश्क होता था. क्या खाक काम की ऐसी पढ़ाई जब इच्छा होने पर बमपकौड़ा तक खाने को न मिले.

लालसिंह की दुकान से निकल जाने के बाद, घर पहुंचने से पहले लफ़त्तू और मेरे बीच एक महाधिवेशन हुआ जिसमें अभी अभी घटित दुर्घटना पर चर्चा हुई. लफ़त्तू भी मेरी ही तरह सोच रहा था.

वह रात तब तक के प्रेमजीवन की सबसे मुश्किल रात साबित हुई मेरे लिए.

सुबह सोकर उठा तो लगा बहुत देर हो गई है. जब तक कुछ सोचता, लफ़त्तू ने नीचे सड़क से "बी...यो...ओ...ओ...ई..." का लफ़ंडरसंकेत दूसरी बार किया तो मैंने बड़ी बहन को खिड़की से बाहर झांक कर लफ़त्तू को बताते हुए सुना कि मैं आज स्कूल नहीं आने वाला हूं क्योंकि मैं बीमार हूं.

मुझे बताया गया कि मुझे बुखार था और यह भी कि मैं रात भर सपने में कुछ बड़बड़ कर रहा था. उस प्रलय सरीखी रात का गुज़रना फ़ाइनली पता नहीं कैसे हुआ होगा, मुझे याद नहीं पड़ता. दिन बेहिसी में कटा. मगर शाम का समय किसी सपने जैसा रहा. गोबरडाक्टर, गोबरडाक्टरानी और कुच्चू-गमलू मुझे देखने आए. "हैलो बेटे! अब कैसे हो?" कहकर गोबरडाक्टरानी ने मेरे गाल दुलराये. खिलखिल करती गमलू-कुच्चू मेरे लिए गेंदे के दो फूल ले कर आई थीं और कॉपी से फ़ाड़े गए एक पन्ने पर 'गेट वैल सून' लिख कर भी.

दो दिन बाद मुझे और लफ़त्तू को मालघर में आयोजित एक बड्डे पाल्टी में बाकायदा बुलाया जा रहा था. जाते-जाते गोबरडाक्टर ने आशा जताई कि मैं तब तक चंगा हो जाऊंगा.

गोबरकुटुम्ब के जाते ही मैं चंगा हो गया और जूता पहनकर यह समाचार लफ़त्तू के घर जाकर उसे देने की नीयत से भाग कर सड़क पर आ गया. लफ़त्तू ने मेरी बात का यकीन नहीं किया. लालसिंह ने भी नहीं. लेकिन उसी रात को लफ़त्तू की बड़ी बहन ने उसे बताया कि गोबरकुटुम्ब उसके घर भी तशरीफ़ लेकर गया था.

कुच्चू-गमलू की बड्डे पाल्टी हम दोनों के जीवन की पहली पाल्टी थी. पाल्टी में क्या-कैसे होना होता है इत्यादि तमाम प्रश्नों-जिज्ञासाओं से लैस बिना कोई तोहफ़ा लिए जब मैं पसू अस्पताल के गेट पर अचानक ग़ायब हुए लफ़त्तू का इन्तज़ार कर रहा था. लफ़त्तू कहीं से आया. उसके हाथ में बांसी कागज़ की दो थैलियां थीं. "ले एक तेली"

मैं थैली खोलने को हुआ तो उसने मुझे डांटा: "किती के बड्डे में खाली हात नईं दाते बेते. गिट्ट देते ऐं. मैंने पित्तल में देका ता. एक थैली तेला गिट्ट ऐ. अपनी भाबी ते कैना - हैप्पी बद्दे. थमदा बेते!" महापराक्रमी लफ़त्तू अपने पिताजी की जेब से कुछ नोट चुरा कर मेरी इज़्ज़त बचाने हेतु दो थैलियों में टॉफ़ियां भर कर बड्डे गिट्ट बना लाया था - मैं अहसान से दब गया.

बड्डे मनाने बहुत सारे लोग जमा थे. बहुत सारे बड़े. और बेशुमार बच्चे. गोबरकुटुम्ब एक मेज़ के एक तरफ़ खड़ा था. मेज़ पर केक, मोमबत्ती वगैरह धरे हुए थे. औरतें खुसफुस में और बच्चे चीखपुकार में व्यस्त थे. गोबर डाक्टर ने मुझे देखा तो अपने पास बुला लिया. और लफ़त्तू को भी. बहुत शर्म आ रही थी. बहुत ज़्यादा शर्म आ रही थी. लफ़त्तू का चेहरा शर्म से सुर्ख पड़ चुका था. यही मेरे चेहरे का रंग भी रहा होगा. हम दोनों की निगाहें ज़मीन से चिपकी हुई थीं जब अचानक सब ख़ामोश हुए फिर तालियां पिटीं और "हैप्पी बड्डेटुय्यू, हैप्पी बड्डेटुय्यू ..." हवा में तैरने लगा.

केक बंट रहा था. गमलू या कुच्चू, किसी एक ने हम पिटे आशिकों के हाथों में केक का लिथड़ा सा टुकड़ा थमा दिया था. हमारे हाथों में रखीं दरिद्र टॉफ़ी की थैलियां इतनी आउट ऑफ़ प्लेस महसूस हुईं कि वे अब जेबों में जा चुकी थीं. हरिया हकला जलडमरूमध्य बना हुआ पानी के जग और गिलास लिए "मानी ... मानी" कर रहा था. अचानक डोंगे लिए कुछ औरतें रसोई के भीतर से अवतरित हुईं और "लीजिए न, लीजिए न ..." के साथ डिनर शुरू हो गया.

यह सब भीषण द्रुत गति से हुआ.

महौल में चपचप की आवाज़ें भरना शुरू हुईं तब मैंने आसपास का डिटेल्ड जायज़ा लेना शुरू किया. लफ़त्तू के यहां हुई गीतों की संध्या के नायक मास्टर मुर्गादत्त, पंडित रामलायक निर्जन और दड़ी मास्साब एक गिरोह सा बनाए कमरे के एक कोने में खड़े होकर दूसरे कोने में खड़े गोबरडाक्टर को इशारा सा कर रहे थे जिसका मतलब था कि जो करना-कराना है, जल्दी कराओ, हम क्या यहां दही-भल्ले सूतने भर को आए हैं. मुटल्ली महिलाओं ने चाटेत्यादि की लूटखसोट मचा रखी थी. उनके बच्चे ज़मीन पर लोटे-रोते-खीझते कुछ भी कर रहे थे किन्तु वे निर्लिप्त थीं. चाट के उपलब्धतातिरेक ने उनकी नैसर्गिक प्रतिभा को भड़का दिया था.

इधर गमलू-कुच्चू हमारे नज़दीक आए. "कुछ खाओगे नहीं आप? अपने फ़्रेन्ड को भी खाने को बोलिये न! उस के बाद हम आपको अपने कमरे में बुक्स दिखाएंगे. जल्दी कीजिए. हम अभी आते हैं अपने रूम में जगह बना कर आते हैं."

अपना कमरा, रूम, बुक्स, आप, फ़्रेन्ड ... ये कैसे शब्द बोल कर डरा रही थीं हमें. लफ़त्तू के चेहरे पर पहली बार इत्मीनान आया दिखने लगा था. अधिकतर मेहमान खा-पी रहे थे सो आवाज़ें थोड़ा कम सी हो गई थीं. कोई दो-चार मिनट बाद स्कर्टधारिणी नायिकाएं हम तक पहुंची और "चलिए" कहकर हमें करीब करीब ठेलती हुईं अपने रूम में ले गईं.

रूम बहुत साफ़ सुथरा था. किताबें करीने से लगी हुई थीं. हम दोनों को कुर्सियों पर बिठाया जा चुका था. गमलू-कुच्चू बहुत उत्साह से हमें अपनी पसन्द की कॉमिक्स दिखाना शुरू कर चुकी थीं. कॉमिक्स में किसका मन लगना था. दिल का एक चोर कोना कहता था कि ये सम्भ्रान्त लड़कियां क्योंकर हरिया हकले से फंसने लगीं. लफ़त्तू के मुझे कोहनी से ठसका मारा और उनकी निगाह बचाकर मुझे आंख भी मारी. माल पट रहा है बेते! पकाए जाओ. भौत चान्स है अभी.

इधर नौटंकी में इन्टरवल वाला गाना चालू हुआ, उधर शराबमण्डल कमरे में प्रविष्ट होने की तैयारी कर रहा था. लफ़त्तू के चेहरे पर कमीनपन से भरपूर खुशी की आभा छा रही थी. दोनों लड़कियां उस से सट कर खड़ी थीं और मुझे मालूम था कि उसका दिल भीतर से गा रहा होगा:"...उहुं ... उहुं .. दान्त तत माई बादी ... उहुं ... उहुं ..."

मुर्गादत्त मास्टर के नेतृत्व में पेयदल ने कमरे में एन्ट्री ली और सबसे पीछे आए गोबरडाक्टर ने गमलू-कुच्चू से मुखातिब होकर आदेश दिया : "बेटा चलो, भैया लोगों को बिल्ली के बच्चे दिखाओ बाहर वाले बरामदे में ..."

Friday, August 8, 2008

बिग्यान का दूसरा सबक और टेस्टूप

एक महीने कछुआ देखने के बाद हुई सामूहिक धुनाई के बाद वाले रोज़ दुर्गादत्त मास्साब लालसिंह के साथ क्लास में घुसे. लालसिंह अंग्रेज़ी की क्लास में अनुपस्थित था. असेम्बली में टोड मास्साब और दुर्गादत्त मास्साब के बीच चली कोई एक मिनट की बातचीत के बाद उसे जल्दी जल्दी गेट से बाहर जाते देखा गया था. लालसिंह के हाथ में खादी आश्रम वाला गांठ लगा मैला-कुचैला थैला था. मास्साब आदतन कर्नल रंजीत में डूबे हुए थे. लालसिंह ने रोज़ की तरह हमारी अटैन्डेन्स ली. पिछले दिन की ख़ौफ़नाक याद के कारण सारे बच्चे चुपचाप थे. हमने दो कक्षाओं के बीच पड़ने वाले पांचेक मिनट के अन्तराल में स्याही में डुबो कर काग़ज़ की गेंदें फेंकने का खेल भी नहीं खेला.

अटैन्डेन्स के बाद मास्साब ने उपन्यास नीचे रखा और बहुत नाटकीय अन्दाज़ में बोले: "कल तक हम ने जीव बिग्यान याने कि जूलाजी के बारे में जाना. आज से हम बनस्पत बिग्यान माने बाटनी की पढ़ाई शुरू करेंगे."

तब तक लालसिंह मैले थैले से काग़ज़ में लिपटी कोई गोल गिलासनुमा चीज़, एक पुड़िया और पानी से भरा हुआ शेर छाप मसालेदार क्वाटर सजा चुका था. लफ़त्तू ने मुझे क्वाटर, अद्धे और बोतल का अन्तर पहले से ही बता रखा था. उसके पापा इन सब में भरे मटेरियल का नियमित सेवन करते थे और लफ़त्तू एकाधिक बार चोरी से उसे चख भी चुका था. "छाली बली थुकैन होती है. लुफ़्त का भौत मजा आता है छाली में मगल."

मास्साब ने और भी नाटकीय अदाओं के साथ मेज़ पर रखी इन वैज्ञानिक वस्तुओं को उरियां किया. कांच गिलासनुमा चीज़ बहुत साफ़ थी और पतली स्याही से लम्बवत उसमें नियत दूरी पर लकीरें बनी हुई थीं. उसके भीतर गै़रमौजूद धूल को एक अतिशयोक्त फूंक मार कर मास्साब ने दूर किया, उंगली को टेढ़ा कर उसमें दो-चार नाज़ुक सी कटकट की और ऊंचा उठाकर बोले: "देखो बच्चो ये है बीकर. आज श्याम को सारे बच्चे लच्छ्मी पुस्तक भंडार पे जा के इसे ख़रीद लावें. डेड़-दो रुपे का मिलेगा. घरवालों से कह दीजो कि मास्साब ने मंगवाया है."

पुड़िया खोलकर उन्होंने उसके भीतर के भूरे जरजरे पाउडर को ज़रा सा लिया और लकड़ी के बारूदे से हमारा परिचय कराया. "जिस बच्चे के घर पे बारूदे की अंगीठी ना हो बो भवानीगंज जा के अतीक भड़ई के ह्यां से ले आवे. अतीक कुछ कये तो उस से कैना कि मास्साब ने मंगाया है"

शेर छाप का क्वाटर खोल कर उन्होंने हमें पानी दिखाया और पहली बार कोई मज़ाकिया बात बोली "और ये है दारू का पव्वा. दारू पीने से आदमी का बिग्यान बिगड़ जाता है. कोई बच्चा दारू तो नहीं पीता है ना?" बच्चों ने सहमते हुए खीसें निपोरीं.

"सारे बच्चे कल को बिग्यान की बड़ी कापी में बीकर का चित्र बना के लावें. और अब बनस्पत बिग्यान का कमाल देखो." उन्होंने अपने गन्दे कोट की विशाल जेब में हाथ डाला और मुठ्ठी बन्द कर के बाहर निकाली." हमें पता था कि उसमें चने के दाने होंगे क्योंकि हमारी ठुकाई करने के बाद उन्होंने क्लास से बाहर जाते हुए यह अग्रिम सूचना जारी कर दी थी सो उनके इस नाटक को हम दर्शकों की ज़्यादा सराहना नहीं मिली.

"ये हैं चने के दाने. इस संसार में सब कुछ बिग्यान होता है जैसे ये दाने भी बिग्यान हैं. अब देखेंगे बनस्पत बिग्यान का जादू." उन्होंने बीकर में चने के दाने डाले, उसके बाद उन्हें बुरादे से ढंक दिया. बीकर में आधा बुरादा डाल चुकने के बाद उन्होंने आधा क्वाटर पानी उसमें उड़ेला.

"अब इस में से चने उगेंगे"

लालसिंह को बीकर थमाते हुए उन्होंने उसके साथ कछुए वाला व्यवहार करने का आदेश दिया और उपन्यास में डूब गए. लालसिंह ने बीकर दिखाना शुरू किया ही था कि घन्टा बज गया. लालसिंह के हाथ से बीकर लेते हुए मास्साब ने पलटकर कहा: "सारे बच्चे आज श्याम को बाज़ार से बीकर लावें और ऐसा ही परजोग करें. कल सबको चने वाले बीकर लाने हैं."

घर पर हमेशा की तरह साइंस के इस प्रयोग की सामूहिक हंसी उड़ाई गई. लफ़त्तू के घरवालों ने उसे बीकर के पैसे देने से मना कर दिया था सो मैंने मां से यह झूठ बोलकर दो बीकर ख़रीदे कि सबको दो-दो बीकर लाने को कहा गया है.

अगले दिन असेम्बली में कक्षा छः (अ) के हर बच्चे के हाथ में एक बीकर था. केवल नई कक्षा के बच्चों ने इन में दिलचस्पी दिखाई. दुर्गादत्त मास्साब के इस बनस्पत बिग्यान परजोग से बाक़ी के अध्यापक-छात्र परिचित रहे होंगे.

मास्साब ने आकर लालसिंह से अटैन्डेन्स के बाद हर बच्चे का बीकर चैक करने को कहा. बीकर चैक करने के बाद हमारे लिए ख़ास बनाई गईं काग़ज़ की छोटी पर्चियां जेब से निकालकर मास्साब ने हम से उन पर अपना-अपना नाम लिखने और परजोगसाला से लालसिंह द्वारा लाई गई आटे की चिपचिप लेई से उन्हें अपने बीकरों पर चिपकाने को कहा. "जब चिप्पियां लग जावें तो सारे बच्चे बारी-बारी से नलके पे जाके हाथ धोवें औए साफ़ सूखे हाथों से बीकरों को परजोगसाला में रख के आवें" घड़ी की तरफ़ एक बार देख कर मास्साब ने एक उचाट निगाह डालते हुए हमें आदेश दिया.

मोतीराम परशादीलाल इन्टर कालिज की परजोगसाला एक अजूबा निकली. एक बड़ा सा हॉल था, जिस में घुसते ही क़रीब सौएक टूटी कुर्सियां और मेज़ें औंधी पड़ी हुई थीं. उनके बीच से रास्ता बनाते हुए आगे जाने पर एक तरफ़ को बड़ी-बड़ी मेजें थीं - एक पर शादी का खाना बनाने में काम आने वाले बड़े डेग-कड़ाहियां-चिमटे-परातें बेतरतीब बिखरे हुए थे. एक मेज़ के ऊपर कर्नल रंजीत वाली एक अधफटी किताब धूल खा रही थी. वह दुर्गादत्त मास्साब की मेज़ थी. इसी पर हमने अपने बीकर क्रम से रखने थे. किताब मैंने दूर से ताड़ ली थी. मेरे त्वरित, गुपचुप, लालचभरे इसरार पर लफ़त्तू लपक कर गया और चौर्यकर्म में अपनी महारत का प्रदर्शन करते हुए किसी और बच्चे के मेज़ तक पहुंचने देने से पेशतर उसने किताब चाऊ की और कमीज़ के नीचे अड़ा ली और मुझे आंख भी मारी. बीकर रखने के बाद मेरी निगाह दूसरी तरफ़ गई. जहां-तहां टूटे कांच वाली कुछ अल्मारियां थीं जिनकी बग़ल खड़ा में चेतराम नामक लैब असिस्टैन्ट ऊंची आवाज़ में हम से जल्दी फूटने को कह रहा था. इतनी सारी व्यस्तताओं और हड़बड़ी के बावजूद मुझे भुस भरे हुए कुछ पशु-पक्षी इन अल्मारियों के भीतर दिख ही गए. और एक संकरी ताला लगी अल्मारी के भीतर खड़ा एक कंकाल भी जिसने कर्नल रंजीत के साथ अगले कई महीनों तक मेरे सपनों में आना था.

अगले बीसेक दिन बिग्यान की क्लास का रूटीन यह तय बताया गया कि अंग्रेज़ी की क्लास के तुरन्त बाद हमें परजोगसाला जाकर अपने - अपने बीकरों में पानी देना होता था, उसके बाद सम्हाल कर इन्हें क्लास में लाकर अपने आगे रख कर अटैन्डेन्स दी कर बीकर की परगती को ध्यान लगाकर देखना होता था. मास्साब के घड़ी देख कर बताने के बाद घन्टा बजने से दस मिनट पहले हमें इन बीकरों को वापस परजोगसाला जाकर रखना होता.

पहले तीन-चार दिन तो मुझे लगा यह भी मास्साब की कोई ट्रिक है जिस से बोर करने के बाद वे हमें एक बार पुनः मार-मार कर बतौर तिवारी मास्साब हौलीकैप्टर बनाने की प्रस्तावना बांध रहे हैं. पांचवें दिन बीकर के तलुवे में पड़े चने के दानों में कल्ले फूट पड़े और बीकर को नीचे से देखने पर वे शानदार नज़र आते थे. भगवानदास मास्साब इस घटना से इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने पांच मिनट तक उपन्यास नीचे रख कर हमें बनस्पत बिग्यान की माया पर एक लैक्चर दिया.

परजोगसाला जाकर मैं सबसे पहले पानी न देकर कंकाल को देखता और उसे पास जा कर छूने का जोख़िमभरा कारनामा अंजाम देने की कल्पना किया करता. इधर मैंने चोरी छिपे ढाबू की छत के एक निर्जन कोने में कर्नल रंजीत के फटे उपन्यास के सारे पन्ने कई बार पढ़ लिए थे. उस के बारे में फिर कभी. चोरी-चोरी मास्साब के उपन्यासों के कवर देखते हुए अब मुझे कुछ कुछ समझ में आने लगा था और कर्नल का इन्द्रजाल सरीखे रहस्य लोक से परिचित क़िस्म की सनसनी होने लगी थी.


दस- बारह दिन बाद नन्हे से पौधे वाक़ई चार-पांच सेन्टीमीटर की बुरादे की परत फ़ोड़कर बाहर निकल आए. इन दिनों पूरी क्लास भर मास्साब के चेहरे पर परमानन्द की छटा झलकती रहती थी. लालसिंह सारे काम करता और ख़ुद उन्हें उपन्यास पढ़ने के सिवा कुछ नहीं करना होता था.

चने के पौधे दो-तीन सेन्टीमीटर लम्बे हो गए थे और बुरादे से अब बदबू भी आने लगी थी. किसी-किसी बीकर के भीतर फफूंद उग आई थी. एक दिन उचित अवसर देख कर मास्साब क्लास से मुख़ातिब हुए: "चने का झाड़ कितने बच्चों ने देखा है?" कोई उत्साहजनक उत्तर न मिलने पर पहले उन्होंने लालसिंह से किसी खेत से चने का झाड़ लाने को कहा और अपना लैक्चर चालू रखते हुए कहना शुरू किया: "चने का झाड़ बड़े काम का होता है. उसमें पहले हौले लगते हैं फिर चने और चने को खाकर सारे बच्चे ताकतवर बनते हैं. सूखे चने को पीसकर बेसन बनता है जिसकी मदद से तलवार अपने होटल में स्वादिस्ट पकौड़ी बनाता है." पकौड़ी का नाम आने पर उन्होंने अपना थूक गटका, "सारे बच्चों के पौधे भी एक दिन चने के बड़े झाड़ों में बदल जावेंगे. तो आज हम आडीटोरियम के बगल में इन पौधों का खेत तैयार करेंगे. जब खूब सारे चने उगेंगे तो हम उन चनों को बन्सल मास्साब की दुकान पे बेच आवेंवे. उस से जो पैसा मिलेगा, उस से सारे बच्चे किसी इतवार को कोसी डाम पे जाके पिकनिक करेंगे.

"लालसिंह हमें आडीटोरियम के बगल में इन पौधों को रोपाने ले गया और वहां जाकर भद्दी सी गाली देकर बोला: "मास्साब भी ना!"

इसके बावजूद हमारे उत्साह में क़तई कमी नहीं आई और आसपास पड़े लकड़ी-पत्थर की मदद से खेत खोदन-निर्माण और पौधारोपण का कार्य सम्पन्न हुआ. घन्टा बज चुका था और हम अपने-अपने बीकर साफ़ करने के उपरान्त उन्हें अपने बस्तों में महफ़ूज़ कर चुके थे.

छुट्टी के वक़्त स्कूल से लौटते हुए कुछेक बच्चे सद्यःनिर्मित खेत के निरीक्षणकार्य हेतु गए. बीच में बरसात की बौछार पड़ चुकी थी. लफ़त्तू भागता हुआ मेरे पास आया: "लालछिंग सई कैलिया था बेते. भैंते मात्तर ने तूतिया कात दिया. छाले तने बलछात में बै गए. अब बेतो तने औल कल्लो दाम पे पुकनिक". उस कब्रगाह पर जा पाने की मेरी हिम्मत नहीं हुई.

तीन हफ़्ते की मेहनत का यूं पानी में बह जाना मेरे लिए बहुत बड़ा हादसा था. इस वैज्ञानिकी त्रासदी से असंपृक्त दुर्गादत्त मास्साब ने अगले रोज़ न लालसिंह से चने के झाड़ के बाबत सवालात किए, जिसे लाना वह भूल गया था, न चनोत्पादन की उस महत्वाकांक्षी खेती-परियोजना का ज़िक्र किया. अपनी जेब से कर्नल की चमचमाती नई किताब के साथ उन्होंने जेब से परखनली निकाली और उसी नाटकीयता से पूछा: "इसका नाम कौन बच्चा जानता है?" लालसिंह ने भैंसे यानी दुर्गादत्त मास्साब को कल से भी बड़ी गाली देते हुए हमें बिग्यान की इस तीसरी क्लास के बारे में एडवान्स सूचित कर दिया था. "परखनाली मास्साब!" उत्तर में एक कोरस उठा.

"परखनाली नहीं सूअरो! परखनली कहा जावे है इसे! और कल हर बच्चा बाज़ार से दो-दो परखनलियां ले के आवेगा. कल से हम बास्पीकरण के बारे में सीखेंगे. आज श्याम को सारे बच्चे लच्छ्मी पुस्तक भंडार पे जा के ख़रीद लावें. आठ-बारह आने में आ जावेंगी ..."

लालसिंह की गुस्ताख़ी का उन्हें भान हो गया होगा. पहली बार उसकी तरफ़ तिरस्कार से देखते हुए उन्होंने क़रीब-क़रीब थूकने के अन्दाज़ में हमसे कहा: "इंग्लिस में टेस्टूप कहलाती है परखनली. आई समझ में हरामियो?"

Sunday, November 4, 2007

कर्नल रंजीत और विज्ञान के पहले सबक



दुर्गादत्त मास्साब कर्नल रंजीत के जासूसी उपन्यासों के सबसे बड़े पाठक थे. हर सुबह उन्हें एम. पी. इंटर कालिज के परिसर में आलसभरी चाल के साथ प्रवेश करते देखा जा सकता था. असेम्बली खत्म होने को होती थी जब वे प्रवेशद्वार पर नमूदार होते थे. प्रवेशद्वार से भीतर घुसते ही उन्हें ठिठक कर थम जाना पड़ता था क्योंकि उसी पल राष्ट्रगान शुरू हो जाता था. वे इत्मीनान से आंखें बन्द कर राष्ट्रगान के खत्म होने का इन्तजार करते रहते थे. असेम्बली के विसर्जन के समय प्रिंसीपल साब एक खीझभरी निगाह दुर्गादत्त मास्साब पर डालते थे लेकिन उस निगाह से बेज़ार मास्साब स्टाफरूम की तरफ घिसटते जाते थे. उनके अगल बगल से करीब तीन हज़ार बच्चे हल्ला करते धूल उड़ाते अपनी अपनी कक्षाओं की तरफ जा रहे होते थे. पहली क्लास दस बजे से होती थी और बच्चों के पास उस के लिए पांच मिनट का समय होता था. असेम्बली का मैदान उन पांच मिनटों में धूल के विशाल बवंडर में तब्दील हो जाया करता था.

दुर्गादत्त मास्साब स्टाफ़ रूम में बड़ी खिड़की से लगी अपनी कुर्सी में किसी तरह अट जाते थे. खिड़की से बाहर बाजार का विहंगम दृश्य देखा जा सकता था. मास्साब के विशाल शरीर के के हिसाब से उनकी कुर्सी बहुत सूक्ष्म थी. वे अपने किसी भी साथी अध्यापक से बात नहीं करते थे. दुर्गादत्त मास्साब प्रिंसीपल के रिश्ते के मामा लगते थे और उन से बात करने की स्टाफ़ तो दूर खुद प्रिंसीपल साहब की भी हिम्मत नहीं होती थी. इसके अलावा उन्हें पहला पीरियड भी नहीं पढ़ाना होता था. असेम्बली के मैदान जैसा ही दृश्य स्टाफ़रूम में भी देखा जा सकता था : अपनी-अपनी अल्मारियों से अटेन्डैन्स रजिस्टर, किताबें, चॉक और डस्टर आदि जल्दी जल्दी निकालते हुए अपने साथी अध्यापकों की तरफ एक उकताई सी निगाह डालकर मास्साब अपने उपन्यास में डूबने का प्रयत्न करने में सन्न्द्ध हो जाते थे.

दुर्गादत्त मास्साब विज्ञान के मेरे पहले टीचर थे. कक्षा छ: (अ) में करीब दो सौ बच्चे थे. कक्षा की दीवारें बहुत मैली थीं और टीन की उसकी छत तनिक नीची थी. ब्लैकबोर्ड के कोनों पर चिड़ियों की बीट के पुरातन डिजायन उकेरे गए से लगते थे. हम लोग फर्श पर चीथड़ा दरियों पर बैठा करते थे. सामने डेस्क होती थी और डेस्क के एक कोने पर स्याही की दवात. पता नहीं कौन हर सुबह इन दवातों को भर जाता था. हम छुट्टी के बाद जब घरों को जाते तो हमारी सफेद कमीजों पर खूब बड़े बड़े नीले धब्बे होते.

एम पी यानी मोतीराम परशादीलाल इन्टर कालिज में वह मेरा पहला दिन था. अपनी होस्यारीके कारण मैं कक्षा चार से सीधा छ: में पहुंच गया था. पहली कक्षा के बाद हम अगले मास्साब के आने का इन्तजार कर रहे थे. पहली क्लास अंग्रेजी की थी. हमारी अटैन्डेन्स ली ही गई थी कि अंग्रेजी वाले मास्साब को किसी ने बाहर बुला लिया. हमारी तरफ एक पल को भी देखे बिना अंग्रेजी वाले मास्साब पूरे पीरियड भर अपने परिचित से बातें करते रहे. हम कागज की गेंदें स्याही में डुबो कर एक दूसरे पर फेंकने का खेल खेल रहे थे कि घंटा बज गया. अंग्रेजी वाले मास्साब ने हमारी तरफ एक बार को भी नहीं देखा और वे कक्षा से उपस्थिति रजिस्टर लेकर अगली कक्षा की तरफ बढ़ चले.

लालसिंह हमारी क्लास का सबसे विचित्र लड़का था. वह छठी कक्षा में पांच-छः साल फेल हो चुका था. वह तकरीबन करीब अठारह साल का हो चुका था और उसकी मूंछें भी थीं. वह मेरे बड़े भाई जितना लम्बा था. वह एक खास तरह से प्यारा भी था. अपनी लम्बाई और कक्षा के हिसाब से अनफिट मूंछों पर आने वाली शर्म को छिपाने का प्रयास करता वह हम सब को तमाम अध्यापकों के बारे में चुटकुले सुनाया करता था. उसने हमें बताया कि अपनी अस्तित्वहीन गरदन के कारण अंग्रेजी वाले मास्साब को टोडकहा जाता था. मैने करीब-करीब तय कर लिया था कि लालसिंह स्कूल में मेरा सबसे पक्का दोस्त बनेगा.

आ गया, आ गया. भैंसा आ गया.लालसिंह की चेतावनी सुनते ही हम सब की आंखें दरवाजे पर लग गई. बिना हड़बड़ी के दुर्गादत्त मास्साब क्लास में घुसे और उन्होंने लालसिंह पर एक परिचित निगाह डाली: इस निगाह में मुस्कान की सुदूर झलक थी.

कक्षा अचानक शान्त हो गई थी. दुर्गादत्त मास्साब की विशाल देह ही हमें डरा देने को पर्याप्त थी. और लालसिंह हमें उनके गुस्से के कई किस्से सुना चुका था. लालसिंह तुरन्त खड़ा हुआ और मास्साब के हाथ से रजिस्टर लेकर अटैन्डैन्स लेने लगा. दुर्गादत्त मास्साब ने हमारी तरफ बेरूखी से देखा और अपने कोट की जेब से एक किताब बाहर निकाल ली.

सस्ते कागज पर छपी किताब का चमकीला कवर बहुत आकर्षक था. कद में सबसे छोटा होने के कारण मैं सबसे आगे बैठा हुआ था और उस जादुई किताब को बहुत साफ-साफ देख सकता था. अपना चेहरा एक तरफ को थोड़ा सा झुकाए कर्नल रंजीत सीधा मेरी तरफ देख रहा था. उसने काला ओवरकोट और काला ही हैट पहना हुआ था. उसकी तीखी मूंछें ऊपर की तरफ खिंची हुई थीं और आंखों में एक सवाल था. उसके एक हाथ में छोटा सा रिवॉल्वर था. कर्नल का दूसरा हाथ एक अधनंगी लड़की की कमर पर था और वह लड़की कर्नल से चिपकने का प्रयास कर रही दिखती थी. पृष्ठभूमि में लपटें उठ रही थीं और कवर के निचले हिस्से पर एक लाश पड़ी थी. लाश के बगल में खूनसना चाकू था.

कर्नल रंजीत के पास कोई ऐसी दिव्य ताकत थी कि वह एक साथ मुझे और लड़की और लाश को पैनी निगाहों से देख सकता था. यह बेहद आकर्षक था़. मैं सर्वशक्तिमान कर्नल रंजीत के कारनामों के बारे में कल्पनाएं कर रहा था जब दुर्गादत्त मास्साब ने बोलना शुरू किया. अगले आदेश की प्रतीक्षा में लालसिंह अब भी उनकी बगल में खड़ा था.

मैं तुम लोगों को बिग्यान पढ़ाया करूंगा.

हम ने विज्ञान की किताब निकाल ली थी और हमारी सांसें थमी हुई थीं.

"कछुआ कितने बच्चों ने देखा है?”

कुछ हाथ हवा में उठे. किताब को थामे हुए मास्साब सीट से उठे और उन्होंने अपना मैला कोट एक बार हल्के से झाड़ा. मेरी आंखें कवर से चिपकी हुई थीं.

ए तेरा नाम क्या है बच्चे?” वे मेरी तरफ देख रहे थे.

मुझे लगा कि मेरी चोरी पकड़ी गई है और मैं थप्पड़ का इन्तजार करने लगा. डेस्क को देखता हुआ मैं खड़ा हुआ.

"मास्साब मैं …”

मास्साब मैं नाम हैगा तेरा?”

मैं कुछ कहना चाहता था पर जीभ पत्थर की हो गई थी. मैं रोने रोने को हुआ कि उनका बड़ा सा हाथ मेरे कन्धे पर था.

तू वो खताड़ी वाले पांडेजी का लड़का है ना?”

मैंने हां में सिर हिलाया.

सुना है कि तू भौत होशियार है. अब मुझे बता तूने कभी कछुआ देखा है - असली वाला जिन्दा कछुआ

"नईं मास्साब

बढ़िया. कोई बात नहीं. आज सारे बच्चे असली का कछुआ देखेंगे.

अपने कोट की बड़ी सी जेब में हाथ डालकर उन्होंने पत्धर जैसी कोई गोल चीज बाहर निकाली.

"ये रहा कछुआ. असली जिन्दा कछुआ. लो पांडेजी पकड़ो इसे.मास्साब द्वारा पांडेजी कहे जाने पर मुझे थोड़ी शर्म आई. मैंने कांपते हाथों से उस कड़ी चीज को पकड़ा.

अभी कछुआ सोया हुआ है. अगर उसे आराम से खुजाओगे तो ये तुम्हें अपनी शकल दिखा देगा. लालसिंह, चलो मदद करो पांडेजी की.

जरा भी देर किए बिना लालसिंह ने मेरे हाथों से कछूए को छीन लिया. उसने अपनी अनुभवी उंगली को कछुए के किसी हिस्से में खुभाया और कछुआ खोल से बाहर निकल आया. यह एक चमत्कारिक चीज थी और आगे वाले बच्चे लालसिंह के हाथ के गिर्द इकठ्ठा थे.

एक एक कर के लालसिंह!मास्साब वापस अपनी सीट पर थे और उपन्यास पढ़ने में किसी तरह का व्यवधान नहीं चाहते थे.

लालसिंह ने सारे बच्चों को डपटकर सीट पर बिठा दिया और कछुआ मुझे थमाया. कछुआ वापस खोल में घुस चुका था. मैंने भी लालसिंह की तरह उंगली घुसाने की कोशिश की पर कुछ नहीं हुआ. अब तेरी बारी हैकहकर लालसिंह ने कछुआ मेरे साथ वाले बच्चे को पकड़ा दिया. कक्षा में शोर बढ़ता जा रहा था. पीछे की सीटों के बच्चे अधैर्य के कारण बेकाबू हो गए थे. कछुआ उनकी पहुंच से बहुत दूर था सो उन्होंने आइस पाइस खेलना चालू कर दिया था. जब तक कि अगली कतार के सारे बच्चों को कछुआ देख पाने का अवसर मिलता घंटा बज गया. लालसिंह ने कछुआ मास्साब को सुपुर्द कर दिया.

कुर्सी से सश्रम उठते हुए मास्साब ने हमारी तरफ देख कर कहना चालू किया: जिनका नम्बर आज नहीं आया वो बच्चे कल कछुआ देखेंगे .कक्षा से बाहर जाते हुए उन्होंने कुछ अस्पष्ट शब्द बुदबुदाए जो पिछली कतारों के असंतुष्ट बच्चों के कोलाहल में डूब गए. आगे की क़तार वाले वाले बच्चों के चेहरों पर गर्व था.

अगले पन्द्रह दिन तक लाल सिंह के कुशल निर्देशन में विज्ञान की कक्षा में सारे बच्चे कछुआ देखते रहे. लालसिंह का इकलौता काम यह होता था कि मास्साब और कर्नल रंजीत के दरम्यान कम से कम बाधा हो.

हम शायद अनन्त काल तक उस कछुए को देखते रहते लेकिन उसे इतनी बार देख चुकने के बाद बच्चे उकता चुके थे और जब एक दुर्भाग्यपूर्ण क्षण में कुछ बच्चों ने कछुए के साथ कैच कैचका खेल खेलना शुरू किया दुर्गादत्त मास्साब ने अपने ऐतिहासिक गुस्से से हमारा पहला परिचय कराया. जब तक हम कुछ समझ पाते लालसिंह पता नहीं कहां से डंडा लाकर मास्साब को थमा चुका था. साले, हरामजादे, खबीस, बदमाश, ससुरे, सूअर इत्यादि तमाम उपाधियां हमें नवाजते मास्साब के भीतर जैसे किसी चैम्पियन एथलीट का भूत घुस गया था. लॉंग जम्प, हाई जम्प, भालाफेंक, गोलाफेंक और अन्य खेलों में अपना कौशल दिखाते मास्साब डंडे, रजिस्टर और चॉक के टुकड़ों के साथ किसी बेरहम यमराज की तरह कत्लोगारत पर उतर आए थे. उनके सामने जो पड़ा उसकी शामत आई. कई बच्चे एक डेस्क से दूसरी पर कूदते अपनी जान बचा रहे थे. जो ज्यादा स्मार्ट थे वे खिड़की फांद कर बाहर भाग गए.

आठ दस मिनट तक चले इस खून खच्चर के बाद मास्साब फिर से किताब में डूब चुके थे. ज्यादातर बच्चे सुबक रहे थे. लालसिंह जो इस गुस्से को कई दफा देख चुका था एक कोने पर खड़ा बेमन से कछुए के उसी विशेष हिस्से में अपनी उंगली घुसा रहा था.

कछुए में हमारी सारी दिलचस्पी अब खत्म हो चुकी थी. घंटा बजा तो मास्साब इस तरह उठे जैसे कुछ हुआ ही न हो. हमारी जिन्दगानियां लुट चुकी थीं और कछुआ वापस उनकी जेब में था. लालसिंह की तरफ देखते हुए उन्होंने सारी क्लास को संबोधित किया:

कल हम देखेंगे कि बीकर कैसा होता है और लकड़ी के बारूदे की मदद से बीकर में चने कैसे उगते हैं. …”

उनका हाथ जेब में गया तो संभवत: वहां कछुआ उनकी उंगलियों को छू गया होगा. उन्हें कुछ याद सा आया और बाहर जाते जाते थमते हुए उन्होंने पूछा:

कछुआ सारे बच्चों ने देख लिया कि नहीं … ”


*इस पोस्ट को यहां सुना जा सकता है:

संडे स्पेशल: आज सुनिये लपूझन्ने का बचपन और कर्नल रंजीत