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Thursday, September 11, 2008

फ़ुच्ची कप्तान की आसिकी

लफ़त्तू के साथ पढ़ाई-लिखाई से सम्बन्धित बहुत ज़्यादा बातें नहीं होती थीं. हां, यदि घर से कोई चीज़ स्कूल ले कर जानी होती जैसे बारूदा एक्स्पेरीमेन्ट के लिए बीकर या सिरीवास्तव मास्साब की सिलाई-कक्षा हेतु पिलाश्टिक का अंगुस्ताना तो लफ़त्तू के लिए वे चीज़ें मैं लेकर जाया करता. इस कार्य को मैं मित्रतापूरित उत्साह के साथ अंजाम देता. हम दोनों के बीच इस तरह की कोई समझौता वार्ता नहीं हुई थी पर एक आपसी अंडरस्टैंडिंग थी कि लफ़त्तू की चीज़ें ख़रीदने के लिए मैं मां से झूठ बोल लेता था जबकि बौने के ठेले पर होने वाले हमारे बमपकौड़ायोजनों में अपने पापा की जेब से चुराए पैसों से लफ़त्तू पेमेन्ट किया करता.

इधर के दिनों में टौंचा-उस्ताद बागड़बिल्ले का कार्यक्षेत्र खताड़ी से आगे भवानीगंज तक पसर चुका था. बागड़बिल्ले के कुशल नेतृत्व और निर्देशन में वरिष्ठ-कनिष्ठ दोनों प्रकार के लफ़ंडर लौंडे घुच्ची के खेल को रामनगर की गली-गली में फैला देने के महती अनुष्ठान में जान दे देने के हौसले के साथ तन-मन और पांच पैसे के सिक्कों के साथ जुट चुके थे. बड़े भाइयों-चाचाओं-मामाओं इत्यादि द्वारा कभी किसी लड़के के साथ सद्यःघटित सार्वजनिक मारपीटीकरण और अपमानीकरण की अफ़वाहें तमाम मसालों मे लपेटकर हमारे इन्टरवल-सम्मेलनों का विषय बनतीं पर इन सब से उदासीन और अभूतपूर्व जिजीविषा से लबालब ये जांबाज़ जिस खेल पर अपना सर्वस्व न्यौछावर करने का क़ौल उठा चुके थे, उस से उन्हें अब परमपिता भी विरत नहीं कर सकता था.

यही दिन थे जब अपने अनुभव-जगत की विस्तृतता के कारण लफ़त्तू मुझे, मेरा हमउम्र होने के बावजूद, अपने से बहुत-बहुत बड़ा लगने लगा था. इधर उसने नियमित रूप से क्लास गोल करने का रिवाज़ चलाया जो घुच्चीप्रेरित बच्चों में जल्दी पॉपुलर हो गया. लफ़त्तू बागड़बिल्ले का अच्छा दोस्त था और उसके कॉन्फ़ीडेन्स और तोतले किन्तु प्रभावकारी वाकचातुर्य के कारण उसकी उपस्थिति की क्लास में बास्पीकरण सीखने में नहीं बल्कि घुच्ची-अभियान के प्रचार-प्रसार में अधिक दरकार होती थी.

डरना लफ़त्तू ने अब और भी कम कर दिया था. अपने पापा की अंग्रेज़ी की उन्हीं के मुंह के सामने ऐसी-तैसी फेर चुकने के बाद से अब उसने गब्बर का डायलॉग मारना भी बन्द कर दिया था. वह इस मामले में अब बहुत कर्मठ हो चुका था.

छत पर क्रिकेट खेलते हुए लफ़त्तू की उपस्थिति लगातार कम होती जा रही थी और हमें उसमें मज़ा आना क़रीब-क़रीब बन्द हो गया था. कभी-कभी मैं और बंटू बैट-बल्ला छोड़ छत से भावपूर्ण मुद्रा में खेल मैदान को देखा करते और फिर किसी क्षण सड़क पर आकर घासमण्डी का रुख़ करते.शाम के समय घूमने जाने को घर से थोड़ा दूर अवस्थित घासमण्डी को बंटू के पापा ने हमारी लिमिट तय किया हुआ था. घासमण्डी की सरहद पर मरियल कुत्तों की तरह खड़े, मजबूत आवारा कुत्तों को बेख़ौफ़ लड़ते-भौंकते देखते हुए से हम 'असफाक डेरी सेन्टर और केन्द्र' के सामने वाली गली की तरफ़ निगाह चिपका लेते. बहुत संजीदगी से अपने हाथों से भंगिमाएं बनाते, नवघुच्चीवादियों के लैक्चर देते या स्वयं घुच्ची खेलते लफ़त्तू की झलक देखने को मिल जाती तो हमें अजीब-अजीब लगने लगता. हमारी मानसिक हालत किसी असहाय, विवश ग़ुलाम की सी होती और हम बहुत मनहूस चेहरों के साथ, क़रीब-क़रीब रोते हुए वापस लौटते.

जिस दिन हमारे लिए ख़ास फ़ुरसत निकालकर लफ़त्तू क्रिकेट खेलने आता, उसके पास हमें बताने को बेतहाशा क़िस्से होते. खताड़ी में अपना झंडा गाड़ चुकने के बाद कैसे उसने भवानीगंज में अपना सिक्का जमा लिया था, यह हमारे लिए रश्क का विषय होता. उसके चमत्कार-लोक में प्रवेश कर पाने की हमारी आकुलता से भरपूर उत्कंठा और भी बलवती हो जाया करती.

इधर लफ़त्तू की अंतरंग मित्रमंडली का विस्तार हो चुका था. उसकी बातों से ज्ञात होता था कि फ़ुच्ची कप्तान नामक एक नए आए लड़के का उसके जीवन पर बहुत प्रभाव पड़ चुका था.

फ़ुच्ची के पापा रेडीमेड कपडों और प्लास्टिक के जूतों की रेहड़ी लगाते शहर-दर-शहर भटका करते थे. उसी क्रम में वे कुछ समय पहले रामनगर आ बसे थे. उनकी भाषा बहुत ज़्यादा देसी थी. फ़ुच्ची हमसे तीनेक साल बड़ा रहा होगा. शहर-शहर, नगर-नगर घूम चुकने के बाद उसका अनुभव-जगत बहुत संपन्न था और हम सबकी स्पृहा का बाइस भी. 'छठी फ़ेल' की उच्चतम शिक्षाप्राप्त फ़ुच्ची बहुत सांवला था और बात-बात पर "मने, मने" कहता था.

उसका नाम फ़ुच्ची धरे जाने का क़िस्सा लफ़त्तू ने हमें मौज ले ले कर सुनाया था. किसी गली में घुच्ची खेल रहे लौंड-समूह के पास जाकर उसने पूछा:"मने इस खेल की नाम बतइये तनिक!" नाम बताए जाने पर उसने किसी ख़लीफ़ा की तरह जेब से पांच के सिक्के निकालते हुए कहा: "हम भी खेलेंगे फ़ुच्ची!"

"अबे फ़ुच्ची नहीं घुच्ची! घुच्ची ... घुच्ची!" लौंडसमूह के अंतरंगतापूर्ण सामूहिक अट्टहास में इस कलूटे देसी लड़के को फ़ुच्ची नाम से आत्मसात कर लिया गया.

फ़ुच्ची के साथ 'कप्तान' की पदवी दिए जाने का कारण स्वयं फ़ुच्ची की एक आदत में छिपा हुआ था. अपनी वाकपटुता के कारण वह हर जगह दिखाई देने लगा था. बच्चे जहां कहीं कुछ भी खेल रहे होते थे, वह वहां पहुंच जाता और फट से दो टीमों का निर्माण कर देता. "अपनी टीम के कप्तान हम बन गए, बाकी वाले अपना छांट लें!" - यह उसका तकिया कलाम था और अन्ततः उसके नाम के साथ नेमेसिस की तरह जुड़ गया.

रामनगर में इतने समय से खेलते हुए हमें कभी कप्तानी जैसे विषय पर सोचने की प्रेरणा तक नहीं मिली थी और फ़ुच्ची ने आते ही खु़द को आधे बच्चों का कप्तान बना लिया. इस से उसका क़द, इज़्ज़त और नाम तीनों की लम्बाई बढ़ी. कप्तानी के साथ फ़ुच्ची ऑब्सेशन की हद तक जुड़ा हुआ था. हरिया हकले के मकान से होते हुए हमारी छत तक पहुंचने का रास्ता उसे लफ़त्तू बता चुका था. एकाध बार उसने मेरे साथ बैटमिन्डल भी खेली थी. छत पर हम दो ही थे. उसने कहा: "इधर वाले के कप्तान हम. और उधर वाले का मने आप छांट लें!" मेरा मन कुढ़न और खीझ से भर गया था पर मुझे चुप रहना पड़ा क्योंकि कुछ भी हो फ़ुच्ची उन दिनों मेरे उस्ताद लफ़त्तू का उस्ताद बना हुआ था.

एक दिन देर शाम को सियार की सी आवाज़ निकालते हुए लफ़त्तू ले घर के बाहर "बी ... यो ... ओ ... ओ ... ई" का लफ़ाड़ी-संकेत किया तो डरते-सहमते मैं ज़ीना उतर कर बाहर निकला. हांफ़ते हुए लफ़त्तू ने मुझे काग़ज़ का एक पर्चा थमाया और वापस भागता हुआ बोला: "इत को थीक कल देना याल. कल छुबै फ़ुत्ती को देना है!"

मैंने वापस आकर होमवर्क में मुब्तिला होने का बहाना बनाया और पर्चा किताब के बीच छिपा लिया. हालात सामान्य होते ही मैंने पर्चा खोला. लफ़त्तू की अद्वितीय हैंडराइटिंग सामने थी.

जैसे बचा खुचा ज़रा सा भात आवारा बिल्लियों के लिए धूप में रखे जाने और न खाये जाने पर टेढ़े-मेढ़े कणों में बदल जाता है, कुछ वैसी ही हैंडराइटिंग में लफ़त्तू ने फ़ुच्ची के बदले लिखा था:

"मेरी चीटडी पड के नराज न होना.

मे तुमरा आसिक हु.

सादी कर.

तुमरा

फुच्चि"


उफ़! यानी लवलैटर! मेरे सामने जीवन में देखा गया पहला प्रेमपत्र पड़ा हुआ था - यह दीगर बात थी कि वह प्रॉक्सी था और मुझे उसे "थीक" करना था.

पहले तो मैंने लफ़त्तू के प्रति ज़रूरत से ज़्यादा कृतज्ञताभाव महसूस किया कि उसने इस अतिमहत्वपूर्ण प्रोजेक्ट के लिए मुझे छांटा. उसके बाद मैं उस बदनसीब पर्चे को अपना लिखा पहला प्रेमपत्र बनाने के प्रयासों में जुट गया. मैंने अपने मन में तब तक देखी गई सारी फ़िल्मों और सुने गए सारे गानों की फ़ेहरिस्त बनाई और रात को ज़्यादा होमवर्क मिले होने का झूठ बोलते हुए देर तक जग कर अन्ततः एक आलीशान इज़हार-ए-मोहब्बत लिख मारा. शुरू में मैंने सकीना को संबोधित किया, पर उसके बहुत छोटी होने के कारण मेरी कल्पना सीमित हो जा रहि थी, सो बाद का हिस्सा मेरी नई प्रेमिका मधुबाला मास्टरानी से मुख़ातिब था. अन्त में "आपका अपना फ़ुच्ची" लिखने से पहले मैंने चांद-तारे तोड़ लाने की बात लिखी थी.

सुबह स्कूल जाते हुए कांपते हाथों से मैंने लफ़त्तू को उसकी "चीटडी" थमाई. उसने मुझे एक मिनट रुकने को कहा. वह भागता हुआ घासमंडी की तरफ़ गया और मिनट से पहले वापस आ गया. वापस भागते हुए वह बार-बार मुझे आंख मार रहा कि काम बन गया, चिट्ठी फ़ुच्ची को डिलीवर हो गई.

सांस थमने के बाद वह बोला "बले आतिक बन लए फ़ुत्ती! लौंदियाबाद छाले! तित्ती लिकाने को बोल्ल्या ता तो मैंने कया अतोक लिक देगा." उसने पहली बार अहसानमन्द होते हुए मेरा हाथ दबाया.

स्कूल आने पर उसने हाथी जैसा चेहरा बनाते हुए, ब्रह्मवाक्य जारी करते हुए कहा "बलबाद हो जागा फ़ुत्ती!"

असेम्बली के बाद इन्टरवल के बीच चार पीरियड काटना मेरे लिए एक युग बिताने जैसा हुआ. यानी कोई लड़की है जो फ़ुच्ची को भा गई है. फ़ुच्ची जैसे कलूटे कप्तान का प्यार में गिर पड़ना मेरे लिए अविश्वसनीय था. कौन-कैसी होगी वह - विषय पर सोचते हुए मुझे कई विचार आए.

कहीं ऐसा तो नहीं कि फ़ुच्ची मेरा पत्ता काट कर मधुबाला को चिट्ठी दे आने की फ़िराक में हो. आजकल बैटमिन्डल खेलने वो जभी आता है जब मास्टरनी ट्यूशन पढ़ा रही होती है. और मधुबाला क्या जाने कि चिट्ठी फ़ुच्ची ने नहीं मैंने लिखी है.

पछाड़ें मारती, बेकाबू रोती, गिरती-पड़ती, आत्महत्या का ठोस फ़ैसला ले चुकी हीरोइन का विम्ब अब मेरे मन में प्यार-मोब्बत की सघनतम इमेज के रूप में स्थापित हो चुका था. क्या मधुबाला वैसा कुछ करेगी?

मेरा मन फ़ुच्ची की शकल नोंच लेने का हो रहा था.

अगर मधुबाला तक वाक़ई फ़ुच्ची ने चिट्ठी पहुंचा दी और उसने ज़हर खा लिया तो लफ़त्तू इस सारे मामले पर कैसे रियेक्ट करेगा?

...

इन्टरवल का घन्टा बजते ही लफ़त्तू मुझे घसीट कर बौने के ठेले पर ले गया. फ़ुच्ची हमें प्रतीक्षारत मिला. बिना किसी दुआ सलाम के लफ़त्तू ज़ोर से बोला: "आत के पैते फ़ुत्ती देगा!" उसने पहले मुझे, फिर क्रमशः बौने और फ़ुच्ची को आंख मारी. बौना पत्तल बनाने लगा और हमारा महाधिवेशन चालू हो गया.

"दखिये, इतना तो हम समझ लिए कि आप को अच्छा लिखना आती है. मगर आप मने ये क्या आपका अपना ढिम्मक ढमकणा लिखे! अरे जिन्दगानी का बात है. हम तो फैसला किए हैं के आज चिट्ठी और कल सादी. ... अरे तनी कोई सेर-ऊर तो लिखिए न! ... सायरी-दोहा वगेरा ..."

उसने जेब से सलीके से मोड़ा हुआ पर्चा निकाला और वहीं नीचे बैठ कर अपनी जांघ पर फैला लिया.

मेरे पत्र में यह सुधार किया गया था कि सबसे ऊपर पानपत्रद्वय अंकित कर दिए गए थे - एक के भीतर लिखा था 'एफ़' दूसरे के भीतर 'टी'. एक टेढ़ा तीर दोनों पत्रों को जोड़ रहा था और 'टी' वाले जोड़बिन्दु से दो बूंदें टपक रही थीं. इन विवरणों को मैंने चोर निगाह से ताड़ लिया और मन अचानक टनों बोझ उतर जाने जितना हल्का हो गया. 'एफ़' माने फ़ुच्ची. और 'टी' माने कोई भी, मधुबाला नहीं.

"याल बलिया छायली लिक कोई फ़ुत्ती भाई की तरप से. भाबी खुत हो जाए कैते बी! क्यों फ़ुत्ती बाई?" लफ़त्तू 'टी' को भाभी कह रहा था - यानी मामला वाक़ई संजीदा था.

मैं भी फ़ुच्ची का लाया लाल कलम ले कर संजीदा हो गया. "आपका अपना फ़ुच्ची" के नीचे 'दोहा' लिख कर मैंने अंडरलाइन कर दिया. मैं मधुबाला की याद और प्रेरणा की प्रतीक्षा कर रहा था . लफ़त्तू और फ़ुच्ची झल्लाहट, उम्मीद और बेकरारी से मेरा मुंह ताक रहे थे. आख़िरकार वह क्षण आ ही गया. दोहा लिखने के बाद प्रसन्नता के अतिरेक में कांपते सद्यःप्रेमग्रस्त फ़ुच्ची ने हमें एक-एक बमपकौड़ा और टिकवाया.

दोहा था:

"अजीरो ठकर अब कां जाइयेगा
जां जाइयेगा मुजे पाइयेगा"

Thursday, September 4, 2008

इंग्लिछ मात्तर का बेता हो के लोता है बेते!

टोड मास्साब की पढ़ाई अंग्रेज़ी ज़्यादातर बच्चों की समझ में नहीं आती थी. क्लास के अधिकतर बच्चे नॉर्मल स्कूल या बम्बाघेर नम्बर दो के सरकारी प्राइमरी स्कूल से पांचवीं पास थे. इन स्कूलों में अंग्रेज़ी नहीं सिखाई जाती थी. लफ़त्तू, मैं और क़रीब बीसेक बच्चे मान्टेसरी स्कूल या शिशु मन्दिर से आए थे जहां पहली ही कक्षा से इसे सिखाए जाने पर ज़ोर था.

टोड मास्साब की कक्षा में अंग्रेज़ी वाली कापी में ए बी सी डी लिखाने से शुरुआत हुई. मास्साब का लड़का गोलू भी हमारे साथ था और उसकी पढ़ाई बम्बाघेर नम्बर दो में हुई थी. जाहिर है गोलू को भी ए बी सी डी नहीं आती थी. और यह सर्वज्ञात तथ्य टोड मास्साब के ग़ुस्से और झेंप का बाइस बना करता था.

लफ़त्तू को गोलू से संभवतः इसलिए सहानुभूति थी कि गोलू हकलाता था. पहली बार कक्षा में पिता द्वारा सबके सामने पीटे जाने और जलील किए जाने के बाद गोलू इन्टरवल में रो रहा था. अपने पापा की जेब पर सफलतापूर्वक हाथ साफ़ करके आया लफ़त्तू मुझे बौने का बमपकौड़ा खिलाने ले जा रहा था जब उसकी निगाह गोलू पर पड़ी.

"इंग्लिछ मात्तर का बेता हो के लोता है बेते!" कह कर उसने गोलू को मोहब्बतभरी तोतली डांट पिलाते हुए बमपकौड़ा अभियान का हिस्सा बना लिया. " मेले पापा तो मुदे लोज धूनते हैं, मैं कोई लोता हूं कबी! गब्बल छे छीक बेता गब्बल छे: जो दल ग्या वो मल ग्या बेते." किंचित सहमा हुआ, लार टपकाता गोलू कभी लफ़त्तू के कॉन्फ़ीडेन्स को देखता कभी हरे पत्ते में सजे दुनिया के सर्वश्रेष्ठ, स्वादिष्टतम बम-पकौड़े को. कभी उसकी निगाह स्कूल की तरफ़ उठ जाती.

"ततनी दालियो हली वाली औल लाल मिल्चा" कहकर उसने अपना पत्तल बौने के सामने किया. "अभी लेओ बाबूजी" बौना सदा की तरह तत्परता से बोला. यह लफ़त्तू की ख़ास अदा थी जब वह मिर्चा खा पाने की अपनी कैपेसिटी से सामने वाले को आतंकित किया करता. उसकी तनिक पिचकी नाक से एक अजस्र धारा बह रही होती थी पर वह बौने से कहता: "औल दो!"

गोलू के हावभाव बता रहे थे कि वह पहली बार इस प्रकार के कार्यक्रम में हिस्सेदरी कर रह था. पिता की झाड़ और संटी की मार भूलकर वह ज्यों त्यों पकौड़ा निबटाने में लगा था. मैं और गोलू नए खेल के पोस्टर देखने में मशगूल थे.

"नया खेल लगा है बाबूजी! आज ही शुरू हुआ है." अपनी कलाई पर बंधी कोयले और धुंए जैसे डायल वाली, सुतली से कलाई में लपेटी घड़ी पर निगाह मारते हुए बौने ने आगामी बिज़नेस की प्रस्तावना बांधना चालू किया, "हैलन का डान्स हैगा इस में. अभी चल्लिया होगा. आपके इस्कूल में तो अभी टैम हैगा. देखोगे बाबूजी?" इस आश्वस्तिपूर्ण वक्तव्य में इसरार कम था नए ग्राहक को फंसाने की चालबाज़ी ज़्यादा. "नए वाले बाबूजी से क्या पैसा लेना."

लफ़त्तू ने जेब से दो का नोट निकाला और जब तक वह गोलू को पिक्चर देखने का तरीक़ा बताता, मेरी निगाह अपने घर की छत पर गई. मां कपड़े सुखाने डाल चुकने के बाद बाहर देख रही थी. मुझ डरपोक को लगा कि वह सीधा हमें ही देख रही है. मैं बिना बताए जल्दी-जल्दी क्लास की दिशा में बदहवास भाग चला. इस हड़बड़ी में कक्षा के दरवाज़े पर मैं सीधा अपने बड़े भाई से टकरा गया जो मुझे इन्टरवल के बाद घर बुलाने आया था. मेरे ध्यान में नहीं रहा था कि उस दिन हमें गर्जिया मंदिर लाना था. सामने से सिलाई वाले सिरीवास्तव मास्साब आते दिखे तो भाई ने उन्हें एक कागज़ दिखाया. उनके मुंडी हिलाने पर हम घर की दिशा में चल पड़े.

लफ़त्तू और गोलू के साथ क्या बीती होगी - यह मेरी कल्पना की उड़ान के लिए बहुत बड़ी थीम थी.

हम शाम को घर लौटे. थोड़ी ही देर बाद दरवाज़े पर लफ़त्तू के पापा मौजूद थे. मैं बेतरह डर गया और थरथर कांपने लगा. लेकिन वे मेरे लिए जोकर के मुंह वाला मीठी सौंफ़ का डिब्बा लाए थे. डब्बा लेकर मैं छत पर बंटू के साथ क्रिकेट खेलने चला गया. बंटू नई गेंद लाया था और हमारा स्वयंसेवक अम्पायर महान लफ़त्तू हरिया हकले की छत फांदता आ रहा था.

बहुत ही अनौपचारिक तरीके "क्या कैलये मेले पापा" पूछते हुए उसने बंटू से गेंद ली और "खेल इश्टाट" का ऑर्डर दिया. मैं बैटिंग कर रहा था पर मेरा मन बेहद व्याकुल था. जाहिर है लफ़त्तू जानता था कि उसके पापा मेरे घर में बैठे पिताजी से बात कर रहे थे. स्कूल में गोलू के अन्जाम की खौ़फ़नाक कल्पनाओं में मैं रामनगर-गर्जिया-रामनगर यात्रा में चिन्ताग्रस्त रहा था.

मैं पहली बॉल पर आउट होता रहा और बंटू ख़ुशी ख़ुशी मेरी गेंदों की धुनाई करता रहा. देर से शुरू हुआ खेल जल्दी निबट गया. घर जाने से पहले लफ़त्तू ने कमीज़ ऊपर की और पीठ पर पड़े नीले निशानों की मारफ़त सूचना दी कि उसकी और गोलू की टोड मास्साब ने संटी मार-मार कर खाल उधेड़ डाली थी. उसके बाद लफ़त्तू के पापा को स्कूल बुलाया गया. और यह भी कि उसके पापा ने उस से कुछ नहीं कहा बल्कि उसे भी जोकर के मुंह वाला मीठी सौंफ़ का डिब्बा दिया.

अगले दिन और उसके बाद के कई दिन तक न टोड मास्साब स्कूल आए न गोलू. कोई कहता था लफ़त्तू के पापा ने टोड मास्साब को जेल भिजवा दिया और गोलू को मरेलिया हो गया. हुआ जो भी हो, लफ़त्तू की और मेरी अपनी दिनचर्या में एक परिवर्तन यह आया कि हमें सुबह छः बजे लफ़त्तू के पापा ने अंग्रेज़ी पढ़ानी चालू कर दी. यह मेरे घर उनके आने के अगले दिन से शुरू हुआ.

मेरी ही तरह लफ़त्तू के भी बहुत सारे भाई-बहन थे और हमारी पढ़ाई के समय वे कभी-कभार परदों के पीछे नज़र आ जाया करते थे. इस पढ़ाई के दौरान उसकी बड़ी बहन हमें दूध-बिस्कुट भी परोसा करती थी. असल बात यह थी कि मैं एक ही दिन में ताड़ गया था कि लफ़त्तू के पापा की ख़ुद की अंग्रेज़ी कोई बहुत अच्छी नहीं थी. वे पिथौरागढ़ी कुमाऊंनी मिश्रित हिन्दी में हमें इंग्लिस पढ़ाते थे. 'वी' को 'भी' कहते थे, जो मुझे बहुत अटपटा लगता. लेकिन लफ़त्तू की दोस्ती के कारण मैं इस कार्यक्रम में बेमन से हिस्सा लेता और हां-हूं कहा करता.

बस अड्डे से माचिस की डिब्बियों के लेबल खोजने का प्रातःकालीन आयोजन बाधित हो गया था और कभी-कभार घुच्ची खेलने का भी. क़रीब एक हफ़्ता हुआ होगा जब एक रोज़ लफ़त्तू पर जैसे शैतान सवार हो गया. दूध-बिस्कुट आते ही लफ़त्तू ने कापी बन्द की, एक सांस में दूध पिया, जेब में चार बिस्कुट अड़ाए और कापी को ज़मीन पर पटक कर, बस अड्डे और उस से भी आगे भाग जाने से पहले अपने पापा से बोला: "वल्ब को तो भल्ब कहते हो आप! क्या खाक इंग्लिछ पलाओगे पापा?"

Tuesday, November 27, 2007

मोबीन भाई और अताउल्ला पेलवान



रक्षाबन्धन के समय मोबीन भाई और अताउल्ला पेलवान रामनगर आया करते थे : बस एक रोज़ के लिए। उनके आने की तारीख मौखिक समाचारों के माध्यम से शहर भर में फैल जाया करती थी। आमतौर पर वे रक्षाबन्धन के एक दिन पहले आया करते थे। यह कोई नहीं जानता था कि वे कहां से आते थे। कोई कहता था मोबीन भाई ठाकुरद्वारे के थे और अताउल्ला पेलवान कालाढूंगी के। कुछ लोगों का कयास था कि दोनों असल में चचेरे भाई थे और चोरगलिया के रहने वाले थे। जो भी हो उनका शहर में आना किसी लाटसाहब के दौरे की तरह हुआ करता था।

मोबीन भाई तनिक लम्बे कद के थे : छरहरी देह काजल लगी आंखें और मुंह में हमेशा पान की गिलौरी। लफत्तू को मोबीन भाई दुनिया के सबसे इस्माट आदमी लगते थे। उसका तो यह भी कहना था कि मोबीन भाई बम्बई चले जाएं तो मुकद्दर के सिकन्दर अमीताच्चन की दुकान बन्द करवा दें। मोबीन भाई हमेशा काली बैलबॉटम और काली शर्ट पहने होते थे और बेहद सीरियस रहते थे।

अताउल्ला पेलवान जैसा कि नाम से जाहिर है पहलवानी ठाठ की कदकाठी के मालिक थे। चारखाने की लुंगी और ढीला कुरता डाले पहलवान के गले में तमाम तरह के गंडे हुआ करते थे। वे मोबीन भाई से उमर में बड़े थे और उनकी कनपटियों पर उम्र की दस्तक की चांदी दिखा करती थी।

मोबीन भाई और अताउल्ला पेलवान जिस तरह तूफान की तरह आया करते थे उनकी रूखसती भी वैसी ही शिताब होती थी। उन्हें कहीं और जाना होता था और रक्षाबन्धन का पूरा दिन वे पीरूमदारे में गुजारते थे।

मोबीन भाई और अताउल्ला पेलवान की पतंगबाजी देखने को खेल का मैदान ठसाठस भरा होता था। सुबह से ही छोकरे मांझा सद्दी गुल्ली और चरखी - घिर्री के चक्करों में लगे रहते थे। मैदान में लाउडस्पीकर पर ‘मेरे ख्वाजा …’ टाइप कव्वालियां बजा करती थीं और मौके का फायदा उठाकर चाट पकौड़ी खीर अमरूद वाले अपने ठेले ले आया करते थे। बमपकौड़े वाला बौना इस खास अवसर पर जलेबियां भी बनाया करता था।

फिर किसी एक पल दोनों खलीफा आपस में धीरे धीरे बतियाते मैदान में तशरीफ लाया करते और चन्द ही पलों में उनके गिर्द बच्चों की भीड़ लग जाती थी। फिर बुजुगार्न बच्चों को डपट कर भगाने की कोशिश करते और दोनों उस्तादों के इस्तकबाल में लाउडस्पीकर पर बकायदा तकरीर होती। यह तकरीर आमतौर पर गोल्टा मास्साब किया करते थे। एक साल जब मास्साब का एक बेटा नहर में डूब गया था यह तकरीर पालीवाल वैद्यजी ने की थी : वैद्यजी जाने क्या महोदय महोदय कह कर सब को बोर रहे थे जब भीड़ ने उन्हें हूट किया था।

बहरहाल दोनों पतंगबाज शुरूआती शिष्टाचार निबटाने के उपरान्त अपने अपने कोनों पर चले जाते थे। दोनों के बीच पूरे मैदान का फासला होता था। दोनों के गिर्द उनके शागिर्द और फैन खड़े रहा करते। फिर दोनों अपने अपने कुशलतम स्थानीय शागिर्द को पतंग उड़ाने को कहा करते थे। दस पांच पतंगें आजमाने के बाद ये शागिर्द सबसे अच्छी पतंग को काफी लम्बी उड़ान दे चुकने के बाद और अपने अपने हुनर के हिसाब से दर्शकों का मनोरंजन कर चुकने के बाद उस्तादों की स्वीकृति की बाट देखते थे।

मोबीन भाई अपनी पतंग पहले सम्हाला करते थे। पतंग सम्हालने के बाद वे कनखियों से पेलवान साब की तरफ निगाह मारते थे। पेलवान साब सहमति में सिर भी झुकाते थे और एक हाथ जरा सा उठा कर मोबीन भाई को आशीर्वाद भी देते। तमाशबीनों में एक उत्तेजना फैल जाती थी जब दोनों के पेंच शुरू होते।

यह तो करीब पन्द्रह बीस साल बाद हुआ जब मैंने बाबा नज़ीर अकबराबादी को पढ़ना शुरू किया। अब लगता है काश कोई तब यह सुना देता:


गर पेच पड़ गए तो यह कहते हैं देखियो
रह रह इसी तरह से न अब दीजै ढील को
“पहले तो यूं कदम के तईं ओ मियां रखो”
फिर एक रगड़ा दे के अभी इसको काट दो।

हैगा इसी में फ़तह का पाना पतंग का।।

और जो किसी से अपनी तुक्कल को लें बचा
यानी है मांझा खूब मंझा उनकी डोर का
करता है वाह वाह कोई शोर गुल मचा
कोई पुकारता है कि ए जां कहूं मैं क्या

अच्छा है तुमको याद बचाना पतंग का …


(नज़ीर अकबराबादी साहब की ‘कनकौए और पतंग’ का एक हिस्सा)

मोबीन भाई और अताउल्ला पेलवान की पतंगबाज़ी चलती रहती थी और दर्शकसमूह जब-तब ‘अशअश’ कर उठता था। तमाम तरह के दांवपेंच चला करते थे और आखिरकार जब किसी एक की पतंग कट जाती थी दोनों खलीफा खेल को इस वैराग्य के साथ छोड़ देते मानो कोई गमी हो गई हो।

मोबीन भाई और अताउल्ला पेलवान एक दूसरे से बतियाते हुए खेल के मैदान के बाहर आ जाते थे। उनके पीछे भीड़ हुआ करती। फिर वे दोनों खताड़ी के मोड़ पर आते आते कहीं गुम हो जाते थे : मेरे बचपन से कभी न गुम होने को।

Tuesday, October 16, 2007

बौने का बम पकौड़ा



लफत्तू के साथ दोस्ती बनाए रखने में कई सारे जोखिम थे. सबसे पहला तो यह कि इन्टर में पढ़ने वाला मेरा भाई जब जब मुझे उसके साथ देखता मुझे बाकायदा हिदायत दी जाती थी कि इस टाइप के लौंडों से हाथ भर दूरी बना कर रहना ही ठीक होता है. लफत्तू की धुनाई के बाद मुझे लगता था कि किसी दिन उसके चक्कर में मैं बुरा फंसूगा और भाई या पिताजी के हाथों पिटूंगा. सबसे बड़ा खतरा यह था कि उसके साथ लगातार देखे जाने से मेरी रेपूटेशन खतरे में पड़ सकती थी और मैं होस्यार के बजाय बदमासके तौर पर विख्यात हो सकता था. लेकिन इस दोस्ती में जो एडवेन्चर का पुट था उस के कारण मैं लफत्तू की संगत के लालच में आ ही जाता था.

उस दिन लफत्तू अपने पिताजी के दफ्तर से पीतल का बड़ा सा ताला चाऊ कर लाया था. वह अपने पिताजी को कोई जरूरी चिठ्ठी देने गया था. दफ्तर के चपरासी से लापरवाही में ताला मय चाबी के एक बेन्च पर पड़ा रह गया था और दोपहर बीत जाने के बाद भी किसी की निगाह में नहीं आया था. उल्लेखनीय है कि अपने घर से बाहर लफत्तू ने पहली बार हाथ आजमाया और फतहयाब होकर आया था.

खेलमैदान के एक तरफ हिमालय टॉकीज था और एक तरफ गाड़ी मिस्त्रियों की कालिखभरी दुकानों की कतार. मैदान से हमारे घर की तरफ लगा हुआ प्राइवेट बस अड्डा था. मैं अपने साथ के कुछ बच्चों के साथ घर के सामने स्थित इसी अड्डे पर खड़ा था. इस अड्डे से काशीपुर और मुरादाबाद रूट की बसें चला करती थीं. शाम को पांच बजे तक सारी गाड़ियां अपना दिन भर का काम करने के बाद अड्डे पर लग जाती थीं. उसके बाद गाड़ियों के क्लीनर गाड़ियों में झाड़ू लगा कर सारा कचरा बाहर किया करते थे. यह कचरा हमारे लिए खजाने की तरह होता था. हम में से कुछ बच्चों ने उन्हीं दिनों माचिस की डब्बियों के लेबल इकठ्ठा करने का नया शौक पाला था. इस अय्याशीभरे शौक के चलते क्लीनरों के झाड़ू लगाते समय अड्डे पर हमारी उपस्थिति अनिवार्य होती थी. कूड़ा बुहारते क्लीनर हमें बेहद भद्दी गालियां दिया करते थे और कई बार किसी दुर्लभ लेबल को लेकर हम में सरफुटव्वल तक हो जाता था लेकिन शौक़ तो शौक़ होता है साहब.

बहरहाल क्लीनरगण अपने कार्य में व्यस्त थे और हम लोग आपस में डुप्लीकेट लेबलों की अदला-बदली कर रहे थे जब लफत्तू हांफता हुआ मेरे पास आया. उसने बड़ी हिकारत से एक निगाह पहले मुझ पर डाली फिर बाकी बच्चों पर. बलबाद हो जागा इन छालों के चक्कल में बेते …” कहते हुए उसने मुझे अपने पीछे आने का इशारा किया. वह दूधिए वाली संकरी गली में घुस गया. उस्ताद के आदेश की बेकद्री मैं नहीं कर सकता था. सो बेमन से उसके पीछे चल दिया. एक जगह थोड़ी सी तनहाई मिली तो उसने जेब से एक एक के नोटों की पतली गड्डी बाहर निकाली और पूरे सात गिनाए. चल बमपकौड़ा खा के आते हैं.उसने मेरे कन्धे पर हाथ रखा और आंख मारी.

अपने पापा के दफ्तर से ताला चु्राने की दास्तान उसने सुना तो दी लेकिन मेरी समझ में नहीं आया कि सात रूपए वह कहां से चुरा कर लाया. अले याल बेच दिया थाले को. वह ताले को एक गाड़ी मिस्त्री को बेच आया था. इत्ता बड़ा ताला था बेता इत्ता बड़ाकहकर उसने ताले की नाप बढ़ा चढ़ा कर बताते हुए हाथ फैलाए. मैंने दस मांगे छाले से. उसके पास सात ई थे.अब हम लोग उसी गाड़ी मिस्त्री की दुकान के आगे से निकल रहे थे. वो ऐ उतकी दुकान.लफत्तू ने इशारा किया लेकिन मेरी हिम्मत उस तरफ देखने की नहीं हुई. यह बहुत बड़ा ज़ोखिम था जिसमें हमारे कारनामे के सार्वजनिक हो जाने की प्रबल संभावना थी.

गाड़ी मिस्त्री की दुकान से बीस तीस कदम चलने के बाद ही मैं अपनी निगाह ऊपर कर पाया. तब तक हमारी मंजिले-मकसूद भी आ पहुंची थी. हिमालय टॉकीज़ सड़क से सटा हुआ था. उसके प्रवेशद्वार से लगा कर खड़े किए गए एक ठेलानुमा खोखे में रामनगर का मशहूर बम पकौड़ा मिलता था. इस ठेले का संचालन एक कलूटा और गंजा बौना किया करता था. जब वह अपने ठेले पर नहीं होता था, उसे उसकी साइकिल पर सारे शहर का चक्कर लगाते देखा जाता था. बौना होने के बावजूद वह हमेशा बड़ों की साइकिल चलाया करता था. और इस तकनीकी दिक्कत के चलते वह साइकिल की गद्दी पर कभी बैठ ही नहीं पाता था. बाद के दिनों में उसने गद्दी हटवा ही दी थी. वह सामर्थ्य भर तेज़-तेज़ कैंची चलाया करता. कभी उसके कैरियर पर आलू की बोरी लदी होती उसी के जैसे उसके दो बच्चे बैठे होते.

क्रिकेट की बॉल जितना होता था बौने का बम पकौड़ा. दुनिया का सबसे लज़ीज़ व्यंजन बनाने वाला बौना एक दूसरा बिजनेस भी चलाता था. उसके ठेले से लगा हुआ था हिमालय टॉकीज़ का प्रवेशद्वार. लकड़ी का वह चौड़ा गेट जमीन पर पहुंचने के करीब एक इंच पहले ख़त्म हो जाता था. नतीज़तन फ़र्श और गेट के बीच एक झिरी सी थी. यह झिरी बहुत स्ट्रेटेजिक लोकेशन पर थी. यदि अपना गाल फर्श पर लगाए श्रमपूर्वक उस पर आंख लगाई जाती तो भीतर हॉल का पूरा पर्दा नजर आ जाता था. बौना स्कूल गोल करके आए बच्चों और स्कूल न जाने वाले पिक्चरप्रेमी बच्चों को पांच पैसा प्रति पन्द्रह मिनट के हिसाब से झिरी पर आंख लगाए पिक्चर देखने देता था. एक बार में पांच बच्चे बकौल लफत्तू इस लुफ्त का मजा लूट सकते थे. दर्शक को पन्द्रह पैसे का एक बमपकौड़ा भी खरीदना होता था.

बच्चों में यह बात मशहूर थी कि बौना इस तरह का सफल बिजनेस चलाने के कारण लखपति बन चुका था यानी उसके पास हमारे पिताओं से ज्यादा प्रापर्टी थी. लोग कहते थे पीरूमदारा में उसका एक बहुत बड़ा मकान था. लेकिन बौने के गंदे - संदे बच्चों की बहती नाक और खुद बौने की भूरी पड़ चुकी छींट की धोती और खद्दर के फटे कुरते को देख कर इस बात पर मुझे कभी कभी शक होता था.

हम दोनों ने दो-दो बमपकौड़े टिकाये और तनिक दिलचस्पी से झिरी पर आंख लगाए एक बच्चे को देखा. शाम का शो चल रहा था और इस शो में बौने का साइड बिजनेस मद्दा पड़ जाता था. लफत्तू ने मुझे पिक्चर देखने का आमंत्रण दिया. हिन्दुस्तान की कसमलगी हुई थी.

जब मैं शाम को घर पहुंचा तो मेरी सफेद कमीज बुरी तरह भूरी पड़ चुकी थी. मां ने पूछा तो मैंने कहा कि मैं ऐसे ही गिर पड़ा था. उसके अगले पूरे हफ्ते तक मैं हर रोज़ गिरता रहा. एक दिन पिक्चर बदल गई. नया खेल लगा है बाबूजी. देख लो आप दोनों के लिए दो जगे छोड़ रखी हैं मैंने.बौना, चोट्टे लफत्तू को बहुत अमीर समझने लगा था और उसकी चमचागीरी करता हुआ उसे बाबूजी कहकर पुकारने लगा था.


इकत्तीस साल हो गए लेकिन हिन्दुस्तान की कसममैं आज तक पूरी नहीं देख पाया.