लफ़त्तू की सतत उदासी और उसका ज़्यादातर ख़ामोश रहना मेरी बरदाश्त से बाहर हो गया था. तैराकी की मौज के बाद हम जब भी कायपद्दा खेलने की शुरुआत करते, लफ़त्तू बिना कोई नोटिस दिए नहर से बाहर आकर पिछले रास्ते से हाथीखाने की तरफ़ निकल जाया करता. हाथीखाना मुझे बहुत आकर्षित करता था लेकिन मुझे घर से वहां तक जाने की इजाज़त नहीं थी क्योंकि हाथीखाना पाकिस्तान के पिछवाड़े में स्थित था.
रोज़ सुबह हमारे स्कूल जाने से पहले एक हाथी अपने महावत के साथ घर के बाहर से गुज़रा करता. हाथी जाहिर है वैसा ही था जैसा कि हाथी होता है. रामनगर के अपने बिल्कुल शुरुआती दिनों में मेरे और मेरी बहनों के लिए वह दुनिया का सबसे बड़ा अजूबा था. एकाध किताबों में मैं उसे देख चुका था पर वह इतना बड़ा होगा, मेरी कल्पना से बाहर था. धीरे धीरे वह रोज़मर्रा की ज़िन्दगी का हिस्सा बन गया और हमें उसकी ऐसी आदत पड़ गई थी कि अपने ऐन बगल में गुज़रते हाथी को देख कर भी हम कभी कभी उसे नहीं देखते थे. हां अगर चाचा या मामा वगैरह के बच्चे किन्हीं छुट्टियों में हमारे घर आते तो हम उन्हें सबसे पहले बताते कि हमारे घर के सामने से रोज़ सुबह हाथी गुज़रता है - सच्ची मुच्ची का हाथी. ऐसा बताते हुए हमें अपार गर्व महसूस होता और काफ़ी सारा सुपीरियोरिटी कॉम्प्लेक्स भी. तब लगता था जैसे वह हमारा अपना हाथी हो.
जंगलात डिपार्टमेन्ट के इस हाथी के मुतल्लिक मेरी चन्द ऑफ़ीशियल उत्सुकताओं के बाबत मुझे लफ़त्तू कई जीकेनुमा जानकारियां मुहैय्या करवा चुका था. मसलन "हाती एक बाल में इत्ती तत्ती करता ऐ बेते कि नगलपालिका का बमपुलिछ दो बाल भल जाए" या "छुबै नाछ्ते में एक पेल खाता ऐ हाती" "हाती का द्लाइबल हाती की पीथ पल ई तोता ऐ क्यूंकि दलाइबल के बिना उतको नींद नईं आ छकती." इस लास्ट वाली सूचना को लेकर एक दफ़ा बागड़बिल्ले और लफ़त्तू के बीच एक सेमिनार कायपद्दा खेलते वक़्त आयोजित किया जा चुका था. बागड़बिल्ले का विचार था कि हाथी पहली बात तो सोते ही नहीं और अगर सोते हैं तो लेट कर और वो भी उल्टा लेट कर. ऐसे में महावत के उसकी पीठ पर सोने की बात तर्कसंगत नहीं लगती थी. बागड़बिल्ला यह भी कहा करता था कि अगर महावत का दिमाग खराब होगा तभी वह बैठ कर सोने की नौकरी करेगा. वह भी एक जानवर की पीठ पर. लफ़त्तू हारने हारने को था जब उसने अपनी प्रत्युत्पन्नता का परिचय दिया. "बेते मैं तो बैथ के बी छो छकता ऊं औल खले हो के बी."
कायपद्दे को संक्षिप्त ब्रेक देकर उसने खड़े होकर आंखें मूंदीं और बाकायदा खर्राटे निकाले. मिनट भर यह ठेटर करने के उपरान्त वह एक पेड़ के ठूंठ पर बैठा और फिर से आंखें मूंद कर खर्राटे मारने लगा. जब तक बागड़बिल्ला कुछ तर्क सोच पाता लफ़त्तू चिल्लाकर आंख मारता हुआ बोला "औल बेते हाती हाती होता ऐ औल दानवल दानवल ... बी यो ओ ओ ओ ई ..."
लफ़त्तू के उदासीन हो जाने से बन्टू भीतर ही भीतर ज़्यादा प्रसन्न और सन्तुष्ट लगने लगा था. चूंकि मेरे पास लफ़त्तूसान्निध्यरहित समय कुछ ज़्यादा रहने लगा था, बन्टू मेरे जीवन में चरस बोने का काम ज़्यादा सिन्सियरिटी के साथ करने लगा था. अपने विदेशी मामा के लाए पुराने सामान में से उसने एक टूटा हुआ विदेशी परकार मुझे बतौर उपहार दिया. इस टूटे परकार में पेन्सिल फंसाने वाले हिस्से की कील टूट गई थी और किसी भी जुगाड़ टैक्नीक के प्रयोग से उसकी मदद से किसी भी तरह का गोला नहीं बनाया जा सकता था. इस टूटे परकार का यू एस पी यह था कि उसकी मूठ पर अंग्रेज़ी में साफ़ साफ़ ’मेड इन इंग्लैण्ड’ लिखा हुआ था. मेरे पर्सनल कलेक्शन में यह पहली इम्पोर्टेड चीज़ थी. तनिक झेंप और अस्थाई ग्लानि के बावजूद मुझे बन्टू का ऐसा करना अच्छा लग रहा था. मुझे पता था कि लफ़त्तू इस काम का हर हाल में सार्वजनिक विरोध करता.
बन्टू के संसर्ग में अजीब हॉकलेट टाइप की चीज़ों में मन लगाना पड़ता था. इधर कुछ दिनों से मेरी पेन्सिल की मांग ज़्यादा हो गई थी और मां हर रोज़ पेन्सिल मांगने पर सवालिया निगाहों से देखा करने लगी थी. मैं उसे पिछले ही दिन ली गई तकरीबन खत्म हो चुकी पेन्सिल दिखा कर कहता कि उनको बार बार छीलना पड़ रहा है क्योंकि उनकी नोंकें छीलते ही टूट जाया कर रही हैं.
दर असल बन्टू ने कहीं से यह वैज्ञानिक सूचना प्राप्त कर ली थी कि पेन्सिल की छीलन को दो हफ़्तों तक पानी में डुबो कर रखा जाए तो वे रबर में तब्दील हो जाती हैं. सो हम दिम भर अपनी पेन्सिलें छीलते और अपने अपने प्लास्टिक के टूटे डब्बों में छीलन को इकठ्ठा करते जाते. ये डब्बे ढाबू की छत के एक मुफ़ीद हिस्से में रखे जाते थे जहां जाकर हर शाम को अपने अपने छीलभण्डार का मुआयना किया जाता. दसेक दिन में हम दोनों के डब्बे तकरीबन भर गए. एक दिन बाकायदा नियत किया गया और इन डिब्बों में पानी डाला गया.
जैसा तैसा खेल वगैरह चुकने के बाद घर जाते समय हम इन डब्बों को नाक तक ले जाते और गहरी सांसों से सूंघा करते. दो तीन दिन तक तो कोई खास बू नहीं आई पर उसके बाद छीलन सड़ने लगी और डब्बों से गन्दी बास सी आने लगी. "मेरे मामा का लड़का बता रहा था कि शुरू में बदबू आएगी पर पन्द्रह दिन में वह मटेरियल खुशबूदार रबड़ में तब्दील हो जाएगा."
मैं असमंजस में रहता कि बन्टू की बात का यक़ीन करूं या नहीं.
इधर लफ़त्तूने न सिर्फ़ स्कूल आना बन्द कर दिया था, वह हमारे साथ तैरने आना भी बन्द कर चुका था. यह बदलाव मेरे लिए एक बहुत बड़ी पर्सनल ट्रैजेडी था.
एक दिन तैराकी के बाद जब हम कायपद्दा खेलने को पितुवा लाटे के आम के बगीचे का रुख कर रहे थे तो मैंने लफ़त्तू को धीमी चाल से हरिया हकले की छत की तरफ़ जाते देखा. वह खासा मरियल हो गया था या लग रहा था. न उसकी चाल में वह मटक बची थी न शरारतों में उसकी कोई दिलचस्पी.
अड्डू का पीछा करते दौड़ते हुए भी चोर निगाह से मैंने उसे हरिया हकले का ज़ीना चढ़ते हुए देख लिया. दसेक मिनट बाद मैंने बहाना बनाकर हरिया हकले के ज़ीने की राह ली. हरिया की छत पर पहुंचते ही मैंने जिस पहली चीज़ पर ग़ौर किया वह थी हवा में फैली टट्टी की मरियल सी गन्ध. उसके बाद मेरी निगाह लफ़त्तू पर गई जो हमारी छत पर जा चुकने के बजाय ढाबू की छत पर खड़ा बड़ी हिकारत से किसी चीज़ को ध्यान से देख रहा था. उसने मुझे देखा तो उसके चेहरे की हिकारत एक डिग्री बढ़ गई.
हमारी छत की तरफ़ कूदते हुए उसने मुझसे पूछा: "ये दब्बे में कुत्ते की तत्ती तूने लखी थी लबल बनाने को?"
मेरे दबी ज़ुबान में हां कहने पर उसने ज़मीन पर थूका और कहने लगा "तूतिया थाला! मैंने का ता ना कि ये बन्तू के चक्कल में पलेगा तो तूतिया बन दाएगा"
मैं ढाबू की छत पर था. हमारे दोनों डिब्बों के भीतर का बदबूदार गोबर सरीखा असफल वैज्ञानिकी उत्पाद बिखरा पड़ा था और वाक़ई बहुत बास मार रहा था.
मैं जब तक कुछ कहता मुझे अपने पीछे आ चुके बन्टू की आवाज़ सुनाई दी "ये किसने किया बे?"
बन्टू को सुनते ही लफ़त्तू पलटा. बन्टू बोल रहा था "आज रात की बात थी बे. मेरे मामा का लड़का बता रहा था कि कल से इसमें खुशबू आ जाती और बढ़िया रबर बन जाता." वह वहीं खड़ा हुआ था और बास के बावजूद गोबर के बगल में खड़ा बना हुआ था.
विदेशी मामा के बेटे का ज़िक्र आते ही लफ़त्तू फट पड़ा "तेले मामा के इंग्लैन्द में बनाते होंगे कुत्ते की तत्ती छे लबल छाले. गब्बल कोई तूतिया ऐ बेते! ... और छुन ..." इतने दिनों तक अदृश्य रहे लफ़त्तू का यह रूप मुझे बहुत अच्छा लग रहा था. मेरा मन कर रहा था कि उसका हाथ थाम कर सीधा बमपकौड़े वाले ठेले तक भाग चलूं. लफ़त्तू ने हाल में सीखा हुआ डायलाग जारी किया " बन्तू बेते वो दमाने लद गए दब गधे पकौली हगते थे."
लफ़त्तू द्वारा बन्टू को डांटे जाने का सिलसिला कोई दो मिनट और चला और ज़रा देर में हम दोनों वाकई बमपकौड़े के ठेले की तरफ़ जा रहे थे. मैं आश्वस्त था कि लफ़त्तू के पास पैसे ज़रूर होंगे. लफ़त्तू के सिर्फ़ एक बमपकौड़ा मंगवाया. मेरे वास्ते. "याल मुदे मना कला ऐ दाक्तल ने. तू खा."
पकौड़ा उसी दिव्य स्वाद से लबरेज़ था. लेकिन उस से मिली ऊर्जा के बावजूद मैं लफ़त्तू की बीमारी के बारे में उस से पूछने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था. मैं ’दोस्ती’ फ़िल्म का कोई डायलाग भी याद करने की कोशिश कर रहा था.
चुपचाप घर का रुख करते हुए लफ़त्तू ने बस अड्डे पर रुकी एक बस की ओट में पेशाब करते समय मुझे बताया कि उसे रोज़ रात को भयानक बुखार आता है और वह सो नहीं पाता और यह भी कि शायद कल उसे किसी बड़े डाक्टर को दिखाने मुरादाबाद ले जाया जाने वाला है.
मुझे रात को बहुत देर नींद नहीं आई. सुबह मैं स्कूल जाने को सड़क पर उतरा तो देखा कि एक हाथठेले पर लेटे लफ़त्तू को बस अड्डे की तरफ़ ले जाया जा रहा था. हाथ में गांठ लगा एक थैला थामे उसके पापा आगे आगे थे. ठेला धकेलने वाले पहलवान के पीछे सुबकती हुई उसकी दुबली मां थी और उसकी बड़ी बहन. उन के ठीक पीछे एक और ठेला चला अ रहा था जिसमें रोज़ की तरह भैंस का मीट ले जाया जा रहा था. शेरसिंह की दुकान के इस हिस्से से मन्द गति से आ रहे हाथी की सूंड़ दिखाई देने लगी थी.
मैंने असहाय निगाहों से लफ़त्तू की तरफ़ देखा. वह बुरी तरह कांप रहा था और गर्मी के मौसम के बावजूद उसने कम्बल ओढ़ा हुआ था. मुझ से और नहीं देखा गया. अपनी भर आई आंखों के किनारों को जल्दी जल्दी पोंछता हुआ मैं स्कूल की तरफ़ भाग चला.
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Thursday, April 8, 2010
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