Friday, August 8, 2008

बिग्यान का दूसरा सबक और टेस्टूप

एक महीने कछुआ देखने के बाद हुई सामूहिक धुनाई के बाद वाले रोज़ दुर्गादत्त मास्साब लालसिंह के साथ क्लास में घुसे. लालसिंह अंग्रेज़ी की क्लास में अनुपस्थित था. असेम्बली में टोड मास्साब और दुर्गादत्त मास्साब के बीच चली कोई एक मिनट की बातचीत के बाद उसे जल्दी जल्दी गेट से बाहर जाते देखा गया था. लालसिंह के हाथ में खादी आश्रम वाला गांठ लगा मैला-कुचैला थैला था. मास्साब आदतन कर्नल रंजीत में डूबे हुए थे. लालसिंह ने रोज़ की तरह हमारी अटैन्डेन्स ली. पिछले दिन की ख़ौफ़नाक याद के कारण सारे बच्चे चुपचाप थे. हमने दो कक्षाओं के बीच पड़ने वाले पांचेक मिनट के अन्तराल में स्याही में डुबो कर काग़ज़ की गेंदें फेंकने का खेल भी नहीं खेला.

अटैन्डेन्स के बाद मास्साब ने उपन्यास नीचे रखा और बहुत नाटकीय अन्दाज़ में बोले: "कल तक हम ने जीव बिग्यान याने कि जूलाजी के बारे में जाना. आज से हम बनस्पत बिग्यान माने बाटनी की पढ़ाई शुरू करेंगे."

तब तक लालसिंह मैले थैले से काग़ज़ में लिपटी कोई गोल गिलासनुमा चीज़, एक पुड़िया और पानी से भरा हुआ शेर छाप मसालेदार क्वाटर सजा चुका था. लफ़त्तू ने मुझे क्वाटर, अद्धे और बोतल का अन्तर पहले से ही बता रखा था. उसके पापा इन सब में भरे मटेरियल का नियमित सेवन करते थे और लफ़त्तू एकाधिक बार चोरी से उसे चख भी चुका था. "छाली बली थुकैन होती है. लुफ़्त का भौत मजा आता है छाली में मगल."

मास्साब ने और भी नाटकीय अदाओं के साथ मेज़ पर रखी इन वैज्ञानिक वस्तुओं को उरियां किया. कांच गिलासनुमा चीज़ बहुत साफ़ थी और पतली स्याही से लम्बवत उसमें नियत दूरी पर लकीरें बनी हुई थीं. उसके भीतर गै़रमौजूद धूल को एक अतिशयोक्त फूंक मार कर मास्साब ने दूर किया, उंगली को टेढ़ा कर उसमें दो-चार नाज़ुक सी कटकट की और ऊंचा उठाकर बोले: "देखो बच्चो ये है बीकर. आज श्याम को सारे बच्चे लच्छ्मी पुस्तक भंडार पे जा के इसे ख़रीद लावें. डेड़-दो रुपे का मिलेगा. घरवालों से कह दीजो कि मास्साब ने मंगवाया है."

पुड़िया खोलकर उन्होंने उसके भीतर के भूरे जरजरे पाउडर को ज़रा सा लिया और लकड़ी के बारूदे से हमारा परिचय कराया. "जिस बच्चे के घर पे बारूदे की अंगीठी ना हो बो भवानीगंज जा के अतीक भड़ई के ह्यां से ले आवे. अतीक कुछ कये तो उस से कैना कि मास्साब ने मंगाया है"

शेर छाप का क्वाटर खोल कर उन्होंने हमें पानी दिखाया और पहली बार कोई मज़ाकिया बात बोली "और ये है दारू का पव्वा. दारू पीने से आदमी का बिग्यान बिगड़ जाता है. कोई बच्चा दारू तो नहीं पीता है ना?" बच्चों ने सहमते हुए खीसें निपोरीं.

"सारे बच्चे कल को बिग्यान की बड़ी कापी में बीकर का चित्र बना के लावें. और अब बनस्पत बिग्यान का कमाल देखो." उन्होंने अपने गन्दे कोट की विशाल जेब में हाथ डाला और मुठ्ठी बन्द कर के बाहर निकाली." हमें पता था कि उसमें चने के दाने होंगे क्योंकि हमारी ठुकाई करने के बाद उन्होंने क्लास से बाहर जाते हुए यह अग्रिम सूचना जारी कर दी थी सो उनके इस नाटक को हम दर्शकों की ज़्यादा सराहना नहीं मिली.

"ये हैं चने के दाने. इस संसार में सब कुछ बिग्यान होता है जैसे ये दाने भी बिग्यान हैं. अब देखेंगे बनस्पत बिग्यान का जादू." उन्होंने बीकर में चने के दाने डाले, उसके बाद उन्हें बुरादे से ढंक दिया. बीकर में आधा बुरादा डाल चुकने के बाद उन्होंने आधा क्वाटर पानी उसमें उड़ेला.

"अब इस में से चने उगेंगे"

लालसिंह को बीकर थमाते हुए उन्होंने उसके साथ कछुए वाला व्यवहार करने का आदेश दिया और उपन्यास में डूब गए. लालसिंह ने बीकर दिखाना शुरू किया ही था कि घन्टा बज गया. लालसिंह के हाथ से बीकर लेते हुए मास्साब ने पलटकर कहा: "सारे बच्चे आज श्याम को बाज़ार से बीकर लावें और ऐसा ही परजोग करें. कल सबको चने वाले बीकर लाने हैं."

घर पर हमेशा की तरह साइंस के इस प्रयोग की सामूहिक हंसी उड़ाई गई. लफ़त्तू के घरवालों ने उसे बीकर के पैसे देने से मना कर दिया था सो मैंने मां से यह झूठ बोलकर दो बीकर ख़रीदे कि सबको दो-दो बीकर लाने को कहा गया है.

अगले दिन असेम्बली में कक्षा छः (अ) के हर बच्चे के हाथ में एक बीकर था. केवल नई कक्षा के बच्चों ने इन में दिलचस्पी दिखाई. दुर्गादत्त मास्साब के इस बनस्पत बिग्यान परजोग से बाक़ी के अध्यापक-छात्र परिचित रहे होंगे.

मास्साब ने आकर लालसिंह से अटैन्डेन्स के बाद हर बच्चे का बीकर चैक करने को कहा. बीकर चैक करने के बाद हमारे लिए ख़ास बनाई गईं काग़ज़ की छोटी पर्चियां जेब से निकालकर मास्साब ने हम से उन पर अपना-अपना नाम लिखने और परजोगसाला से लालसिंह द्वारा लाई गई आटे की चिपचिप लेई से उन्हें अपने बीकरों पर चिपकाने को कहा. "जब चिप्पियां लग जावें तो सारे बच्चे बारी-बारी से नलके पे जाके हाथ धोवें औए साफ़ सूखे हाथों से बीकरों को परजोगसाला में रख के आवें" घड़ी की तरफ़ एक बार देख कर मास्साब ने एक उचाट निगाह डालते हुए हमें आदेश दिया.

मोतीराम परशादीलाल इन्टर कालिज की परजोगसाला एक अजूबा निकली. एक बड़ा सा हॉल था, जिस में घुसते ही क़रीब सौएक टूटी कुर्सियां और मेज़ें औंधी पड़ी हुई थीं. उनके बीच से रास्ता बनाते हुए आगे जाने पर एक तरफ़ को बड़ी-बड़ी मेजें थीं - एक पर शादी का खाना बनाने में काम आने वाले बड़े डेग-कड़ाहियां-चिमटे-परातें बेतरतीब बिखरे हुए थे. एक मेज़ के ऊपर कर्नल रंजीत वाली एक अधफटी किताब धूल खा रही थी. वह दुर्गादत्त मास्साब की मेज़ थी. इसी पर हमने अपने बीकर क्रम से रखने थे. किताब मैंने दूर से ताड़ ली थी. मेरे त्वरित, गुपचुप, लालचभरे इसरार पर लफ़त्तू लपक कर गया और चौर्यकर्म में अपनी महारत का प्रदर्शन करते हुए किसी और बच्चे के मेज़ तक पहुंचने देने से पेशतर उसने किताब चाऊ की और कमीज़ के नीचे अड़ा ली और मुझे आंख भी मारी. बीकर रखने के बाद मेरी निगाह दूसरी तरफ़ गई. जहां-तहां टूटे कांच वाली कुछ अल्मारियां थीं जिनकी बग़ल खड़ा में चेतराम नामक लैब असिस्टैन्ट ऊंची आवाज़ में हम से जल्दी फूटने को कह रहा था. इतनी सारी व्यस्तताओं और हड़बड़ी के बावजूद मुझे भुस भरे हुए कुछ पशु-पक्षी इन अल्मारियों के भीतर दिख ही गए. और एक संकरी ताला लगी अल्मारी के भीतर खड़ा एक कंकाल भी जिसने कर्नल रंजीत के साथ अगले कई महीनों तक मेरे सपनों में आना था.

अगले बीसेक दिन बिग्यान की क्लास का रूटीन यह तय बताया गया कि अंग्रेज़ी की क्लास के तुरन्त बाद हमें परजोगसाला जाकर अपने - अपने बीकरों में पानी देना होता था, उसके बाद सम्हाल कर इन्हें क्लास में लाकर अपने आगे रख कर अटैन्डेन्स दी कर बीकर की परगती को ध्यान लगाकर देखना होता था. मास्साब के घड़ी देख कर बताने के बाद घन्टा बजने से दस मिनट पहले हमें इन बीकरों को वापस परजोगसाला जाकर रखना होता.

पहले तीन-चार दिन तो मुझे लगा यह भी मास्साब की कोई ट्रिक है जिस से बोर करने के बाद वे हमें एक बार पुनः मार-मार कर बतौर तिवारी मास्साब हौलीकैप्टर बनाने की प्रस्तावना बांध रहे हैं. पांचवें दिन बीकर के तलुवे में पड़े चने के दानों में कल्ले फूट पड़े और बीकर को नीचे से देखने पर वे शानदार नज़र आते थे. भगवानदास मास्साब इस घटना से इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने पांच मिनट तक उपन्यास नीचे रख कर हमें बनस्पत बिग्यान की माया पर एक लैक्चर दिया.

परजोगसाला जाकर मैं सबसे पहले पानी न देकर कंकाल को देखता और उसे पास जा कर छूने का जोख़िमभरा कारनामा अंजाम देने की कल्पना किया करता. इधर मैंने चोरी छिपे ढाबू की छत के एक निर्जन कोने में कर्नल रंजीत के फटे उपन्यास के सारे पन्ने कई बार पढ़ लिए थे. उस के बारे में फिर कभी. चोरी-चोरी मास्साब के उपन्यासों के कवर देखते हुए अब मुझे कुछ कुछ समझ में आने लगा था और कर्नल का इन्द्रजाल सरीखे रहस्य लोक से परिचित क़िस्म की सनसनी होने लगी थी.


दस- बारह दिन बाद नन्हे से पौधे वाक़ई चार-पांच सेन्टीमीटर की बुरादे की परत फ़ोड़कर बाहर निकल आए. इन दिनों पूरी क्लास भर मास्साब के चेहरे पर परमानन्द की छटा झलकती रहती थी. लालसिंह सारे काम करता और ख़ुद उन्हें उपन्यास पढ़ने के सिवा कुछ नहीं करना होता था.

चने के पौधे दो-तीन सेन्टीमीटर लम्बे हो गए थे और बुरादे से अब बदबू भी आने लगी थी. किसी-किसी बीकर के भीतर फफूंद उग आई थी. एक दिन उचित अवसर देख कर मास्साब क्लास से मुख़ातिब हुए: "चने का झाड़ कितने बच्चों ने देखा है?" कोई उत्साहजनक उत्तर न मिलने पर पहले उन्होंने लालसिंह से किसी खेत से चने का झाड़ लाने को कहा और अपना लैक्चर चालू रखते हुए कहना शुरू किया: "चने का झाड़ बड़े काम का होता है. उसमें पहले हौले लगते हैं फिर चने और चने को खाकर सारे बच्चे ताकतवर बनते हैं. सूखे चने को पीसकर बेसन बनता है जिसकी मदद से तलवार अपने होटल में स्वादिस्ट पकौड़ी बनाता है." पकौड़ी का नाम आने पर उन्होंने अपना थूक गटका, "सारे बच्चों के पौधे भी एक दिन चने के बड़े झाड़ों में बदल जावेंगे. तो आज हम आडीटोरियम के बगल में इन पौधों का खेत तैयार करेंगे. जब खूब सारे चने उगेंगे तो हम उन चनों को बन्सल मास्साब की दुकान पे बेच आवेंवे. उस से जो पैसा मिलेगा, उस से सारे बच्चे किसी इतवार को कोसी डाम पे जाके पिकनिक करेंगे.

"लालसिंह हमें आडीटोरियम के बगल में इन पौधों को रोपाने ले गया और वहां जाकर भद्दी सी गाली देकर बोला: "मास्साब भी ना!"

इसके बावजूद हमारे उत्साह में क़तई कमी नहीं आई और आसपास पड़े लकड़ी-पत्थर की मदद से खेत खोदन-निर्माण और पौधारोपण का कार्य सम्पन्न हुआ. घन्टा बज चुका था और हम अपने-अपने बीकर साफ़ करने के उपरान्त उन्हें अपने बस्तों में महफ़ूज़ कर चुके थे.

छुट्टी के वक़्त स्कूल से लौटते हुए कुछेक बच्चे सद्यःनिर्मित खेत के निरीक्षणकार्य हेतु गए. बीच में बरसात की बौछार पड़ चुकी थी. लफ़त्तू भागता हुआ मेरे पास आया: "लालछिंग सई कैलिया था बेते. भैंते मात्तर ने तूतिया कात दिया. छाले तने बलछात में बै गए. अब बेतो तने औल कल्लो दाम पे पुकनिक". उस कब्रगाह पर जा पाने की मेरी हिम्मत नहीं हुई.

तीन हफ़्ते की मेहनत का यूं पानी में बह जाना मेरे लिए बहुत बड़ा हादसा था. इस वैज्ञानिकी त्रासदी से असंपृक्त दुर्गादत्त मास्साब ने अगले रोज़ न लालसिंह से चने के झाड़ के बाबत सवालात किए, जिसे लाना वह भूल गया था, न चनोत्पादन की उस महत्वाकांक्षी खेती-परियोजना का ज़िक्र किया. अपनी जेब से कर्नल की चमचमाती नई किताब के साथ उन्होंने जेब से परखनली निकाली और उसी नाटकीयता से पूछा: "इसका नाम कौन बच्चा जानता है?" लालसिंह ने भैंसे यानी दुर्गादत्त मास्साब को कल से भी बड़ी गाली देते हुए हमें बिग्यान की इस तीसरी क्लास के बारे में एडवान्स सूचित कर दिया था. "परखनाली मास्साब!" उत्तर में एक कोरस उठा.

"परखनाली नहीं सूअरो! परखनली कहा जावे है इसे! और कल हर बच्चा बाज़ार से दो-दो परखनलियां ले के आवेगा. कल से हम बास्पीकरण के बारे में सीखेंगे. आज श्याम को सारे बच्चे लच्छ्मी पुस्तक भंडार पे जा के ख़रीद लावें. आठ-बारह आने में आ जावेंगी ..."

लालसिंह की गुस्ताख़ी का उन्हें भान हो गया होगा. पहली बार उसकी तरफ़ तिरस्कार से देखते हुए उन्होंने क़रीब-क़रीब थूकने के अन्दाज़ में हमसे कहा: "इंग्लिस में टेस्टूप कहलाती है परखनली. आई समझ में हरामियो?"

28 comments:

मैथिली गुप्त said...

अब बास्पीकरण की क्लास जल्दी ही लगाईयेगा

जोशिम said...

वाह महाराज - पहला ब्यौपार चने के झाड़ का तो बह गया - बिग्यान आओ करके सीखें कर्नल रंजीत ही बचे - बस्पिकरन में जासूस विक्रांत मिले ? [:-)] - मनीष

बालकिशन said...

लिखा तो बहुत रोचक पर
गुरूजी इत्ता लंबा भी एक साथ ना लिखा करे.
इसे दो भाग में करते तो और अच्छा रहता.

sidheshwer said...

जे हुआ ना उम्दा कबाड़ !
क्या भाव लगाऊं! बाबूजी?

pallavi trivedi said...

waah...ek aur rochak kissa....mazedar raha.

मुनीश ( munish ) said...

apki yaddasht aur kashetriya lahje ke lihaz se ye sari series har haal mein chhapni hi chahiye.atyuttam maane bhot sahi !

Udan Tashtari said...

बहुत रोचक..

सचिन मिश्रा said...

bahut khub

सचिन मिश्रा said...
This comment has been removed by the author.
Vineeta Yashswi said...

wah saab wah. maza hi aa gaya....

Lovely kumari said...

परखनाSSSली कथा के इन्तिज़ार में

शायदा said...

बहुत बढि़या। सचमुच हंसी आई आज तो।

डा. अमर कुमार said...

.

माफ़ करना यार लप्पूझन्ने,
तेरे को ललकार के वापिस तो बुल्लालाया, औ' मैंई ना
पहुँचा । खैर, अब सुन यह दुर्गादत्त मास्टर जहाँ भी मिलें
उन्ने इंघे को भेज्ज दीजो । एक जुगाड़ लगरिया ऎ..
बेचारे के संघरष की अत्ति होग्यी, अब नासा में लगवा
दूँ, तो तेरा प्राश्चित भी होजावेग्गा और नासा को भी एक
होनहार बिग्यानीक, बस तू भेज दे ..

विनीता यशस्वी said...

मुनीश जी, लपूझन्ने को किताब की शक्ल में तो आना ही चाहिये पर आपकी आवाज़ में इसका अगला हिस्सा सुनने को कब मिलेगा? उसे बार-बार सुनने पर भी मन नहीं भरता.

लपूझन्ना said...

डाक्साब माने डा+अमर (=?) कुमार साब

दुर्गादत्त मास्साब इहलोक छोड़ कर उहलोक लपक लिए पिछले साल. सीक्रेट तो जे हैगा के अपने क्या नाम थे वो रास्टपती कलाम साब - वो भी रामनगर में दुर्गादत्त मास्साब से साइंस पढ़ के दुनिया भर में लैक्चर देते फिरे. और बाक़ी के शिष्यों की भांति उन्ने भी बोई किया के "मूं फेरकर न देखा ऐसे गये लिकल के ..."

जेई गम बरदास न हो सका मास्साब से. उनकी याद में अब जा के नासा अपना हैडक्वाटर रामनगर शिफ़्ट कर रिया है इन बरसातों के बाद.

मास्साब ज़िन्दाबाद.

sonu said...

Saari Rachanaye padhi, tumahari likhne ki kala wakai jabardast hai. man gaye dost.

Agli rachna ke intazaar main.

दीपा पाठक said...

मज्ज एगो हो। अति उत्तम, शानदार।

महेन said...

अशोक भाई, पढ़ते-पढ़ते ही अंदाज़ा हो गया था कि यह आप ही लिख रहे हो। नाम पढ़ा तो मुहर भी लग गई।
आपने शायद मज़ाक में लिखी हो मगर यह मेरे लिये उत्कृष्ट किताब है। संस्मरण नहीं कहूंगा, स्वामी और दोस्त जैसी कोई किताब। पहला ब्लोग है जो पूरा चाट गया। इन कहानियों को खत्म करने में कोई जल्दी न कीजियेगा… पूरी फ़ुटेज खाईये और आराम से लिखिये।

महेन said...

और हां, यह सब अपने स्कूल के दिनों की भी जस की तस याद दिलाते हैं… दिल्ली शहर के बीच पहाड़ियों की कालोनी और जाट-गूजर क्लासमेट वैसा ही माहौल पैदा होता था।

महेन said...

डा. अमर को डा+अमर मत करो भाई। डा+अमर तो डामर बन जाएगा और अगर डा. साब को डामर का मतलब समझ में आ गया तो गंगाप्रसाद से शरीर के पृष्ठभाग के मांसल हिस्से की सिंकाई हो जाएगी।

Ek ziddi dhun said...

ये टोड मास्साब हर शहर में होवें क्या? हमारे भी थे मुज़फ्फरनगर. असली ब्लॉग का पहला फेरा रहा आज.

सोतड़ू said...

शानदार, पहली बार लगा कि नेट पर भी साहित्य उपलब्ध है.... अद्भुत। मैं तो बस फ़ैन हो गया जी आपका

Ashu said...

Aapke blg ka link Dehradun se mila, padhte hi maza aa gaya aur dimaag ghanchakker ban gaya. Saare bolgs ka printout nikaala aur ravivaar to ghar par bath kar araam se do teen baar padh daala chai ki chuskiyon ke saath. Main bhi Haldwani se hoon lekin pichle kayi saalon se rajdhani main viraajmaan hoon. Numaish, raamlila, patangbaazi aur cricket ki toss ke baare main padh kar saari purani yaadein taaza ho gayi. Aapki vocabulary ke kaayal ho gaye hum sir.....

anil yadav said...

लफत्तू गुरू।
आप कोई कैसे मेल करे कहीं कोई पता ही नहीं। एक टवेंटीनाइन वाला दिखा पर खटके ने रोक दिया क्या पता अब खुलता हो या नहीं। फोन पर बतियाने में वो बात नहीं जो लिखने में है। आग्रह है पता भेज दीजिए। कंप्यूटर जी की सेहत सुधर रही है।

वर्षा said...

कबाड़खाने में तो जाती रहती थी, लपूझन्ना में पहलीबार आई, मास्साब की क्लास में तो मजा ही आ गया।

सोतड़ू said...

क्या दाज्यू ज़्यादा देर नहीं हो गई अगली किस्त आने में ?????

anil yadav said...

लफत्तू गुरू


लफूझन्ना का सिलसिला खत्म हो तो इस बच्चे को केंद्र में रख कर एक कम अज कम छह सौ पन्ने के उपन्यास होना चाहिए। बचपन का अपिक।
जानते हो क्यों कह रहा हूं। पाठक उर्फ आदमी की जात जरा जलनखोर होती है जब लेखक को खुद कागज पर देखेगी तो सोचेगी कि हाय मेरा बचपन क्यों न ऐसा हुआ। ऐसा ही या इससे भी घटनाबहुल रहा होगा लेकिन अपने गदेलेपन को देख पाने वाली आंख और उस पर हंस पाने वाला निर्लिप्त झकलेट मन अक्सर नहीं होता।

अगर कोई काल्पनिक चरित्र होगा तो उसके साथ अपने कोरिलेट करना बेहद आसान होता है और वह किताब अपनी प्रिय बन जाती है।
हैरी पाटर लिखने वाली औरत और एनिड ब्लाइटन और एडवेंचर्स आफ हक्कलबेरी फिन लिखने वाले का सारा खेल मुझे इस क्षण इसी बात पर टिका लगता है।

विनीता यशस्वी said...

लफ़त्तू और लपूझन्ने की किताब ज़रूर आनी चाहिए. अनिल जी की बात से पूरी तरह सहमति है मेरी.