Wednesday, May 18, 2016

भोर सुहानी चंचल बालक और जैहनूमान

लफ़त्तू अब भी मुरादाबाद में भर्ती था और उसकी सलामती की बाबत न लालसिंह के पास कोई सूचना थी न फ़ुच्ची के पास. मेरी बहनें लफ़त्तू की बहनों की दोस्त थीं और उनसे कुछ पूछना मुझे गवारा न था क्योंकि लफ़त्तू को हमारे घर पर बहुत बड़ा चोट्टा समझा जाता था. जब-तब उसके पापा गांठ-लगा थैला किए मुरादाबाद जाने वाली बस के इन्तज़ार में बस अड्डे पर खड़े नज़र आते और मेरा कलेजा गले में किसी फांस की तरह अटक जाया करता. कायपद्दातैराकीबैटमिन्डल और क्रिकेट वगैरह सारी गतिविधियों पर विराम लग चुका था और मेरा मन लगातार किसी आसन्न बुरी ख़बर से कांपा करता.

गर्मियां आया चाहती थीं और लम्बी छुट्टियां भी. गर्मियों का मतलब होता था जुल्मी की बक्से वाले वाली कुल्फीलाला की पिस्ते वाली लस्सीपोदीने वाला गन्ने का रसआमतरबूजलम्बी दोपहरियाँ और घर आने वाले मेहमानों की बाढ़ का बंद हो जाना. मेरे घर पर जाड़ों भर रिश्तेदार-मेहमानों का तांता लगा रहता जो पता नहीं कहाँ-कहाँ से आकर हमारे घर के अलग-अलग कमरों में अपनी-अपनी सुविधा के हिसाब से नत्थी होते रहते थे – चूंकि घर से नेरा ताल्लुक सिर्फ खाने और सोने तक महदूद हुआ करता थाइन अतिथियों के समय-समय आते रहने से मुझे बहुत दिक्कत नहीं होती थी. बस माँ और बहनों को बुरादे की अंगीठी के सामने बैठे-बैठे हर रात एक करोड़ रोटियाँ बेलते-सेंकते देखना मुझे नहीं भाता था.

हमारे एक दद्दा थे जिनकी खुराक अड़तीस-चालीस रोटी की हुआ करती थीएक चचा कहीं से आते थे और बड़े भाई को अहर्निश बस त्रिकोण-वर्ग-आयत कराते रहते थेएक मामू थे जिनकी पीठ सदैव फोड़े-फुंसियों की कॉलोनी बनी रहती थी जिनके इलाज के लिए वे हर साल हफ्ता-दस दिन रामनगर के हर डाक्टर-वैद्य-हकीम के दर पर सवाली बने रहने के उपरान्त थैला भर ट्यूबेंलेपगोलियांकाढ़े वगैरह लेकर वापस अपने घर जाते थेबाबू के बचपन के एक दोस्त थे जो हर होली से हफ्ते भर पहले घर के बैठकखाने पर पड़े तखत को अपना अड्डा बना लेते – इस तखत पर वे दिन भर अधमरे पड़े-लेटे रहते लेकिन शाम होने से लेकर सोने तक उनके भीतर पता नहीं कहाँ से के. एल. सहगल की आत्मा घुस जाती और वे अपनी तनिक नक्कू और अचारी आवाज़ में ‘भोर सुहानी चंचल बालक’ और ‘एक राजे का बेटा’ जैसे सड़ियल क्लासिक गाने गाते रहते. पिताजी वक्त पर घर आ चुके होते तो उनके साथ बैठे ‘वाह साब’ का जाप करते अपनी फाइलें निपटाते रहते वरना सहगल साब खुली खिड़की से बाहर बस अड्डे-खेल मैदान और आटे की चक्की का विहंगम दृश्य देखते ‘प्रीतम आन मिलो’ करते रहते. इस दौरान उन्हें लगातार पानी सी सप्लाई करते रहना होती थी क्योंकि उन्हें पानी की प्यास केवल शाम के बाद से लगना शुरू होती थी. स्टील के बिना हैंडल वाले जग में भर-भर कर पानी उन तक पहुंचाने की जिम्मेदारी बड़े भाई की हुआ करती. लफत्तू उन्हें लगातार तखत पर बैठे देखता तो अपने पापा से सीखी हुई एक कविता फुसफुसाकर बेकाबू हंसता हुआ दोहरा हो जाया करता था-

आइये हुजूर
खाइए खजूर
बैठिये तखत पर
पादिये बखत पर

एक बाबाजी आते थे जिनके आने पर हमें अपनी अंग्रेज़ी ग्रामर की किताबें निकाल कर उनके सामने बैठ जाना होता था. वे घंटों हमें आई एन जी लगाने के नुस्खे सिखाया करते और टाफियां देते जाते. वे कभी-कभार बांसुरी निकाल लेते और उससे कुत्ते के रोने की जैसी आवाजें निकाला करते और हमसे साथ-साथ ‘गोपालागोपाला’ गाने को कहते. टाफी और बांसुरी के इस बेढब सामंजस्य का आकर्षण एक बार लफत्तू को भी मेरे घर बाकायदा कापी-किताब समेत लेकर आया लेकिन उसी शाम को कायापद्दा खेलते हुए उसने बाबाजी को हॉकलेट घोषित करते हुए मुझे चेताया कि बुढ्ढा बाबा हमारे घर पर डकैती डालने की योजना बना रहा है. 

लफत्तू का बीमार होकर यूं मेरे संसार से मुरादाबाद चले जाना बहुत कचोटा करता और उसके बिना रामनगर की हर शै आकर्षणविहीन हो गयी थी. फुच्ची ने मेरे घर पर आकर मुझे अपने साथ ले जाने को कुछ दिनों से नियम बना लिया था. मैं उसके साथ केवल इस वजह से चला जाया करता कि उसके पास पैसे होते थे और मौका-बेमौका गम गलत करने को वह बमपकौड़ा खिलवा दिया करता था. लफत्तू के घर के सामने वाले मकान में नए किरायेदार आ गए थे जिनकी कॉलेजगामिनी मुटल्ली लड़की का नाम फुच्ची ने प्रत्यक्ष कारणों से जीनातमान रख दिया था.

इस मुटल्ली जीनातमान की दोस्ती रामनगर आते ही उसके घर के सामने वाले पप्पी मांटेसरी स्कूल वाली मेरी और फुच्ची की पुरानी लौ अर्थात मधुबाला मास्टरानी से ही गयी थी और ये दोनों हीरोइनें यदा-कदा साथ-साथ जुल्मी के बक्से की कुल्फी खातींफिक्क-फिक्क हंसतीं अपने दुपट्टे संभालतीं नज़र आ जाया करतीं. फुच्ची मुझे हर शाम लफत्तू के घर के सामने से होकर ही कहीं ले जाया करता. कई बार तो एक ही शाम हम उसके सामने से छः-सात बार तक गुज़रा करते. फुच्ची को जीनातमान में न जाने क्या नज़र आता था कि लार टपकाता वह उसके घर की तरफ इतनी बार देखने की नीयत से उसी रास्ते पर से गुज़रता हुआ भी बोर नहीं होता था. एक दिन जब हम साह जी की चक्की से फुच्ची के घर का आटा पिसवा कर लौट रहे थेचौराहे के उस तरफ हाथीखाने की तरफ से जीनातमान और मधुबाला आती नज़र आईं . उनके आगे-आगे हाथी चल रहा था.  फुच्ची ने धप से आटे का थैला नीचे धरा और मेरा हाथ थामकर हाथीखाने की राह लग लिया. हाथी हमसे करीब बीस मीटर दूर था और उसकी टांगों के बीच से दोनों हीरोइनों को देखा जा सकता था. वे बेमतलब मटकती हुईं ,गपियाती हमारी तरफ को आ रही थीं. मैंने एक निगाह फुच्ची के चेहरे पर डाली तो पाया कि उसकी वाकई में लार टपक रही थी. मुझे हंसी आने को हुई कि हाथी अचानक  रुका और उसने बीच सड़क पर ढेर सारा गोबर कर दिया. फुच्ची का सारा रोमांस हाथी के गोबर ने गोबर बना दिया और अचानक हुए इस सार्वजनिक गजगोबरीकरण से हकबकाया नायिकाद्वय अपने होंठों को दुपट्टे से ढांपता वहीं बगल में रहनेवाले पुरिया चोर के घर घुस गया.

नसीम अंजुम का मेरे और मेरी बहनों की जिंदगानियों में आना किसी तिलिस्म की तरह घटा. उसके पापा जंगलात के बहुत बड़े अफसर थे और लखीमपुर से हमारे पड़ोस में हाल ही में शिफ्ट हुए थे. नसीम अंजुम मेरी मंझली बहन की क्लास में पढ़ती थी और हमारे घर पहली बार आने के पंद्रह मिनट के भीतर ही उसने अपनी ठसकेदार भाषा और मुस्कान से घर के हर सदस्य को अपना बना लिया था. वह खुद को कभी भी केवल नसीम कहकर नहीं बल्कि नसीम अंजुम कहकर संबोधित करती थी और अपने बारे में इस तरह बोलती थी जैसे वह खुद कोई और हो – “तो आन्टी अम्मी ने हमसे कहा कि नसीम अंजुम आपका दिमाग खराब हो गया है. अब नसीम अंजुम किसी को कैसे बताएं कि हुआ क्या था. आप ही बताइये आन्टी घर पर जब कोई मेहमान आया हो तो उसे बिना कुछ खिलाये-पिलाए कैसे जाने दे सकते हैं. तो अम्मी घर पे थी नहीं और हमने जोशी अंकल को चाय के साथ वो रात वाले समोसे गरम करके परोसने की ठान ली. अब नसीम अंजुम को क्या पता कि बिजली का हीटर कैसे चलता है. बस लग गया करंट. ये देखिये कित्ता तो बड़ा दाग लगा था.” ऐसा कहकर उसने अपनी नन्हीं सी कलाई को उघाड़कर लखीमपुर में तीन साल पहले लगे करंट के निशान को उरियां किया. “तो जब नसीम अंजुम अब्बू के साथ अस्पताल से वापस घर पहुँचीं तो अम्मी बोलीं नसीम अंजुम आपका दिमाग खराब हो गया है. बताइये ऐसे कोई बोलता है आन्टीतो नसीम अंजुम ने फैसला किया ...” खिलखिलाती हुई वह बकबक करती जाती थी और सामने रखे बिस्कुटों को एक के ऊपर एक रखकर पहले कुतुबमीनार सी बनाती फिर गिराती जाती. उसकी पतली-पतली सुन्दर उँगलियों में से एक पर लगी चमचम करती छोटी सी अंगूठी के नगीने पर जब-जब शाम की धूप सीधी पड़ जातीउसकी नाक के नुकीले छोर पर पर सतरंगी दिपदिप झलमलाने लगती. वह उस वक़्त मुझे अप्रतिम सुन्दर लगी लेकिन बाहर से फुच्ची का “बीयो ... ओ ... ओ ... ई ...” वाला आमंत्रण संकेत दूसरी दफ़ा आते ही मुझे निकलना पड़ा.

फुच्ची के कोयला चेहरे पर पसीने की मोटी-मोटी बूँदें थीं और वह काफी उत्तेजित और व्यग्र लगता था. वह मुझे देखते ही सीधा लालसिंह की दुकान की दिशा में बढ़ चला. पीछे-पीछे मैं पहुंचा तो लालसिंह पहले से ही बाहर खड़ा होकर बस अड्डे की तरफ निगाहें गड़ाए थे. मैंने भी उस तरफ देखा. पहलवान के ठेले पर लफत्तू के माँ-बाप लाल कम्बल में लपेटे लफत्तू को लिटा रहे थे.

मेरे ख़याल से लफत्तू लिकल्लिया!” लालसिंह ने बेहद खतरनाक आवाज़ निकालते हुए थूक गटका.

क्या मतलब बे!” यह फुच्ची था.

मेरी ईजा को भी बाबू ऐसे ही लाये थे मुरादाबाद से.

तेरी ईजा तो बुढ्ढी थी बे. लफत्तू ऐसे कैसे ...

वही तो मैं कह रहा हूँ फुच्चन बेटे. देख कम्बल ज़रा भी हिल नहीं रहा. गया लफत्तू ...” 

लालसिंह दुकान के बाहर धरी बेंच पर अधपसर सा गया. इस वार्तालाप को आगे सुनने की मेरे भीतर ताकत नहीं बची थी और मैं खेलमैदान की तरफ भाग गया. मेरी रुलाई फूट रही थी जबकि चारों तरफ बच्चे साइकिल चला रहे थे. अभी लफत्तू होता तो उस छोटे से बच्चे को साइकिल सिखाने लगता जिससे गद्दी पर नहीं बैठा जा रहा था. मैं भागता भागता बौने के ठेले तक पहुँच गया जहाँ उसके दोनों अधनंगे बच्चे अखबार के टुकड़ों से नाव और जहाज़ बनाने का खेल खेल रहे थे. बौना एक और अखबार का पंखा झल रहा था और उसकी मैली बनियान पसीने से भीगकर भूरी पड़ चुकी थी. उसने मुझे देखा तो तुरंत हरकत में आ गया मसालेदार आलू का गोला बनाने लगा.

जैसे ही मैं उसके ऐन सामने आया उसने मेरी बहती हुई आँखें ताड़ लीं और खुशामदी लहजे में बोला – “सब ठीक तो है ना बाबूजी!

वो लफत्तू ...

इतनी बड़ी त्रासदी घट गयी थी और बौना आलू के गोले को बेसन के घोल में डुबो रहा था.

बहुत दिनों से बड़े वाले बाबूजी नहीं आ रहे ...

उसी की बात तो बता रहा हूँ. लफत्तू मर गया आज ...” यह कहते कहते मैं इतनी जोर जोर से रोने लगा कि साइकिल चला रहे एकाध बच्चों तक ने मेरी तरफ निगाह डाली अलबत्ता वे अपने काम में लगे रहे. बमपकौड़े अब गरम तेल की कढ़ाई में खदबदाने लगे थे और आसपास की हवा सुपरिचित गंध से भारी होती जा रही थी.

ऐसे थोड़े ही होता है बाबूजी. बड़े बाबूजी के घरवाले हनूमान जी के भगत हैं. हनूमान जी ऐसे ही थोड़ी होने दे सकते हैं. बड़े बाबूजी को कुछ नहीं होगा. मुझे पता है ...” बौना ज्ञान गाँठ रहा था और पत्तल बना रहा था.

मेरा रोना अब तकरीबन बंद हो चुका था और बौने के हाथों में धरा पत्तल मेरे सामने था : “खाइए बाबूजी ... पैसे की कोई बात नहीं ...

एक पल को असमंजस हुआ कि दोस्त के मरने पर इतना बेशर्म कैसे हुआ जा सकता है लेकिन बमपकौड़े की महक के आगे मेरी हार हुई और बौना जीत गया. इस फ़ोकट पार्टी के बाद मेरा चित्त थोड़ा शांत हुआ. मैंने पहली बार अकेले बौने के ठेले पर यह कारनामा अंजाम दिया था. अब मुझे दुःख भी कम हो रहा था. पिक्चर देखने का मन कर रहा था. बौने ने एक बार उकसाया तो मैंने फ़ौरन फर्श पर अपना गाल टिकाया और हॉकलेट धरमेंदर की कोई पिक्चर देखने लगा. पिक्चर बीसेक मिनट में धरमेंदर और मुच्छड़ पुलिसवाले के बीच हुई लम्बी वार्ता और जीनातमान के साथ उसके गाना गाने के साथ ख़तम हो गयी.

मैं कपड़े सही करने लगा तो बौना बोला : “चालीस पैसे हुए बाबूजी. अगली बार दे दीजियेगा. अब घर जाइए. हनूमान जी भली करेंगे.” बौने ने अपना सफल व्यापारी रूप दिखाया और जैहनूमान ग्यानगुनसागर गुनगुनाने लगा. दोस्त की मौत के बाद बमपकौड़ा खाना और पिक्चर देखना और वो भी उधार में – अपराधबोध से अटा हुआ मैं जब घर के दरवाज़े पर पहुंचा तो शाम धुंधला चुकी थी. एक निगाह लालसिंह की दुकान की दिशा में डाली तो वहां कुछ भी उल्लेखनीय होता नज़र नहीं आया. मुंह में बीड़ी चिपकाए लालसिंह के बाबू चाय की केतली के मुंह पर फंसे अदरक के टुकड़े को निकाल रहे थे और मेरे दोस्तों का नामोनिशान तक नहीं था. मैं समझ गया वो लफत्तू के घर गए होंगे.

मैं जीना चढ़ ही रहा था कि माँ और मेरी दोनों बहनें एक साथ दरवाज़े से बाहर निकले.

तू था कहाँ ... हर जगह देख आये तुझे. चल अंकल जी के घर चलना है. लफत्तू की मम्मी बुला रही तुझको.

लफत्तू के घर छोटा-मोटा मजमा लगा हुआ था जैसा बंटू के दादाजी के मरने पर लगा था. लफत्तू की बहनें एक कोने में खड़ी थीं और उसका जल्लाद भाई सियाबर बैद जी के कानों में मुंह सटाए जोर-जोर से कुछ कह रहा था. परसूराम मास्साब और विलायती सांड भी नज़र आ रहे थे. माँ ने मेरा और छोटी बहन का हाथ थामा हुआ था और वह वैसे ही हमें घसीटते हुए लफत्तू के घर के भीतर ले गयी. बाहर के कमरे की कुर्सियों पर लफत्तू के पापा और कुछ पड़ोसी विराजमान थे. माँ हमें भीतर के कमरे में ले गयी.

लफत्तू जिंदा था और उसकी नाक बह रही थी. उसकी मम्मी उसे मुसम्मी का शरबत पिला रही थी.   

लफत्तू मरा नहीं था क्योंकि उसको बौने के हनूमानजी ने बचा लिया था.

लफत्तू बहुत बीमार और दुबला दिख रहा था पर मुझ पर निगाह पड़ते ही उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गयी. उसकी मम्मी के इशारे पर मैं आगे बढ़कर लफत्तू की बगल में बिस्तर पर बैठ गया. मैं उसे गले लगा कर और खूब रोना-पीटना करके अपना जी हल्का कर लेना चाहता था. मैं अपने मन की सारी भावनाएं उसके उसके सामने उड़ेल कर उसका हाथ भी थामे रहना चाहता था लेकिन मैं पैदाइशी घुन्ना था और चुपचाप फर्श पर निगाहें लगाए औरतों की बातें सुनता दुखी होता रहा.

लफत्तू को अगले छः महीने तक स्कूल जाने की इजाजत नहीं थी. उसे हर पंद्रह दिन पर मुरादाबाद ले जाया जाना था. उसके भोजन और दवा में हज़ार तरह की सावधानियां बरती जानी थीं.

दो दिन की देर हुई होती तो हमारा बच्चा तो ...” लफत्तू की मम्मी मेरी माँ को बता रही थीं. “अब की सोमवार को गर्जिया माता के दरबार में हाजिरी लगानी है दिदी! अब तो माता का ही सहारा हुआ हमें ...

कम्बल के नीचे से लफत्तू ने अपना हाथ बाहर निकाला तो कलाई पर चिपकी हुई प्लास्टिक की एक मशीननुमा चीज़ ने मुझे आकर्षित किया.

इसी में डाल के हज़ारों इंजेक्सन लगाए मेरे बच्चे को जल्लादों ने ... इसी में डाल के दिदी ...” लफत्तू की माँ ने अब रोना शुरू कर दिया था. देखादेखी मेरी माँ ने भी वही काम शुरू कर दिया. ज़मीन पर बैठी दो मुटल्ली औरतों ने भी इस कार्यक्रम में शरीक होना अपना फ़र्ज़ समझा और मिनट के भीतर-भीतर कमरे में बकौल लफत्तू मोर्रम का जल्सा शुरू हो गया. बस औरतों के छाती पीटने की कमी बची थी. औरतों की इस बेपरवाह नाटकीयता के चक्कर में मैं लफत्तू को सीधे देख सकने की हिम्मत जुटा सका. मैं उसे देखता हुआ अपने चेहरे को भरसक मनहूस बनाने की कोशिश कर रहा था कि मौके का फायदा उठाकर उसने इंजेक्सन से जख्मी अपने हाथ से मेरी पिद्दी पिछाड़ी पर जोर की चिकोटी काटी और आँख मार कर मंद-मंद मुस्कराने लगा. उसने उंगली से मेरी कमीज़ के आगे के उस हिस्से को छुआ जिस पर मेरे द्वारा अभी अभी किये गए अपराध का सबूत चस्पां था. कमीज़ पर गिरी हुई मिर्चीदार हरी चटनी अब तक सूखी नहीं थी जिसे देखकर उसने अपना पुराना डायलॉग फुसफुसाया “थाले गब्बल के बिना मौद कात लए तुम थब.

अब मुझे सच्ची मुच्ची का रोना आ गया.  

तू जल्दी से ठीक हो जा यार लफत्तू. मेरा कहीं भी मन नहीं लगता.” ऐसे ही एकाध वाक्य मेरे मुंह से निकल सके. लफत्तू ने अपने घायल हाथ से मेरा हाथ थामा और कम्बल के भीतर कर लिया. उसकी हथेली पसीने से भीग गयी थी लेकिन उसने एकाध मिनट तक मेरा हाथ नहीं छोड़ा. उसकी पलकों के कोरों पर भी एक नन्हा सा आंसू ठिठक सा गया था. यह उस्ताद और शागिर्द के दरम्यान लम्बे अरसे बाद हो रहा मूक लेकिन भावपूर्ण संवाद था जिसने आगे के दिनों में हमारी गर्मी की छुट्टियों और नए मोहब्बतनामों की दिशा तय करनी थी. 


लफत्तू की तबीयत का हाल जानने को हमारी समूची मंडली कितनी व्याकुल थी इसका पता दूधिये वाली गली से लगातार आ रही "बीयोओओओई ..." की बेचैन आवाजों से चल रहा था जो बताती थीं कि फुच्ची, मुन्ना खुड्डी, बंटू, लालसिंह, जगुवा पौंक और बागड़बिल्ला वगैरह व्याकुल होकर लफंडर-यूथ बनाए मेरे बाहर आने की प्रतीक्षा कर रहे थे.   

11 comments:

Praveen Singh said...

जय हो अशोक दा , आखिर लफत्तू वापस आ ही गया,
आज इंजार का सूखा खत्म हुआ।

thegroup said...

boffline pande jyu maharaj

thegroup said...

boffline pande jyu maharaj

मृत्युंजय said...

लौट आए, जय हो ! लफत्तू की जय हो !

Shardu Kumar Rastogi said...

Teen Saal Ka Sukha Khatam Hua. Welcome Back. Jai Ho.

S. K Jha said...

JAI HO..............KHUSH-AMA-DID.................JEH-NA-SIB..............

YUNKI.........3 SAAL KA ANTRAL..........PATHAK PE ATYACHAR ......... FIR BHI ABHAR....

PRNAM.

Poonam Nigam said...

वो चार लाइन की कविता ने कमाल कर दिया। लफ़त्तू वाले इस हास्य रस के लिए तरस रहे थे। मैं इतनी शोर से हसी की मेरी ६ महीने की बेटी जो अभी अभी बैठना सीखी है अपने सारे खिलोने छोड़ के मुझे देखने लग गयी की हुआ क्या है। फिर से खून चटा दिया है आपने उम्मीद है जल्द ही अगली पोस्ट आये.

vB said...

saheb bas ab dobara itna lamba sookha mat kariyega.

Bhaskar Lakshakar said...

मुझे लगा कि अब इस पर आप कुछ पोस्ट नही करेंगे.. लेकिन फिर यूँही आदतन इसे सर्फ किया... और नया किस्सा सामने.. :)

मैथिली गुप्त said...

हमेशा की तरह शानदार

Shailesh Bharatwasi said...

:)