Monday, March 30, 2009

हुसन की मलका दीलफरैब जीनातमान का नाच और टुन्ना झर्री के कारनामे

टुन्ना झर्री रामनगर हम से एक पीढ़ी आगे वाले लफाड़ी समुदाय का सर्वमान्य ख़लीफ़ा माना जाता था. कोसी डाम पर एक दफ़ा हिन्दू लड़कियों के ताड़ीकरण-कर्म की नीयत से टहल रहे दो पाकिस्तान निवासी लौंडों को अकेले ठोक दिया था टुन्ना ने. यह अलग बात है कि टुन्ना स्वयं उसी प्रयोजन से वहां टहलने गया था. इस उपलब्धि के ऐवज़ में ख़ुद की अपनी पीढ़ी में वह नायक के और हमारी अप्रेन्टिसरत पीढ़ी में महानायक के तौर पर स्थापित हो गया.

टुन्ना के इस शौर्य की गाथा हमें नेचुरली लफ़त्तू ने ही सुनाई. टुन्ना भी फ़ुच्ची की तरह कलूटा था. उसके पापा हमारे कालेज में सीनियर बच्चों को कुछ पढ़ाया करते थे. लेकिन टुन्ना ने स्कूल जाना आठवीं क्लास के बाद बन्द कर दिया था. टुन्ना के पापा को समूचा शहर नेस्ती मास्टर के नाम से जाना करता था. यदि नागरजनों को उन पर अधिक लाड़ आ जाता तो उन्हें विलायती सांड़ नाम से भी संबोधित किया जाता.

रामनगर की शब्दावली में झूठ्मूठ गप्प मारने की क्रिया के लिए अपना स्वायत्त शब्द-पद था - 'झर पेलना'. टुन्ना के आगे झर्री शब्द लगाए जाने की उत्पत्ति भी इसी क्रियापद में पोशीदा थी. टुन्ना के बारे में यह बात सारे रामनगर के लौंडजगत में विख्यात थी कि वह अपने काम से काम रखता है और झर कभी नहीं पेलता. दर असल कोसी डाम पर पाकिस्तानी लड़कों की पिटाई के प्रकरण को रामनगर के इतिहास में एक क्रान्तिकारी और परिवर्तनकारी घटना माना गया जिसके न मालूम कितने संस्करण गली-मोहल्लों में उपलब्ध थे. टुन्ना प्रेरणा का झरना बन गया था जिसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की नीयत से टुन्ना भक्तों और अघोषित टुन्ना फ़ैन्स क्लब द्वारा डाम-घटना को लेकर इतनी बेशुमार झरें पेली गईं कि टुन्ना से अगली पीढ़ी के लफंडरों ने टुन्ना के प्रति बहुत हिकारत और संभवतः उस से भी ज़्यादा ईर्ष्या भी महसूस करते हुए टुन्ना के आगे झर्री विशेषण फ़िट कर दिया.

मिसाल के तौर पर एक बार क्लास में दो पीरियडों के बीच के अन्तराल में बम्बाघेर नम्बर दो में रहने वाले हमारे सहपाठी जगदीस जोसी उर्फ़ जगुवा पौंक ने एक बार टुन्ना को हिमालय टाकीज से बाहर निकलते हुए दिखाते हुए हमें गर्व से बताया कि टुन्ना बम्बाघेर में उनका पड़ोसी है. टुन्ना और कोसी डाम अपरिहार्य रूप से एक दूसरे से सम्बद्ध हो चुके थे. जगुवा पौंक ने टुन्ना का पड़ोसी होने का गर्व बहुत देर तक महसूस करते हुए झर पेली कि टुन्ना ने उस ऐतिहासिक दिन बारह मुसलियों को अकेले सूत डाला था. बागड़बिल्ला इस संख्या को हमें इम्प्रेस करने की नीयत से पन्द्रह तक पहुंचा दिया करता था. इन गड़बड़ आंकड़ों का लफ़त्तू पर कोई असर नहीं होता. वह कहता था : "एक कतुवा दत-बीत हिन्दू के बलाबल होता ऐ बेते ... तुन्ना धल्ली ने दोई कतुवों को माला होगा ... छमल्लेवैं आप ... एक तुन्ना धल्ली और दो-दो कतुवे ..."

लफ़त्तू की टोन बताती थी कि टुन्ना के प्रति उसके दिल में असीम सम्मान ठुंसा हुआ है.

धूल मैदान से आगे खेल मैदान पर किराये की साइकिलें चलाते वक्त हम किंचित ईर्ष्या और भय से उस कोने को ताका करते जहां टुन्ना अपनी कैबिनेट मीटिंगें लिया करता था. लफ़त्तू ने बाद में मेरा ज्ञानवर्धन करते हुए बताया कि टुन्ना चाहे तो उन मीटिंगों को कहीं भी ले ले पर पाकिस्तान निवासी लौंडे अक्सर हिन्दुस्तानी लौंडों की साइकिलें छीन लिया करते थे. कोसी डाम पर परमवीर चक्र प्राप्त कर चुकने के बाद टुन्ना ने अपना सायंकालीन दफ़्तर इसी बात के चलते खेल मैदान पर शिफ़्ट कर लिया था कि देखें कौन भूतनी का छीनता है साइकिलें.

निमाइस जाने की इजाज़त देने के लिए मैं अपने परिवार वालों को राजी करने में आख़िरकार सफल हो गया. घर से बहुत सारी हिदायात और बहुत कम पैसे देकर लफ़त्तू और बन्टू के साथ भेजा गया. सबसे ज़रूरी हिदायत थी आग के दरिया और बिजली वाले झूले से दूर रहना और कच्चर-बच्चर न खाना.

शाम हो आई थी. निमाइस की बत्तियां जल गई थीं. करीब दस लाउडस्पीकरों को कुछ न कुछ एलौन्स चल रहे थे और कुछ भी साफ़ नहीं सुनाई दे रहा था. धूल-गर्द-हल्ला-हड़बड़ी का ये आलम था कि हम निमाइस में घुसे और एक दूसरे से बिछड़ गए. एक पल को घबराहट महसूस हुई तो मैंने पलटकर देखा. घर की खिड़की नज़र आ रही थी और वहां भी बत्ती जल चुकी थी यानी खो जाने का कोई डर न था. कॉन्फ़ीडेन्स लौटा तो लफ़त्तू और बन्टू की तलाश में इधर उधर निगाह डालना शुरू किया. थोड़ी मशक्कत के बाद बन्टू की लाल हाफ़ पैन्ट नज़र आ गई. मैं भाग कर उस तक पहुंचा. वह भी हकबकाया खड़ा था. हमने एक दूसरे के हाथ थाम लिए और मिलकर लफ़त्तू की खोज में जुट गए. आख़ीरकार हमें वह दिखाई दे गया. अपने से दो हाथ लम्बी बन्दूक थामे वह एक खोखे पर गुब्बारे फोड़ने की मौज लूट रहा था. हम तनिक नाराज़ होते हुए उस तक पहुंचे तो उसने हमसे डिस्टर्ब न करने को कहा.

ख़ुद को जिम कॉर्बेट से बड़ा शिकारी समझता हुआ वह अपने कन्धे, हाथों और आंखों का अचूक संयोजन करने में लगा था. मरियल बल्ब की रोशनी में सामने लगे गत्ते के बोर्ड पर चिपकाए गए सौ एक गुब्बारे एक ही रंग का होने का आभास दे रहे थे.

"अब देकना बेते ... बो पीला वाला फोल्दूंगा ..."

कट्‌ की आवाज़ आई फिर मरियल सी फट्‍ की और शायद एक गुब्बारा फूटा. "... देका बेते मेला तौंता..."

अगले पांचेक मिनट तक आत्मलीन होकर वह अपना टौंचा सैट करता रहा और आत्ममुदित होता रहा. अपना पेमेन्ट कर चुकने के बाद उसने प्रस्ताव दिया कि हम भी उक्त खेल उसके खर्चे पर खेल कर देखें पर हमें निमाइस घूमने की जल्दी थी सो प्रस्ताव को मुल्तवी कर दिया गया. मेरा मन तो आग का दरिया देखने का था. गुबारे का निशाना लगाने वाले के बाद हग्गू सिपले की दूध-जलेबी की दुकान लगी हुई थी. अगले खोखे पर लालसिंह के पापा को चाय बनाते देख कर मेरे मन में आया कि लालसिंह भी आसपास ही होगा. वह था भी. "अबे हरामियो!" उसने अपने प्रिय सम्बोधन से हमें पुकारा. वह चाय के खाली गिलास इकठ्ठा कर के ला रहा था.

"यहीं रुको तुम" कह कर वह अपनी दुकान के पिछवाड़े गायब हो गया. मिनट बीतने से पहले वह हमारे साथ था.

"डान्स देखोगे हरामियो? जीनातमान जैसा माल आया है इस साल निमाइस में."

प्रस्ताव बहुत चैलेंजिंग था और पौरुष को ललकारने वाला. "इन बत्तों ते पूत ले याल लालछिंग ... मैं तो देकियाया दीनातमान को पैले ई .."

लफ़त्तू के इस डायलॉग के बाद नहीं कहने का कोई मतलब नहीं था. लम्बू लालसिंह आगे आगे और हम तीन नन्हे हरामी पीछे-पीछे. लोहे की एक बहुत बड़ी बाड़ के अन्दर गोल टैन्ट लगा हुआ था. चारों तरफ़ से बन्द इस तम्बू की सज्जा हेतु उरोजा-दल का वही पोस्टरनुमा पैनल लगाया गया था जिसे ठेले पर रख कर निमाइस का परचार किया जाता था. मेरी चोर निगाह ने ज़मीन पर धरे ब्लैकबोर्डनुमा पैनल पर लिखा पढ़ लिया: 'हुसन की मलका दीलफरैब हैलन का नाच. २ रु.' - हुसन, दिलफ़रैब. मोब्बत, बफा-जफा, आसिक इत्यादि अल्फ़ाज़ अब समझ में आने ही लगे थे. २ रु. देखते ही मैंने लालसिंह से कहा कि मेरे पास तो कुल इतनी ही रकम है और अभी मैंने अपनी शॉपिंग करना बाकी है.

"बड़ा आया पैसा देने वाला हरामी" लालसिंह ने लाड़ से दुत्कार लगाई. वह डान्स वाली दुकानवाले का दोस्त था. हम चार टोटल फिरी-फोकट में पिछवाड़े वाले मार्ग से तम्बू के अन्दर थे. अन्दर बीड़ी-सिगरेटों का नीला धुंआ तैर रहा था और बेशुमार भीड़ थी. और अच्छा खासा अन्धेरा भी. एक तनिक ऊंचे प्लेटफ़ॉर्म पर मंच बनाया गया था. मंच के बैकग्राउन्ड के परदे पर एक अधनंगी तस्वीर बनी हुई थी - ठीक जैसी दुर्गादत्त मास्साब की किताबों के कवर पर हुआ करती थीं. अचानक एक पल को मंच की बत्ती बुझी और फिर तुरन्त बाद सारा मंच चटख नीली रोशनी से नहा गया. एक कलूटा आदमी हाथ में माइक लिए स्टेज पर आया तो भीड़ से एक समूहगान सरीखी गूंज उभरी "... ओबे काणे sssss ... ओबे काणे बेsss ..." इस सस्वर प्रोत्साहन ने सारे दर्शकों को बतला-जतला दिया कि कलूटे को ऐरा-गैरा न समझा जाए - उसका नाम है, ख़ूब नाम है और उसके अपने फ़ैन्स भी हैं.

कलूटे ने कुछ चुटकुला सा सुनाया जो मेरी समझ में नहीं आया. अलबत्ता भीड़ एक अश्लील हंसी में फटकर दोहरी हो गई. काने ने करीब दस मिनट तक यह सांस्कृतिक कार्यक्रम चलाया जिसके बाद मंच पर बत्ती बुझने और जलने का पिछला सिलसिला दोहराया गया. बत्ती का जलना और कर्कश लाउडस्पीकर पर 'साकिया आज तुझे नींद नईं आएगी' बजना शुरू हो गया. सीटियां बजनी चालू हो गईं. बन्टू मेरे कान में चिल्ला रहा था कि इस के पहले कोई हमें देखे हमें फूट लेना चाहिये

मंच पर जीनातमान के आते ही दर्शक पागल हो गए. जीनातमान ने फ़िल्मों में मुजरा करने वालियों की लाल-नीली चमचम ड्रेस पहनी हुई थी. उसने झुक कर सलाम जैसा कुछ किया. हम बहुत दूर थे और ज़्यादा डिटेल्स देख पाने की इच्छा पूरी करने में असमर्थ भी. 'सुना है तेरी मैफ़िल में रतजगा है' की टेक से उसने बेहद भौंडा नृत्य शुरू किया. लफ़त्तू ने मेरी बांह पर हल्की चिकोटी काटी तो मैंने पलट कर देखा. उसने मुझे आंख मारी जिसका तात्कालिक अभिप्राय यह था कि बेते मौज काटो जीनातमान के. नाच में बस ये हो रहा था कि एक लाल-नीली ड्रेस के यदा-कदा हवा में ज़रा सा उछलती सी नज़र आती और एडल्ट सीटियां और डायलाग विसर्जित करता रामनगर का कलापारखी वर्ग पूर्णमुदित हो जाता. बस दो तीन मिनट का नाच देखा ही था बस कि लालसिंह ने हमें तकरीबन घसीटते हुए तम्बू से बाहर निकाल लिया. लफ़त्तू और मैं और बन्टू जो भी हो डान्स के मज़े लेने का एडल्ट अनुभव तो जी ही रहे थे; अचानक यूं घसीट कर बाहर निकाल लिया जाना थोड़ा नागवार गुज़रा तो लालसिंह ने ज़रा आगे जा कर हमारे लिए रंधे से बनाई जा रही तीन तिरंगी चुस्की आइसक्रीमें ऑर्डर करते हुए बताया कि ऐसा उसने हमारी बेज्जती खराब ने होने देने के लिहाज़ से किया.

हमें बेमन से चुस्कियां चूसते देख कर लालसिंह ने कहा "डान्स छूट गया है अब देखना कौन कौन बाहर निकलेगा."

बाहर आने वाले तनिक झेंप के साथ जल्दी जल्दी डान्स-तम्बू की सीमा से परे जाने की कड़ी मेहनत कर रहे थे. उन में से कुछ को हम ने पहले भी कहीं न कहीं देखा हुआ था. आख़िर में निकलने वालों में हमारे कालिज का आधे से ज़्यादा स्टाफ़ था. पान की पीक का महासागर मुंह में भरे होने के बावजूद बोल पाने में सफलता प्राप्त कर ले रहे मुर्गादत्त मास्साब के नेतृत्व में दड़ी मास्साब, भगवानदास मास्साब, गोल्टा मास्साब और रामलायक 'निर्जन' बाहर आ रहे थे. वे इतने आत्मविश्वास से आस्पास देखते बाहर आ रहे थे मानो उनका समूचा जीवन यही पुण्यकर्म करने हेतु बना हो और उसी में व्यतीत हुआ हो.

मेरे लिए यह सदमा इस वजह से था कि मैं कम से कम गोल्टा मास्साब को अच्छा समझता था. मैं इस हादसे पर विचार कर ही रहा था कि तम्बू के भीतर से गंगापुत्र उर्फ़ प्याली मात्तर नमूदार हुए. उनके चश्मे की सुतली खुल गई थी और उसकी इकलौती कमानी को कान से लगए वे "अले लुको बाई, लुको, लुको ..." कहते हुए अपने मित्रों के नज़दीक जाने का प्रयास कर रहे थे. चश्मे की खुली हुई सुतली दूसरी तरफ़ लटक रही थी.

"अगर मास्साब लोग देख लेते कि तुम लोग डान्स देख रहे हो तो वो तुम्हारे घरों में शिकायत कर देते. घर वाले तुम्हारा बनाते हौलीकैप्टर अलग और मास्साब लोग तुमें इमत्यान में फ़ेल करते अलग. बेज्जती खराब होती नफ़े में."

लालसिंह सच कह रहा था. बन्टू और लफ़त्तू के साथ मैंने भी हामी में सिर हिलाया. हमारे पैसे अभी बचे हुए थे और आग का दरिया देखने की इच्छा भी. लालसिंह ने कहा कि वह हमें फ़िरी में अन्दर बिठा देने के बाद दुकान पर चला जाएगा क्योंकि उसके पापा अकेले होंगे. लालसिंह निमाइस के स्टाफ़ का आदमी था और उसे सारी चीज़ें फ़ोकट उपलब्ध हैं - यह जानकारी मेरे लिए बड़ी डाह का विषय बन गई थी.

धूल-गर्द-हल्ला-हड़बड़ी अब और ठोस होकर निमाइस के आसमान पर जम चुके थे. दूर बिजली वाले झूले की बत्तियां जलबुझ रही थीं और आकर्षित कर रही थीं.

हाथों में चुस्कियां थामे पहला एडल्ट काम कर चुकने का गर्व महसूस करते हम आग के दरिया की तरफ़ धीमे कदमों से बढ़ रहे थे. लालसिंह ने ठिठोली करते हुए हमसे जीनातमान के हुसन के मुताल्लिक कुछ अश्लील सवालात पूछे. प्रफुल्लित होने के बाजवूद बन्टू और मैं जवाब देने की हिम्मत नहीं जुटा पाये अलबत्ता लफ़त्तू बोला : "किलमित की बौल दैते उतल लई ती याल दीनातमान ... भौछ्‍छई लौंदिया है... भौछ्छई ..."

... अचानक बिना किसी पूर्वसूचना के चीख पुकार मच गई. हमसे ज़रा अगे धूल का हल्का बादल सा उठने को था. पांच सात लड़के अचानक सीरियस मारपीट शुरू कर चुके थे. लालसिंह ने हमसे वहीं खड़े रहने को कहा और घटनास्थल की तरफ़ भाग चला.

वह उसी रफ़्तार से वापस हम तक पहुंचा: "आग का दरिया बन्द हो गया आज. तुम लोग घर जाओ. पांच पांच मुसलिये आग के दरिये से भार लिकाल के टुन्ना झर्री को सूत रहे हैं ...!"

(निमाइस गाथा जारी है)

17 comments:

Neeraj Rohilla said...

जय हो...
अदली तली ता इन्तिजार लहेगा

शिरीष कुमार मौर्य said...

लोग पाकिस्तान के जिक्र से चक्कर में पड़ेंगे!
मिझे पता है कआं ऐ जे पाकिस्तान!
बढ़िया चिल्लया दद्दा कारोबार!
जारी तो रहना ही चाहिए!

महेन said...

दद्दा, ये क्या आजकल इस्पेशल एपिसोड चल्ले क्या? भोत जल्दी जल्दी कर्रे... बढ़िया है... मजा आ रिया है..

मुनीश ( munish ) said...

satt bachan ! jay ho !! aan do deelfareb zamaane ki kuch or yaadein!

Shefali Pande said...

ramnagar itna interesting hoga maalum na tha....

विनीता यशस्वी said...

Humesha ki tarah majedaar...

aage ke hisse ka intazaar rahega...

अनिल कान्त : said...

मज़ा आ गया भाई

अजित वडनेरकर said...

भौछ्छई गुलू!!!

डॉ .अनुराग said...

जय हो मास्साब की भी....लुको शब्द ऐसा आनंद दे गया ...बहुत दिन से लुका हुआ जो था....

Aflatoon said...

काशिका में झर पेलना का पर्यायवाची डौल देना है ।

संदीप शर्मा said...

bahut khoob...

विनय said...

बचपन की अप्रतिम मनोरंजक समझ! भौछ्‍छई..

Ek ziddi dhun said...

idhar to pelne wale ko bataula kahte hain..

rawatji said...

मजा आ गया दाज्यू ..... बचपन याद आ गया .....

vineeta said...

vaah vaah vaah vaah vaah vaah vaah vaah vaah vaah vaah...kuch bhi kahane ko nahi bacha....

ravi sharma said...

बर्बाद कर दिया यार. इसके बाद और कुछ पढने लायक नहीं रह गया. थत्ति कय लिया ऊँ, दोत.

Kishore Choudhary said...

देख रहा हूँ हुस्न निखर रहा है
पर ये रवि का कमेन्ट पढ़ते ही अपनी बरबादी पे रोना नहीं आया