<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-272678107746144576</id><updated>2011-11-28T05:03:48.277+05:30</updated><category term='गड़त'/><category term='सकीना'/><category term='लफ़त्तू'/><category term='नेरूजी'/><category term='लाजेस्खन्ना'/><category term='कैरमबोट'/><category term='शिब्बन'/><category term='कर्नल रंजीत'/><category term='गुलाबी तोता'/><category term='अफ़वाह'/><category term='सूकड़ू का ठूकड़ू'/><category term='हौलीकैप्टर'/><category term='गोबरडाक्टर'/><category term='बमफटाका मालासिन्ना'/><category term='ढाबू की छत'/><category term='हरिया'/><category term='बिग्यान'/><category term='अमीताच्चन'/><category term='लालसिंह'/><category term='बच्चों की चड्ढी'/><category term='टोड मास्साब'/><category term='जगुवा पौंक'/><category term='रत्तीपइयां'/><category term='बैटमिन्डल'/><category term='एडल्ट'/><category term='मटर की तहरी'/><category term='आल्ट'/><category term='लफ़त्तू'/><category term='देबानन'/><category term='निमाइस'/><category term='नेस्ती मास्टर'/><category term='टौंचा'/><category term='बम पकौड़ा'/><category term='दीलफरैब हैलन'/><category term='कुच्चू'/><category term='भिगोल'/><category term='इस्कूल'/><category term='कालाढूंगी'/><category term='किरकिट'/><category term='लोए का पाइप'/><category term='टांडा'/><category term='बागड़बिल्ला'/><category term='कुच्चू गमलू'/><category term='फ़िटबाल'/><category term='ब्रिच्छारौपड़'/><category term='बैदजी'/><category term='पुगत्तम'/><category term='किलास में सुताई'/><category term='मुगल ए आज़म'/><category term='गमलू'/><category term='नौटंकी'/><category term='रामलीला'/><category term='मोम्मद रफ़ी'/><category term='लाल बैलबॉटम'/><category term='धलमेन्दल'/><category term='हाथीखाना'/><category term='पप्पी मान्टेसरी'/><category term='उरस'/><category term='प्याली मात्तर'/><category term='दूधिए वाली संकरी गली'/><category term='खताड़ी'/><category term='बड्डे पाल्टी'/><category term='होस्यार सुतरा'/><category term='बास्पीकरण'/><category term='मोब्बत'/><category term='कायपद्‌दा'/><category term='जीनातमान'/><category term='बन्टू'/><category term='ज्याउल'/><category term='नैनीताल'/><category term='पीरूमदारा'/><category term='पिक्चर'/><category term='नागड़ादन्गल'/><category term='सतरूघन सिन्ना'/><category term='टायर'/><category term='फ़ुच्ची कप्तान'/><category term='मेरा रामनगर'/><category term='घुच्ची'/><category term='टुन्ना झर्री'/><category term='पतंगबाज़ी'/><title type='text'>लपूझन्ना</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://lapoojhanna.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/272678107746144576/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://lapoojhanna.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>लपूझन्ना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06722723246925370677</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>32</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-272678107746144576.post-3448135426057376056</id><published>2010-11-26T17:53:00.001+05:30</published><updated>2010-11-26T18:25:09.798+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='धलमेन्दल'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बमफटाका मालासिन्ना'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लफ़त्तू'/><title type='text'>दैने बाले सिरी भगवान और इन्तलनेछनल फकील</title><content type='html'>हफ़्ते के एक नियत दिन खताड़ी और उसके आसपास के मोहल्लों में भीख मांगने आने वाला एक बूढ़ा इतनी ज़्यादा दफ़े अपनी बेहद सड़ियल और भर्राई हुई आवाज़ में दैने बाले सिरी भगवान ... दैने बाले सिरी भगवान कहते हुए भीषण बोर किया करता था कि उसके सिरी भगवान का जाप सुनते ही लोग आटा-चावल इत्यादि के कटोरे लेकर अपने घरों से बाहर निकल आते ताकि बूढ़ा जल्दी दफ़ा हो और कानों की खाल न उतार पाए. बूढ़ा लोगों की दयालुता को स्वीकारने और किसी प्रकार का आशीर्वचन इत्यादि देने में विश्वास नहीं करता था. वह उसी असंपृक्त शैली में दैने बाले सिरी भगवान ... दैने बाले सिरी भगवान का जाप करता हुआ आगे बढ़ता जाता और लोग बूढ़े को जल्दी मर जाने का मूक आशीर्वचन देते हुए अपने किवाड़ बन्द कर लिया करते. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लफ़त्तू को यह बूढ़ा कुछ ज़्यादा ही पसन्द था और वह उसके खताड़ी पार करते ही भाग कर उसके पास जाता और उस से ठिठोली किया करता. "चल्लिया क्यून कबल कलने?" बूढ़ा एकाध बार तो उसकी बात सुनता पर उसके बाद उसका पारा चढ़ता और वह ज़मीन पर पड़े किसी ढेले से लफ़त्तू की मुण्डी को निशाना बनाने की असफल कोशिश करता. तब तक "बीयो ओ ओ ओ ...ई" कहता लफ़त्तू सेफ़्टी ज़ोन में प्रवेश कर चुकता. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन जाड़ों में हिमालय में धरमेन्दर और बमफटाका मालासिन्ना की पिक्चर आंखें लगी. एक बार पुनः लालसिंह की अद्भुत सोशियल नैटवर्किंग के चलते हमें बाकायदे हॉल के भीतर स्क्रीन से आंखें सटाकर देखने का फोकट सुअवसर प्राप्त हुआ. गेटकीपर लालसिंह का जाननेवाला था और बड़ा लौंडियाबाज़. यह दूसरी सूचना हमें लालसिंह और केवल लालसिंह ने दी थी. हमें लालसिंह के साथ पिक्चर हॉल के गेट पर खड़ा देख बौना तनिक बौखलाया क्योंकि उसके बिज़नेस पर छोटा सा खतरा भिन्नौटायमान होने को था लेकिन जब लफ़त्तू ने बौने को जल्दी-जल्दी तीन पत्तल बनाने का ऑर्डर दिया तो बौने के आत्मविश्वास में ज़रा बढ़ोत्तरी हुई. अभी लीजिये बाबूजी कहकर वह अपने महानकलाकर्म में सन्नद्ध होने को ही था कि फ़ुच्ची कप्तान से भी ज़्यादा कलूटा एक भुसकैट टाइप का लौंडा लालसिंह के पास आया और उन्होंने आपस में बेहद भद्दी भद्दी गालियों का आदान प्रदान करते हुए अपनी अंतरंग मित्रता के ऐफ़ीडैविट को सार्वजनिक किया. कलूटे ने बौने की पीठ पर हल्की धौल सी जमाते हुए उसे भी एक भद्दी गाली दी और एक बेपरवाह नज़र हम दो पिद्दियों पर डालकर लालसिंह और हमसे अपने पीछे आने को कहा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कलूटा हमें एक गुप्त द्वार से भीतर ले गया और थर्ड क्लास की सबसे आगे वाली पांत में हमें बिठाकर नड़ी हो गया. बिना टिकट पिक्चर देखने का आनन्द द्विगुणित हो गया जब हमें इन्टरवल में कोकोला और मूमफली का फोकट भोग लगाने को मिला. कुल मिलाकर पिक्चर अब तक बढ़िया चल रही थी. बमफटाका मालासिन्ना के आते ही लफ़त्तू मेरा हाथ कस कर थाम लेता और कुछ अंडबंड फुसफुसाने लगता. धरमेन्दर हमेशा की तरह उतना ही हॉकलेट था जैसा उसे होने का श्राप मिला हुआ लगता था. लेकिन जब जब कॉमेडी के दृश्य आते हम पर मस्ती छा जाती - पिक्चर में मैमूद भी था और मदनपुरी भी और आंएयांयांहांहांयांयां करते रहने से रोगग्रस्त काइंयां जीवन भी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लुफ़्त का क्लाइमेक्स तब आया जब मैमूद और बमफटाका हाथगाड़ी में टेपरिकॉर्डर जैसा एक बचकाना सा वैज्ञानिक उपकरण ले कर भीख मांगने का नाटक करते हुए दे दाता के नाम तुझको अल्ला रक्खे गाने लगे. पहले स्टैन्ज़ा के ख़त्म हो चुकने पर लफ़त्तू की समझ में धुन बैठ गई और उसने अगले स्टैन्ज़े के चालू होते ही अपनी सीट से खड़े होकर बाकायदा कूल्हे मटकाने का कार्यक्रम शुरू कर दिया. पीछे की सीटों से "ओए बैठ जा बे लौंडे!" का उच्चार विभिन्न शैलियों-गालियों में होने लगा. लालसिंह ने डपटकर लफ़त्तू को सीट पर बिठाया पर अब पिक्चर में मन किसका लगना था. उसने मुझे चिकोटियां काटते हुए बेफ़ालतू हंसना जारी रखा. जैसे तैसे पिक्चर निबटी. लालसिंह ने हमसे जल्दी-जल्दी निकल लेने को कहा ताकि कोई परिचित हमें वहां देख घरों पर चुगली न कर बैठे. वह स्वयं कलूटे से एक दफ़ा मिलकर उसका आभार व्यक्त करने की मंशा रखता था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिमालय से बाहर निकलकर हम सीधे घर न जाकर बम्बाघेर की राह लग लिये. मेरे पूछने पर लफ़त्तू ने बस आंख भर मारी और दे दाता के नाम का जाप करना जारी रखा. दस मिनट में हम जगुवा पौंक के घर के बाहर थे. निर्धन जगुवा हमसे इस मायने में अमीर था कि उसके पास बैरिंगगाड़ी थी. ऐसी गाड़ी मेरे पास अल्मोड़े में थी पर रामनगर में हमारी मित्रमंडली में ऐसी गाड़ी सिर्फ़ जगुवा के पास थी. लफ़त्तू इस गाड़ी को जगुवा से कुछ दिन उधार मांगने की नीयत से आया था. जगुवा ने अहसान मानते हुए बहुत खुशी खुशी यह सत्कर्म किया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगले कई दिन हमारी शामें इस बैरिंगगाड़ी की सवारी करने में बीतती थी. घासमंडी के आगे अस्पताल की थोड़ी सी चढ़ाई थी. हम लकड़ी के फट्टों और ट्रकों के बैरिंगों से बनी इस गाड़ी को साइड में दबाकर अस्पताल तक ले जाते और वहां से उसकी सवारी करते तेज़फ़्तार से सीधा घासमंडी के मुहाने पहुंच जाया करते. बंटू इसे बहुत छोटा काम मानता था और हमें बैरिंगगाड़ी थामे देखते ही अपने घर में घुस जाता. उसे डर लगता था कि कुछ आंयबांय कहकर लफ़त्तू उसकी बेज्जती खराब कर देगा. हां इस कार्यक्रम में हमारे साथ बागड़बिल्ला, गोलू और यदा कदा मौका निकालकर आया फुच्ची भी शामिल हो जाया करते. एकाध बार जगुवा निर्देशक की हैसियत से हमें बैरिंगगाड़ी की तकनीकी जटिलताएं सिखा गया था कि कैसे ज़्यादा स्पीड में गाड़ी के आते ही फट्टों से बने प्लेटफ़ॉर्म के आगे लगे एक छेद से छोटी से लकड़ी को सड़क पर छुआ देने से रफ़्तार कम की जा सकती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बार मैं गाड़ी थामे अस्पताल की चढ़ाई चढ़ रहा था और लफ़त्तू घासमंडी पर अभी अभी मौज काट कर मेरा इन्तज़ार कर रहा था. उसे कुछ आइडिया सूझा और उसने भागकर मेरे पीछे आकर कहा "नीचे लक दे गाली" मेरे कुछ समझने से पहले उसने मेरे हाथ से छीन कर गाड़ी ज़मीन पर रखी और मुझे उस पर बैठ जाने का आदेश दिया. मैं कुछ सकुचाता सा उस पर बैठा ही था कि उसने मुझे बमय गाड़ी के आगे को ठेलना शुरू किया. उस पर मैमूद वाली मौज छा गई और उसने मुझे धकेलने के साथ साथ कहना शुरू किया "दे दे, दे दे भगबान के नाम पे दे दे. इन्तलनेछनल फकील आए एं ... तुदको लक्के लाम तुदको अल्ल लक्के ... अल्ला लक्के ... अल्ला लक्के ..." आसपास चल रहे लोगों में से कुछ ने अजीब सी दिलचस्पी से हमारी तरफ़ निगाहें डालीं और कुछ ने "हरामी लौण्डे" कहकर लफ़त्तू का उत्साहवर्धन और मेरा अपमानीकरण किया. जिस गति से मुझे ठेला जा रहा उससे जाहिर था कि मुदित लफ़त्तू नाच रहा था. कुछेक आवारा बच्चे हमारे टोले में शामिल हो गए. अचानक सामने से लफ़त्तू के बड़े भाई के आते ही हमारा कार्यक्रम समाप्त हो गया. कार्यक्रम का अन्त वैसा ही हुआ जैसा पहले होता आया था - लफ़त्तू की ठुकाई, मुझे उसके साथ न रहने की मनहूस सलाह और बैरिंगगाड़ी को उसके मालिक के पास तुरन्त पहुंचाने का फ़रमान.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लुटे-पिटे से हम बैरिंगगाड़ी को थामे भवानीगंज पहुंचे ही थे कि बाजार वाली एक गली से दैने बाले सिरी भगवान कहता हुआ लुच्चे भिखारी नमूदार हुआ. लफ़त्तू को क्या सूझी उसने अपनी जेब से दस-बीस पैसे निकाल कर भिखारी से कहा कि वह उसे ये पैसे जभी देगा जब वह बैरिंगगाड़ी में बैठकर हमारे साथ बम्बाघेर तक चलेगा. भिखारी ने आंखें मिचमिचाकर लफ़त्तू और मुझे पहचानने का प्रयास किया और कुछ देर सोचने के बाद पैसे थाम कर अपनी पोटली समेत गाड़ी में बैठ गया. लफ़त्तू ने भिखारी को ठेलने का प्रयास किया पर बह खासा भारी था सो मुझे भी लगना पड़ा. लफ़त्तू ने उसे सलाहें देना शुरू किया "कित्ते दिन येई कैता रएगा ... तू बोल भौत कलता ए ... ऐता कल मैं तुदे एक नया गाना छुनाता ऊं ... इतको याद कल्लेगा तो भौत पैते मिलेंगे ..." एकदम से अभी अभी हुई सुताई भूलकर उसने ज़ोर ज़ोर से मैमूद-प्रोग्राम स्टार्ट किया  "दे दे, दे दे भगबान के नाम पे दे दे. इन्तलनेछनल फकील आए एं ... तुदको लक्के लाम तुदको अल्ल लक्के ... अल्ला लक्के ... अल्ला लक्के ..." भवानीगंज के सारे भड़ई दुकानों से बाहर आकर इस दृश्य को देख कर ठठाकर हंस रहे थे. इस से लफ़त्तू और उत्साहित हुआ और उसकी आवाज़ में और जोश भर गया. अतीक भड़ई हमें पहचान गया और बोला "हरामियो काए तंग कर रए हो बुड्ढे को." लफ़त्तू ने आंख मार कर उस के बड़े होने से डरे बिना कहा "बिदनेत ए थबका अपना अपना बेते ..." &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भिखारी सम्भवतः काफ़ी थक और चट चुका था और एक जगह ज़रा सी चढ़ाई आने पर बैरिंगगाड़ी के ठहरते ही अपनी पोटली समेत भाग खड़ा हुआ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम जगुवा की गाड़ी लौटा कर वापस घर लौट रहे थे. रास्ते में अतीक भड़ई ने हमें एक मोटी गाली देते हुए चेताया कि वह दुर्गादत्त मास्साब से हमारी शिकायत करेगा कि हम कैसे एक बूढ़े भिखारी को परेशान कर रहे थे. लफ़त्तू ने निर्विकार भाव से जवाब दिया "अपना अपना बिदनेत ए बेते ..."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाथ आए किसी खज़ाने को मजबूरी में वापस लौटा आने का शोक हमारे बीच पसरा हुआ था. अचानक लफ़त्तू बोला "बेते मौद आई?" "हां यार आई लेकिन तेरा भइया बहुत हरामी है." &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"हलामी है थाला मगल गब्बल छे जादा नईं" कहकर उसने जेब से पांच का मुड़ातुड़ा नोट निकाल कर दिखाया. कई दिनों बाद इतनी बड़ी रकम देखी थी तो मुझे गश जैसा आया. "क्या बेचा तूने?" मैंने जानबूझकर बेपरवाह बनने का ड्रामा करते हुए उस से पूछा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;(जल्दी ही आगे की कहानी पेश करता हूं साहेबान. कुछ घरेलू विवशताओं ने हाथ थामा हुआ है. धैर्य धरने के लिए धन्यवाद.)&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/272678107746144576-3448135426057376056?l=lapoojhanna.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://lapoojhanna.blogspot.com/feeds/3448135426057376056/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=272678107746144576&amp;postID=3448135426057376056' title='23 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/272678107746144576/posts/default/3448135426057376056'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/272678107746144576/posts/default/3448135426057376056'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://lapoojhanna.blogspot.com/2010/11/blog-post.html' title='दैने बाले सिरी भगवान और इन्तलनेछनल फकील'/><author><name>लपूझन्ना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06722723246925370677</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>23</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-272678107746144576.post-4145955462679314674</id><published>2010-04-29T14:20:00.001+05:30</published><updated>2010-04-29T14:24:12.427+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मुगल ए आज़म'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बन्टू'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नेरूजी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नागड़ादन्गल'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बैदजी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सतरूघन सिन्ना'/><title type='text'>नागड़ादन्गल और दली को आग कैते ऐं</title><content type='html'>सियाबर बैद जी के रेज़ीडेन्स-कम-औषधालय का बरामदा शामों को मोहल्ले के बड़े लोगों के बीड़ी फूंकने और गपबाज़ी का सबसे प्रिय स्थान था. इस स्थान हमारा वास्ता बस तभी पड़ता था जब कभी कभार क्रिकेट की गेंद के वहां चली जाया करती. बैद जी को देखकर लगता था कि वे पैदा भी गांधी टोपी पहन कर हुए होंगे. बड़ों की गप्पों को सुनते हुए यह पता चलता था कि आज़ादी से कुछ साल पहले बैदजी अंग्रेज़ों से लड़ते हुए एक बार एक दिन को जेल हो आए थे. इस बात से रामनगर भर में बैदजी का में बड़ा रसूख था और आज़ादी के बाद से लगातार हर स्वतन्त्रता दिवस पर उन्हें किसी न किसी स्कूल में मुख्य अतिथि बनाए जाने का रिवाज़ चल चुका था. इतने सारे सालों तक स्वतन्त्रता दिवसों को स्कूलों में मुख्य अतिथि बनने रहने  के बावजूद उनके मुख्य अतिथि बनने के उत्साह में कोई कमी नहीं आई थी. रामनगर में पिछले कोई तीस सालों के दौरान पढ़ाई कर चुके हर किसी शख़्स को उनका भाषण करीब करीब याद हो चुका था. पिछले साल इस अवसर पर हमारे स्कूल में उनके आते ही समूचे स्टाफ़ और सीनियर बच्चों में ख़ौफ़नाक चुप्पी छा गई. प्याली मात्तर के जुड़वां भाई जैसे दिखाई देने वाले बैदजी की ज़बान भी ज़रा सा लगती थी. उन्होंने हमारा ऐसीतैसीकरण कार्यक्रम चालू करते हुए बड़ी देर तक प्याले बच्चो, आदरणीए गुरुजन वगैरह किया और हमें बताया था कि उस दिन स्वतन्त्रता दिवस था और हम उसे मना रहे थे. "ऐते बोल्लिया जैते आप छमल्लें हम कोई दंगलात से आए हैं. थब को पता ए बेते आद के दिन गांदी बुड्डा पैदा हुआ था. ..." फुसफुस ज़ुबान में लफ़त्तू सतत बोले चला जा रहा था. जब मैंने उससे कहा कि गांधी बुड्ढा दो अक्टूबर को पैदा हुआ था तो उसने मुझे डिसमिस करते हुए आधिकारिक लहज़े में वक्तव्य जारी किया : "एकी बात ऐ बेते."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अचानक बैदजी एकताल से द्रुत ताल पर आ गए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"बली बली योजनाएं बन रई ऐं बच्चो देश के बिकास के लिए ... हमाले पैले पलधानमन्त्री नेरू जी ने दिश के बिकास के लिए बली बली योजनाएं बनाईं ... बली बली मशीनें बिदेस से मंगवाईं ... रेलगाड़ियां और मोटरें मंगवाईं ... पानी के औल हवा के जआज मंगवाए ... तब जा के हमाला बिकास हो रा ए ..." अचानक मैंने सीनियर लौंडसमुदाय के भीतर हो रही गतिविधि पर गौर किया. ऐसा लग रहा था कि वे बैदजी के मुंह से पिछले किसी स्वतन्त्रता दिवस के दौरान सुनी हुई किसी मनोरंजक बात के बोले जाने का बेसब्री से इन्तज़ार कर रहे थे. उनके मुखमण्डल बतला रहे थे कि उन पर हंसी का दौरा पड़ा ही चाहता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"नेरू जी ने रामनगर में कोसी नदी पर डाम बनाया ... और ऐसे ई कितने ई सारे डाम बनाए ... यहां से बहुत दूर एक जगे पर उन्ने नागड़ा दन्गल जैसा डाम बनाया ... नागड़ा दन्गल जैसा डाम हमारे देश में ई नईं साली दुनिया में नईं ऐ ..." उनके आख़िरी वाक्य को दबी हुई आवाज़ों में एक साथ कई सारे सीनियर लौंडों ने बाकायदा रिपीट किया और हंसी के दौरे चालू हो गए. मुझे लग रहा था कि अब सामूहिक सुताई अनुष्ठान प्रारम्भ होगा लेकिन मुर्गादत्त मास्टर और प्रिंसिपल साहब के अलावे कई सारे मास्टरों के चेहरों पर भी मुस्कराहट थी. इन अध्यापकों ने सम्भवतः यह भाषण इतनी दफ़ा सुन लिया था कि उनकी बला से बच्चे हंसें या जो चाहे करें. बैदजी अपमान की सारी सीमाओं को पार कर चुके थे और नागड़ा दन्गल  जैसे कई दन्गल जीत चुकने के बाद शायद गामा पहलवान से भी नहीं डरते थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बैदजी का भाषण अभी और चला. दुर्गादत्त मास्साब ने बेशर्मी की हद पार करते हुए कर्नल रंजीत निकाल लिया था और असहाय प्रिंसिपल साहब अपने रिश्ते के मामू की स्थूल तौंद को उठता-गिरता देखने के अतिरिक्त कुछ भी कर पाने से लाचार थे. मौका ताड़कर बेख़ौफ़ लफ़त्तू बैठे बैठे ही घिसटता हुआ ऑडिटोरियम से बाहर निकल चुका था और सम्भवतः अपने प्रिय डेस्टीनेशन तक पहुंच चुका था. बैदजी के बैठ जाने के बाद मुर्गादत्त मास्टर ने हारमोनियम पर अपने घिसे पिटे दोनों गाने बजाए और हमने भी मजबूरी में उनका यथासम्भव बेसुरा साथ दिया. बांसी कागज़ की तेल से लिथड़ी थैलियों में बूंदी के दो-दो लड्डू थमाकर मिष्ठान्न वितरण हुआ और हम अपने घरों की तरफ़ निकल पड़े. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लफ़त्तू रास्ते में ही टकरा गया. उसकी बहती नाक और मिट्टीसनी कमीज़ बता रहे थे कि वह बमपकौड़े का भरपूर लुत्फ़ उठाने के साथ साथ इधर हिमालय टाकीज़ में लगी फ़िल्म विश्वनाथ का अपना फ़ेवरिट सीन देखकर आ रहा था क्योंकि मुझे देखते ही उसने सतरूघन सिन्ना का परम लफ़ाड़ी पोज़ धारण कर लिया और एक हाथ से अपने बालों को तनिक सहलाते हुए सीरियस आवाज़ में कहा: "दली को आग कैते ऐं औल बेते बुदी को लाक ... और उछ आग से निकले बारूद को विछ्छनात कैते हैं" सतरूघन सिन्ना से वह उन दिनों इस कदर इम्प्रैस्ड था कि ज़ेब में हमेशा एक काली स्कैच पैन रखा करता और मौका मिलते ही अपने होंठों पर उसी की शैली की मूंछें बना लेता. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नज़दीक आकर उसने मेरी पीठ पर धौल जमाई और मज़े लेते हुए पूछा: "बन गया बेते थब का नागलादन्गल. तूतिया ऐं थब छाले." फिर उसने ज़मीन पर गिरा एक कागज़ का टुकड़ा उठाया और उसे मोड़कर अपने सिर पर गांधीटोपी की तरह पहन लिया और बैदजी जैसा मनहूस चेहरा बनाते हुए भाषण देना चालू किया: "बली बली योदनाएं बन लई ऐं ... बले आए नेलू जी ... बले बले दाम बन लए ऐं ... तूतिया थाले नेलू जी ... जाज खलीद लए ऐं ... कूला खलीद लए ऐं ... मेले कद्दू में गए छाले बैदजी और नेलू जी ... तल तैलने तलते ऐं याल" उसके चेहरे पर परम हरामियत का भाव आ चुका था और चाल में दान्त तत वाली ठुमक. एक तो बैदजी के भाषण से मैं चटा हुआ था दूसरे बहुत ज़ोरों की भूख लगी हुई थी सो मैंने उसके साथ नहर जाने के उसके प्रस्ताव पर ज़्यादा तवज्जो नहीं दी और अनमना सा होकर घर के भीतर घुसा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लड्डू वाली थैली मेरी जेब में किसी मरे मेंढक का सा आभास दे रही थी. ऐसे मरे हुए दो-तीन और मेढक घर पर और धरे हुए थे जिन्हें मेरी बहनें अपने अपने स्कूलों से लाई थीं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बन्टू के दादाजी के मर जाने की वजह से उसके मम्मी पापा अपने गांव गए हुए थे. इन दिनों बन्टू और उसकी बहन हमारे ही घर खाना खाने आया करते और दोपहरों को मेरा ज़्यादातर समय बन्टू लोगों के घर रामनगर के हिसाब से काफ़ी आलीशान उनके ड्राइंगरूम में सजी वस्तुओं को देखने और बन्टू की ढेर सारी मिन्न्तें करने के बाद रिकार्ड प्लेयर पर मुग़ल ए आज़म के डायलाग सुनने में बीतने लगा था. रिकार्ड के शुरू होते ही "मैं हिन्दोस्तान हूं ..." वाली कमेन्ट्री चालू हो जाती और मेरा मन उर्दू की मीठी मीठी आवाज़ों में हलकोरें खाने लगता. कभी कभार मैं उसके पापा के पुस्तक संग्रह पर निगाह मारा करता. इन किताबों के कवर दुर्गादत्त मास्साब की किताबों जैसे ही बल्कि उनसे भी ज़्यादा खतरनाक हुआ करते थे. इन आवरणों को सुशोभित करती नारियों के बदन पर और भी कम कपड़े होते थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बाबत जब मैंने लफ़त्तू से उसकी राय पूछी तो उसने फिर वही डिसमिस करने वाली टोन में कहा: "सई आदमी नईं ऐं बन्तू के पापा. आप छमल्लें काला तत्मा पैनने वाला आदमी कबी सई नईं हो सकता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;(जारी)&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/272678107746144576-4145955462679314674?l=lapoojhanna.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://lapoojhanna.blogspot.com/feeds/4145955462679314674/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=272678107746144576&amp;postID=4145955462679314674' title='18 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/272678107746144576/posts/default/4145955462679314674'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/272678107746144576/posts/default/4145955462679314674'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://lapoojhanna.blogspot.com/2010/04/blog-post_29.html' title='नागड़ादन्गल और दली को आग कैते ऐं'/><author><name>लपूझन्ना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06722723246925370677</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>18</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-272678107746144576.post-7119389372711787764</id><published>2010-04-15T14:36:00.001+05:30</published><updated>2010-04-15T14:39:42.495+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लफ़त्तू'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इस्कूल'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बागड़बिल्ला'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='घुच्ची'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अफ़वाह'/><title type='text'>गब्बल थे बी खतलनाक इन्छान कताई मात्तर</title><content type='html'>लफ़त्तू की हालत देख कर मेरा मन स्कूल में कतई नहीं लगा. उल्टे दुर्गादत्त मास्साब की क्लास में अरेन्जमेन्ट में कसाई मास्टर की ड्यूटी लग गई. प्याली मात्तर ने इन दिनों अरेन्जमेन्ट में आना बन्द कर दिया था और हमारी हर हर गंगे हुए ख़ासा अर्सा बीत चुका था. कसाई मास्टर एक्सक्लूसिवली सीनियर बच्चों को पढ़ाया करता था, लेकिन उसके कसाईपने के तमाम क़िस्से समूचे स्कूल में जाहिर थे. कसाई मास्टर रामनगर के नज़दीक एक गांव सेमलखलिया में रहता था. अक्सर दुर्गादत्त मास्साब से दसेक सेकेन्ड पहले स्कूल के गेट से असेम्बली में बेख़ौफ़ घुसते उसे देखते ही न जाने क्यों लगता था कि बाहर बरसात हो रही है. उसकी सरसों के रंग की पतलून के पांयचे अक्सर मुड़े हुए होते थे और कमीज़ बाहर निकली होती. जूता पहने हमने उसे कभी भी नहीं देखा. वह अक्सर हवाई चप्पल पहना करता था. हां जाड़ों में इन चप्पलों का स्थान प्लास्टिक के बेडौल से दिखने वाले सैन्डिल ले लिया करते.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कसाई मास्टर की कदकाठी किसी पहलवान सरीखी थी और दसवीं बारहवीं तक में पढ़ने वाले बच्चों में उसका ख़ौफ़ था. थोरी बुड्ढे और मुर्गादत्त मास्टर के धुनाई-कार्यक्रम कसाई मास्टर के विख्यात किस्सों के सामने बच्चों के खेल लगा करते. बताया जाता था कि कसाई मास्टर की पुलिस और सरकारी महकमों में अच्छी पहचान थी और उसके ख़िलाफ़ कुछ भी कह पाने की हिम्मत किसी की नहीं हुआ करती थी. लफ़त्तू के असाधारण सामान्यज्ञान की मार्फ़त मुझे मालूम था कि अगर कभी भी कसाई मास्टर का अरेन्जमेन्ट में हमारी क्लास में आना होगा तो हमें बेहद सतर्क रहना होगा क्योंकि कसाई मास्टर का दिमाग चाचा चौधरी की टेक पर कम्प्यूटर से भी तेज़ चला करता था. यह अलग बात है कि कम्प्यूटर तब केवल शब्द भर हुआ करता था - एक असम्भव अकल्पनीव शब्द जिसके ओरछोर का सम्भवतः भगवान को भी कोई आइडिया नहीं था. लफ़त्तू के कहने का मतलब होता था कि कसाई मास्टर को स्कूल भर में पढ़ने वाले हर बच्चे के विस्तृत बायोडाटा ज़बानी याद थे. "बला खतलनाक इन्छान है कताई मात्तर बेते! बला खतलनाक! गब्बल थे बी खतलनाक!"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो गब्बरसिंह से भी खतरनाक इस कसाई मास्टर की क्लास में एन्ट्री कोई ड्रामाई नहीं हुई. कसाई ने खड़े खड़े ही बहुत आराम से ख़ुद ही अटैन्डैन्स ली और जब "प्यारे बच्चो!" कहकर कुर्सी पर अपना स्थान ग्रहण किया, मुझे लफ़त्तू की बातों पर से अपना विश्वास एकबारगी ढहता सा महसूस हुआ. कसाईमुख को थोड़ा गौर से देखने पर पता चलता था कि उसकी दाईं  आंख बागड़बिल्ले की भांति एलएलटीटी यानी लुकिंग लन्डन टॉकिंग टोक्यो यानी ढैणी थी. बाईं भौंह के बीचोबीच चोट का पुराना निशान उस मुखमण्डल को ख़ासा ख़ौफ़नाक बनाता था. सतरुघन सिन्ना टाइप की मूंछें धारण किये, ऐसा लगता था, मानो कसाई अपने आप को जायदै ही इस्माट समझने के कुटैव से पीड़ित था. कसाई के अधपके बाल प्रचुर मात्रा में तेललीपीकरण के बावजूद किसी सूअर के बालों की तरह कड़े और सीधे थे. उन दिनों पराग पत्रिका में एक उपन्यास धारावाहिक छप कर आ रहा था. उपन्यास का नायक भारत की राष्ट्रीय पोशाक यानी पट्टे के घुटन्ने के अतिरिक्त किसी भी तरह के मेक अप में विश्वास नहीं रखता था. कसाई के अटैन्डेन्स लेते लेते छिप कर देखते हुए एकाध मिनट से भी कम समय में मुझे यकीन हो गया कि उक्त उपन्यास के लेखक ने कसाई मास्टर के चेहरे का विषद अध्ययन करने के बाद ही उपन्यास के नायक का वैसा हुलिया खींचा होगा. मुझे यह कल्पना करना मनोरंजक लगा कि कसाई मास्टर केवल घुटन्ना पहने कैसा नज़र आएगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अटैन्डेन्स हो चुकी थी और "प्यारे बच्चो!" कहते हुए कुर्सी में बैठते ही कसाई मास्टर किसी ख्याल में संजीदगी से तल्लीन हो गया. क्लास के बाकी बच्चों की तरह मैं भी अगले दो पीरियड के दौरान किसी भी स्तर के कैसे भी हादसे का सामना करने को तैयार था. अचानक कुर्सी से एक अधसोई सी आवाज़ निकली: "पत्तल में खिचड़ी कितने बच्चों ने खाई है?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ समय से क्लास में बस कभी कभी ही आने वाले लालसिंह के सिवाय किसी भी बच्चे का हाथ नहीं उठा. लालसिंह के उठे हुए हाथ को ख़ास तवज्जो न देते हुए कसाई मास्टर ने कहा - "यहां से कुछ दूरी पर कालागढ़ का डाम हैगा. मैं सोच रहा हूं कि तुम सारे बच्चों को किसी इतवार को म्हां पे पिकनिक पे ले जाऊं. आशीष बेटे, ह्यां कू अईयो जरा!" आशीष क्लास में नया नया आया था और वह भी अपने आप को जायदै ही इस्माट समझने के कुटैव से पीड़ित था. उसका बाप रामनगर का एसडीएम टाइप का बड़ा अफ़सर था और यह तथ्य उसकी हर चालढाल में ठसका ठूंसने का वाज़िब और निहायत घृणास्पद कारण था. कि कसाई मास्टर आशीष को नाम से जानता है, हमारे लिए क्षणिक अचरज का विषय बना. आशीष कसाई मास्टर की बगल में खड़ा था. मास्टर का अभिभावकसुलभ प्रेम से भरपूर हाथ उसकी पीठ फेर रहा था. "आशीष के पिताजी रामनगर के सबसे बड़े अफ़सर हैंगे. कल मुझे इनके घर खाने पर बुलवाया गया था. व्हईं मुझे जे बात सूझी की आशीष की क्लास के सारे बच्चों को कालागढ़ डाम पे पिकनिक के बास्ते ले जाया जाबै. और साहब ने सरकारी मदद का मुझे कल ही वादा भी कर दिया है. तो बच्चो अपने अपने घर पे बतला दीजो कि आने बालै किसी भी इतवार को पिकनिक का आयोजन किया जावैगा. पिकनिक में देसी घी की खिचड़ी बनाई जाएगी और उसे पत्तलों में रखकर सारे बच्चे खावेंगे. खिचड़ी खाने का असल आनन्द पत्तल में है. ..."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खिचड़ी, पत्तल, देसी घी, कालागढ़, डाम, साहब, आशीष, पिकनिक इत्यादि शब्द पूरे पीरियड भर बोले गए और कसाई मास्टर का हाथ लगातार आशीष की पीठ को सहलाता रहा. घन्टी बजने ही वाली थी जब "ऐ लौंडे, तू बो पीछे वाले, ह्यां आइयो तनी!"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पैदाइशी बौड़म नज़र आने वाले इस लड़के का नाम ज़्यादातर बच्चे नहीं जानते थे. उसकी पहचान यह थी कि उसके एक हाथ में छः उंगलियां थीं. कसाई मास्टर की टोन से समझ में आया कि पैदाइशी बौड़म को कुछ खुराफ़ात करते हुए देख लिया गया था. वह मास्टर की मेज़ तक पहुंचा, कसाई ने एक बार उसे ऊपर से नीचे तक देखा. "जरा बाहर देख के अईयो धूप लिकल्लई कि ना." क्लास का दरवाज़ा खुला था और अच्छी खासी धूप भीतर बिखरी पड़ी थी. पैदाइशी बौड़म की समझ में ज्यादा कुछ आया नहीं लेकिन डर के मारे कांपते हुए कक्षा के बाहर जाकर आसमान की तरफ़ निगाह मारने अलावा उसके पास कोई चारा नहीं था. वापस लौटकर उसने हकलाते हुए कहा "न्न्निकल रही मास्साब..." &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"तो जे बता कि धूप कां से लिकला करे?" पैदाइशी बौड़म ने फिर से हकलाते हुए कहा "स्स्सूरज से मास्साब ..."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"जे बता रात में क्या निकला करे?" पैदाइशी बौड़म के उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना कसाई ने कहा: "रात में लिकला करै चांद. और चांद की वजै से रात में तारे भी लिकला करै हैं. तारे वैसे तो दिन में भी लिकला करै हैं पर सूरज की वजै से दिखाई ना देते."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पैदाइशी बौड़म के कन्धे पर हाथ रखकर क्रूर आवाज़ में कसाई मास्टर बोला: "इस बच्चे को दिन में तारे देखने का जादै सौक हैगा सायद जभी तो खीसें निपोर रिया था." इतना कहते कहते उसने अपनी कमीज़ की जेब से एक नई पेन्सिल निकाली और पैदाइशी बौड़म के छः उंगली वाले हाथ को ज़ोर से अपनी मेज़ पर रख दिया. किसी कुशल कारीगर की भांति उसने पैदाइशी बौड़म की उंगलियों के बीच एक ख़ास स्टाइल में पेन्सिल फ़िट की और अगले ही क्षण अपने दूसरे हाथ से पैदाइशी बौड़म के हाथ को इतनी ज़ोर से दबाया कि उसकी आंखें बाहर आने आने को हो गईं. उसकी बाहर निकलने को तैयार आंखों के कोरों से आंसू की मोटी धार बहना शुरू हो गई थी. करीब आधा मिनट चले इस जघन्य पिशाचकर्म को भाग्यवश पीरियड की घन्टी बजने से विराम मिला. मास्साब ने पेन्सिल वापस अपनी जेब में सम्हाली और वापस लौटते पैदाइशी बौड़म की पिछाड़ी पर एक भरपूर लात मारते हुए हमें चेताया: "सूअर के बच्चो! मास्साब की बात में धियान ना लगाया और जादै नक्सा दिखाया तो एक एक को नंगा कर के लटका दूंगा."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पैदाइशी बौड़म के प्रति किसी प्रकार की सहानुभूति व्यक्त करने का मौका नहीं मिल सका क्योंकि तिवारी मास्साब क्लास के बाहर खड़े थे. तिवारी मास्टर उर्फ़ थोरी बुड्ढे ने गुलाबी तोता बनाने में हमें पारंगत बना चुकने के बाद इधर दोएक महीनों से इस्कूल जाती लौण्डिया बनवाना चालू किया था. कन्धे पर बस्ता लगाए और दो हाथों में गुलदस्ता थामे स्कर्ट-ब्लाउज़ पहनने वाली घुंघराले बालों वाली यह बदसूरत लौण्डिया बनाना ज़्यादातर बच्चों को अच्छा लगता था. लफ़त्तू की रफ़ कॉपी इस्कूल जाती लौण्डिया के बेडौल अश्लील चित्रों से अटी पड़ी थी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी तरह स्कूल खत्म हुआ. मैं मनहूसियत और परेशानी का जीता जागता पुतला बन गया था लफ़त्तू के बिना. घर पहुंच कर बेमन से मैंने कुछ दूध नाश्ता समझा और कपड़े बदल कर नहर की तरफ़ चल दिया. मैं नहर की दिशा में मुड़ ही रहा था कि घासमण्डी के सामने की अपनी दुकान से लालसिंह ने आवाज़ लगाकर मुझे बुलाया. अभी वह स्कूल की पोशाक में ही था. उसके पापा कहीं गए हुए थे और वह लफ़त्तू को लेकर चिन्तित था. उसने मुझे लफ़त्तू का सबसे करीबी दोस्त समझा, इतनी सी बात से ही मेरी मनहूसियत कुछ कम हो आई. सही बात तो यह थी कि मुझे पता ही नहीं था कि लफ़त्तू को असल में क्या हुआ था. वह बीमार था और बहुत बीमार था. बस. मैंने लालसिंह को सुबह वाली बात बता दी कि कैसे मैंने लफ़त्तू के मम्मी-पापा को उसे मुरादाबाद वाली बस की तरफ़ ले जाते देखा था और कैसे वह कांप रहा था गर्मी के बावजूद. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लफ़त्तू के बारे में दसेक मिनट बातें करने के बाद मेरे मन से जैसे कोई बोझा उतरा. लालसिंह ने दूध-बिस्कुट सुतवाया. पेट भरा होने के बावजूद लालसिंह की दुकान का दूध बिस्कुट कभी भी पिरोया जा सकता था. दूध-बिस्कुट सूतते हुए अचानक मेरी निगाह पसू अस्पताल की तरफ़ गई. जब से गोबरडाक्टर कुच्चू गमलू नाम्नी हमारी काल्पनिक प्रेयसियों के साथ हल्द्वानी चला गया था, मेरी उस तरफ़ देखने की इच्छा तक नहीं होती थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे अनायास उस तरफ़ देखता देख लालसिंह कह उठा - "ये नया गोबरडाक्टर साला अपने बच्चों को लेकर नहीं आनेवाला है बता रहे थे. नैनीताल में पढ़ती है इसकी लौण्डिया. भौत माल है बता रहा था फ़ुच्ची ..."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ़ुच्ची! यानी फ़ुच्ची कप्तान! नैनीतालनिवासिनी कन्या के बाबत चलने ही वाली मसालापूरित बातचीत को मैंने काटते हुए लालसिंह से पूछा कि फ़ुच्ची कप्तान कहां है. "अबे कल ही वापस आया है फ़ुच्ची रामनगर. साला और काला हो गया है. ..."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ़ुच्ची के रामनगर पुनरागमन के समाचार ने मुझे काफ़ी प्रसन्न किया. फ़ुच्ची मेरे उस्ताद लफ़त्तू का भी उस्ताद था सो उसके माध्यम से लफ़त्तू के स्वास्थ्य के बारे में आधिकारिक सूचना प्राप्त कर पाने की मेरी उम्मीदों को बड़ा सहारा मिला. लालसिंह की दुकान से नहर की तरफ़ जाने के बजाय मैं अपने घर की छत पर पहुंच गया. दर असल मैं कुछ देर अकेला रहना चाहता था. बन्टू को वहां न पाकर मुझे तसल्ली हुई. अपनी छत फांदकर मैं ढाबू की छत पर मौजूद पानी की टंकी से पीठ टिकाए बैठने ही वाला था कि उधर हरिया हकले वाली छत की साइड से बागड़बिल्ला आ गया. लफ़त्तू और फ़ुच्ची जैसे घुच्ची-सुपरस्टारों की गैरमौजूदगी के कारण बागड़बिल्ला अब तकरीबन बेरोजगार हो गया था और दिन भर आवारों सूअरों की तरह यहां वहां भटका करता. नीचे सरदारनी के स्कूल में मधुबाला ट्य़ूशन पढ़ने आए बच्चों को कोई इंग्लिश पोयम रटा रही थी. कुछ देर इधर उधर की बातें करने के बाद बागड़बिल्ले ने असली बात पर आते हुए मुझसे आर्थिक सहायता का अनुरोध किया. दर असल उसे घर से अठन्नी देकर दही मंगवाया गया था. हलवाई की दुकान तक पहुंचने से पहले ही घुच्ची खेल रहे बच्चों को देख कर उससे रहा नहीं गया जहां वह पांच मिनट में सारे पैसे हार गया. बागड़बिल्ले जैसे टौंचा उस्ताद का घुच्ची में हारना आम नहीं होता था. मेरे पास पच्चीस तीस पैसे थे जो मैंने उसे अगले दिन वापस किये जाने की शर्त पर उसे दे दिये, हालांकि मैं जानता था कि बागड़बिल्ला किसी भी कीमत पर उन पैसों को वापस नहीं चुका सकेगा. वह बहुत गरीब परिवार से था और उसकी मां इंग्लिश मास्टरानी के घर बर्तन-कपड़े धोने का काम किया करती थी. जाते जाते उसने एक बात कहकर मुझे उत्फुल्लित कर दिया - "फ़ुच्ची तुझे याद कर रहा था यार!" मेरे यह पूछने पर कि फ़ुच्ची कहां मिलेगा उसने अपनी चवन्नी जैसी आधी आंख को चौथाई बनाते हुए दोनों हाथों की मध्यमा उंगलियों को मिला कर घुच्ची का सार्वभौमिक इशारा बनाते हुए कहा - "वहीं! और कहां!"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं नीचे उतर कर भागता हुआ साह जी की आटे की चक्की के आगे से होता हुआ घुच्चीस्थल पहुंचा पर खेल निबट चुका था और खिलाड़ियों के बदले वहां नाली पर पंगत बनाकर बैठे छोटे बच्चे सामूहिक निबटान में मुब्तिला थे. ये इतने छोटे थे कि उनसे अभी अभी सम्पन्न हुए खेल और उसके खिलाड़ियों के बारे में कोई जानकारी हासिल हो पाने का कोई मतलब नहीं था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घुच्चीस्थल से आगे का जुगराफ़िया मेरे लिए ज़्यादा परिचित न था सो मैं मन मारे वापस घर की तरफ़ चल दिया. बस अड्डे पर आखिरी गाड़ी आ लगी थी. और दिन होता तो लफ़त्तू और मैं डिब्बू तलाशने वहां ज़रूर जाते. माचिस के लेबेल इकठ्ठा करने के शौक को किनारे कर हमने तीन चार महीनों से डिब्बू यानी सिगरेट के खाली डिब्बे इकठठा करने का शौक पाल लिया था. डिब्बू इकठ्ठा करना माचिस के लेबेल इकठ्ठा करने की बनिस्बत ज़्यादा एडल्ट माना जाता था क्योंकि डिब्बुओं के साथ भी घुच्ची जैसा एक जुए वाला खेल खेला जा सकता था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतने में मेरी निगाह बस से बाहर उतरते मनहूस सूरत बनाए लफ़त्तू के पापा पर पड़ी. बस से बाहर उतरने वाले वे आखिरी आदमी थे. यानी लफ़त्तू और उसकी मां वहीं हैं मुरादाबाद में. मेरा अनुमान गलत भी हो सकता था क्योंकि यह सम्भव था कि वे दोनों दिन के किसी पहर वापस लौट आए हों और ... और ... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गांठ लगा वही थैला लफ़त्तू के पापा के कन्धे पर टंगा था. दिन भर की पस्ती और थकान उनके चेहरे और देह पर देखी जा सकती थी. मेरे लिए यह निर्णायक क्षण था. मैं लपकता हुआ उनके सामने पहुंचा और "नमस्ते अंकल" कह कर उनके सामने स्थिर हो गया. उन्होंने अपना धूलभरा चश्मा आंखों से उतारा और मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए मरियल आवाज़ में कहा "जीते रहो बेटे, जीते रहो."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अंकल लफ़त्तू ..."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"भर्ती करा दिया बेटा मुरादाबाद में उसको. तेरी आन्टी भी वहीं है ..."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे लफ़त्तू को अस्पताल में भर्ती कराए जाने की इमेज काफ़ी मैलोड्रैमैटिक और फ़िल्मी लगी और मुझे पिक्चरों में देखे गए सफ़ेद रंग से अटे अस्पतालों और मरीज़ों वाले सारे सीन याद आने लगे. मैं कुछ और पूछता, वे मेरे सामने से घिसटते से अपने घर की दिशा में चल दिए.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/272678107746144576-7119389372711787764?l=lapoojhanna.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://lapoojhanna.blogspot.com/feeds/7119389372711787764/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=272678107746144576&amp;postID=7119389372711787764' title='13 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/272678107746144576/posts/default/7119389372711787764'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/272678107746144576/posts/default/7119389372711787764'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://lapoojhanna.blogspot.com/2010/04/blog-post_15.html' title='गब्बल थे बी खतलनाक इन्छान कताई मात्तर'/><author><name>लपूझन्ना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06722723246925370677</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>13</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-272678107746144576.post-6996675356704200848</id><published>2010-04-08T16:06:00.001+05:30</published><updated>2010-04-08T17:09:14.826+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लफ़त्तू'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हाथीखाना'/><title type='text'>बेते हाती हाती होता ऐ औल दानवल दानवल</title><content type='html'>लफ़त्तू की सतत उदासी और उसका ज़्यादातर ख़ामोश रहना मेरी बरदाश्त से बाहर हो गया था. तैराकी की मौज के बाद हम जब भी कायपद्दा खेलने की शुरुआत करते, लफ़त्तू बिना कोई नोटिस दिए नहर से बाहर आकर पिछले रास्ते से हाथीखाने की तरफ़ निकल जाया करता. हाथीखाना मुझे बहुत आकर्षित करता था लेकिन मुझे घर से वहां तक जाने की इजाज़त नहीं थी क्योंकि हाथीखाना पाकिस्तान के पिछवाड़े में स्थित था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रोज़ सुबह हमारे स्कूल जाने से पहले एक हाथी अपने महावत के साथ घर के बाहर से गुज़रा करता. हाथी जाहिर है वैसा ही था जैसा कि हाथी होता है. रामनगर के अपने बिल्कुल शुरुआती दिनों में मेरे और मेरी बहनों के लिए वह दुनिया का सबसे बड़ा अजूबा था. एकाध किताबों में मैं उसे देख चुका था पर वह इतना बड़ा होगा, मेरी कल्पना से बाहर था. धीरे धीरे वह रोज़मर्रा की ज़िन्दगी का हिस्सा बन गया और हमें उसकी ऐसी आदत पड़ गई थी कि अपने ऐन बगल में गुज़रते हाथी को देख कर भी हम कभी कभी उसे नहीं देखते थे. हां अगर चाचा या मामा वगैरह के बच्चे किन्हीं छुट्टियों में हमारे घर आते तो हम उन्हें सबसे पहले बताते कि हमारे घर के सामने से रोज़ सुबह हाथी गुज़रता है - सच्ची मुच्ची का हाथी. ऐसा बताते हुए हमें अपार गर्व महसूस होता और काफ़ी सारा सुपीरियोरिटी कॉम्प्लेक्स भी. तब लगता था जैसे वह हमारा अपना हाथी हो.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जंगलात डिपार्टमेन्ट के इस हाथी के मुतल्लिक मेरी चन्द ऑफ़ीशियल उत्सुकताओं के बाबत मुझे लफ़त्तू कई जीकेनुमा जानकारियां मुहैय्या करवा चुका था. मसलन "हाती एक बाल में इत्ती तत्ती करता ऐ बेते कि नगलपालिका का बमपुलिछ दो बाल भल जाए" या "छुबै नाछ्ते में एक पेल खाता ऐ हाती" "हाती का द्लाइबल हाती की पीथ पल ई तोता ऐ क्यूंकि दलाइबल के बिना उतको नींद नईं आ छकती." इस लास्ट वाली सूचना को लेकर एक दफ़ा बागड़बिल्ले और लफ़त्तू के बीच एक सेमिनार कायपद्दा खेलते वक़्त आयोजित किया जा चुका था. बागड़बिल्ले का विचार था कि हाथी पहली बात तो सोते ही नहीं और अगर सोते हैं तो लेट कर और वो भी उल्टा लेट कर. ऐसे में महावत के उसकी पीठ पर सोने की बात तर्कसंगत नहीं लगती थी. बागड़बिल्ला यह भी कहा करता था कि अगर महावत का दिमाग खराब होगा तभी वह बैठ कर सोने की नौकरी करेगा. वह भी एक जानवर की पीठ पर. लफ़त्तू हारने हारने को था जब उसने अपनी प्रत्युत्पन्नता का परिचय दिया. "बेते मैं तो बैथ के बी छो छकता ऊं औल खले हो के बी." &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कायपद्दे को संक्षिप्त ब्रेक देकर उसने खड़े होकर आंखें मूंदीं और बाकायदा खर्राटे निकाले. मिनट भर यह ठेटर करने के उपरान्त वह एक पेड़ के ठूंठ पर बैठा और फिर से आंखें मूंद कर खर्राटे मारने लगा. जब तक बागड़बिल्ला कुछ तर्क सोच पाता लफ़त्तू चिल्लाकर आंख मारता हुआ बोला "औल बेते हाती हाती होता ऐ औल दानवल दानवल ... बी यो ओ ओ ओ ई ..." &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लफ़त्तू के उदासीन हो जाने से बन्टू भीतर ही भीतर ज़्यादा प्रसन्न और सन्तुष्ट लगने लगा था. चूंकि मेरे पास लफ़त्तूसान्निध्यरहित समय कुछ ज़्यादा रहने लगा था, बन्टू मेरे जीवन में चरस बोने का काम ज़्यादा सिन्सियरिटी के साथ करने लगा था. अपने विदेशी मामा के लाए पुराने सामान में से उसने एक टूटा हुआ विदेशी परकार मुझे बतौर उपहार दिया. इस टूटे परकार में पेन्सिल फंसाने वाले हिस्से की कील टूट गई थी और किसी भी जुगाड़ टैक्नीक के प्रयोग से उसकी मदद से किसी भी तरह का गोला नहीं बनाया जा सकता था. इस टूटे परकार का यू एस पी यह था कि उसकी मूठ पर अंग्रेज़ी में साफ़ साफ़ ’मेड इन इंग्लैण्ड’ लिखा हुआ था. मेरे पर्सनल कलेक्शन में यह पहली इम्पोर्टेड चीज़ थी. तनिक झेंप और अस्थाई ग्लानि के बावजूद मुझे बन्टू का ऐसा करना अच्छा लग रहा था. मुझे पता था कि लफ़त्तू इस काम का हर हाल में सार्वजनिक विरोध करता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बन्टू के संसर्ग में अजीब हॉकलेट टाइप की चीज़ों में मन लगाना पड़ता था. इधर कुछ दिनों से मेरी पेन्सिल की मांग ज़्यादा हो गई थी और मां हर रोज़ पेन्सिल मांगने पर सवालिया निगाहों से देखा करने लगी थी. मैं उसे पिछले ही दिन ली गई तकरीबन खत्म हो चुकी पेन्सिल दिखा कर कहता कि उनको बार बार छीलना पड़ रहा है क्योंकि उनकी नोंकें छीलते ही टूट जाया कर रही हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दर असल बन्टू ने कहीं से यह वैज्ञानिक सूचना प्राप्त कर ली थी कि पेन्सिल की छीलन को दो हफ़्तों तक पानी में डुबो कर रखा जाए तो वे रबर में तब्दील हो जाती हैं. सो हम दिम भर अपनी पेन्सिलें छीलते और अपने अपने प्लास्टिक के टूटे डब्बों में छीलन को इकठ्ठा करते जाते. ये डब्बे ढाबू की छत के एक मुफ़ीद हिस्से में रखे जाते थे जहां जाकर हर शाम को अपने अपने छीलभण्डार का मुआयना किया जाता. दसेक दिन में हम दोनों के डब्बे तकरीबन भर गए.  एक दिन बाकायदा नियत किया गया और इन डिब्बों में पानी डाला गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसा तैसा खेल वगैरह चुकने के बाद घर जाते समय हम इन डब्बों को नाक तक ले जाते और गहरी सांसों से सूंघा करते. दो तीन दिन तक तो कोई खास बू नहीं आई पर उसके बाद छीलन सड़ने लगी और डब्बों से गन्दी बास सी आने लगी. "मेरे मामा का लड़का बता रहा था कि शुरू में बदबू आएगी पर पन्द्रह दिन में वह मटेरियल खुशबूदार रबड़ में तब्दील हो जाएगा."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं असमंजस में रहता कि बन्टू की बात का यक़ीन करूं या नहीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इधर लफ़त्तूने न सिर्फ़ स्कूल आना बन्द कर दिया था, वह हमारे साथ तैरने आना भी बन्द कर चुका था. यह बदलाव मेरे लिए एक बहुत बड़ी पर्सनल ट्रैजेडी था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिन तैराकी के बाद जब हम कायपद्दा खेलने को पितुवा लाटे के आम के बगीचे का रुख कर रहे थे तो मैंने लफ़त्तू को धीमी चाल से हरिया हकले की छत की तरफ़ जाते देखा. वह खासा मरियल हो गया था या लग रहा था. न उसकी चाल में वह मटक बची थी न शरारतों में उसकी कोई दिलचस्पी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अड्डू का पीछा करते दौड़ते हुए भी चोर निगाह से मैंने उसे हरिया हकले का ज़ीना चढ़ते हुए देख लिया. दसेक मिनट बाद मैंने बहाना बनाकर हरिया हकले के ज़ीने की राह ली. हरिया की छत पर पहुंचते ही मैंने जिस पहली चीज़ पर ग़ौर किया वह थी हवा में फैली टट्टी की मरियल सी गन्ध. उसके बाद मेरी निगाह लफ़त्तू पर गई जो हमारी छत पर जा चुकने के बजाय ढाबू की छत पर खड़ा बड़ी हिकारत से किसी चीज़ को ध्यान से देख रहा था. उसने मुझे देखा तो उसके चेहरे की हिकारत एक डिग्री बढ़ गई. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारी छत की तरफ़ कूदते हुए उसने मुझसे पूछा: "ये दब्बे में कुत्ते की तत्ती तूने लखी थी  लबल बनाने को?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे दबी ज़ुबान में हां कहने पर उसने ज़मीन पर थूका और कहने लगा "तूतिया थाला! मैंने का ता ना कि ये बन्तू के चक्कल में पलेगा तो तूतिया बन दाएगा"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं ढाबू की छत पर था. हमारे दोनों डिब्बों के भीतर का बदबूदार गोबर सरीखा असफल वैज्ञानिकी उत्पाद बिखरा पड़ा था और वाक़ई बहुत बास मार रहा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं जब तक कुछ कहता मुझे अपने पीछे आ चुके बन्टू की आवाज़ सुनाई दी "ये किसने किया बे?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बन्टू को सुनते ही लफ़त्तू पलटा. बन्टू बोल रहा था "आज रात की बात थी बे. मेरे मामा का लड़का बता रहा था कि कल से इसमें खुशबू आ जाती और बढ़िया रबर बन जाता." वह वहीं खड़ा हुआ था और बास के बावजूद गोबर के बगल में खड़ा बना हुआ था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विदेशी मामा के बेटे का ज़िक्र आते ही लफ़त्तू फट पड़ा "तेले मामा के इंग्लैन्द में बनाते होंगे कुत्ते की तत्ती छे लबल छाले. गब्बल कोई तूतिया ऐ बेते! ... और छुन ..." इतने दिनों तक अदृश्य रहे लफ़त्तू का यह रूप मुझे बहुत अच्छा लग रहा था. मेरा मन कर रहा था कि उसका हाथ थाम कर सीधा बमपकौड़े वाले ठेले तक भाग चलूं. लफ़त्तू ने हाल में सीखा हुआ डायलाग जारी किया " बन्तू बेते वो दमाने लद गए दब गधे पकौली हगते थे."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लफ़त्तू द्वारा बन्टू को डांटे जाने का सिलसिला कोई दो मिनट और चला और ज़रा देर में हम दोनों वाकई बमपकौड़े के ठेले की तरफ़ जा रहे थे. मैं आश्वस्त था कि लफ़त्तू के पास पैसे ज़रूर होंगे. लफ़त्तू के सिर्फ़ एक बमपकौड़ा मंगवाया. मेरे वास्ते. "याल मुदे मना कला ऐ दाक्तल ने. तू खा."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पकौड़ा उसी दिव्य स्वाद से लबरेज़ था. लेकिन उस से मिली ऊर्जा के बावजूद मैं लफ़त्तू की बीमारी के बारे में उस से पूछने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था. मैं ’दोस्ती’ फ़िल्म का कोई डायलाग भी याद करने की कोशिश कर रहा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चुपचाप घर का रुख करते हुए लफ़त्तू ने बस अड्डे पर रुकी एक बस की ओट में पेशाब करते समय मुझे बताया कि उसे रोज़ रात को भयानक बुखार आता है और वह सो नहीं पाता और यह भी कि शायद कल उसे किसी बड़े डाक्टर को दिखाने मुरादाबाद ले जाया जाने वाला है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे रात को बहुत देर नींद नहीं आई. सुबह मैं स्कूल जाने को सड़क पर उतरा तो देखा कि एक हाथठेले पर लेटे लफ़त्तू को बस अड्डे की तरफ़ ले जाया जा रहा था. हाथ में गांठ लगा एक थैला थामे उसके पापा आगे आगे थे. ठेला धकेलने वाले पहलवान के पीछे सुबकती हुई उसकी दुबली मां थी और उसकी बड़ी बहन. उन के ठीक पीछे एक और ठेला चला अ रहा था जिसमें रोज़ की तरह भैंस का मीट ले जाया जा रहा था. शेरसिंह की दुकान के इस हिस्से से मन्द गति से आ रहे हाथी की सूंड़ दिखाई देने लगी थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने असहाय निगाहों से लफ़त्तू की तरफ़ देखा. वह बुरी तरह कांप रहा था और गर्मी के मौसम के बावजूद उसने कम्बल ओढ़ा हुआ था. मुझ से और नहीं देखा गया. अपनी भर आई आंखों के किनारों को जल्दी जल्दी पोंछता हुआ मैं स्कूल की तरफ़ भाग चला.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/272678107746144576-6996675356704200848?l=lapoojhanna.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://lapoojhanna.blogspot.com/feeds/6996675356704200848/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=272678107746144576&amp;postID=6996675356704200848' title='14 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/272678107746144576/posts/default/6996675356704200848'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/272678107746144576/posts/default/6996675356704200848'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://lapoojhanna.blogspot.com/2010/04/blog-post.html' title='बेते हाती हाती होता ऐ औल दानवल दानवल'/><author><name>लपूझन्ना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06722723246925370677</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-272678107746144576.post-2940046386985580917</id><published>2009-07-30T13:47:00.004+05:30</published><updated>2009-08-05T10:40:41.283+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्रिच्छारौपड़'/><title type='text'>ज्याउल, उरस की मूफल्ली, मोर्रम और ब्रिच्छारौपड़ - ६</title><content type='html'>लफ़त्तू और मैं हरिया हकले की छत फांद ही रहे थे जब पीछे से बन्टू की आवाज़ आई: "रुको मैं भी आ रहा हूं यार." ज़ीना उतर कर हम दूधिये वाली संकरी गली में थे. सरदारनी का स्कूल की तरफ़ जाने के बजाए हम बाईं तरफ़ वाली गली में मुड़ गए जहां से हमें सीधे घासमंडी पहुंच जाना था. घासमंडी की तमाम दुकानों के आगे लोग मोर्रम के जुलूस के वहां तक पहुंच जाने की प्रतीक्षा में थे. हम लालसिंह की दुकान पर पहुंचे ही थे कि बन्टू पर भय का दौरा सा पड़ा. वह वापस घर जाने की बात करने लगा तो लफ़त्तू ने थूकते हुए कहा: "दलपोक थाला."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डरपोक कहे जाने से बन्टू का स्वाभिमान आहत हुआ और उसने वापस जाने की योजना मुल्तवी कर दी.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अब यईं पल लुके लओ" लफ़त्तू साधिकार बोला.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जुलूस हमारे घर से आगे निकल रहा था और हम तक पहुंचा ही चाहता था. रात घिर आने के बावजूद बैन्डगाड़ी के आगे सीना पीट रहे छोटे बच्चों में से कुछ के परिचित चेहरे पहचाने जा सकते थे. मोर्रम के जुलूस को छत से देखना और बात थी यहां उसे रू-ब-रू अपने नज़दीक आते देखना और. ढोलों की धमक जैसे हमारे पेटों से उठती हुई दिमाग तक पहुंचती लग रही थी. यह रोंगटे खड़े कर देने वाली आवाज़ें थीं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बैन्डगाड़ी के एक तरफ़ दो बड़ी बड़ी देगचियां रखी हुई थीं. बच्चे देगची-इन्चार्ज के पास जाते, उसकी चिरौरी करते और मुठ्ठी भर कुछ माल पा-खा कर पुनः सीनाफोड़ीकरण में लग जाते.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बैन्डगाड़ी हमारे ऐन सामने थी. देगची-इन्चार्ज को मैंने पहचान लिया. बन्टू ने भी. वह बन्टू लोगों के घर चलती रहने वाली शाश्वत मरम्मतों का निर्देशन करने वाला बहरा मिस्त्री था जो बार-बार बताए जाने के बावजूद कुछ न कुछ ऐसी वास्तुशिल्पीय गड़बड़ कर दिया करता था कि घर लौटने पर बन्टू के पापा उसे काला चश्मा लगाए लगाए ही डांटना शुरू कर दिया करते थे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देगची-इन्चार्ज ने भी हमें दूर से ताड़ लिया और इशारे से अपने नज़दीक बुलाया. बन्टू ने एक पल की भी देर नहीं लगाई और हम बैन्डगाड़ी के ऐन बगल में थे. बहरे मिस्त्री ने खूब बड़े बड़े तीन पत्तलों में माल भर कर हमें थमाया और हम बिजली की गति से घासमंडी के उस तरफ़ पसू अस्पताल से सटे एक टीले की तरफ़ भाग चले. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पत्तलों में जलेबी वाली गरम गरम बूंदियां भरी हुई थीं. बन्टू ने बूंदी के मुसलमान होने का ज़िक्र किया तो लफ़त्तू ने हिकारत से उस से कहा : "मैंने का ता तुदते अपने थात आने को? तुदे वापत दाना ऐ तो दा. हता थाले को!"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बन्टू वाकई डरपोक निकला और भागता हुआ वापस अपने घर चला गया. हम बूंदी के मज़े लेने की प्रोसेस के चरम पर पहुंचने को ही थे जब अचानक एक कर्रा तमाचा खोपड़ी पर पड़ा. जब तक मैं इस प्रहार से सम्हल पाता दूसरा तमाचा पड़ा. दो सेकेन्ड के भीतर हम दोनों बांकुरे ज़मीन पर थे. दो जोड़ी बड़े बड़े हाथों ने हमारे पत्तल समेट कर कूड़े की तरह उछाल दिए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक लफ़त्तू का बड़ा भाई था एक उसका बीड़ीखोर दोस्त. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे कान दूधिये वाली गली तक नहीं छोड़े गए. छत पर की भीड़ आखिरी ताजियों को निकलता देखने में मशगूल थी. दूधिये वाली गली के मुहाने पर हमारे कान छोड़े गए जो लगता था दो-दो हिस्सों में बंट चुके थे. लफ़त्तू के भाई ने मुझे चेताते हुए कहा कि मुझ होस्यार बच्चे को उसके भाई जैसे हौकलेट से दूर रहना चाहिये. यह भी मुसलियों के हाथ की बनी मिठाई खा चुकने के बदले में शायद कल सुबह तक हमारे हाथ झड़ जाएंगे. और यह भी कि लफ़त्तू को तो अब घर पर देखा जाएगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दर्द, अपमान और छोटा होने की विवशता के बावजूद मुझे लफ़त्तू के बड़े भाई के अज्ञान और गधेपन पर तरस आया. हाथ झड़ने होते तो अब तक झड़ चुके होते. मुझे भाषण दिया ही जा रहा था जब अचानक बिजली की तेज़ी से लफ़त्तू अपने भाई की गिरफ़्त से निकला और "हत थाले!" कह कर आगे अन्धेरों की तरफ़ भागता चला गया. दोनों बड़े उसे पकड़ने भागे तो मैंने अपने दुखते कान पर हाथ लगाया. वह सलामत था. जुलूस की आवाज़ अब उतनी कानफोड़ू नहीं रही थी. मैं चोरों की तरह हरिया हकले का ज़ीना चढ़कर ढाबू की छत फलांगता अपनी छत के क्रिकेट मैदान वाले हिस्से की तरफ़ आ कर टंकी की ओट हो गया. रात के खाने की योजनाएं बनाती आपस में बतियातीं मन्थर कदमों से नीचे उतरती औरतें थीं. मैदान साफ़ था. मैंने थोड़ा ऊंची आवाज़ में कुछ गाना सा गुनगुनाना शुरू कर दिया ताकि वे मेरी उपस्थिति से वाकिफ़ हो रहें&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अब कब तक छत पर रहेगा. चल हाथ मुंह धो के किताब हिताब पढ़! बहुत हो गया मुसलियों का ताजिया फाजिया. कल से स्कूल भी है."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नींद रह रह कर टूटती रही रात भर . मुझे सपना दिखता था कि लफ़त्तू की धुनाई हो रही है और वह "बचाओ बचाओ" की गुहार लगा रहा है. लेकिन सुबह वह अपना बस्ता थामे लफ़ंडरसंकेत "बी...यो...ओ...ओ...ई.." के साथ मुझे बुला रहा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसका चेहरा सूजा हुआ सा लग रहा था. मैंने उसके भाई द्वारा बाद में किये गए व्यवहार के बारे में जानना चाहा पर झेंप महसूस हुई. उसने मेरा हाथ पकड़कर आंख मारते हुए कहा: "हात तो नईं धला यार तेला मुछलियों के हात की बूदी खा के बी!"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्कूल में असेम्बली के समय प्रिंसीपल साहब के साथ एक सज्जन खड़े थे. खाकी वर्दी पहने ये सज्जन पुलिस तो कतई नहीं लग रहे थे. पर एक तरह की अफ़सरी धज उनके भीतर से ज़रूर टपक रही थी. राष्ट्रगान के बाद प्रिंसीपल साहब ने कहना शुरू किया: "बच्चो आज आप को जंगलात विभाग से पधारे सिरी जोसी जी कुछ अच्छी अच्छी बातें बताएंगे. पहले उनके स्वागत में आप लोग गीत गाएं." मुर्गादत्त मास्टर ने हारमोनियम सम्हाल लिया. इस तरह अचानक गीत गाने की हम में से किसी की तैयारी न थी. नतीज़तन मास्टर देबानन मुर्गादत्त की कर्कश ध्वनि सबसे अलग सुनाई दे रही थी. हार्मोनियम जैसे रेलगाड़ी की बग़ल में रेंग रही मालगाड़ी जैसा अलग स्वरमंजरियों का खौफ़नाक समां बांधे था. हवा में करीब तीन हज़ार बच्चों के तीन हज़ार आरोह अवरोह एक दुसरे को काट-पीट-खसोट-नोच रहे थे "आपि का सुआगत है सिरीमान. आपि का सुआगत है सिरीमान ..."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस भीषण राग नोचखसोट के बारहताला द्रुततम ताल पर आने के उपरान्त खाकी जोसी जी ने एक एक कर पहले तो सारे मास्टरों का नाम ले ले कर धन्यवाद कहा. उसके बाद गला खंखार कर करीब आधे घन्टे हमारी ऐसी तैसी की. हमारी समझ में इतना ही आया कि हमें पेड़ लगा कर धरा को बचाना है. और पेड़ लगाने का यह काम चौबीस घन्टे, ताज़िन्दगी करते जाना है जभी धरा बचेगी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खाकी जोसी के माइक से हटने पर एक बार पुनः प्रिंसीपल साहब ने मोर्चा सम्हाला. "जोसी साहब के निर्देशन में आज कच्छा छै और सात के बच्चे ब्रिच्छारौपड़ हेतु कोसी डाम पे जाएंगे. ब्रिच्छारौपड़ के उपरान्त बच्चे चाएं तो स्कूल आ जावें चाएं अपने घर चले जावें. कल को कच्छा आठ और नौ के बच्चे यही कारजक्रम करेंगे ..."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यानी छुट्टी. ब्रिच्छारौपड़ शब्द का मतलब लफ़त्तू की समझ में नहीं आया तो उसने मुझ से पूछा. मैंने उसे बतलाया तो वह बोर होता हुआ बोला: "इत्ता सा पौदा लगाने का इत्ता बला नाम. बली नाइन्तापी है."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चीखते, चिल्लाते धूल उड़ाते हमारा काफ़िला डाम पर पहूंचा. डाम के बगल में बने बच्चा पार्क के बगल से एक रास्ते पर हमें ऊपर चढ़ने को कहा गया. आगे लकड़ी का एक गेट था. गेट पर करीब पांच मनहूस आदमी खड़े थे जो सूरत से ही कामचोर और चपरासी लग रहे थे. उन्होंने डपटकर हमें "एक-एक कर के सालो!" कह कर एक-एक पौधा थमाया. ज़्यादातर पौधों की पत्तियां सूखी हुई थीं और वे भयानक तरीके से मरगिल्ले लग रहे थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आधे पौन घन्टे में इन पौधों को जैसे-तैसे ज़मीन में दफ़ना कर हम नीचे पार्क में थे जहां खाकी जोसी, मुर्गादत्त मास्टर और नेस्ती मास्टर उर्फ़ विलायती सांड कहीं से ले आई गई कुर्सियों पर विराजमान हो चुके थे. उनके सामने एक मेज़ धरी हुई थी. और आगे हम बच्चों के बैठने को दरी बिछा दी गई थी. जब सारे बच्चे सैटल हो गए और हल्लागुल्ला कम हुआ तो विलायती सांड खड़ा हुआ और प्रारम्भिक अनुष्ठान के तौर पर उसने पहले ख्वाक्कध्वनि के साथ थूक का गोला अपने पीछे की धरा पर उछाला, एक डकार जैसी ली और हमें सूचना दी - "अब सारे बच्चों को ब्रिच्छारौपड़ कारजक्रम के सटफिकट बांटे जाएंगे." &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दो घन्टे तक नाम पुकारे जाते रहे. हर बच्चा मेज़ पर जाता और खाकी जोसी से सटफिकट ग्रहण करता. शुरू के चालीस पचास बच्चों तक तो उत्साह बना रहा उसके बाद बच्चे धीरे धीरे अधमरे होना शुरू हो गए. धूप अलग थी. मेज़ पर लगातार चाय की सप्लाई जारी थी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब मेज़ पर धरी सटफिकटों की गड्डी खत्म होने को थी, एक जीप बगल में आ रुकी. जीप से पेटियां निकाली गईं और बच्चों को एक एक कर एक केला और एक समोसा थमाते हुए अपना मुंह काला कर घर फूट लेने का आदेश दिया गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लफ़त्तू इस सब से इस कदर चट चुका था कि उसने पार्क से बाहर आते ही समोसा और केला नहर की तरफ़ "हता थाले को!" कहते हुए उछाल दिये.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और दिन होते तो लफ़त्तू ने मेज़ कुर्सी पर बैठी सतत चाय सुड़कती त्रयी की कितनी ही मज़ाकें उड़ा ली होतीं लेकिन वह पिछले कुछ दिनों से किसी दूसरी आकाशगंगा के किसी दूसरे सौरमन्डल के सुदूरतम ग्रह में जा बसा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ब्रिच्छारौपड़ कारजक्रम के चौथे दिन असेम्बली में गोबरडाक्टर की उपस्थिति ने हमारी दिलचस्पी को ज़रा सा हवा दिखाई. उस दिन बारहवीं क्लास ने ब्रिच्छारौपड़ करने जाना था. गोबरडाक्टर ने भी पेड़, पानी, धरती वगैरह के बारे में अपना ज्ञान बघारते हुए ब्रिच्छारौपड़ कारजक्रम की महत्ता को रेखांकित किया. नकली तालियों के बाद प्रिंसीपल साहब ने बच्चों को सूचित किया कि गोबरडाक्टर का स्थानान्तरड़ हो गया है और यह कि सारा शहर उनकी याद में आने वाले कई सालों तक रोता रहेगा. पंडित रामलायक 'निर्जन' ने अपनी रची एक गीत-श्रॄंखला सुनाई जिसका आशय यह निकलता था कि चांद सूरज तो तब भी रोज़ आते रहेंगे लेकिन रामनगर की सड़कें गोबरडाक्टर के बिना कब्रिस्तान में तब्दील जाएंगी क्योंकि वे अब कभी यहां नहीं आएंगे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रामलायक 'निर्जन' ने पहले से ही मनहूस इस असेम्बली को मनहूसतर बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छुट्टी जल्दी घोषित कर दी गई. मैंने लफ़त्तू से बमपकौड़ा खाने चलने को कहा तो वह मान गया. मेरे पास थोड़े पैसे थे. बमपकौड़ा खा कर हम मन्थर गति से घर की तरफ़ जा रहे थे जब सामने से दौड़ता हुआ लालसिंह हम तक पहुंचा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"तुम साले मौज काट रहे हो वहां तुम्हारे माल हल्द्वानी जा रहे हैं. एक बार देख तो लो हरामियो उन को!"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अजीब सी नासमझ बदहवासी में हम भागते हुए पसू अस्पताल के गेट पर पहुंचे. ट्रक में सामान लादा जा चुका था और गोबरडाक्टर की गाड़ी की गतिमान झलक भर 'असफाक डेरी केन्द्र और सेन्टर' के मोड़ पर नज़र आई. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम दोनों वहीं बैठ गए. लफ़त्तू का चेहरा सफ़ेद पड़ा हुआ था और ऐसा लग रहा था कि वह अब रोया तब रोया. मैं तो नकली आसिक था सो मुझे कुच्चू गमलू के चले जाने का ऐसा कोई अफ़सोस नहीं हो रहा था. मुझे लफ़त्तू की चिन्ता हुई.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घरघर करता ट्रक जब चल दिया तो हम हारे जुआरियों की तरह पसू अस्पताल के अहाते में प्रविष्ट हुए. वहां श्मशान जैसी मुर्दनी छाई हुई थी. गोबरडाक्टर के घर के अन्दर कोई झाड़ू कर रहा था. अगले डाक्टर के रहने के लिए घर तैयार किये जाने की तैयारी शुरू हो चुकी थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घर के बाहर पुरानी पेटियां, एकाध दरियां और कूड़ा कचरा बिखरा था. लफ़त्तू ने अचानक कुछ देखा और भागकर कूड़े से उसने अपना रत्तीपइयां बाहर निकाला. ये वही रत्तीपइयां था जिसे उसने उस दिन कार की सवारी खाने के बाद "हाउ क्यूट! हाउ क्यूट!" कहती हमारी एक स्कर्टधारिणी भाबी पर न्यौछावर कर दिया था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"हता थाले को! हता थाले को! ... हता! " कहते आवेग में लफ़त्तू ने रत्तीपइयां के तार को बुरी तरह टेढ़ामेढ़ा बना दिया. रत्तीपइयां को लेकर वह नहर की दिशा में भागा. मैंने उसका अनुसरण किया. वह मेरे पहुंचने से पहले ही रत्तीपइयां को नहर के हवाले कर चुका था. उसने एक रुंआसी निगाह मुझ पर डाली और भागता हुआ भवानीगंज की तरफ़ निकल पड़ा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगले दिन इतवार था. हमारा दिगम्बरदल तैराकी कार्यक्रम के उपरान्त कायपद्दा भी खेल चुका था. यानी घर जाकर कुछ खाने का समय हो गया था. लफ़त्तू पानी के भीतर नंगा निश्चेष्ट लेटा था. सब जा चुके तो मैंने उस से घर चलने को कहा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"तू दा याल. मैं कुत थोत रा ऊं." कह कर उसने तेज़-तेज़ तैरना शुरू कर दिया जब तक कि वह मेरी निगाहों से ओझल न हो गया.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/272678107746144576-2940046386985580917?l=lapoojhanna.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://lapoojhanna.blogspot.com/feeds/2940046386985580917/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=272678107746144576&amp;postID=2940046386985580917' title='28 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/272678107746144576/posts/default/2940046386985580917'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/272678107746144576/posts/default/2940046386985580917'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://lapoojhanna.blogspot.com/2009/07/blog-post_30.html' title='ज्याउल, उरस की मूफल्ली, मोर्रम और ब्रिच्छारौपड़ - ६'/><author><name>लपूझन्ना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06722723246925370677</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>28</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-272678107746144576.post-7282304912283967566</id><published>2009-07-29T16:55:00.004+05:30</published><updated>2009-08-05T11:02:27.395+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ज्याउल'/><title type='text'>ज्याउल, उरस की मूफल्ली, मोर्रम और ब्रिच्छारौपड़ - ५</title><content type='html'>ज्याउल के घर का खाना याद आते ही मुंह में पानी भर आता. एक बार मैंने ज्याउल से  ऐसा कहा तो वह मेरे और लफ़त्तू के लिए अलग से प्लास्टिक के डब्बे में मटर की तहरी बनवा कर लाया और अपनी अम्मी का सन्देशा भी कि हम जब चाहें तहरी खाने उनके घर आ सकते हैं. बल्कि इसी इतवार को क्यूं नहीं आ जाते.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन्टरवल में जब सारे बच्चे खेलमैदान की तरफ़ भाग चले हम तीनों ने क्लासरूम में रहकर ही अपना गुप्त लंच कार्यक्रम आयोजित किया. छोटा सा प्लास्टिक का डब्बा और खाने वाले दो भुखाने सूरमा. न पेट भरा न मन. पर लुफ़्त आ गई.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगले दो इतवार हमने ज्याउल के घर इस लुफ़्त का क्लाइमेक्स भी महसूस किया. इस में बाधा बन कर आईं कुछ छुट्टियां. ज्याउल अपने नानाजान के घर फ़रुक्खाबाद चला गया था इन छुट्टियों में.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारा दिगम्बर तैराकी और पॉलियेश्टराम्बर कायपद्दा कार्यक्रम अपने उरूज पर आ जाता था इस तरह की छुट्टियों में. एक बार थक कर चूर हम लोग घरों को लौट रहे थे तो ऐसे ही बातों बातों में इस बात पर बहस चल निकली कि छुट्टियां किस बात की चल रही हैं. गोलू ने अपने पापा के हवाले से बतलाया कि कुछ त्यौहार एक साथ पड़ गए और बीच में इतवार भी. एक दिन बाद मोर्रम था. मोर्रम माने कोई मुसलमान त्यौहार. पिछली बार मोर्रम के टाइम हम लोग रानीखेत किसी शादी में गए हुए थे. उस मोर्रम के ताजियों और ढोल-दमामों वगैरह की बाबत लफ़त्तू और बन्टू ने  मुझे इतने किस्से सुनाए थे कि इस त्यौहार का नाम आने से मुझे कुछ उत्साह महसूस हुआ. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इधर लफ़त्तू के व्यवहार में धीरे धीरे कुछ परिवर्तन आने शुरू हो गए थे. उसने कायपद्दा खेलना बन्द कर दिया था. हम आम की डालियों पर चढ़े रहते और वह पानी में डूबा अधडूबा रहता. बहुत बोलता भी नहीं था. न शामों को क्रिकेट खेलने आता. हां हर शाम लालसिंह की दुकान पर हम ज़रूर जाते थे. मेरी निगाहें पसू अस्पताल के गेट से लगी रहा करतीं पर लफ़त्तू किसी दूसरे ग्रह पर पहुंच चुका था. यदा कदा वह कोई अश्लील गाना सुनाता या किसी पिक्चर के डायलाग ताकि लालसिंह उसकी उदासी को ताड़ न ले. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे उस्ताद का यह रूप कतई पसन्द नहीं आ रहा था. लेकिन मैं असहाय था. मेरी इतनी ताब न थी कि उस के लिए कुछ भी कर सकूं. मैं हिम्मत कर के गमलू कुच्चू का नाम ले लेता तो वह "हता थाले को याल" कहता सड़क पर पड़े पत्थरों को लतियाता दूर तक ठेलता ले जाता. कभी कभी वह बिला वजह अपने आप से "हत थाले की" कहता. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन मोर्रम की सुबह वह "बी ... यो ... ओ ... ओ ... ई. .." करता सड़क पर से मुझे बुला रहा था. मैंने झटपट चप्पल पहनी और अपने शान्तिवन अर्थात बौने के ठेले की तरफ़ चल पड़े.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"बेते पितले छाल इत्ते बले बले धोल बज रये थे मोर्रम पे कि कान फूत गए ते. औल इते बले ऊंते उंते तादिये ... आप छमल्लेवें ... तेले घल की  थत तक. बन्तू ते पूत लेना. मैं तो तुदे ये कैने आया ऊं कि तू दलना मत धोल छाले ऐते बदते ऐं ... "&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमने पेटों में प्रिय व्यंजन पिरोया और बहुत दिनों बाद फ़र्श से चिपक कर आधे घन्टे कोई पिक्चर देखी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मोर्रम के जुलूस की आवाज़ें शाम चार बजे से पाकिस्तान के किसी सुदूर हिस्से से सुनाई देना शुरू हो गई थीं. समय बीतते बीतते ढोलों की थापें तेज़ होती गईं. करीब साढ़े छः बजे जुलूस पाकिस्तान सीमा पर था. हमारी छत पर दर्शकों का मजमा लगा हुआ था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत दूर तक लोगों का हुजूम नज़र आ रहा था. जुलूस में बीच बीच में बड़े बड़े शानदार ताजिये नज़र आ रहे थे. बेहतरीन कलाकारी के नमूने ये चमचमाते ताजिये मैं पहली बार देख रहा था. जुलूस में सबसे आगे बैन्डवाली एक गाड़ी पर दो बड़े बड़े ढोल बजाए जा रहे थे. गाड़ी के आगे अपनी छातियां पीटते करीब सौ बच्चे थे. वे बार बार गाड़ी के पास जाते है वहां से उन्हें कुछ मिलता जिसे अपने मुंहों में ठूंसकर वे सीना फ़ोड़ने में जुट जाते. पीछे पता नहीं कितने सारे तो ताजिये थे और कितने लोग. बैन्डगाड़ी हमारे घर से दसेक मीटर दूर रह गई होगी जब ढोल बजाने वालों के भीतर जैसे कोई देवता घुस गया. खुले सीनों वाले चार-चार हट्टे कट्टे आदमी ढोल पीट रहे थे और सचमुच घर की दीवारों की एक एक ईंट बजती महसूस हो रही थी. ताजिये वाकई बहुत ऊंचे थे और लगता था कि ऊपर टंगे बिजली के तारों में लिपझ जाएंगे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ढोलों की आवाज़ बिल्कुल कानफोड़ू थी. ऐसी उत्तेजना मुझे कभी महसूस नहीं हुई थी. बैन्डगाड़ी के पीछे बड़ी उम्र के पगलाए से लड़कों-आदमियों को अपने सीनों और पीठों पर रस्सियां-सोंटियां बरसाते हुए "या अली या अली" कहते देखना अजब सनसनी भर देने वाला था. इस सारे कोलाहल को देखते कुछ भी सुनाई दे रहा था. मुझ से सट कर खड़े बन्टू की लगातार कमेन्ट्री चालू थी. अलबत्ता लफ़त्तू ने जब कान से अपना मुंह सटाकर "तल बेते" कहा तो उस पागलपन के बीच भी मैंने उसकी आवाज़ सुन ली. उसने आंख मार कर मुझे अपने पीछे आने को कहा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;(जारी - कल अगली लास्ट किस्त. हर हाल में. अभी कहीं जाना पड़ रहा है.)&lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/272678107746144576-7282304912283967566?l=lapoojhanna.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://lapoojhanna.blogspot.com/feeds/7282304912283967566/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=272678107746144576&amp;postID=7282304912283967566' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/272678107746144576/posts/default/7282304912283967566'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/272678107746144576/posts/default/7282304912283967566'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://lapoojhanna.blogspot.com/2009/07/blog-post_29.html' title='ज्याउल, उरस की मूफल्ली, मोर्रम और ब्रिच्छारौपड़ - ५'/><author><name>लपूझन्ना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06722723246925370677</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-272678107746144576.post-7020026254954846348</id><published>2009-07-28T18:11:00.006+05:30</published><updated>2009-08-05T11:06:37.555+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हरिया'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कुच्चू गमलू'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ज्याउल'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मटर की तहरी'/><title type='text'>ज्याउल, उरस की मूफल्ली, मोर्रम और ब्रिच्छारौपड़ - ४</title><content type='html'>हालांकि ज्याउल के घर हम उसके बड्डे पर जा चुके थे, यह बात मेरे परिवार में किसी को मालूम न थी. रात को खाना खाते वक्त जब मैंने अगले दिन ज्याउल के घर जाने की अनुमति मांगी तो उसे मिल ही जाना था क्योंकि पिताजी पहले ही मुझे उसके साथ दोस्ती बढ़ाने को कह चुके थे. मां ने थोड़ा सा मूंह बनाया और बोली : "यहीं क्यूं नहीं बुला लेता है उस को? कोई जरूरी है उस के यहां जाना?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अरे जाने दो यार बच्चों को ऐसे ही दुनियादारी पता चलती है" कह कर फ़ैसला मेरे पक्ष में सुना दिया गया. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगले दिन मैं तैयार हो कर ज्याउल के घर जाने ही को था कि मां ने कहा: "रुक एक मिनट को."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह भाग कर मन्दिर वाले कोने में गई और वहां कुछ देर रूं-रूं जैसा करती रही. वापस आ कर उसने मेरे माथे पर भभूत का टीका लगाया और काला धागा मेरी गरदन के गिर्द बांध दिया: "वहां खाना हाना मत कुछ. और डर लगेगा तो हनुमान चालीसा का जाप कर लेना. एक बजे तेरे बाबू आ के ले जाएंगे तुझे."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूर्वनिश्चित कार्यक्रमानुसार लफ़त्तू मुझे बस अड्डे के पीछे खड़ा मिला. मेरे माथे पर भभूत लगी देख कर बोला: "अबी तू बत्ता ऐ बेते. थोता ता बत्ता." उसकी मंशा मुझे अपमानित करने की नहीं थी पर मुझे अपमानित महसूस हुआ. मैंने झटके में माथा रूमाल से साफ़ किया और अपनी मां के उक्त कृत्य को डिफ़ेन्ड करते हुए कहा कि मां ने अपना काम किया मैंने अपना. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसने मेरा हाथ थाम के कहा: "बुला नईं मानते याल!" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिमालय टाकीज़ पार करते न करते उस पर पुरानी रौ छा गई. उसने दो उंगलियां मुंह में घुसेड़कर सीटी बजाना भी सीख लिया था. सत्तार मैकेनिक की दुकान के बाहर उसने इस कला का प्रदर्शन किया और जल्द ही "...उहूं ... उहूं ...दान्त तत ... दान्त तत ..." की मटकदार चाल में पहुंच गया. मैं हैरान हो जाता था उसे देख कर. अभी अभी इसके पापा ने इसकी चमड़ी उधेड़ी है मगर ये किसी से डरता ही नहीं. उसके मुझ पर ऐसे ऐसे अहसानात थे मगर उसने एक बार भी किसी का हवाला देकर मेरी बेज्जती खराब नहीं की थी जैसा बन्टू हर दूसरी बार किया करता था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ज्याउल के घर पर हमारा इन्तज़ार हो रहा था. आसमानी लिबास ने आज गुलाबी रंग चढ़ा लिया था. उसने हमें दूर से देख लिया और हमें उसका "ज़िया भाई! ज़िया भाई!" कहते हुए भीतर जाते बोलना सुनाई दे गया. ज्याउल की अम्मी ने हमारे सिरों पर हाथ फिराये और अल्ला-अल्ला चाबी-ताला जैसा कुछ कहा. गुलाबी लिबास ने हमें "आदाब भाईजान" कहा और अन्दर कहीं चला गया. ज्याउल हमें अपने कमरे में ले जाते हुए बोला "ये हमारी बाजी हैं"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'बाजी' शब्द का मतलब पूछने की हिम्मत नहीं पड़ी - बस मन में दस-बीस सवाल भर उमड़े. ज्याउल के पास बहुत सारी किताबें थीं. मैंने इतनी किताबें दुकान को छोड़कर कभी-कहीं नहीं देखी थीं - किताबें कुच्चू गमलू के पास भी थीं पर ज्याउल का कलेक्शन अविश्वसनीय था. ज्याउल ने हमें स्पैलिंग वाला खेल खेलने का प्रस्ताव दिया. लफ़त्तू ने एक लोटपोट निकाल ली थी और वह किसी भी तरह का खेल खेलने के मूड में न था. "तुम दोनो खेलो याल. मुदे नईं आती इंग्लित फ़िंग्लित! ..."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारा स्क्रैबल करीब एक घन्टा चला. इस दरम्यान शरबत, सिंवई, समोसे इत्यादि का भोग लग चुका था. हमारे स्क्रैबल को गुलाबी पोशाक बाजी के रूप में एक उम्दा दर्शक मिल गया था. बाजी शायद ज्याउल से एकाध साल बड़ी थीं. हर नए शब्द पर "बहुत अच्छे भाईजान!" कहना उनका ताज़ा तकिया कलाम था शायद.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोटपोट में नकली व्यस्त लफ़त्तू ने अपना चेहरा इस कदर छुपाया हुआ था कि अगर आधे घन्टे वहां रहने पर बाजी "आप नहीं खेलेंगे?" नहीं पूछती तो हम उसे भूल ही जाते. "लफ़त्तू को खेल पसन्द नहीं हैं. उसे कॉमिक अच्छे लगते हैं." मैंने लफ़त्तू का बचाव करते हुए कहा. "कोई बात नहीं, कोई बात नहीं" कहकर उन्होंने हमारे उत्साहवर्धन में जुट जाना बेहतर समझा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्क्रैबल के बाद हम लोग बाहर बरामदे में आ गए. सामने नहर बहती थी और दूर टुन्नाकर्मस्थली यानी कोसी डाम की झलक दिख रही थी. "आओ बच्चो! खाना लग गया!" अन्दर से ज्याउल की मम्मी की आवाज़ आई तो मेरी फूंक सरक गई. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिंवई, समोसे, शरबत तक तो ठीक था पर पूरा खाना. अगर घर में मां को पता लग गया तो? और मान लिया खाने को गाय-हाय हुई तब? ... मैं कोई बहाना सोच ही रहा था कि लफ़त्तू ने मेरी बांह थामी और आश्वस्त करते हुए अपने साथ भीतर डाइनिंग टेबल पर ले चला. बढ़िया साफ़ सफ़ेद तश्तरियां करीने से लगी हुई थीं. ज्याउल की अम्मी ने मटर की खुशबूदार तहरी और दही के डोंगे खोले और बोली "बच्चों के हिसाब से मिर्च बिल्कुल नहीं डाली है बेटे. लो."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जीवन में मैंने तब तक नहीं जाना था कि मटर की तहरी जैसी सादा चीज़ इस कदर स्वादिष्ट भी हो सकती है. उसे सूतते हुए न तो मां की बातें याद आईं न तहमत से ढंके मीट से लदे हाथठेले की. खाना खा चुकने के बाद मुरादाबादी घेवर मिला बतौर स्वीटडिश.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे जाने का समय होने को था और मैं पिताजी का इन्तज़ार कर रहा था जब ज्याउल की अम्मी ने बताया कि ऑफ़िस से चपरासी आकर बता गया था कि पिताजी व्यस्त होने के कारण नहीं आ सकेंगे. मुझे थोड़ा तसल्ली हुई कि वापसी में लफ़त्तू और मैं कुछ देर और मौज कर सकेंगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ज्याउल, उसकी अम्मी और बाजी हमें कालोनी के गेट तक छोड़ने आए. "आते रहना बेटा! वरना ज़िया तो अकेले में हर बखत किताबों में ही मुंह डाले रहते हैं. घर पर सब को हमारा सलाम कहना."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुसलमान घर में लंच कर चुकने जैसा अविश्वसनीय कारनामा कर चुकने का सदमा एकाध मिनट रहा जब लफ़त्तू बोला: "द्‍याउल कित्ता अत्त ऐ ना. और उतकी मम्मी बी." वह विचारमग्न होने को था जब मैंने मुसलमान घर में लंच करने के बाबत उसके विचार पूछे. "अले हता याल! इत्ते प्याल छे तो मेली मम्मी ने मुदे कबी नईं खिलाया. कुत नईं होता मुछलमान हुछलमान! बत घल पे मत कैना. द्‍याउल ते मैं कै दूंगा कि तेले घल पे नईं कएगा."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घर पर छोटी बहनों के सिवा कोई न था. वे अपनी गुड़ियों के बचकाने खेलों में मुब्तिला थीं. मैंने इत्मीनान की सांस ली कि तुरन्त खाना खाने को कोई नहीं कहेगा. देह में गरदन गरदन तलक स्वाद अटा हुआ था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक शाम हम क्रिकेट खेल रहे थे. लफ़त्तू हरिया हकले की छत पर पहुंचा दी गई गेंद लाने गया. इस बार गेंद असल में दूधिये वाली गली में चली गई थी. इन्हीं दिनों फ़ील्डिंग में यह नियम लागू किया गया था कि सड़क या दूधिये वाली गली में गेंद पहुंचाने वाले को ही उसे लाना होगा. लफ़त्तू ने अपनी स्वयंसेवी फ़ील्डिंग संस्था बन्द कर दी थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बन्टू नीचे गया तो मैं और लफ़त्तू छत की मुंडेर पर अपनी मुंडियां टिकाए नीचे झांक कर देखने लगे. बन्टू को गेंद नज़र नहीं आ रही थी और वह इधर उधर खोज रहा था. अचानक हमारे ऐन नीचे हरिया के घर का दरवाज़ा खुला और हमारी उम्मीदों को ग्रहण लगाता कुच्चू-गमलू का खिलखिल करते बाहर आना घटित हुआ. उनके पीछे पीछे हरिया निकला और उसके बाद हरिया की बहन और उसकी मां.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"हो गई बेते तेली भाबी की थादी फ़ित्त हलिया के तात. मैं कै ला था ना थाले ने फंता लिया ऐ उतको."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब तक बन्टू गेंद लाता, हम दोनों बौने के ठेले की तरफ़ निकल चुके थे. इधर मेरे मामा आए थे. और जाने से पहले सब से छिपा के मुझे पांच का नोट दे गए थे सो पैसे की इफ़रात थी. बमपकौड़ा पेट में जाते ही हमारे दिमाग थोड़ा स्थिर हो जाया करते और तब ऐसी संकटपूर्ण वेलाओं में हम किसी भी विषय पर लॉजिकली सोच पाते थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"तल. लालछिंग के पात तलते ऐं."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लालसिंह किस्मत से दुकान पर अकेला बैठा माचिस की तीली की मदद से कनगू निकाल रहा था. हमें देखा तो उसका चेहरा अचानक खिल गया. "इत्ते टैम से कां थे बे हरामियो."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूध-बिस्कुट की मौज काटी गई. लालसिंह ने तड़ से हमारे सामने सवाल उछाला: "गोबरडाक्टर तो जा रहा हल्द्वानी. ट्रान्सफ़र हो गया बता रहे थे. अब तेरा क्या होगा कालिया?" उसने प्यार से लफ़त्तू की ठोड़ी सहलाई.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"होना क्या ऐ. आपका नमक खाया है छलकाल" अप्रत्याशित रूप से कालिया बन गया लफ़त्तू. फ़िर जल्दी से पाला चेन्ज कर के गब्बर बन कर बोला: "ले बेते अब गोली खा!"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने नन्हे हाथों को जोड़कर उसने पिस्तौल की सूरत दी और अपनी ही कनपटी पर लगा कर कहा: "धिचक्याऊं! धिचक्याऊं! धिचक्याऊं!" और मर गया. लालसिंह हंसते हंसते पगला गया था. "सालो जल्दी जल्दी आया करो यहां. इत्ती बोरियत होती है साली."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लालसिंह लफ़त्तू की ऐक्टिंग से इम्प्रेस्ड था पर मुझे पता था यह लफ़त्तू की डिफ़ेन्स मैकेनिज़्म काम कर रही थी अपने ऊपर आए ऐसे व्यक्तिगत विषाद के अतिरेक से लड़ने को. लफ़त्तू तो तब भी नहीं रोया था जब उसके पापा उसे सड़क पर नंगा कर के जल्लादों की तरह थुर रहे थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नहीं. लफ़त्तू तब भी नहीं रोया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;न तब. न बाद में.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;(जारी - कल अगली लास्ट किस्त)&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछली कड़ियां:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://lapoojhanna.blogspot.com/2009/07/blog-post.html"&gt;पहला हिस्सा&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://lapoojhanna.blogspot.com/2009/07/blog-post_28.html"&gt;दूसरा हिस्सा&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://lapoojhanna.blogspot.com/2009/07/blog-post_9996.html"&gt;तीसरा हिस्सा&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/272678107746144576-7020026254954846348?l=lapoojhanna.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://lapoojhanna.blogspot.com/feeds/7020026254954846348/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=272678107746144576&amp;postID=7020026254954846348' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/272678107746144576/posts/default/7020026254954846348'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/272678107746144576/posts/default/7020026254954846348'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://lapoojhanna.blogspot.com/2009/07/blog-post_7945.html' title='ज्याउल, उरस की मूफल्ली, मोर्रम और ब्रिच्छारौपड़ - ४'/><author><name>लपूझन्ना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06722723246925370677</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-272678107746144576.post-3322031060797416999</id><published>2009-07-28T16:11:00.004+05:30</published><updated>2009-07-28T18:21:28.330+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='उरस'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ज्याउल'/><title type='text'>ज्याउल, उरस की मूफल्ली, मोर्रम और ब्रिच्छारौपड़ - ३</title><content type='html'>डबल डेकर डब्बे को छुपाना अगले कई दिन का सबसे मुश्किल काम रहा. सबसे पहली बात तो यह थी कि वह डब्बा मुझे बहुत पसन्द था पर हर साल लिया जाने वाला जौमेट्री बॉक्स मेरे लिए लच्छमी पुस्तक भण्डार से कुछ माह पहले लिया जा चुका था और सलामत था. एक बार मैंने उस डबल डेकर डब्बे का घर पर ज़िक्र क्या किया सारे लोग झिड़कियों का झाड़ू ले कर मुझ पर पिल पड़े थे. लफ़त्तू जानता था कि मुझे वह डब्बा अच्छा लगता है. उसे यह बात याद रही और जेब में रकम आते ही वह मेरे वास्ते उसे खरीद लाया. यह तथ्य मेरे लिए गौरवान्वित करने वाला होने के साथ साथ इमोशनल बना देने वाला भी था. अलबत्ता अगर लफ़त्तू के घरवालों को किसी भी सूत्र से पता लग जाता कि उसने अपनी बहन की घड़ी सत्तार मैकेनिक को बेच दी है तो उसका क्या हाल होना था यह सोच सोच कर मैं थर्रा जाया करता.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घर की दुछत्ती में एक कबाड़ बक्सा धरा रहता था जिसके भीतर पुरानी फ़ाइलें, टूटे हत्थों वाली एक कढ़ाई, कुछेक पोटलियां और बिना ट्यूब वाला साइकिल का पुराना पम्प जैसी अंडबंड चीज़ें रखी रहती थीं. दुछत्ती में जाने के लिए खास मेहनत नही करती पड़ती थी. इस दुछत्ती का दरवाज़ा छत तक जाने वाली सीढ़ियों से लगा हुआ था . क्रिकेट खेलने जाते वक्त मैंने डब्बे को उसी बक्से के एक कोने में पोटलियों के नीचे छिपा दिया. हर सुबह शाम एक बार अपने ख़ज़ाने की सलामती चैक कर लेने पर ही इत्मीनान मिलता. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ दिन बाद वह स्थान भी असुरक्षित लगने लगा तो मैंने उसे ढाबू की छत पर बने आले के नीचे धरी ईंट-रेत के पीछे वाली अपनी प्राइवेट सेफ़ को ही सबसे मुफ़ीद पाया जहां पिछले पांच छः माह से कर्नल रंजीत वाली वह फटी किताब अब तक सुरक्षित धरी हुई थी जिसे परजोगसाला से लफ़त्तू ने मेरे लिए चाऊ किया था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ढाबू की छत का नामकरण बन्टू, उसकी बहन और मैंने किया था. ढाबू का मकान असल में एक बूढ़े आदमी की सम्पत्ति था. चूंकि मकान अक्सर खाली रहा करता, उसकी छत पर हम अपना एकाधिकार समझा करते थे. एक बार हम तीनों वहां धरे रेत के टीले पर लकड़ियां खुभा कर किला बनाने का खेल खेल रहे थे जब बुड्ढा पता नहीं कहां से आ गया. उसने हमें बहुत धमकाया. बन्टू ने अपने पापा से शिकायत की कि बुड्ढा आ कर हमें डांट गया. बन्टू के पापा ने उल्टे बन्टू को थप्पड़ जड़ा और कहा कि खबरदार किसी बुज़ुर्ग को बुड्ढा कहा तो. छत पर वापस आकर गुस्साप्रेरित रचनात्मक अतिरेक के किसी एक क्षण हम तीनों ने फ़ैसला किया कि बाकी बुड्ढों से हमें कोई आपत्ति नहीं है पर इस वाले से है और हम उसे अपने हिसाब से बुड्ढा कहेंगे. इस तरह बूढा का उल्टा बना ढाबू. आस पड़ोस में आज भी रामनगर में वह छत ढाबू की छत के नाम से विख्यात है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घर से घड़ी गायब हो चुकने का समाचार मिलते ही लफ़त्तू के पापा उस की तीन चार दफ़ा भीषण धुनाई कर चुके थे. लफ़त्तू को अपने घर में ही चोट्टा या हद से हद बौड़म कह कर सम्बोधित किये जाने का रिवाज़ था. इतनी मारें खा चुकने के बाद लफ़त्तू अब ढीठ और हद दर्ज़े का बहादुर बन चुका था. वह मार खाता रहा और चूं तक न बोला. तीसरी बार तो उसे इतना ज़्यादा मारा गया कि पड़ोस में रहने वाली क्रूर सरदारनी को उसे बचाकर अपने घर ले जाना पड़ा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लफ़त्तू का बड़ा भाई हाकी वगैरह ले कर मैकेनिक गली में "एक एक को देख लूंगा सालो" कह कर एक चक्कर काट आया पर न सत्तार कुछ बोला न कोई और मैकेनिक. जाहिर तौर पर सत्तार के हाथ बढ़िया सौदा लगा था और वह अगले बिज़नेस की राह देख रहा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं दिन में दो बार ढाबू की छत पर जाता और डब्बे को छू कर देख लेता. एक नज़र कर्नल रंजीत की किताब पर डालता और किसी के आ जाने से पहले पहले वहां से हट जाता. पर कोई चोर निगाह मुझे लगातार देखे जाती थी. एक दिन वहां से डब्बा गायब था. किताब की चिन्दियां की जा चुकी थीं. तब तक के जीवन का यह सबसे बड़ा आघात था. दुर्घटना घटते ही मेरा शक सत्तू पर गया क्योंकि उसकी छत ढाबू और हरिया हकले की छतों के एक तरह से बीच में पड़ती थी. लेकिन क्या तो किसी से पूछा जाता और किस आधार पर. ज़रा सी लापरवाही से लफ़त्तू की जान को ख़तरा था. और मेरी जो सुताई होती सो अलग.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तिमाही का रिजल्ट आ चुका था और पहली बार मैं क्लास में दूसरे नम्बर पर आया.  ज्याउल ने टॉप किया था. घर पर हल्का फ़ुल्का मातम मनाया जा रहा था हालांकि मुझे पता था कि ज़रा सी मेहनत से मैं भी टॉप कर सकता था. पर ज्याउल के फ़र्स्ट आने का मुझे कोई दुख नहीं था. दुख तो तब होता जब प्याली मात्तर का नाती गियानेस अग्गरवाल संस्कृत और हिन्दी में बेमान्टी से सौ में सौ दिए जाने पर हमसे आगे निकल जाता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घर पर पहली दफ़ा ज्याउल का पॉजीटिव ज़िक्र हुआ और मेरे पिताजी ने उस से दोस्ती करने को कहा. "रहमान साब भी इतने बढ़िया पढ़े लिखे आदमी हैं बेटा. पढ़े लिखों की संगत करोगे तो कभी पछताओगे नहीं." गड़त में सौ में सौ लाने के ऐवज़ में मुझ से कोई भी चीज़ मांगने को कहा गया तो मैंने झट से उसी डबल डेकर की मांग की. भाई के साथ मुझे भेजा गया और डबल डेकर के अलावा कोई किताब लेने को भी कह दिया गया. यूं पहली बार राजन इकबाल नाम के दो जासूसों से अन्तरंग परिचय की राह बनी. जब-जब कर्नल रंजीत उस फटी किताब के पन्नों में अकेला किसी होटल में किसी महिला के साथ होता था तो भीगी बिल्ली बन जाता था और अजीब अबूझ शब्दो में उनके प्राइवेट कारनामों का ज़िक्र होता. राजन इकबाल जो कुछ करते थे वह हम भी कर सकते थे. बल्कि अगर उन्हें टुन्ना झर्री का नाम मालूम होता तो वे शायद बेताबी से उसका शिष्यत्व ग्रहण कर रामनगर आ बसते.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तिमाही की छुट्टियां होने के साथ ही धूल मैदान से बस अड्डे का टैम्प्रेरी विस्थापन हुआ और मुन्ने फ़कीर के सालाना उरस के मौके पर कव्वाली और मेला आयोजन की तैयारी चालू हो गई. उरस के लिए क्या हिन्दू क्या मुसलमान सारे बड़े पुरुष टोलियां बनाकर घर-घर दुकान-दुकान जा कर चन्दा इकट्ठा किया करते थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इधर ज्याउल दो दफ़ा मेरे घर आ चुका था. उसकी सलीकेदार भाषा सुनकर मेरी मां हैरत में रह जाती थी. उसे यकीन ही नहीं होता था कि वह मुसलमान है. उसके लिए तो मुसलमान का मतलब शरीफ़ या जब्बार भर होता था. जब वह उनके पैर छूकर गया तो उसने दार्शनिक आवाज़ निकाल कर कहा: "पिछले जन्म में हिन्दू रहा होगा बिचारा!"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पापा से पिटाई खाने के एक हफ़्ते तक लफ़त्तू को कहीं देखा नहीं गया. सारा मोहल्ला उसके पापा की थूथू करता रहा क्योंकि यह तय माना जा रहा था कि लफ़त्तू को गहरी गुम चोटें आई हैं. शुरू के दो-तीन दिन अपने सामने लगा खाना देख कर मेरे गले में जैसे कोई सूखा पत्थर फंस जाता. एक दिन मेरी बहन जो लफ़त्तू की बहन की दोस्त थी, ने घर पर सब को और खासतौर से मुझे सुनाते हुए सूचना दी कि दो तीन दिन में लफ़त्तू बिल्कुल ठीक हो जाएगा. वह खुद अपनी आंखों देख कर आई है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उरस से पहले दरगाह में जाकर मिन्नत मांगने का रिवाज़ था. उरस के पहले दिन ज्याउल अपनी अम्मी के साथ दरगाह जाने वाला था. मैंने पिछली शाम उस से तकरीबन भर्राए गले से गुज़ारिश की कि मेरी तरफ़ से दुआ मांग ले कि मेरा दोस्त, मेरा उस्ताद लफ़त्तू जल्दी ठीक हो जाए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उरस की शाम से क्या कव्वालियों का समां बंधा. समझ में न तो बोल आते न संगीत पर अन्दर तक कोई चीज़ प्रवेश कर जाती और मन आह्लाद से लबालब हो जाता. मैं खिड़की पर बैठा सामने शामियाने के भीतर मेले की चहलपहल का जायजा लेता जाता और कव्वाली अपना काम करती रहती. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरे दिन मुझे ज्याउल के साथ उरस के मेले में जाने की इजाज़त मिल गई. अन्दर तमाम बच्चे ही बच्चे थे. वो भी थे जो कुछ माह पहले सब्ज़ी मन्डी में मस्जिद से लगी दीवार से सटाकर लगाई अपनी बच्चा दुकानों पर कटारी-सफ़री बेचते मुझे डराया करते थे. उत्सव के इस माहौल में उनके तेवर भी बदले हुए थे. मेरी चोर निगाहें सकीना को खोजती थीं अलबत्ता अब उस का चेहरा भी मुझे ठीक से याद नहीं रहा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अस्सलाम" "तस्लीम" "भाईयान" वगैरह शब्द बहुतायत में हवा में उड़ रहे थे और ये हिन्दू मुसलमान दोनों मुखारविन्दों से बाहर आ रहे थे. एक कोने पर कव्वाली का पंडाल लगा हुआ था जिस के भीतर फ़िलहाल तम्बू कनात वाले थके मजदूर इत्यादि विभिन्न मुद्राओं में विराजमान थे. बस अड्डे वाले हिस्से पर खाने पीने की चीज़ों के ठेले, दुकानें सजाई गई थीं. जगुवा पौंक और मास्टरपुत्र गोलू भी हमें वहीं मिल गए. कुछ देर में बन्टू और सत्तू भी. मौके का दस्तूर था कि घर से मिले पैसों को तुरन्त तबाह कर दिया जाए. बमपकौड़े वाला बौना हमें देख बहुत उत्साहित हुआ. और बिना पूछे पत्तल बनाने लगा. पत्तल बनाते बनाते उसने बिना मेरी तरफ़ देखे पूछा: "बाबूजी नहीं आ रहे आजकल. लगता है बाहर गए हैं. आएंगे तो कहियेगा नया खेल लगा है अबकी धरमेन्दर का!" मैंने खुद को शर्म, दुःख और असहायता में डूबा पाया और मेरी आंखें ज़मीन से लग गईं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ज्याउल ने पत्तल बौने से लेकर मेरी तरफ़ बढ़ाया ही था कि "धिचक्याऊं! धिचक्याऊं! धिचक्याऊं!" की तोतली आवाज़ मेरे कानों में पड़ी और लफ़त्तू धीमे धीमे दौड़ता सा हमारे ऐन बगल में आ खड़ा हुआ. "थाले अकेले अकेले खा लये हो हलामियो!"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं उसके गले लग गया पर उस ने मुझे आराम से दूर किया: "थूने में अबी दलद होता है याल अतोक!"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस तरक का हर माहौल लफ़त्तू के लिए ही रचा गया लगता था. सदियों से. सारी मनहूसियत एक सेकेन्ड में गायब हो गई. बौने ने बाबूजी का आत्मीय इस्तकबाल किया. पहली बार उसके बमपकौड़े के पैसे मैंने दिए. हमारा पिद्दी टोला अब अपने मरियल सीनों को भरसक बाहर निकालने की कोशिश करता तनिक घिसटते चल रहे लफ़त्तू का अनुसरण करते दुकानों के मुआयने पर निकल चला.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक कोने पर कुछ छोटे बच्चों की भीड़ लगी हुई देखी तो हम इन्स्टिंक्टिवली वहीं चल दिए. एक कोने में पट्टे का पाजामा और फ़टी बंडी पहने एक बारह पन्द्रह साल का लड़का रुंआसा खड़ा था. वह सूरत से ही किसी पहाड़ी गांव से आया लगता था. लफ़त्तू ने हमें पांचेक मीटर दूर रुक जाने का आदेश दिया. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बच्चे उस लड़के से पूछ रहे थे: "क्या बेच रिया भैये?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"का ना मूफल्ली है. कितनी बार पूछोगे?" उसका धैर्य टूटता सा दिख रहा था और वह बस रोने को ही था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अबे मूफल्ली नईं कैते मूमफ़ली कैते हैं!" कहती हुई बच्चा पार्टी हंस कर दोहरी हो गई. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"बता ना क्या भाव लगा रिया?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"भैया बार आने की पाव भर मूफल्ली."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मूफल्ली ..." उसी की टोन में इस शब्द का उच्चारण करते बच्चों पर पुनः हंसी का दौरा पड़ा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लफ़त्तू मामला समझ गया. हमें साथ आने को कह कर वह वहां पहुंचा और बच्चों को हड़काते हुए बोला: "थालो एक एक की हद्दी तोल दूंगा. फूतो थालो! फूतो!" एक बच्चे की पिछाड़ी पर उसकी लात भी पड़ी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब मूफल्ली विक्रेता छोकरा और हमारा पिद्दीदल आमने सामने थे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"कां थे आया ऐ?" अपने को बॉस दिखाने की मुद्रा में लफ़त्तू ने पूछा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"भतरौंजखान से."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"ये प्लेन्त ऐ बेते. यां नईं तलती मुपल्ली. मूम्पली नईं कै तकता?" उसके बोरे से दो-चार मूंगफलियां साधिकार निकालते उसने हिकारत से कहा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मुम्फल्ली."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"हां" कुछ सोच कर लफ़त्तू ने कहा "ये तलेगा." फिर पूछा "यां अकेला आया ऐ?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"नईं बाबू साथ आए रहे मुझ को यहां बैठा गए कि अभी आ रहा हूं कह के. पता नईं कां गए. लौंडों ने इतना दिक कर दिया. मैं जाता हूं अब." वह अपना बोरा उठाने को हुआ तो लफ़त्तू ने उसे डपटा "थाला बला आया बिदनत कलने वाला. गब्बल का नाम नईं छुना तैने. जो दल ग्या बेते वो मल ग्या. अब बैत के बेत मूमफली. कोई तंग नईं कलेगा. गब्बल की गालन्ती ऐ."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लफ़त्तू ने मुझ से चवन्नी मांगी और उस से मूंगफली खरीदी. उसकी तरफ़ आंख मारी और कहा "दलना मती."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेले में घूमते काफ़ी देर हुई और हम मूंगफली टूंगते लगातार आपस में मूफल्ली मूफल्ली कर हंसते रहे और प्रफुल्लित हुआ किए. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घर लौटते लफ़त्तू से मैंने दबी ज़ुबान में पूछा: "बहुत मारा ना पापा ने तुझे."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अले हो ग्या याल. गब्बल को कौन माल छकता है." उसकी आवाज़ में पुराना आत्मविश्वास तनिक कम था. उसने मुझ से भी दबी ज़ुबान में मुझ से पूछा: "अपनी भाबी को देका तूने याल? कोई कै रा था गोबलदाक्तर का त्लांतपल हो ग्या."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी ज़ुबान पर गोंद चिपका हुआ था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहली बार उदास आवाज़ में वह बोला: "याल कुत्तू गमलू लामनगर छे तले दाएंगे क्या?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;(जारी)&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछली कड़ियां:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://lapoojhanna.blogspot.com/2009/07/blog-post.html"&gt;पहला हिस्सा&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://lapoojhanna.blogspot.com/2009/07/blog-post_28.html"&gt;दूसरा हिस्सा&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/272678107746144576-3322031060797416999?l=lapoojhanna.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://lapoojhanna.blogspot.com/feeds/3322031060797416999/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=272678107746144576&amp;postID=3322031060797416999' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/272678107746144576/posts/default/3322031060797416999'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/272678107746144576/posts/default/3322031060797416999'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://lapoojhanna.blogspot.com/2009/07/blog-post_9996.html' title='ज्याउल, उरस की मूफल्ली, मोर्रम और ब्रिच्छारौपड़ - ३'/><author><name>लपूझन्ना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06722723246925370677</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-272678107746144576.post-8936808574832155319</id><published>2009-07-28T13:12:00.004+05:30</published><updated>2009-07-28T18:23:18.970+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लोए का पाइप'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ज्याउल'/><title type='text'>ज्याउल, उरस की मूफल्ली, मोर्रम और ब्रिच्छारौपड़ - २</title><content type='html'>बिला नागा हर सुबह पाकिस्तान की तरफ़ से दो हाथठेलों में लाल दाग लगी चारखाने की तहमतों से ढंका ढुलमुल ढुलमुल गाय-भैंस का मीट पता नहीं कहां ले जाया जाता था. पाकिस्तान की हमारी हद शरीफ़ सब्ज़ीवाले की दुकान से सटी जब्बार कबाड़ी की गुमटी थी. उस से आगे एक अनजाना अनदेखा रहस्यलोक था जहां किसी फ़कीर की दरगाह थी और उसके आगे कब्रिस्तान, मिट्टी के ढूह, जंगल और उसके ऊपर एक आसमान जो रातों को सियारों की हुवांहुवां से अट जाया करता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मत्यु और अन्तिम संस्कार जाहिर है हमें सबसे ज़्यादा फ़ैसिनेट करते थे और इस बाबत अक्सर ही हम तमाम कयासों से भरी बहसों का आयोजन किया करते. लफ़त्तू जो किसी ज़माने में मुछलियों से दूर रहने की चेतावनियां दिया करता था, इधर लगातार उनके प्रति सहिष्णु और सदाशय होता जा रहा था. इस परिवर्तन के पीछे हो सकता है ज्याउल का साथ रहा हो या स्कूल के मात्तरों का मैमूदों के प्रति सौतेला व्यवहार. जो भी हो.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सत्तू और जगुवा ने एक दफ़ा छिप कर पाकिस्तानी अन्तिम संस्कार के प्रत्यक्षदर्शी होने का क्लेम किया पर लफ़त्तू उन्हें अपने एक सवाल से निरुत्तर बना दिया करता: "बेते ये बताओ लाछ को बैथा के गालते हैं या खला कल के?" झाड़ी के बहुत दूर होने से सब कुछ साफ़ नज़र नहीं आया के झूठमूठ बहाने से सत्तू और जगुवा इधर उधर देखने लगे. "मुदे द्‍याउल ने बताया था" कहकर लफ़त्तू इस तरह के सेमिनारों में एक तरह से अध्यक्ष की भूमिका में आ जाया करता. उसने कहीं से पता लगा रखा था कि लकड़ी के बक्से में रख कर लाश को दफ़नाते वक्त उसके साथ लोहे के पाइप का एक टुकड़ा भी रखा जाता है. मेरे इस बाबत सवाल पूछने पर उसने आंखें और छोटी बना कर कहा: "दमीन के नीते बौत अन्देला होता है बेते. मित्ती के अन्दल लाछ दुबाला दिन्दा ओ दाती है. इत्ते अन्देले में कोई देक तो कुत छकता नईं. इतलिए पाइप के तुकले को लकते हैं. लाछ ... आप छमल्लें लोए के तुकले को आंक पे लगाती है औल उत को को थब दिकने लगता है बेते. ..." वह रुक रुक कर रहस्यनामा बांधा करता. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोहे के पाइप के टुकड़े वाली लफ़त्तू थ्योरी मुझे काफ़ी हद तक सही लगती थी. रातों को जब कभी कभी हम भाई बहन एक दूसरे को डराने के उद्देश्य से भूतप्रेत की कहानियां सुनाया करते थे. मेरे भाई ने कसम खा कर बताया था कि जब वह अपने एक दोस्त के दादाजी के दाह संस्कार में श्मशान गया था तो वहां उसने यहां वहां रखे लोहे के पाइप के कई टुकड़े देखे थे. जब मुर्दा जल रहा होता है तब अगर कोई भी आदमी पाइप के टुकड़े में आंख गड़ा कर देखे तो उसे श्मशान भर में रहने वाले सारे भूत दिख जाते हैं. "दद्दा तूने देखा था?" छोटी ने पूछा, तो उसने असमंजस में सिर डोलाते हुए हां-ना जैसा कुछ कहा. बहरहाल मेरे लिए मृत्यु के साथ लोहे का पाइप अपरिहार्य रूप से जुड़ गया था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ज्याउल की बड्डे पाल्टी से लौटने के बाद मैं कीचड़ खा कर लौट रहे किसी मरियल पालतू कुत्ते की तरह चोरों जैसा घर में घुसा. पर किसी ने ध्यान ही नहीं दिया. आस पड़ोस की कुछेक औरतें अगले रोज़ 'जै सन्तोसी मां' पिच्चर देखने बनवारी मधुवन जाने का प्लान बना रही थीं. इन स्त्रियों ने इधर हर शुक्रवार को व्रत रखना और खट्टा न खाने का रिवाज़ बना लिया था. लफ़त्तू हर शुक्रवार को मुझे खूब चटनी डलाया बमपकौड़ा अवश्य खिलाया करता. बुध-शुक्र की किसे याद रहती थी. वो तो जब पहली बार ऐसा हो गया तब लफ़त्तू ने नकली शोक जताते हुए कहा कि अब सन्तोसी माता हमें सारे इम्त्यानों में फ़ेल कर देगी. पर रिजल्ट खराब नहीं आया. इस का तात्कालिक अर्थ यह निकाला गया कि शुक्रवार को बमपकौड़ा खाने से कुछ खास परेशानी नहीं होती. हालांकि थोड़ा बहुत डर लगता था कि अगर सन्तोसी माता सच में आ गई तो क्या होगा तो भी जानबूझ कर हर शुक्रवार को किया जाने वाला यह सत्कर्म काफ़ी एडवेन्चरस लगा करता था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रात को खाना खाते वक्त मां ने पूछा कि मैंने अंगुस्ताना खरीद लिया है या नहीं. मैंने सिर हिलाकर हामी भरी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगली सुबह लफ़त्तू स्कूल देर से आया. इन्टरवल के समाप्त होने से मिनट भर पहले. उसका लाल पड़ा चेहरा बतला रहा था कि उसने कोई उल्लेखनीय सफलता अर्जित की है जिस की सूचना वह सार्वजनिक रूप से नहीं दे सकता. बहुत मुश्किल से बीता अगला पीरियड. मैं सबसे आगे बैठता था जबकि लफ़त्तू की शरारतें सबसे पिछली कतारों में बैठने पर ही सम्भव होती थीं. पीरियड के बाद हमें परजोगसाला के बगल वाले हॉल में जा कर सिलाई की कक्षा हेतु भूपेस सिरीवास्तव मास्साब के कमरे में जाना होता था. घन्टा बजते ही लफ़त्तू लपक कर मेरे पास आया और अपना बस्ता साइड से खोल कर उसने अपनी जेब से कुछ नोट निकाल कर दिखाए. "बारा रुपे में बेच दी दीदी की घली" - एक पल को उसका चेहरा दर्प से चमका. मुझे डर लगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छुट्टी होते ही हम ज्याउल वाले सैक्शन के बाहर जा कर खड़े हो गए. लफ़त्तू ने कस कर मेरा हाथ थामा हुआ था. ज्याउल बाहर आया तो लफ़त्तू ने ज़ोर की आवाज़ दे कर उसे पास बुलाया. उसके आते ही हम तेज़ तेज़ कदमों से धूल मैदान के एक निविड़ कोने पर हो गए. लफ़त्तू ने अपना बस्ता खोला और उसके अन्दर से चमचम करता लाल पीले रंग का जौमेट्री बक्सा बाहर निकाला. मेरी नज़र खुद गुप्ता पुस्तक भंडार के शोकेस में लगे उस डेबल डेकर को देख कर कई कई बार ललचा चुकी थी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"ले. अतोक औल मेली तलप से ये तेला बड्डे गिट्ट ऐ याल द्‍याउल." लफ़त्तू की आवाज़ में अपनापा था. उसने एक बार दुबारा कहा : "हैप्पी बड्डे टुय्यू!" ज्याउल जब तक कुछ कहता हम जल्दी से कोना छोड़ सार्वजनिक हो गए और अपने अपने घरों की राह लग लिए. रास्ते में लफ़त्तू ने बताया कि सत्तार सिर्फ़ दस दे रहा था पर किस तरह वह बारा रुपे ले के ही माना. मैंने पूछा कि अगर किसी को पता लग गया तो क्या होगा तो उसने आंख मारते हुए बताया कि उसका नाम भी गब्बर है. घर आने को ही था कि उसने अपना बस्ता दुबारा खोला और ठीक वैसा ही डबल डेकर डब्बा बाहर निकाला और जबरिया मेरा बस्ता खोल कर उसमें ठूंस दिया. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;" एक तेले लिए बी लिया मैंने!" मुझे खुशी और भय का संक्षिप्त जॉइंट दौरा पड़ा पर घर के सामने थे हम दोनों अब. जल्द ही छत पर क्रिकेट खेलने आने का वादा करने के उपरान्त  "बीयो...ओ...ओ...ई..." कहता लफ़त्तू मटकता, गुनगुनाता अपने घर की तरफ़ चल दिया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;(जारी)&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://lapoojhanna.blogspot.com/2009/07/blog-post.html"&gt;पहला हिस्सा&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/272678107746144576-8936808574832155319?l=lapoojhanna.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://lapoojhanna.blogspot.com/feeds/8936808574832155319/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=272678107746144576&amp;postID=8936808574832155319' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/272678107746144576/posts/default/8936808574832155319'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/272678107746144576/posts/default/8936808574832155319'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://lapoojhanna.blogspot.com/2009/07/blog-post_28.html' title='ज्याउल, उरस की मूफल्ली, मोर्रम और ब्रिच्छारौपड़ - २'/><author><name>लपूझन्ना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06722723246925370677</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-272678107746144576.post-4921274083641338229</id><published>2009-07-28T02:17:00.002+05:30</published><updated>2009-07-28T02:24:41.096+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ज्याउल'/><title type='text'>ज्याउल, उरस की मूफल्ली, मोर्रम और ब्रिच्छारौपड़ - १</title><content type='html'>पापा के दोस्त इंजीनियर साब का लड़का ज्याउल सिर्फ़ कायपद्दा खेलने हर शाम को आया करता था.  पदता था और कटुवा होने के बावजूद हमें प्यारा था. पढ़ने में भौत होस्यार ज्याउल मुझे तब अच्छा लगता था जब वह क्लास में पूछे जाने वाले किसी मुश्किल सवाल का हल मुझसे पहले बतला कर मात्तरों की नकली और थोथी ही सही शाबासी पा लिया करता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जायदेतर पार्टटाइम करते थे ये मात्तर. जायदेतर मात्तरों की दुकानें थीं और वे इस्लाम, मैमूद, मोम्मद, फ़ैजू, रज्जाक जैसे नाम वाले  बच्चों से इतनी हिकारत से पेश आते थे कि उनके मुंह पे थूक देने की इच्छा होती थी. रामनगर आए जितना भी टाइम बीता था हर बखत हिन्दू-मुसलमान हिन्दू-मुसलमान सुनते सुनते हम अघा गए थे. हमें ये बात समझ में भी आने लगी थी कि मैमूद मैमूद होता है और अरविन्द अरविन्द. मैमूद गन्दा होता है. गाय खाता है. नहाता नहीं है. हम उसके घर जाएंगे तो शरबत पिलाएगा मगर पहले उसमें थूकेगा. इसी वजह से शायद लफ़त्तू ने भी ज्याउल को पसंद करना शुरू कर दिया था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बार हमेशा की तरह जब शाम को वह कायपद्दा खेलने आया और बागड़बिल्ले ने उसे चोर बना दिया तो लफ़त्तू ने विरोध जताते हुए कहा: "द्‌याउल नईं बनेगा आद तोल. आत का तोल मैं". ज्याउल ने तनिक हैरत और संशय में सभी उपस्थित खिलाड़ियों को पल भर देखा पर तुरन्त आम के पेड़ पर चढ़ गया. और क्या मज़ाल कि ज्याउल की रफ़्तार का कोई सामना कर पाता. बाद के दिनों में जब जगुवा पौंक एक बार चोर बना तो ज्याउल की रफ़्तार के आगे रोने रोने को हो गया था. असल में उस दिन के बाद ज्याउल कभी चोर बना ही नहीं. लफ़त्तू उसे अपनी वाली डाल पर बुला लिया करता. यह मेरे लिए कुछ दिन डाह का कारण बना रहा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अलबत्ता लफ़त्तू और मैं अभी ज्याउल के दोस्त नहीं बने थे पर यह एक तरह का आपसी समझदारी का मसला बना ही चाहता था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक रोज़ ज्याउल ने हमें अपने घर पे आने का न्यौता दिया बाकायदा हम दोनों के घर आ कर "आंटी, आंटी" कह कर. ज्याउल का बड्डे था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घर पर उस रात एक महाधिवेशन हुआ जिसमें भाई ने बताया कि साले मुसलिये हर साल ईद से एक महीना पहले किसी हिन्दू के बच्चे को उठा ले जाते हैं. उसे खूब खिला पिला कर मोटा बनाते हैं. ठीक ईद के दिन बच्चे को चावल से भरे एक तसले में लिटाते हैं और तलवार से उसके टुकड़े कर खून रंगे चावलों को पूरे शहर में बाकायदे प्रसाद बांटते हैं. इस से उनका अल्ला खुस होता है. और यह भी कि किसी कीमत पर मैं उस बड्डे पाल्टी में नहीं जा सकता. बहनों के चेहरे हैरत और हिकारत से सन गए थे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तय यह पाया गया कि मैं तो नहीं जा सकता मुसलिये के घर में. हां बौड़म लफ़त्तू के जो मन आए सो करे. मैंने असहायता में अपनी आंखें भरी भरी महसुस कीं पर उस्ताद लफ़त्तू की बात याद आई कि बेते जो दला वो मला. बेहतरी इसी में थी कि चुप्पा लगा लिया जाए और यह भी कि देखें कौन रोकता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घर पे झूठ बोला गया कि आज लच्छमी पुस्तक भन्डार से पेन्सिलें और कि सिलाई क्लास के वास्ते टंडन इश्टोर से नया अंगुस्ताना लाना है. अंगुस्तानों के लिए मांगे गए पैसों के ऐवज़ में किराये पे साइकिल ली और चल पड़े ज्याउल की कालोनी की तरफ़. बड्डे गिट्ट के पैसे नहीं थे लफ़त्तू ने अपने घर से अपनी बहन की लेडीज घड़ी पार कर ली थी जिसे सत्तार मैकेनिक को बेचने की हम दोनों की हिम्मत नहीं पड़ी. "द्‌याउल को दे देंगे याल. कौन थाला उछे पूत लिया ऐ कि कित ने दी. तेला मेला बद्दे गिट्ट ऐ." &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लफ़त्तू की बड़ी बहन की घड़ी उसकी जेब में पड़ी ही रही. क्या अजब मंजर उस घर में था. हर कोई एक दूसरे को आप आप कह रहा था. घर भर में कैसी कैसी तो दिलफ़रेब खाने की ख़ुशबुएं और क्या लकदक लकदक चमचम औरतें लड़कियां. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"आइये आइये!" कह कर एक हम उम्र लड़की ने हमारा स्वागत किया. हल्का आसमानी तारों भरा लिबास ही बहुत था हमें अधमरा कर देने को. "आप ज़िया भाई के दोस्त हैं ना?" हमारा उत्तर आने से पहले ही "ज़िया भाई ज़िया भाई आपके दोस्त आए हैं! ..." कहता हुआ आसमानी लिबास उंगलियों के पोरों से अपने को समेटता भाग चला.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ज्याउल ने हमें काजू पड़ी सिवइयां सुतवाईं, और जाने क्या नमकीन नमकीन भी. अन्दर ले जा कर अपने मां बाप से मिलवाया. न सूरत याद रही किसी की न लिबास. बस "अम्मी, अब्बू, बाजी, खाला" वगैरह सुनाई देता रहा. न केक था न प्लेटों में कुन्टल भर चाट भरने वाली गमलू कुच्चू के घर उनके बड्डे वाली वो मुटल्ली औरतें. हां खुसफ़ुस बहुत हो रही थी पर किसी ने हमारी तरफ़ ध्यान तक नहीं दिया.  ज्याउल की अम्मी ने हमारे सिरों पर हाथ फेरा और कुछ अल्ला अल्ला कहा और चाबी-ताला जैसा भी.   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साइकिल आधे घन्टे के किराए पे थी और यह बात लफ़त्तू ने जल्दी जल्दी ज्याउल को बता दी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ज्याउल कुछ रेयेक्ट करता इस के पहले ही लफ़त्तू बोल पड़ा: " द्‍याउल तू मेला बाई ऐ याल. तेले मम्मी पापा कित्ते अत्ते ऐं याल. कल ..."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ कहता कहता लफ़त्तू रुक गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"तल बेते" कह कर उसने मुझे डंडे पे बिठाया और हम हवा बन कर बजाजा लाइन के नज़दीक मौजूद साइकिल वाले के ठीहे तक पहुंचे. हम शायद थोड़ा लेट थे पर साइकिल वाले ने जायदे तबज्जो नहीं दी.&lt;br /&gt;घर पास आने को हुआ तो लफ़त्तू को अपनी जेब में पड़ी घड़ी याद आई. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अले याल द्‍याउल का गिट्ट रै गया" उसने मुझे हमेशा की तरह एक बार फिर बच्चा जाना और बोला: "अपने घल दा तू."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे पूछने पर कि वो कहां जा रहा है उसने आंख मारी और सद्यःपारंगत  उंगलियों को ख़ास अन्दाज़ में मोड़ते हुए बोला: "वईं! क्वीन कबल कलने! थाले द्‍याउल का गिट्ट तो रै गया. अब कल देंगे तू औल मैं. बलिया वाला."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं असमंजस में घासमंडी के मुहाने पर खड़ा था जब उस ने कहा: "किती ते कैना नईं बेते!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(जारी)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/272678107746144576-4921274083641338229?l=lapoojhanna.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://lapoojhanna.blogspot.com/feeds/4921274083641338229/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=272678107746144576&amp;postID=4921274083641338229' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/272678107746144576/posts/default/4921274083641338229'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/272678107746144576/posts/default/4921274083641338229'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://lapoojhanna.blogspot.com/2009/07/blog-post.html' title='ज्याउल, उरस की मूफल्ली, मोर्रम और ब्रिच्छारौपड़ - १'/><author><name>लपूझन्ना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06722723246925370677</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-272678107746144576.post-6665862702432202495</id><published>2009-04-25T15:02:00.004+05:30</published><updated>2009-04-25T18:41:59.158+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जगुवा पौंक'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कैरमबोट'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नेस्ती मास्टर'/><title type='text'>नेस्ती मास्टर,कैरमबोट की बारीकियां और जगुवा पौंक</title><content type='html'>बन्टू के एक मामा विदेश में रहा करते थे. उनका पूरा परिवार हफ़्ते-दस दिन के लिए रामनगर आया. इन दिनों में बन्टू ने मुझे और लफ़त्तू को अपनी अनदेखी से इस कदर जलील किया कि एक शाम घुच्ची-प्रतियोगिता के उपरान्त उचाट होकर खेल मैदान की चारदीवारी पर विचारमग्न लफ़त्तू ने बन्टू के परिवार की स्त्रियों को याद करते हुए आदतन ज़मीन पर थूकते हुए कहा: "थाला बन्तू अपने को ऐते छमल्लिया जैते तत्ती कलने बी कोत-पैन्त पैन के दाता होगा."   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"तल" कह कर उसने मेरा हाथ थामा और मुझे खींचता हुआ बौने के ठेले की दिशा में ले चला. घुच्ची से बचे पैसों से उसने मुझे बमपकौड़ा सुतवाया. पहली बार बमपकौड़ा इस कदर बेस्वाद लगा था मुझे. मिर्चभरी चटनी के कारण बह आई अपनी पिचकी नाक को लफ़त्तू ने आस्तीन से पोंछा और बन्टू द्वारा हाल में प्रदर्शित की गई नक्शेबाज़ी को लानतें भेजते हुए घोषणा की: "कौन थाला बन्तू का मामा लामनगल में ई रैने वाला ऐ बेते! लात्त में लौतेगा तो गब्बल के पात ई ना बेते. तब देकना यां पे बिथाऊंगा थाले को!" कहकर लफ़त्तू ने अपनी नेकर के गुप्त स्थान की तरफ़ इशारा किया, मुझे आंख मारी और " ... दान्त तत ... उहुं ... उहुं ... " गाते, मटकते अपनी नैसर्गिक लय को प्राप्त कर लिया. मुझे मेरे घर के बाहर छोड़कर उसने बन्टू की खिड़की की तरफ़ मुंह उठाया और "ओबे मामू ... बीयो ... ओ ...ओ ...ओ... ई..." का नारा बुलन्द किया. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बन्टू के मामा उस के लिए एक फ़ैन्सी टाइप का कैरमबोट लाए थे - खरगोश-बिल्ली इत्यादि के आकर्षक काल्टूनों से सुसज्जित गोटियों का सैट और सुर्ख़ लाल श्टैकर. इस के अलावा बन्टू के लिए काला चश्मा- चाकलेट-जाकिट-लाल पाजामा-माउथऑर्गन और जाने क्या-क्या. बन्टू दिन के किसी एक पहर मेरे पास आता, इन में से किसी एक चीज़ को मुझे दिखा कर ललचाता और ज्यों ही मैं उसे छूने को होता, "न्ना! तू तोड़ देगा! भौत महंगा है बता रहे थे मामाजी!" कहकर छलांगें मारता वापस अपने घर बक़ौल लफ़त्तू अपने मामू के पास अपनी देह के क्षेत्रविशेष की हत्या करवाने चला जाता. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्लास में अरेन्जमेन्ट में एक रोज़ नेस्ती मास्टर उर्फ़ विलायती सांड यानी टुन्ना झर्री के पिताश्री की बारी लगी. परम मनहूस नेस्ती मास्टर को देख कर लगता था जैसे एक करोड़ मक्खियों का अदॄश्य दस्ता उनके मुखमण्डल के चारों को भिन्नौटीकरण में लीन हो. नेस्ती मास्टर बम्बाघेर में रहा करते थे. जाहिर है उनका महान पुत्र टुन्ना भी वहीं रहता था. हमारा क्लासफ़ैलो जगदीस जोसी उर्फ़ जगुवा पौंक भी इसी मोहल्ले का बाशिन्दा था.क्लास में घुसते ही नेस्ती मास्टर ने जगदीस को ताड़ लिया और बिना अटैन्डेन्स लिए उस से पूछा: "टुन्ना को देखा तैने?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"नईं मास्साब"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अच्छा!" कहकर नेस्ती मास्टर ने एक कराह जैसी जम्हाई ली और कुर्सी पर लधर गए. लधरावस्था में ही उन्होंने जगुवा पौंक से कहा "ये रईश्टर में सब बच्चों के नाम के आगे उपस्थित लिख दीजो जगुवा" और आंखें मूंदे क्लास को निर्देशित करते हुए चेताया: "अब चुपचाप बैठे रइयो सूअरो! और खबरदार जो तंग करा तो!" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नेस्ती मास्टर को आलस्य के अलावे दो अन्य जैविक क्रियाओं में महारत हासिल थी. वे ख़र्राटे भरते हुए भी अपने स्थूल पृष्ठक्षेत्र को बांईं तरफ़ से ज़रा सा उठा कर करीब हर चौदह मिनट के उपरान्त संगीतमय वायु विसर्जन कर लेते थे और हर सोलहवें मिनट पर "ख्वाक्क" करते हुए थूक का एक परफ़ेक्ट गोला हवा में उछालते थे जिसकी ट्रैजेक्टरी उनकी वर्षों की तपस्या  के बाद इतनी सध चुकी थी कि सीधी निकटतम नाली के बीचोबीच गिरती - हमेशा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रकार थूकते, विसर्जित आवाज़ें निकालते विलायती सांड मास्साब दो पीरियड तक खर्राटे मारते रहे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"इत्ते खतलनाक मुजलिम का बाप इत्ता तूतिया बेते! बली नाइन्तापी ऐ दद थाब, बली नाइन्तापी ऐ! तुन्ना पता नईं कैते पैदा कल्लिया इत थुकैन-गनैन मात्तल ने! हत थाले को!" लफ़त्तू ने खिड़की से बाहर फांदते हुए दबी आवाज़ में कहा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाहर से उसने मुझे भी कूद जाने का इशारा किया तो मैंने निगाहें फेर लीं. लफ़त्तू  " ... दान्त तत ... उहुं ... उहुं ... " गुनगुनाता खेल मैदान से होता हुआ बमपकौड़े के ठेले तक पहुंच चुका था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नेस्ती मास्टर के जाते ही घन्टा बजना शुरू हुआ तो बजता ही रहा. कुछ सीनियर लौंडे आकर बता गए कि परजोगसाला सहायक चेतराम की बीवी मर गई है और सारे बच्चों को असेम्बली मैदान पर जमा होना है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धूल-हल्ले-चीखपुकार इत्यादि के बीच अन्ततः जब चीज़ें सामान्य हुईं तो गोल्टा मास्साब ने लौडश्पीकर पर एलौंस किया कि स्कूल के परजोगसाला सहायक सिरी चेतराम जी की जीबनसंगिनी जी उहलोक यात्रा पर निकल गईं हैं जिसकी एवज़ हम लोग दो मिनट का मौन रखेंगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसा कहते ही गोल्टा मास्साब चुप हो गए और उनकी निगाहें जूतों से चिपक गईं. जाहिर है हम से भी यही उम्मीद की जाती थी. लफ़त्तू पता नहीं कब और किस रास्ते से वापस आकर मेरे ठीक पीछे खड़ा हो चुका था. मैंने निगाह उठाकर चारों तरफ़ देखा. ज़्यादातर लोग सिर झुकाए थे. कुछेक लड़के खीसें निपोरे अपनी शरारतों में व्यस्त थे. मगर बोल कोई नहीं नहीं रहा था - लफ़त्तू के सिवा. फ़ुसफ़ुस फ़ुसफ़ुस करते हुए उसने मुझे सूचित किया कि बन्टू का अंग्रेज़ मामा वापस चला गया है और यह भी कि मौन के बाद छुट्टी हो जानी है. छुट्टी के बाद उसने मेरी तरफ़ से भी यह तय कर लिया था कि हम लोग सीधे वापस घर न जा कर पहले जगदीस जोसी के साथ बम्बाघेर जाएंगे और हुआ तो टुन्ना दर्शन कर आएंगे. बन्टू को नहीं ले जाया जाएगा क्योंकि वह दगाबाज़ इन्सान है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लफ़त्तू यह सब बता ही रहा था कि आसपास की एक कतार से किसी एक लड़के की हंसी छूटने की आवाज़ आई. उसका हंसना था कि तकरीबन आधे लड़के अपनी दबी हुई हंसी पर कन्टौल न कर सके. दो-चार सेकेन्ड बीते और सम्भवतः दो ऑफ़ीशियल मिनट पूरे हो गए. जैसे छापामार दस्ते पहाड़ों के बीच अवस्थित दर्रों के बीच से अचानक प्रकट होकर लापरवाह पुलिसवालों की ठुकाई कर जाया करते हैं उसी अन्दाज़ में सारे मास्टरों ने दो मिनट का मौन ख़त्म होते ही असेम्बली मैदान को जलियांवालाबाग में तब्दील कर दिया. मुर्गादत्त मास्साब ने जरनील डायर के रूप में अपने आप को स्वतः नियुक्त कर लिया था. बच्चों की धुनाई चल रही थी और स्वर्ग से इस दॄश्य का अवलोकन कर रही परजोगसालासहायकार्धांगिनी की आत्मा को शान्ति प्राप्त हो रही थी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लफ़त्तू और मुझे भी बेफ़िजूल बिलावजह कुछेक सन्टियां खानी पड़ीं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जलियांवालाबाग काण्ड की वजह से लगी चोटों और दर्द के बावजूद लफ़त्तू द्वारा निर्धारित कार्यक्रम में कोई तब्दीली नहीं आई. जगदीस जोसी उर्फ़ जगुवा पौंक के नेतृत्व में मैं और लफ़त्तू बम्बाघेर में प्रवेश कर चुके थे. किसी पिक्चर में देखे गए राजकुमार जानी की अदा से मैं अपनी निगाहें किसी जासूस की भांति भरसक चौकस बनाए हुए था कि कहीं ऐसा न हो टुन्ना सामने से गुज़र जाए और हम उसके दर्शन भी न कर सकें.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जगुवा बहुत उत्साहपूरित था. वह रास्ते भर हमें टुन्ना के ऐतिहासिक कारनामों और उसकी अकल्पनीय उपलब्धियों के बारे में तीन-चार महाग्रन्थों की सर्जना कर चुका था. जीनातमान के नाच के बाद मुसलिए लौंडों द्वारा टुन्ना को पीटे जाने की ख़बर उसे थी पर उस बाबत उसने ज़्यादा बातें नहीं कीं क्योंकि इस में बम्बाघेर मोहल्ले की बेज्जती खराब होने का चान्स था. हम खुद इस बारे में बहुत ऑथेन्टिक कुछ नहीं जानते थे. ऊपर से हम टुन्ना की कर्मस्थली में पर्यटक बन कर जा रहे थे सो चुप लगा जाने में ही हमारी बेहतरी थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लफ़त्तू के घर पर एक शानदार कैरमबोट था. सप्ताह-दो सप्ताह में एक बार हम बच्चों को उस पर हाथ साफ़ करने का मौका मिलता था. लफ़त्तू कमेन्टेटर सलाहकार का काम किया करता था. जगदीस जोसी से हमारी निकटता इसी कैरमबोट से जुड़ी हुई थी. एक दफ़ा वह अपने किसी रिश्तेदार के घर अपने परिवार के साथ आया था जब हमें सड़क पर कैरम खेलता देख कर उसने अपनी माता से रिश्तेदार के घर जाने के बजाय हमारे साथ खेलने की इजाज़त ले ली. दयावान लफ़त्तू ने उसे एक टीम का मेम्बर बना लिया. खेल शुरू होते ही न खेलता हुआ भी लफ़त्तू क्यून को लेकर खस तरह से संजीदा और इमोशनल हो जाया करता. जिसके हाथ में श्टैकर होता, वह अपरिहार्य रूप से उसे "ओबे क्यून कबल कल्ले!" की सलाह देने में ज़रा भी देर नहीं लगाता. इस से होता यह था कि खिलाड़ियों का कन्सन्ट्रेशन भंग होता और खेल बहुत लम्बा खिंच जाता. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जगदीस बहुत तेज़ी से गोटियां पिल कर रहा था और अप्ने कैरम कौशल से हमारे कॉन्फ़ीडेन्स की ऐसीतैसी किये हुए था. जगदीस की टीम की एक गोटी बची हुई थी और हमारी सात या आठ. क्यून अभी कबल होना बाकी थी. "हनुमान्दी का नाम ले के क्यून कबल कल्ले बेते" कहता हुआ लफ़त्तू उत्साहातिरेक में उछल रहा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जगदीस ने श्टैकर जमाया, कैरमबोट के कोने पर से फूंक मार कर पौडर उड़ाया और निगाहें पिल से तकरीबन चिपकी हुई क्वीन पर लगाईं. इन फ़ैक्ट कोई बच्चा भी उसे भीतर डाल सकता था और इसके अलावा कवर वाली गोटी भी पिल में ढुलक पड़ने को तैयार थी. जगदीस ने निशाना साधकर शॉट मारा पर श्टैकर फ़ुस्स पटाखे जैसा रपटा और आधे कैरमबोट की दूरी भर पार कर सका. जगदीस की खूब थूथू हुई. एक राउन्ड के बाद श्टैकर पुनः जगदीस के पास था और खेल की हालत कमोबेश वही थी. "पौंकना मत बेते" कहकर लफ़त्तू ने उसका हौसला बढ़ाया. किसी भी काम की मंज़िल पर पहुंचने से ऐन पहले नर्वस होकर घुस जाने को रामनगर में "पौंक जाना" कहते थे. इस बार भी जगदीस का श्टैकर फ़ुस्सा गया. अगली पांच-छः बार भी. राउन्ड हम लोग जीते और जगदीस जोसी जगुवा पौंक की उपाधि से सम्मानित हो गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्वीन कवर करने को लफ़त्तू एक दूसरे अर्थ में प्रयुक्त किया करता. मुझे मेरी मोहब्बतों के लिए लाड़ से छेड़ता वह अपनी दो उंगलियों को एक खास अंदाज़ में मोड़कर मुझसे कहता: "मदुबाला मात्तरानी की क्यून कबल कलेगा बेते." फिर कमीनी हंसी हंसकर आगे जोड़ता "जगुवा की तरै पौंकना मती बेते!"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जगुवा पौंक हमें ज़िद कर के अपने घर ले गया. उसकी माता ने हमें परांठे और पालक की सब्ज़ी खिलाई. जगदीस का छोटा भाई भी था - परकास. परकास तरबूज़े का एक बहुत बड़ा टुकड़ा भकोसने में लगा हुआ था और हमें ताक रहा था. लफ़त्तू ने इशारा कर के उसे अपने पास बुलाया तो जगदीस बोला "उसके पैर खराब हैं. चल नहीं सकता परकास."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;न मुझसे उसके बाद पराठा खाया गया न परकास की तरफ़ देखा गया. बाहर आए तो जगुवा ने करीब बीस मीटर दूर से हमें एक घर दिखाते हुए कहा: "वां रैता है टुन्ना झर्री!"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नेस्ती मास्टर बरामदे में बैठे थे. स्कूल से वापस आकर वे रामनगर के अधेड़ नागरों की औपचारिक राष्ट्रीय पोशाक अर्थात पट्टे का धारीदार घुटन्ना और दर्ज़ी द्वारा सिली गई तिरछी जेब वाली बण्डी धारण कर चुके थे. वे बीड़ी पी रहे थे और प्रिंसीपल साहब के दफ़्तर के बाहर लगे 'प्रैक्टिस मेक्स अ मैन परफ़ैक्ट' के नारे से प्रेरित होकए नाली में थूकने की विधा के रियाज़ में व्यस्त थे. उनकी पिछाड़ी यदा कदा एक तरफ़ को ज़रा सा उठती थी और आसपास के माहौल थोड़ा सा आयुर्वेदिक हो जाता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"हत! थाला पादू मात्तर" कहकर लफ़त्तू ने जवाबी थूक निकाला और करते हुए कहा: "तुन्ना के छामने इत मात्तर की हिम्मत ना होती होगी पादने की! थाला थुकैन मात्तर!" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतने मे टुन्ना सिर झुकाए घर के भीतर से बाहर अहाते में आया. हम पानी के पब्लिक नल की आड़ में हो गए. टुन्ना के हाथ में गिलास या कटोरी जैसा कोई बर्तन था जिसे उसने नेस्ती मास्टर को प्रस्तुत किया. नेस्ती मास्टर ने उसे टुन्ना के हाथ से तकरीबन छीनकर झपटा और झटके से ज़मीन पर दे मारा. टुन्ना उसे उठाने नीचे झुका तो उसके पिताश्री ने उसकी पिछाड़ी पर दुलत्तीनुमा लात धरी और "ख्वाक्क!" कर के नाली की दिशा में थूक का गोला प्रक्षेपित किया. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महानायक टुन्ना अपने घर में कुत्ते से गई गुज़री ज़िन्दगी बिताने को विवश था. और यह दॄश्य हम से आगे नहीं देखा जा सका.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"पिछले साल टुन्ना की भैन खलील नाई के साथ भाग गई थी. कटुवों ने उसका नाम भी बदल दिया था कह रहे थे. एक महीना पहले टुन्ना की मां भी मर गई. जभी से नेस्ती मास्साब पागल टाइप हो गए हैं. टुन्ना बिचारे को खाना भी बनाना पड़ता है. अब टुन्ना खाना बनाए या मुसलियों को ठोकने डाम पे जाए. तू ई बता यार लफ़त्तू!"&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/272678107746144576-6665862702432202495?l=lapoojhanna.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://lapoojhanna.blogspot.com/feeds/6665862702432202495/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=272678107746144576&amp;postID=6665862702432202495' title='14 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/272678107746144576/posts/default/6665862702432202495'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/272678107746144576/posts/default/6665862702432202495'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://lapoojhanna.blogspot.com/2009/04/blog-post.html' title='नेस्ती मास्टर,कैरमबोट की बारीकियां और जगुवा पौंक'/><author><name>लपूझन्ना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06722723246925370677</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-272678107746144576.post-5378835472990108542</id><published>2009-03-30T20:31:00.005+05:30</published><updated>2009-03-30T22:00:49.735+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दीलफरैब हैलन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='टुन्ना झर्री'/><title type='text'>हुसन की मलका दीलफरैब जीनातमान का नाच और टुन्ना झर्री के कारनामे</title><content type='html'>टुन्ना झर्री रामनगर हम से एक पीढ़ी आगे वाले लफाड़ी समुदाय का सर्वमान्य ख़लीफ़ा माना जाता था. कोसी डाम पर एक दफ़ा हिन्दू लड़कियों के ताड़ीकरण-कर्म की नीयत से टहल रहे दो पाकिस्तान निवासी  लौंडों को अकेले ठोक दिया था टुन्ना ने. यह अलग बात है कि टुन्ना स्वयं उसी प्रयोजन से वहां टहलने गया था. इस उपलब्धि के ऐवज़ में ख़ुद की अपनी पीढ़ी में  वह नायक के और हमारी अप्रेन्टिसरत पीढ़ी में महानायक के तौर पर स्थापित हो गया. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टुन्ना के इस शौर्य की गाथा हमें नेचुरली लफ़त्तू ने ही सुनाई. टुन्ना भी फ़ुच्ची की तरह कलूटा था. उसके पापा हमारे कालेज में सीनियर बच्चों को कुछ पढ़ाया करते थे. लेकिन टुन्ना ने स्कूल जाना आठवीं क्लास के बाद बन्द कर दिया था. टुन्ना के पापा को समूचा शहर नेस्ती मास्टर के नाम से जाना करता था. यदि नागरजनों को उन पर अधिक लाड़ आ जाता तो उन्हें विलायती सांड़ नाम से भी संबोधित किया जाता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रामनगर की शब्दावली में झूठ्मूठ गप्प मारने की क्रिया के लिए अपना स्वायत्त शब्द-पद था - 'झर पेलना'. टुन्ना के आगे झर्री शब्द लगाए जाने की उत्पत्ति भी इसी क्रियापद में पोशीदा थी. टुन्ना के बारे में यह बात सारे रामनगर के लौंडजगत में विख्यात थी कि वह अपने काम से काम रखता है और झर कभी नहीं पेलता. दर असल कोसी डाम पर पाकिस्तानी लड़कों की पिटाई के प्रकरण को रामनगर के इतिहास में एक क्रान्तिकारी और परिवर्तनकारी घटना माना गया जिसके न मालूम कितने संस्करण गली-मोहल्लों में उपलब्ध थे. टुन्ना प्रेरणा का झरना बन गया था जिसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की नीयत से टुन्ना भक्तों और अघोषित टुन्ना फ़ैन्स क्लब द्वारा डाम-घटना को लेकर इतनी बेशुमार झरें पेली गईं कि टुन्ना से अगली पीढ़ी के लफंडरों ने टुन्ना के प्रति बहुत हिकारत और संभवतः उस से भी ज़्यादा ईर्ष्या भी महसूस करते हुए टुन्ना के आगे झर्री विशेषण फ़िट कर दिया. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मिसाल के तौर पर एक बार क्लास में दो पीरियडों के बीच के अन्तराल में बम्बाघेर नम्बर दो में रहने वाले हमारे सहपाठी जगदीस जोसी उर्फ़ जगुवा पौंक ने एक बार टुन्ना को हिमालय टाकीज से बाहर निकलते हुए दिखाते हुए हमें गर्व से बताया कि टुन्ना बम्बाघेर में उनका पड़ोसी है. टुन्ना और कोसी डाम अपरिहार्य रूप से एक दूसरे से सम्बद्ध हो चुके थे.  जगुवा पौंक ने टुन्ना का पड़ोसी होने का गर्व बहुत देर तक महसूस करते हुए झर पेली कि टुन्ना ने उस ऐतिहासिक दिन बारह मुसलियों को अकेले सूत डाला था. बागड़बिल्ला इस संख्या को हमें इम्प्रेस करने की नीयत से पन्द्रह तक पहुंचा दिया करता था. इन गड़बड़ आंकड़ों का लफ़त्तू पर कोई असर नहीं होता. वह कहता था : "एक कतुवा दत-बीत हिन्दू के बलाबल होता ऐ बेते ... तुन्ना धल्ली ने दोई कतुवों  को माला होगा ... छमल्लेवैं आप ... एक तुन्ना धल्ली और दो-दो कतुवे ..." &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लफ़त्तू की टोन बताती थी कि टुन्ना के प्रति उसके दिल में असीम सम्मान ठुंसा हुआ है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धूल मैदान से आगे खेल मैदान पर किराये की साइकिलें चलाते वक्त हम किंचित ईर्ष्या और भय से उस कोने को ताका करते जहां टुन्ना अपनी कैबिनेट मीटिंगें लिया करता था. लफ़त्तू ने बाद में मेरा ज्ञानवर्धन करते हुए बताया कि टुन्ना चाहे तो उन मीटिंगों को कहीं भी ले ले पर पाकिस्तान निवासी लौंडे अक्सर हिन्दुस्तानी लौंडों की साइकिलें छीन लिया करते थे. कोसी डाम पर परमवीर चक्र प्राप्त कर चुकने के बाद टुन्ना ने अपना सायंकालीन दफ़्तर इसी बात के चलते खेल मैदान पर शिफ़्ट कर लिया था कि देखें कौन भूतनी का छीनता है साइकिलें. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निमाइस जाने की इजाज़त देने के लिए मैं अपने परिवार वालों को राजी करने में आख़िरकार सफल हो गया. घर से बहुत सारी हिदायात और बहुत कम पैसे देकर लफ़त्तू और बन्टू के साथ भेजा गया. सबसे ज़रूरी हिदायत थी आग के दरिया और बिजली वाले झूले से दूर रहना और कच्चर-बच्चर न खाना. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शाम हो आई थी. निमाइस की बत्तियां जल गई थीं. करीब दस लाउडस्पीकरों को कुछ न कुछ एलौन्स चल रहे थे और कुछ भी साफ़ नहीं सुनाई दे रहा था. धूल-गर्द-हल्ला-हड़बड़ी का ये आलम था कि हम निमाइस में घुसे और एक दूसरे से बिछड़ गए. एक पल को घबराहट महसूस हुई तो मैंने पलटकर देखा. घर की खिड़की नज़र आ रही थी और वहां भी बत्ती जल चुकी थी यानी खो जाने का कोई डर न था. कॉन्फ़ीडेन्स लौटा तो लफ़त्तू और बन्टू की तलाश में इधर उधर निगाह डालना शुरू किया. थोड़ी मशक्कत के बाद बन्टू की लाल हाफ़ पैन्ट नज़र आ गई. मैं भाग कर उस तक पहुंचा. वह भी हकबकाया खड़ा था. हमने एक दूसरे के हाथ थाम लिए और मिलकर लफ़त्तू की खोज में जुट गए. आख़ीरकार हमें वह दिखाई दे गया. अपने से दो हाथ लम्बी बन्दूक थामे वह एक खोखे पर गुब्बारे फोड़ने की मौज लूट रहा था. हम तनिक नाराज़ होते हुए उस तक पहुंचे तो उसने हमसे डिस्टर्ब न करने को कहा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ख़ुद को जिम कॉर्बेट से बड़ा शिकारी समझता हुआ वह अपने कन्धे, हाथों और आंखों का अचूक संयोजन करने में लगा था. मरियल बल्ब की रोशनी में सामने लगे गत्ते के बोर्ड पर चिपकाए गए सौ एक गुब्बारे एक ही रंग का होने का आभास दे रहे थे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अब देकना बेते ... बो पीला वाला फोल्दूंगा ..."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कट्‌ की आवाज़ आई फिर मरियल सी फट्‍ की और शायद एक गुब्बारा फूटा. "... देका बेते मेला तौंता..."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगले पांचेक मिनट तक आत्मलीन होकर वह अपना टौंचा सैट करता रहा और आत्ममुदित होता रहा. अपना पेमेन्ट कर चुकने के बाद उसने प्रस्ताव दिया कि हम भी उक्त खेल उसके खर्चे पर खेल कर देखें पर हमें निमाइस घूमने की जल्दी थी सो प्रस्ताव को मुल्तवी कर दिया गया. मेरा मन तो आग का दरिया देखने का था. गुबारे का निशाना लगाने वाले के बाद हग्गू सिपले की दूध-जलेबी की दुकान लगी हुई थी. अगले खोखे पर लालसिंह के पापा को चाय बनाते देख कर मेरे मन में आया कि लालसिंह भी आसपास ही होगा. वह था भी. "अबे हरामियो!" उसने अपने प्रिय सम्बोधन से हमें पुकारा.  वह चाय के खाली गिलास इकठ्ठा कर के ला रहा था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"यहीं रुको तुम" कह कर वह अपनी दुकान के पिछवाड़े गायब हो गया. मिनट बीतने से पहले वह हमारे साथ था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"डान्स देखोगे हरामियो? जीनातमान जैसा माल आया है इस साल निमाइस में."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रस्ताव बहुत चैलेंजिंग था और पौरुष को ललकारने वाला. "इन बत्तों ते पूत ले याल लालछिंग ... मैं तो देकियाया दीनातमान को पैले ई .."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लफ़त्तू के इस डायलॉग के बाद नहीं कहने का कोई मतलब नहीं था. लम्बू लालसिंह आगे आगे और हम तीन नन्हे हरामी पीछे-पीछे. लोहे की एक बहुत बड़ी बाड़ के अन्दर गोल टैन्ट लगा हुआ था. चारों तरफ़ से बन्द इस तम्बू की सज्जा हेतु उरोजा-दल का वही पोस्टरनुमा पैनल लगाया गया था जिसे ठेले पर रख कर निमाइस का परचार किया जाता था. मेरी चोर निगाह ने ज़मीन पर धरे ब्लैकबोर्डनुमा पैनल पर लिखा पढ़ लिया: 'हुसन की मलका दीलफरैब हैलन का नाच. २ रु.' - हुसन, दिलफ़रैब. मोब्बत, बफा-जफा, आसिक इत्यादि अल्फ़ाज़ अब समझ में आने ही लगे थे. २ रु. देखते ही मैंने लालसिंह से कहा कि मेरे पास तो कुल इतनी ही रकम है और अभी मैंने अपनी शॉपिंग करना बाकी है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"बड़ा आया पैसा देने वाला हरामी" लालसिंह ने लाड़ से दुत्कार लगाई. वह डान्स वाली दुकानवाले का दोस्त था. हम चार टोटल फिरी-फोकट में पिछवाड़े वाले मार्ग से तम्बू के अन्दर थे. अन्दर बीड़ी-सिगरेटों का नीला धुंआ तैर रहा था और बेशुमार भीड़ थी. और अच्छा खासा अन्धेरा भी. एक तनिक ऊंचे प्लेटफ़ॉर्म पर मंच बनाया गया था. मंच के बैकग्राउन्ड के परदे पर एक अधनंगी तस्वीर बनी हुई थी - ठीक जैसी दुर्गादत्त मास्साब की किताबों के कवर पर हुआ करती थीं. अचानक एक पल को मंच की बत्ती बुझी और फिर तुरन्त बाद सारा मंच चटख नीली रोशनी से नहा गया. एक कलूटा आदमी हाथ में माइक लिए स्टेज पर आया तो भीड़ से एक समूहगान सरीखी गूंज उभरी "...  ओबे काणे sssss ... ओबे काणे बेsss ..." इस सस्वर प्रोत्साहन ने सारे दर्शकों को बतला-जतला दिया कि कलूटे को ऐरा-गैरा न समझा जाए - उसका नाम है, ख़ूब नाम है और उसके अपने फ़ैन्स भी हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कलूटे ने कुछ चुटकुला सा सुनाया जो मेरी समझ में नहीं आया. अलबत्ता भीड़ एक अश्लील हंसी में फटकर दोहरी हो गई. काने ने करीब दस मिनट तक यह सांस्कृतिक कार्यक्रम चलाया जिसके बाद मंच पर बत्ती बुझने और जलने का पिछला सिलसिला दोहराया गया. बत्ती का जलना और कर्कश लाउडस्पीकर पर 'साकिया आज तुझे नींद नईं आएगी' बजना शुरू हो गया. सीटियां बजनी चालू हो गईं. बन्टू मेरे कान में चिल्ला रहा था कि इस के पहले कोई हमें देखे हमें फूट लेना चाहिये&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मंच पर जीनातमान के आते ही दर्शक पागल हो गए. जीनातमान ने फ़िल्मों में मुजरा करने वालियों की लाल-नीली चमचम ड्रेस पहनी हुई थी. उसने झुक कर सलाम जैसा कुछ किया. हम बहुत दूर थे और ज़्यादा डिटेल्स देख पाने की इच्छा पूरी करने में असमर्थ भी. 'सुना है तेरी मैफ़िल में रतजगा है' की टेक से उसने बेहद भौंडा नृत्य शुरू किया. लफ़त्तू ने मेरी बांह पर हल्की चिकोटी काटी तो मैंने पलट कर देखा. उसने मुझे आंख मारी जिसका तात्कालिक अभिप्राय यह था कि बेते मौज काटो जीनातमान के. नाच में बस ये हो रहा था कि एक लाल-नीली ड्रेस के यदा-कदा हवा में ज़रा सा उछलती सी नज़र आती और एडल्ट सीटियां और डायलाग विसर्जित करता रामनगर का कलापारखी वर्ग पूर्णमुदित हो जाता. बस दो तीन मिनट का नाच देखा ही था बस कि लालसिंह ने हमें तकरीबन घसीटते हुए तम्बू से बाहर निकाल लिया. लफ़त्तू और मैं और बन्टू जो भी हो डान्स के मज़े लेने का एडल्ट अनुभव तो जी ही रहे थे; अचानक यूं घसीट कर बाहर निकाल लिया जाना थोड़ा नागवार गुज़रा तो लालसिंह ने ज़रा आगे जा कर हमारे लिए रंधे से बनाई जा रही तीन तिरंगी चुस्की आइसक्रीमें ऑर्डर करते हुए बताया कि ऐसा उसने हमारी बेज्जती खराब ने होने देने के लिहाज़ से किया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमें बेमन से चुस्कियां चूसते देख कर लालसिंह ने कहा "डान्स छूट गया है अब देखना कौन कौन बाहर निकलेगा."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाहर आने वाले तनिक झेंप के साथ जल्दी जल्दी डान्स-तम्बू की सीमा से परे जाने की कड़ी मेहनत कर रहे थे. उन में से कुछ को हम ने पहले भी कहीं न कहीं देखा हुआ था. आख़िर में निकलने वालों में हमारे कालिज का आधे से ज़्यादा स्टाफ़ था. पान की पीक का महासागर मुंह में भरे होने के बावजूद बोल पाने में सफलता प्राप्त कर ले रहे मुर्गादत्त मास्साब के नेतृत्व में दड़ी मास्साब, भगवानदास मास्साब, गोल्टा मास्साब और रामलायक 'निर्जन' बाहर आ रहे थे. वे इतने आत्मविश्वास से आस्पास देखते बाहर आ रहे थे मानो उनका समूचा जीवन यही पुण्यकर्म करने हेतु बना हो और उसी में व्यतीत हुआ हो.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे लिए यह सदमा इस वजह से था कि मैं कम से कम गोल्टा मास्साब को अच्छा समझता था. मैं इस हादसे पर विचार कर ही रहा था कि तम्बू के भीतर से गंगापुत्र उर्फ़ प्याली मात्तर नमूदार हुए. उनके चश्मे की सुतली खुल गई थी और उसकी इकलौती कमानी को कान से लगए वे "अले लुको बाई, लुको, लुको ..." कहते हुए अपने मित्रों के नज़दीक जाने का प्रयास कर रहे थे. चश्मे की खुली हुई सुतली दूसरी तरफ़ लटक रही थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अगर मास्साब लोग देख लेते कि तुम लोग डान्स देख रहे हो तो वो तुम्हारे घरों में शिकायत कर देते. घर वाले तुम्हारा बनाते हौलीकैप्टर अलग और मास्साब लोग तुमें इमत्यान में फ़ेल करते अलग. बेज्जती खराब होती नफ़े में."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लालसिंह सच कह रहा था. बन्टू और लफ़त्तू के साथ मैंने भी हामी में सिर हिलाया. हमारे पैसे अभी बचे हुए थे और आग का दरिया देखने की इच्छा भी. लालसिंह ने कहा कि वह हमें फ़िरी में अन्दर बिठा देने के बाद दुकान पर चला जाएगा क्योंकि उसके पापा अकेले होंगे. लालसिंह निमाइस के स्टाफ़ का आदमी था और उसे सारी चीज़ें फ़ोकट उपलब्ध हैं - यह जानकारी मेरे लिए बड़ी डाह का विषय बन गई थी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धूल-गर्द-हल्ला-हड़बड़ी अब और ठोस होकर निमाइस के आसमान पर जम चुके थे. दूर बिजली वाले झूले की बत्तियां जलबुझ रही थीं और आकर्षित कर रही थीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाथों में चुस्कियां थामे पहला एडल्ट काम कर चुकने का गर्व महसूस करते हम आग के दरिया की तरफ़ धीमे कदमों से बढ़ रहे थे. लालसिंह ने ठिठोली करते हुए हमसे जीनातमान के हुसन के मुताल्लिक कुछ अश्लील सवालात पूछे. प्रफुल्लित होने के बाजवूद बन्टू और मैं जवाब देने की हिम्मत नहीं जुटा पाये अलबत्ता लफ़त्तू बोला : "किलमित की बौल दैते उतल लई ती याल दीनातमान ... भौछ्‍छई लौंदिया है... भौछ्छई ..."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;... अचानक बिना किसी पूर्वसूचना के चीख पुकार मच गई. हमसे ज़रा अगे धूल का हल्का बादल सा उठने को था. पांच सात लड़के अचानक सीरियस मारपीट शुरू कर चुके थे. लालसिंह ने हमसे वहीं खड़े रहने को कहा और घटनास्थल की तरफ़ भाग चला. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह उसी रफ़्तार से वापस हम तक पहुंचा: "आग का दरिया बन्द हो गया आज. तुम लोग घर जाओ. पांच पांच मुसलिये आग के दरिये से भार लिकाल के टुन्ना झर्री को सूत रहे हैं ...!"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;(निमाइस गाथा जारी है)&lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/272678107746144576-5378835472990108542?l=lapoojhanna.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://lapoojhanna.blogspot.com/feeds/5378835472990108542/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=272678107746144576&amp;postID=5378835472990108542' title='17 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/272678107746144576/posts/default/5378835472990108542'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/272678107746144576/posts/default/5378835472990108542'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://lapoojhanna.blogspot.com/2009/03/blog-post_30.html' title='हुसन की मलका दीलफरैब जीनातमान का नाच और टुन्ना झर्री के कारनामे'/><author><name>लपूझन्ना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06722723246925370677</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>17</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-272678107746144576.post-1642812868287262128</id><published>2009-03-24T18:18:00.004+05:30</published><updated>2009-03-24T22:21:02.006+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लफ़त्तू'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कायपद्‌दा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पुगत्तम'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='रत्तीपइयां'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='टायर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='निमाइस'/><title type='text'>कायपद्‌दा, पुगत्तम और रत्तीपइयां</title><content type='html'>धूल मैदान पर से नौटंकी पाल्टी का जाना और वहां निमाइस का लगना एक साथ घटित हुआ. छुट्टियां चल रही थीं. छत पर क्रिकेट खेलना थोड़ा कम हो गया था. निमाइस की रौनक शाम को गुलज़ार हुआ करती थी. इधर हम लोगों ने लफ़त्तू की अगुवाई में घर के पिछवाड़े स्थित पीताम्बर उर्फ़ पितुवा लाटे के आम के बगीचे के भी पीछे बहने वाली छोटी नहर में दोपहरें गुज़ारने का कार्यक्रम चालू कर दिया था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घर पर सुबह के किसी वक्त पूरा खाना खा चुकते ही मैं नेकर-कमीज़ पहनकर घासमंडी पहुंच जाता. वहां बंटू, बागड़बिल्ला, लफ़त्तू इत्यादि के साथ जल्दी ही पूरी टीम जुट जाती और कुछ भी अश्लील गाना गाते, कूल्हे मटकाते लफ़त्तू का अनुसरण करते हम नहर पहुंचते. काफ़ी खोज बीन के बाद हम लोगों ने नहर के एक हिस्से को अपने तरणकर्म हेतु सबसे मुफ़ीद पाया था. उस जगह नहर के दोनों तरफ़ आम के घने पेड़ थे और थोड़ा सा अन्दर चले जाने पर हमें सड़क पर चल रहा कोई भी आदमी नहीं देख सकता था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नहर पहुंचते और बहता पानी देखते ही हमारी सारी शर्म-ओ-हया काफ़ूर हो जाती और हम सेकेंड से कम समय में पूरे दिगम्बर होकर पानी में कूद पड़ते. बंटू थोड़े ठसकेदार घर का था सो वह नेकर के नीचे बाकायदा चड्ढी पहने रहा करता था. पूरे कपड़े वह कभी नहीं उतारा करता. हम लोग इस कार्यक्रम विषेष के लिए चड्ढी घर पर ही फेंक आया करते थे. बंटू को इस नक्शेबाज़ी के ऐवज़ में एक्स्ट्रा काम करना पड़ता था. तैराकी समाप्त होने पर वह किसी झाड़ी की ओट में पहले चड्ढी उतारता, नेकर पहनता और चड्ढी को सुखाने हेतु किसी पत्थर पर फैला देता. पहली बार जब वह गीली चड्ढी के ही ऊपर नेकर पहनकर घर चला गया था तो गीली नेकर को जस्टीफ़ाई करने के लिए उसे कई सारी कथाओं का निर्माण करना पड़ा था, जो झूठ पर झूठ साबित होती गईं और उसके पापा ने उसे आगे से लफ़त्तू के साथ देखे जाने की सूरत में ज़िन्दा गाड़ देने की चेतावनी दी और झाड़ू से उसकी पिछाड़ी को लाल बना दिया. लेकिन लफ़त्तू का ग्लैमर अकल्पनीय था और लात-घूंसे-झाड़ू वगैरह से उसकी संगत का लुत्फ़ उठाने से देवताओं तक को नहीं रोका नहीं जा सकता था, यह तो फ़क़त बंटू था.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पानी के बहाव की रफ़्तार बहुत दोस्ताना होती थी और हम घन्टों उसमें छपछप किया करते. लफ़त्तू ख़ूब सारे मेढक पकड़ कर एक जगह इकठ्ठा कर लेता और उन्हें डरा कर नीमबेहोश बना चुकने के उपरान्त हम पर निशाना लगा लगा कर फेंका करता. गमलू-कुच्चू और मधुबाला को लेकर कई सम्मेलन तैरते-तैरते पूरे हो जाया करते थे. लफ़त्तू का दिल अभी तक उन्हीं में से एक को हमारी भाबी बनाने की टेक पर फंसा हुआ था जबकि बड्डे पाल्टी में गोबर डाक्टर द्वारा हमारे भइयानिर्मितीकरण के पश्चात मेरा जी दोनों से उखड़ गया था और मैं दुबारा से मन लगाकर मधुबाला से आशिकी में मुब्तिला हो चुका था. लफ़त्तू का तर्क यह था कि गोबरडाक्टर द्वारा हमें गमलू-कुच्चू का भइया कह कर पुकारा जाना उसका हरामीपन था और यह कि हर ज़िम्मेदार बाप अपनी लड़कियों की सेफ़्टी के लिए ऐसे बाबा-आदम ब्रांड नुस्ख़े अपनाता ही है. रक्षाबन्धन के दिन उसने घासमंडी का मुंह तक न देखने का प्लान बड्डे पाल्टी की रात ही वापस लौटते बना लिया था. "मुदे पागल छमल्लिया गोबल दाक्तल! मेला नाम बी गब्बल ऐ बेते गब्बल! दलता नईं किछी के बाप थे!" ' ... उहुं उहुं ... दान्त तत ... ' गुनगुनाते हुए उसने मेरा हाथ थाम कर उसने मुझे अपनी स्ट्रेटेजी और आसन्न अवश्यंभावी विजय के प्रति आश्वस्त किया था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तैराकी के मज़े लूटने के बाद पीताम्बर उर्फ़ पितुवा लाटे के आम के बगीचे की तनिक नीची दीवार फांद कर वहां कायपद्‌दा नामक महान खेल खेला जाता. कायपद्‌दा में खिलाड़ियों में सबसे पहले एक चोर का चुनाव किया जाता था. चोर के चुनाव हेतु काम लाई जाने वाली टैक्नीक पुगत्तम कहलाती थी.  यह चोर आम के किसी सघन और ढेर सारी टहनियों से भरपूर पेड़ के नीचे मिट्टी पर लकड़ी की मदद से एक गोल घेरा बनाता था. उसके बाद आम सहमति से करीब हाथ भर लम्बी लकड़ी को अड्डू बनाया जाता. चोर को छोड़कर सारे बच्चे पेड़ की टहनियों पर चढ़ जाते. खेल की शुरुआत में चोर को अपनी एक टांग उठाकर उठी हुई और स्थिर वाली दो टांगों के बीच निर्मित हवा के भीतर से अड्डू नामक लकड़ी को जितनी दूर संभव होता फेंक दिया करता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब चोर ने जल्दी से पेड़ पर चढ़कर किसी एक खिलाड़ी को छूना होता था. छू कर वापस ज़मीन पर कूदना होता था और भाग कर अड्डू को वापस गोल घेरे में प्रतिष्ठित कर देना होता था. ऐसा करके ही वह चोरयोनि से मुक्त होकर खिलाड़ीयोनि में वापस लौट सकता था. इसमें पेंच यह होता था कि अगर इस दौरान कोई खिलाड़ी कूद कर चोर से पहले अड्डू को घेरे में रख देता तो चोर चोर ही बना रहता और सारा अनुष्ठान एक बार और पूरा किया जाना होता था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कायपद्‌दा खेलते हुए थकान जल्दी लग जाया करती. एक तो सारे नियम खिलाड़ियों की सुविधा से बनाए गए थे, न कि चोर की सो जो एक बार चोर बन गया वह तकरीबन सारे खेल भर चोर बना रहता था. बाद के दिनों में जब हमारा पहला मुसलमान दोस्त ज्याउल इस खेल को खेलने हमारी टीम में शामिल हुआ, किसी साज़िश के तहत हर बार वही चोर बना दिया जाता. ज्याउल रामनगर का नहीं था, मुरादाबाद से आया था. उसके पिताजी बिजली डिपार्टमेन्ट में इंजीनियर थे और मेरे पिताजी के दोस्त. उन्हीं के कहने पर ज्याउल को हमने इतना दुर्लभ विशेषाधिकार दिया हुआ था कि वह लगातार चोर बने और पदता रहे. कभी कभार लफ़त्तू उस पर दया करता और वालंटियर चोर बन जाता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कायपद्‌दा खेलने के बाद भूख से भुखाने और प्यास से तिसाने हम अपने अपने घरों की तरफ़ एक छोटे ब्रेक के वास्ते चल पड़ते.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अल्मोड़ा, जहां हम लोग रामनगर आने से पहले रहा करते थे, पहाड़ी कस्बा था. बड़े भाई ने वहां मेरे वास्ते कहीं से एक बड़े टायर  का जुगाड़ किया हुआ था. छोटी सी एक लकड़ी लेकर मैं उसे ठेलता हुआ इस ढाल से उस ढाल चलाया करता था. रामनगर मैदानी कस्बा था सो यहां ढालों पर टायर चलाने का रिवाज़ नहीं था. यहां हमारे पास ट्रकों के बैरिंगों से बने छोटे गोले थे जिन्हें रत्तीपइयां कहा जाता था. रत्तीपइयां को चलाने हेतु लोहे के मज़बूत तार का एक लम्बा और सीधा टुकड़ा इस्तेमाल में लाया जाता था. इस तार के एक सिरे को इस तरह से मोड़ा जाता था कि  रत्तीपइयां उसमें खड़ी अवस्था में फ़िट हो जाए. अपार कौशल और प्रतिभा चाहिये होती थी  रत्तीपइयां चलाने में. किसी बहुत जटिल मशीन से जूझने जैसा अनुभव होता था. जाहिर है मौज तो आती ही थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तैराकी और कायपद्‌दा के बाद का समय  रत्तीपइयां चलाते हुए सब्ज़ीमंडी तक का चक्कर काटना धर्म बन गया था. यहां भी लफ़त्तू  हमारा नेतृत्व किया करता हालांकि उसके पीछे-पीछे रत्तीपइयां चलाते जाना मोहल्ले और बाज़ार के लोगों की निगाह में अपनी बचीखुची इज़्ज़त का भुस भरा लेने का सबसे आसान तरीका माना जा सकता था पर मैंने कहा न कि लफ़त्तू के अकल्पनीय ग्लैमर के आगे क्या तो बेज्जती और क्या बेज्जती का ख़राब होना.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस रोज़ हम लोग रत्तीपइयां कार्यक्रम निबटाने के बाद तार और ररत्तीपइयां को कन्धों पर गदा की तरह लटकाए घर लौट रहे थे जब कहीं से बदहवास सा भागता लालसिंह हमारे सामने आ गया. आते ही उसने "तुम थे कहां बे हरामियो?" पूछा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पता यह चला कि दो घंटों से गोबरकुटुम्ब शहर में अपनी नई कार का प्रदर्शन करता घूम रहा है. और "क्या माल लग रये बेटा तुम्हारे दोनों माल!" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लालसिंह आगे कुछ बताता न बताता हमारे ठीक सामने गोबरडाक्टर ने अपनी गाड़ी रोकी. सतत खिलखिल करतीं कुच्चू-गमलू ने अपने गुलाबी रिबन लगे सिर बाहर निकाले और हमें पुकारा. रामनगर में कुल चार या पांच कारें थीं. पहली बार कार में बैठ कर किसी ने हमें पुकारा था. यह सनसनीख़ेज़ तो था ही, चेतना को शिथिल बना देने वाला भी था. इस हतप्रभावस्था में हमें यह भी भान न रहा कि हमने अपने-अपने  रत्तीपइयां गदा की तरह ही थामे हुए थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुच्चू-गमलू वाक़ई में माल लग रहे थे और एक पल को मेरी मधुबालाकेंद्रित मोहब्बत डगमग होने को हुई. नीमबेहोशी की सूरत में कब हम दोनों पीछे की सीटों पर हमें अपनी बग़ल में बिठा चुकी थीं, याद  नहीं पड़ता. होश आने पर अपनी हवाई चप्पलों, गन्दी पड़ चुकी नेकरों पर उतनी शर्म नहीं आई, जितनी अपनी गदाओं पर. बावजूद इसके स्कर्टधारिणियां हमें ताके जा रही थीं - मुझे लगा उनकी निगाह में थोड़ी सी आसक्ति नज़र आ रही थी या शायद मेरा भरम रहा हो. दो-तीन मिनट की सैर खिलाने के बाद गोबरडाक्टर ने गाड़ी अपने घर के अहाते में पार्क की और "आ जाओ बाहर बच्चो!" कह कर कार का दरवाज़ा खोल दिया. "कैसे हो बेटे?" कहकर गोबरडाक्टरानी ने आदतन हमारे गाल दुलराए और अपनी पुत्रियों से मुख़ातिब होकर कहा "बेटा, भइया लोगों के लिए केक ले कर आओ फ़्रिज से." &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;या ख़ुदा! फिर से भइया! मेरा मधुबाला-प्रेम एक झटके में वापस पटरी पर आ गया. लफ़त्तू अलबत्ता अब बेशर्म बन चुका था और हौले हौले मुस्काता, केक सूतता मालताड़ीकरण में ईमानदारी से लगा हुआ था. मैंने उसे थोड़ा लिहाज़ बरतने के उद्देश्य से चेताने हेतु ठसकाया तो उसने मेरी तरफ़ आंख मारी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"ये अपना सामान ले लो बेटा!" कहकर गोबरडाक्टर ने गाड़ी की पिछली सीटों के नीचे पड़े हमारे रत्तीपइयां बाहर निकाले. हमने चोरों की तेज़ी से उन्हें अपने कब्ज़े में किया और खिसक पड़ने की जुगत देखने लगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"ये क्या चीज़ है?" एक स्कर्टधारिणी ने उत्सुकतावश पूछा तो मैंने थोड़ा शर्म महसूसते हुए कहा "रत्तीपइयां"  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मगर ये है क्या?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस सवाल का जवाब देने के बजाय लफ़त्तू ने अपने रत्तीपइयां - कौशल का नमूना दिखाते हुए बरामदे का एक चक्कर काट कर दिखाया. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"ग्रेट! और नाम भी कितना क्यूट है इस का!" वे उत्साह में बोलीं. "पापू से कहेंगे, हमें भी चाहिये ये चीज़." &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"इत को ले लओ" कहकर लफ़त्तू ने अपना रत्तीपइयां वहीं ज़मीन पर रखा और मेरा हाथ थाम कर बाहर का रुख़ किया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लालसिंह के पापा की दुकान के पास आकर मैंने लफ़त्तू के चेहरे पर नज़र डाली. वह सुर्ख़ पड़ा हुआ था. अपना रत्तीपइयां बलिदान कर चुकने का दर्प उस की रग-रग से टपक रहा था. और उम्मीदों से भरा एक चमकीला मुस्तकबिल भी. लफ़त्तू वाक़ई मोहब्बत में पड़ चुका था. सच्ची मुच्ची वाली लैला-मन्जूर वाली असल मोहब्बत. मुझे तनिक भय हुआ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अचानक कहीं से निमाइस का विज्ञापन करता एक रंगबिरंगा ठेला सामने से गुज़रा. उरोजाओं की पूरी टीम उस पर लगे एक विशाल पैनल पर से आपको न्यौत रही थी कि निमाइस में आइये और देखिये मौत का कुंआ और आग का दरिया. बहुत सारे लौंडे-लफन्डर भीड़ बनाए ठेले का अनुसरण कर रहे थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लफ़त्तू ने आंख तक उठाकर नहीं देखा. वह ख़ुद आग के दरिया को पार करने की नामुमकिन जद्दोजहद में लगा हुआ था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;(यह पोस्ट मैख़ाने वाले मुनीश शर्मा के इसरार पर लिखी गई है जिन्होंने आज इस नाचीज़ ब्लॉग को अपनी &lt;a href="http://maykhaana.blogspot.com/2009/03/blog-post_23.html"&gt;पोस्ट&lt;/a&gt; का विषय बनाया है)&lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/272678107746144576-1642812868287262128?l=lapoojhanna.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://lapoojhanna.blogspot.com/feeds/1642812868287262128/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=272678107746144576&amp;postID=1642812868287262128' title='16 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/272678107746144576/posts/default/1642812868287262128'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/272678107746144576/posts/default/1642812868287262128'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://lapoojhanna.blogspot.com/2009/03/blog-post_24.html' title='कायपद्‌दा, पुगत्तम और रत्तीपइयां'/><author><name>लपूझन्ना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06722723246925370677</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>16</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-272678107746144576.post-3051785538296302536</id><published>2009-03-09T14:33:00.005+05:30</published><updated>2009-03-10T23:43:04.236+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लालसिंह'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नौटंकी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गोबरडाक्टर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बड्डे पाल्टी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गमलू'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कुच्चू'/><title type='text'>...उहुं ... उहुं .. दान्त तत माई बादी ... उहुं ... उहुं ...</title><content type='html'>कुच्चू और गमलू में से किसी एक पर मेरे और किसी दूसरी पर लफ़त्तू के दिल के आ जाने के दिनों मैं ख़ैर मनाया करता था कि कहीं ऐसा न हो कि हम दोनों के टारगेट अन्त में जाकर एक ही न निकल आवें. मैं तो पैदाइशी बेवफ़ा और मोहब्बत का मारा था सो मुझे खुद से ज़्यादा लफ़त्तू की चिन्ता होती थी. उन्हीं दिनों बस अड्डे के बाहर वाले धूलमैदान में नौटंकी लगी. पिछले साल की नौटंकी के गीतों को कंठस्थ कर चुकने और घर पर उन्हें गा बैठने का अक्षम्य अपराध करने के बाद हुई अपनी धुनाई मुझे अच्छे से याद थी, इसी वजह से "लौंडा पटवारी का बड़ा नमकीन" अब भी मेरा फ़ेवरेट बना हुआ था. इस दफ़ा नौटंकी पाल्टी वाले अपने साथ बड़े-बड़े होर्डिंगनुमा पोस्टर ले कर आए थे जिनमें एक बेहद भौंडा सा दिख रहा दढ़ियल फटा कुर्ता पहने नज़र आया करता था. दढ़ियल के मुंह के एक कोने से खून की लकीर निकला चाहती थी. पोस्टर का अलबत्ता सबसे आकर्षक हिस्सा वह था जिसमें लाल लिपिस्टिक और सुनहरे बेलबूटोंवाली लाल पोशाक धारण किए, गालों में लाली लगाए एक उरोजा देवी चस्पां थी. उरोजा देवी की आंखों की कोरों पर आंसुओं की एक-एक जोड़ी बूंदें थमी हुई थीं. लेकिन एक अदद डिटेल्ड चेहरा होने के बावजूद कलाकार ने ऐसा तिलिस्म तैयार किया था कि उक्त महिला सिर से कमर तक सिर्फ़ उरोजों की एक जोड़ी नज़र आती थी, दीगर है कि इस दर्ज़े की जोड़ी ने अभी हमारे तसव्वुरों पर उस तरह छा जाना बाकी था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नौटंकी पाल्टी इस दफ़े लैला-मन्जूर का खेल ले कर आई थी और लाउडस्पीकर पर ख़ून-ए-दिल पीने और लख़्त-ए-जिगर खाने के बयानात लगातार जारी किये जाते थे. खेल के बीच में इन्टरवल होता तो एक मसख़रा "डान्ट टच माई बाडी मोहन रसिया" नामक अश्लील गान सुना कर श्रोताओं और दर्शकों की वाहवाही लूटा करता. लफ़त्तू ने इस सुपरहिट का "...उहुं ... उहुं .. दान्त तत ... उहुं ... उहुं ..." की टेक से शुरू होने वाला इम्प्रोवाइज़्ड संस्करण तैयार करने में फ़कत एक रात लगाई. हम दोस्त लोग शाम के शो के श्रोता होते थे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक शाम हम, हम माने लफ़त्तू बन्टू और मैं, घासमण्डी के कोने पर खड़े होकर पसू अस्पताल की दिशा में नज़रे गड़ाए थे. पसू अस्पताल के कम्पाउन्ड के भीतर ही कुच्चू-गमलूपिता गोबर डाक्टर को सरकारी क्वाटर मिला हुआ था. अचानक पीछे से किसी ने लफ़त्तू को नाम लेकर पुकारा. लालसिंह था. लालसिंह के पापा की घासमण्डी में चाय-बिस्कुट की दुकान थी - यह तथ्य हमारी नज़रों से न जाने कैसे छूट गया था. उसके पापा बीमार थे और इन दिनों दुकान का काम उसके सिपुर्द था. उसने करीब करीब बड़े भाई का सा लाड़ दिखाते हुए हमें दुकान में गल्ले वाली जगह पर बिठाया और दूध-बिस्कुट खाने को दिया. हमने मौज लूटना शुरू ही किया था कि नौटंकी चालू हो गई. इस घटना ने लफ़त्तू पर तुरन्त असर डाला और उसका  "...उहुं ... उहुं .. दान्त तत ... उहुं ... उहुं ..." अपने नैसर्गिक लुच्चपने के साथ चालू हो गया. लालसिंह ने लफ़त्तू को देख कर ठहाका लगाया और बामोहोब्बत "साला हरामी" कहकर उसकी कला की दाद दी. बन्टू शरीफ़ बच्चा था सो वह "पापा आ गए होंगे" कहकर भाग लिया. मैं न सरीफ़ था न बदमास और मेरा स्टेटस मेरी अपनी निगाहों में लफ़त्तूशिष्य से ऊपर नहीं जा सका था सो जैसी वस्ताद की इच्छा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लालसिंह ने आंख मार कर लफ़त्तू से पूछा: "पसू अस्पताल में क्या देख रया था?"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अपने माल का इंत्दाल कल्लिया ता औल क्या!" वयस्क किस्म की बेपरवाही से लफ़त्तू ने जवाब दिया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"कौन से वाले का: छोटे का या बड़े वाले का?" यह सवाल ट्रिकी था. कुछ दिन पहले लफ़त्तू क्लास में गोबर डाक्टर की एक लड़की से अपने वन साइडेड चक्कर की घोषणा कर चुका था. फ़ुच्ची कप्तान की टोन में उसने सबको चुनौती देते हुए कहा था: "तुम थब की भाबी बनाऊंगा उतको बेतो!"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लालसिंह के सवाल का जवाब देने हेतु आवश्यक पर्याप्त ज्ञान का अभाव था लफ़त्तू के पास. इस कदर जुड़वां दो लड़कियों में कैसे बताया जाए कि 'बड़ा' कौन सा वाला है और 'छोटा' कौन सा. जब लफ़त्तू उन सुन्दर लड़कियों को माल कहता था तो मुझे ऐसा-वैसा लगने लगता. अपनी मोहब्बत नम्बर तीन को मैं तब तक पोशीदा रखना चाहता था जब तक कि यह सर्टेन न हो जाए कि लफ़त्तू वाला माल कौन सा है. उसके बाद बचे हुए माल (किंवा कुच्चू/गमलू में से एक) के प्रति मुझे अपनी भावनाएं अभिव्यक्त कर पाने की वैधता हासिल हो जानी थी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब तक लफ़त्तू कोई जवाब सोचता, लालसिंह ने हरामीपने से हंसते हुए कहा: "हरिया हकले से फंसे हुए हैं दोनों माल!" लफ़त्तू ने हरिया हकले के प्रति एक बड़ी गाली हवा में विसर्जित करते हुए सड़क पर थूक दिया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लफ़त्तू को यह परमज्ञान प्राप्त हुए अर्सा बीत चुका था कि हमारी भाबी हरिया हकले से फंसी हुई है पर मेरा चोर मन कहता था कि उनमें से एक अब भी ख़ाली है. और उस ख़ाली वाली को चाहने का मेरा पूरा अधिकार है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो भी हो यह सारा वार्तालाप मेरे लिए एक ऑलरेडी बड़ी पहेली को और भी बड़ा बना रहा था. लालसिंह और लफ़त्तू ने आपस में कानाफूसी करते हुए एडल्ट किस्म की बात करना शुरू कर दिया था. लालसिंह ने अपनी छाती पर  दोनों हाथ ले जा कर कुछ इशारा किया जिसका मतलब भी एडल्ट रहा होगा क्योंकि उसके ऐसा करते ही लफ़त्तू परमानन्दावस्था को प्राप्त हो कर उठ बैठा और कूल्हे मटकाता हुआ "...उहुं ... उहुं .. दान्त तत माई बादी ... उहुं ... उहुं ..." करने लगा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नौटंकी के शाम वाले शो के समय अगले तीन-चार दिन हमने लालसिंह की दुकान पर दूध-बिस्कुट का फ़ोकट लुत्फ़ काटने, और 'लैला-मन्जूर' के गीतों को कंठस्थ करने में व्यतीत किए. कुच्चू-गमलू केन्द्रित चर्चा के लिए भी समय निकाला जाता. एक दिन लफ़त्तू मालवार्ता का रस ले रहा था कि दोनों लड़कियां हमेशा की तरह एक ही रंग की छैलछबीली पोशाकें पहने दुकान के सामने आ गईं. वे मेरे घर की दिशा से आ रही थीं और अपने घर जा रही थीं. तमाम बातें करते हुए हमारी आंखें पसू अस्पताल की ही तरफ़ लगी हुई थीं. इन दो नायिकाओं ने विपरीत दिशा से आकर हमें एकबारगी हकबका दिया. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छिपने का जतन करता लफ़त्तू काउन्टर के पीछे नीचे ज़मीन पर बैठ गया. मेरा मन हुआ कि धरती में गड़ जाऊं. मुझे लग रहा था कि कुच्चू-गमलू ने हमारी सारी गन्दी बातें सुन ली हैं और अगर वे हरिया हकले से नहीं भी फंसी हैं तो हमारा चान्स अब तो नहीं ही बचा है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"बाहर आ जा बे. गये माल." लालसिंह ने कहा तो लफ़त्तू बाहर आया. "इत्ते डरपोक साले बड़े मन्जूर बन्नए."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विदा करने से पहले लालसिंह ने हमें काफ़ी लताड़ लगाई और अन्ततः पढ़ाई में मन लगाने की नसीहत भी दी. उसने फ़रमान जारी किया कि ऐसा न करने की सूरत में हमारी हालत भी उस जैसी हो जाएगी. उसे यह नहीं मालूम था कि उसकी इन्डिपेन्डेन्स से मुझे कितना रश्क होता था. क्या खाक काम की ऐसी पढ़ाई जब इच्छा होने पर बमपकौड़ा तक खाने को न मिले.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लालसिंह की दुकान से निकल जाने के बाद, घर पहुंचने से पहले लफ़त्तू और मेरे बीच एक महाधिवेशन हुआ जिसमें अभी अभी घटित दुर्घटना पर चर्चा हुई. लफ़त्तू भी मेरी ही तरह सोच रहा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह रात तब तक के प्रेमजीवन की सबसे मुश्किल रात साबित हुई मेरे लिए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुबह सोकर उठा तो लगा बहुत देर हो गई है. जब तक कुछ सोचता, लफ़त्तू ने नीचे सड़क से "बी...यो...ओ...ओ...ई..." का लफ़ंडरसंकेत दूसरी बार किया तो मैंने बड़ी बहन को खिड़की से बाहर झांक कर लफ़त्तू को बताते हुए सुना कि मैं आज स्कूल नहीं आने वाला हूं क्योंकि मैं बीमार हूं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे बताया गया कि मुझे बुखार था और यह भी कि मैं रात भर सपने में कुछ बड़बड़ कर रहा था. उस प्रलय सरीखी रात का गुज़रना फ़ाइनली पता नहीं कैसे हुआ होगा, मुझे याद नहीं पड़ता. दिन बेहिसी में कटा. मगर शाम का समय किसी सपने जैसा रहा. गोबरडाक्टर, गोबरडाक्टरानी और कुच्चू-गमलू मुझे देखने आए. "हैलो बेटे! अब कैसे हो?" कहकर गोबरडाक्टरानी ने मेरे गाल दुलराये. खिलखिल करती गमलू-कुच्चू मेरे लिए गेंदे के दो फूल ले कर आई थीं और कॉपी से फ़ाड़े गए एक पन्ने पर 'गेट वैल सून' लिख कर भी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दो दिन बाद मुझे और लफ़त्तू को मालघर में आयोजित एक बड्डे पाल्टी में बाकायदा बुलाया जा रहा था. जाते-जाते गोबरडाक्टर ने आशा जताई कि मैं तब तक चंगा हो जाऊंगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गोबरकुटुम्ब के जाते ही मैं चंगा हो गया और जूता पहनकर यह समाचार लफ़त्तू के घर जाकर उसे देने की नीयत से भाग कर सड़क पर आ गया. लफ़त्तू ने मेरी बात का यकीन नहीं किया. लालसिंह ने भी नहीं. लेकिन उसी रात को लफ़त्तू की बड़ी बहन ने उसे बताया कि गोबरकुटुम्ब उसके घर भी तशरीफ़ लेकर गया था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुच्चू-गमलू की बड्डे पाल्टी हम दोनों के जीवन की पहली पाल्टी थी. पाल्टी में क्या-कैसे होना होता है इत्यादि तमाम प्रश्नों-जिज्ञासाओं से लैस बिना कोई तोहफ़ा लिए जब मैं पसू अस्पताल के गेट पर अचानक ग़ायब हुए लफ़त्तू का इन्तज़ार कर रहा था. लफ़त्तू कहीं से आया. उसके हाथ में बांसी कागज़ की दो थैलियां थीं. "ले एक तेली"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं थैली खोलने को हुआ तो उसने मुझे डांटा: "किती के बड्डे में खाली हात नईं दाते बेते. गिट्ट देते ऐं. मैंने पित्तल में देका ता. एक थैली तेला गिट्ट ऐ. अपनी भाबी ते कैना - हैप्पी बद्दे. थमदा बेते!" महापराक्रमी लफ़त्तू अपने पिताजी की जेब से कुछ नोट चुरा कर मेरी इज़्ज़त बचाने हेतु दो थैलियों में टॉफ़ियां भर कर बड्डे गिट्ट बना लाया था - मैं अहसान से दब गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बड्डे मनाने बहुत सारे लोग जमा थे. बहुत सारे बड़े. और बेशुमार बच्चे. गोबरकुटुम्ब एक मेज़ के एक तरफ़ खड़ा था. मेज़ पर केक, मोमबत्ती वगैरह धरे हुए थे. औरतें खुसफुस में और बच्चे चीखपुकार में व्यस्त थे. गोबर डाक्टर ने मुझे देखा तो अपने पास बुला लिया. और लफ़त्तू को भी. बहुत शर्म आ रही थी. बहुत ज़्यादा शर्म आ रही थी. लफ़त्तू का चेहरा शर्म से सुर्ख पड़ चुका था. यही मेरे चेहरे का रंग भी रहा होगा. हम दोनों की निगाहें ज़मीन से चिपकी हुई थीं जब अचानक सब ख़ामोश हुए फिर तालियां पिटीं और "हैप्पी बड्डेटुय्यू, हैप्पी बड्डेटुय्यू ..." हवा में तैरने लगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;केक बंट रहा था. गमलू या कुच्चू, किसी एक ने हम पिटे आशिकों के हाथों में केक का लिथड़ा सा टुकड़ा थमा दिया था. हमारे हाथों में रखीं दरिद्र टॉफ़ी की थैलियां इतनी आउट ऑफ़ प्लेस महसूस हुईं कि वे अब जेबों में जा चुकी थीं. हरिया हकला जलडमरूमध्य बना हुआ पानी के जग और गिलास लिए "मानी ... मानी" कर रहा था. अचानक डोंगे लिए कुछ औरतें रसोई के भीतर से अवतरित हुईं और "लीजिए न, लीजिए न ..." के साथ डिनर शुरू हो गया. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह सब भीषण द्रुत गति से हुआ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महौल में चपचप की आवाज़ें भरना शुरू हुईं तब मैंने आसपास का डिटेल्ड जायज़ा लेना शुरू किया.   लफ़त्तू के यहां हुई गीतों की संध्या के नायक मास्टर मुर्गादत्त, पंडित रामलायक निर्जन और दड़ी मास्साब एक गिरोह सा बनाए कमरे के एक  कोने में खड़े होकर  दूसरे कोने में खड़े गोबरडाक्टर को इशारा सा कर रहे थे जिसका मतलब था कि जो करना-कराना है, जल्दी कराओ, हम क्या यहां दही-भल्ले सूतने भर को आए हैं. मुटल्ली महिलाओं ने चाटेत्यादि की लूटखसोट मचा रखी थी. उनके बच्चे ज़मीन पर लोटे-रोते-खीझते कुछ भी कर रहे थे किन्तु वे निर्लिप्त थीं. चाट के उपलब्धतातिरेक ने उनकी नैसर्गिक प्रतिभा को भड़का दिया था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इधर गमलू-कुच्चू हमारे नज़दीक आए. "कुछ खाओगे नहीं आप? अपने फ़्रेन्ड को भी खाने को बोलिये न! उस के बाद हम आपको अपने कमरे में बुक्स दिखाएंगे. जल्दी कीजिए. हम अभी आते हैं अपने रूम में जगह बना कर आते हैं."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपना कमरा, रूम, बुक्स, आप, फ़्रेन्ड ... ये कैसे शब्द बोल कर डरा रही थीं हमें. लफ़त्तू के चेहरे पर पहली बार इत्मीनान आया दिखने लगा था. अधिकतर मेहमान खा-पी रहे थे सो आवाज़ें थोड़ा कम सी हो गई थीं. कोई दो-चार मिनट बाद स्कर्टधारिणी नायिकाएं हम तक पहुंची और "चलिए" कहकर हमें करीब करीब ठेलती हुईं अपने रूम में ले गईं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रूम बहुत साफ़ सुथरा था. किताबें करीने से लगी हुई थीं. हम दोनों को कुर्सियों पर बिठाया जा चुका था. गमलू-कुच्चू बहुत उत्साह से हमें अपनी पसन्द की कॉमिक्स दिखाना शुरू कर चुकी थीं. कॉमिक्स में किसका मन लगना था. दिल का एक चोर कोना कहता था कि ये सम्भ्रान्त लड़कियां क्योंकर हरिया हकले से फंसने लगीं. लफ़त्तू के मुझे कोहनी से ठसका मारा और उनकी निगाह बचाकर मुझे आंख भी मारी. माल पट रहा है बेते! पकाए जाओ. भौत चान्स है अभी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इधर नौटंकी में इन्टरवल वाला गाना चालू हुआ, उधर शराबमण्डल कमरे में प्रविष्ट होने की तैयारी कर रहा था. लफ़त्तू के चेहरे पर कमीनपन से भरपूर खुशी की आभा छा रही थी. दोनों लड़कियां उस से सट कर खड़ी थीं और मुझे मालूम था कि उसका दिल भीतर से गा रहा होगा:"...उहुं ... उहुं .. दान्त तत माई बादी ... उहुं ... उहुं ..." &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुर्गादत्त मास्टर के नेतृत्व में पेयदल ने कमरे में एन्ट्री ली और सबसे पीछे आए गोबरडाक्टर ने गमलू-कुच्चू से मुखातिब होकर आदेश दिया : "बेटा चलो, भैया लोगों को बिल्ली के बच्चे दिखाओ बाहर वाले बरामदे में ..."&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/272678107746144576-3051785538296302536?l=lapoojhanna.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://lapoojhanna.blogspot.com/feeds/3051785538296302536/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=272678107746144576&amp;postID=3051785538296302536' title='15 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/272678107746144576/posts/default/3051785538296302536'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/272678107746144576/posts/default/3051785538296302536'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://lapoojhanna.blogspot.com/2009/03/blog-post.html' title='...उहुं ... उहुं .. दान्त तत माई बादी ... उहुं ... उहुं ...'/><author><name>लपूझन्ना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06722723246925370677</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>15</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-272678107746144576.post-1213814160264843961</id><published>2009-01-20T00:03:00.002+05:30</published><updated>2009-01-20T00:11:52.368+05:30</updated><title type='text'>मोम का ऐ तो मोमबत्ती बनाऊं थाले की</title><content type='html'>फ़ुच्ची के पापा की रेडीमेड कपड़ों की रेहड़ी एक रोज़ शहर में दिखनी बन्द क्या हुई कि लफ़त्तू  अनन्त नोस्टैल्जिया में मुब्तिला हो गया. यह मनहूस बखत बहुत लम्बा खिंचा. मेरे मन में बौने के ठेले पर लिखित दोहे वाली उसकी प्रेमिका की असंख्य तस्वीरें बनती -बिगड़ती रहीं पर किसी भी तरह की लड़की की ठोस सूरत बना पाने में मेरा तसव्वुर नाकामयाब रहा. ये वही दिन थे जब गमलू और कुच्ची नाम्नी दो जुड़वां लड़कियां अपनी चर्चित नफ़ासत के कारण हमारी लौंडसुलभ क़स्बाई फ़ैन्टैसियों की नवनायिकाएं बना ही चाहती थीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अचानक किसी चमत्कार की तरह लफ़त्तू अपनी मनहूसियत से उबरा और उसने "झूम बराबर झूम शराबी" की पैरोडी "बाप छे जादा बेता हलामी" बना कर एक रोज़ क्रिकेट छत पर पेश की.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गोबर डाक्टर की ये बेटियां जब इकठ्ठे सुतली चोट्टे के नाम से मशहूर एक बूढ़े चाटवाले के ठेले पर से पानी के बताशे पैक करवा के ले जाती थीं तो वहां अपने पेट में चाट ठूंसती मुटल्ली स्त्रियों के पत्तल शर्माने लगते थे. ये दो लड़कियां उन से यह कहती नज़र आती थीं कि देखो भले सम्भ्रान्त घरों के लोग सब कुछ घर के भीतर करते हैं - चाहे वह पानी के बताशे खाने जैसा आमफ़हम और परम सार्वजनिक कृत्य के तौर पर स्वीकार कर लिया गया कर्म ही क्यों न हो. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुतली चोट्टे का ठेला हमारे घर के बग़ल में रहने वाले हरिया हकले के साइड वाले छज्जे से लगता था. हर शाम. उसके पास एक पैट्रोमैक्स था और उसके यहां हर चीज़ बाज़ार से महंगी होती. हरिया हकले को फ़कत हकला कहना उसकी अन्य प्रतिभाओं का अपमान था. रामनगर के हमारे खताड़ी मोहल्ले में पानी बस शाम को आया करता था और तथाकथित बाथरूमों में सजे डामर के तीन-चार ड्रमों को इसी वक़्त भरा जाना होता था. पानी आते ही उस पर किसी जलडमरूमध्य में भटक रहे किसी पुरातन प्रेत की आत्मा एक्टिवेट हो जाती और वह जितने पड़ोसी घरॊं में सम्भव हो " ... मानी! ... मानी! ... मानी! ..." कहता पानी के आने की सूचना दे आता. हिन्दुस्तान के परिचित घरों में सूचित कर चुकने के बाद उसे  " ... मानी! ... मानी! ... मानी! ..." कहते हुए पाकिस्तान निवासी जब्बार कबाड़ी की तरफ़ भागते उड़ते तैरते देखा जाता था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पानी जाने वाला होता था जब सुतली चोट्टे के ठेले पर बहार आई होती थी. अपने घरों में ड्रमभरीकरण कर चुकने के बाद भरसक प्रेज़ेन्टेबल बन आई मुटल्ली स्त्रियां टिक्की, दही भल्ले, कचरी और पानी के बताशों पर हाथ साफ़ करने में तल्लीन रहा करती थीं जब हरिया हकला अपना पूरा ध्यान पानी की टोंटी से लगाए रखता और उसके सूंसूं करते ही तनिक भावपूर्ण उल्लास में कहा करता: "... मानी, मानी ... श्या..." &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इधर गोबर डाक्टर की बेटियों को सुतली के बताशों की और हमें उन्हें ताड़ने की नैसर्गिक लत लग गई थी. हरिया हकला हमारे इस काम में एक अकल्पनीय बाधा बन कर आया. अक्सर जब वह "... मानी, मानी ... श्या..." कह रहा होता था कुच्चू-गमलू भी वहीं होते थे और वे दोनों स्कर्टधारी बच्चियां हरिया को देखकर यूं मुस्करातीं जैसे उन्हें ऐसी गुदगुदी कभी महसूस न हुई हो. हरिया सुतली से बच्चियों के घर ले जाया जाने वाला माल ले लेता और उनके घर की तरफ़ रवाना हो जाता. वह हाथों से इशारा भी करता जाता कि वे फ़िक्र न करें. हरिया हकला केवल तीन शब्द बोल पाता था जिन्हें ऊपर लिखा जा चुका है. इसके अलावा सारा संवाद वह अपने हाथों से किया करता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं, लफ़त्तू, बन्टू और सत्तू ऊपर हरिया की छत से ताकीकरण में लगे रहते थे. उधर हकला गमलू-कुच्चू को "... मानी, मानी ... श्या..." कह कर रिझाया करता. करीब माह भर तक ऐसा चलता रहा. आख़िरकार एक दिन लफ़त्तू के सब्र का बांध टूट ही गया. एक वयस्क तोतली गाली दे कर उसने बहुत डिसाइसिव होकर कहा : " ये थाले हकले ने फांत लिया तुम थब की भाभी को!"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वाया फ़ुच्ची कप्तान भाभी-ज्ञान से मैं तो परिचित था पर बन्टू और सत्तू की समझ में कुछ ज़्यादा नहीं आया. बन्टू और सत्तू को वहीं छोड़ कर लफ़त्तू मुझे तकरीबन घसीटता हुआ बाहर सड़क पर ले गया. हरिया हकले द्वारा उन दो माडर्न लड़कियों में से एक को फंसा लिए जाने की लफ़त्तू की बात दो वजूहात से मेरे लिए जीवन का सबसे बड़ा सदमा थी. पहला तो यह कि कोई हकला किसी लड़की को क्या कहकर फंसा सकता है - पिक्चरों में तो सारे हीरो इसी काम में इन्टरवल तक का मामला निबटा दिया करते थे. दूसरा यह कि लफ़त्तू भी ... उफ़! यानी बाहर से इस कदर बदमाश दिखने वाला लफ़त्तू भी ...!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"यार लफ़त्तू, तेरा दिल तो मोम का है!" मैंने अभी अभी देखी गई किसी पिक्चर का आधा अधूरा वाक्यांश बोलने की कोशिश की.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मोम का ऐ तो मोमबत्ती बनाऊं थाले की!" उसने किशमिश जैसा मुंह बनाया और बहुत ज़्यादा वयस्क गाली बकते हुए सड़क पर थूका. "हकले थे फंत गई कुत्तू!" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरा मन दहाड़ें मार कर रोने को हो रहा रहा था क्योंकि मैं ख़ुद उन में से पता नहीं किसी एक की मोहब्बत में गिरफ़्तार था. मोहब्बत तो मधुबाला से भी थी और सकीना से भी मगर उन स्कर्टधारिणियों का आसिक बनने का ख़्वाब इधर कुछ दिनों से विकल किये हुए था. तकलीफ़ ये थी कि वे दोनों बहुत ज़्यादा जुड़वां थीं. हमेशा एक से कपड़े पहनतीं एक से बस्ते लेकर स्कूल जातीं और उनकी आवाज़ भी एक सी लगती थी जब वे अपने मां बाप को "मम्मा ... पापू ..." कह कर पुकारा करतीं ...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(जारी ...)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/272678107746144576-1213814160264843961?l=lapoojhanna.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://lapoojhanna.blogspot.com/feeds/1213814160264843961/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=272678107746144576&amp;postID=1213814160264843961' title='15 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/272678107746144576/posts/default/1213814160264843961'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/272678107746144576/posts/default/1213814160264843961'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://lapoojhanna.blogspot.com/2009/01/blog-post.html' title='मोम का ऐ तो मोमबत्ती बनाऊं थाले की'/><author><name>लपूझन्ना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06722723246925370677</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>15</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-272678107746144576.post-3834246757680124749</id><published>2008-10-16T22:49:00.006+05:30</published><updated>2008-10-17T01:01:54.581+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सूकड़ू का ठूकड़ू'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लाल बैलबॉटम'/><title type='text'>लाल बैलबॉटम और सूकड़ू का ठूकड़ू</title><content type='html'>दिसम्बर-जनवरी के दिन थे. स्कूल में दोएक हफ़्ते की सर्दियों की छुट्टियां हुईं. पड़ोस में रहने वाली डिग्री कालेज में अंग्रेज़ी पढ़ाने वाली मैडम का, लाल बैलबॉटम पहनने वाला भाई नैनीताल से इस बार अपने साथ गिटार ले कर आया हुआ था. अपनी दूरबीन और चश्मेदार आंखों के कारण &lt;a href="http://lapoojhanna.blogspot.com/2008/02/blog-post.html"&gt;मैल्कम फ़्रेज़र वाले वाक़ये &lt;/a&gt;के बाद वह रोलमॉडल्स की मेरी अस्थाई सूची में ऊंची जगह बनाने में कामयाब हो चुका था. लफ़त्तू अलबत्ता उस से तकरीबन नफ़रत करता था और बातचीत में उसका नाम आते ही अपने गालीज्ञान का निर्बाध प्रदर्शन करने लगता था.&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;छुट्टियों के कारण लफ़त्तू व सत्तू द्वारा संचालित होने वाला घुच्ची आन्दोलन कुछ दिन ठंडा पड़ गया और हमारी छत बहुत समय बाद बंटू, लफ़त्तू, सत्तू और यदा-कदा फ़ुच्ची की संगत में क्रिकेट के लम्बे-लम्बे सैशनों से आबाद रहने लगी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक रात लाल बैलबाटम के घर बढ़िया भीड़ जुटी. डिग्री कालिज के मास्टरों से लेकर जंगलात के बड़े अफ़सर इस भीड़ का हिस्सा थे. यह बेहद संभ्रान्त आयोजन था जिसमें किसी भी पड़ोसी को नहीं बुलाया गया. अगले रोज़ पता चला कि अंग्रेज़ी मैडम के यहां नये साल की पाल्टी हुई. अंग्रेज़ी गानों के रेकॉर्ड बजे, केक खाया गया और शराब तक पी गई. हां अंग्रेज़ी मैडम ने भी पी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पाल्टी में भाग ले चुके भाग्यशाली लोगों के साथ जिस किसी का भी कैसा ही कोई संबंध था, वह अपने अपने आत्मविश्वास के हिसाब से इस बात को जल्दी-जल्दी समूचे रामनगर में फैला देना चाहता था कि शहर तरक्की की राह पर है. होली-दीवाली तक ठीक से न मना पाने वाले लोगों से आबाद रामनगर में दारू पी रही एक स्त्री की उपस्थिति में गमगमाए किसी घर से गिटार पर "हैप्पी न्यू ईयर" की आवाज़ के आने के मतलब को परम्परावादी, आधुनिकतावादी और उत्तर आधुनिकतावादी - तमाम कोणों से परखे जाने का सिलसिला चल निकला.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस के बाद लफ़त्तू के मन में लाल बैलबाटम के लिए हिकारत और बढ़ गई, हालांकि मैं अब भी उस से ख़ासा इम्प्रेस्ड था. लाल बैलबाटम के अपनी छत पर गिटार पर झमझम करता रहता और अदा के तौर पर नाक तक बह आए चश्मे को अपनी सबसे छोटी उंगली से ऊपर करता. लफ़त्तू ने उन दिनों अपनी चाल में इस फ़ैशनेबल संगीतकार लौंडे की पैरोडी जोड़ ली थी और हमें देखते ही वह दाएं हाथ के अंगूठे और पहली उंगली को जोड़कर दूसरी बांह को सीधा कर उसे हवाई गिटार  बना कर बजाता हुआ "झांय झप्पा, झांय झप्पा ... हब्बा हब्बा हब्बा हब्बा ..." गाना चालू कर देता. हम हंसते हंसते दोहरे हो जाते जब वह चश्मा ऊपर खिसकाने की एक्टिंग करता और आंख मार के कहता "हैप्पी नूई".  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम क्रिकेट खेल रहे थे जब एक दिन लाल बैलबाटम हमारी छत पर जाने कहां से अवतरित हो गया. उसने "हैलो" कहा और अपनी नाकें पोंछते हुए, हकबकाए हुए हम पहले एक दूसरे को फिर उसके गिटार को देखने लगे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मैं आप लोगों का खेल डिस्टर्ब नहीं करूंगा. दीदी की छत पर कुछ काम चल रहा है. मैं इतनी आवाज़ में वहां प्रैक्टिस नहीं कर सकता - अगले हफ़्ते मेरा म्यूज़िक का एग्ज़ाम है. आप खेलते रहिए, मैं एक कोने पर प्रैक्टिस करता रहूंगा."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"इत ते कै दो धाबू की थत पे कल्ले जो कन्ना ऐ." अम्पायर लफ़त्तू ने कर्री आवाज़ में आदेश जारी किया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लाल बैलबाटम को ढाबू की छत का रास्ता दिखा दिया गया. हम से दो-चार साल बड़ा यह नैनीताली-लौंडा उतना ख़राब नहीं लगा मुझे जितना उसके बारे में अफ़वाहें उड़ाई जा चुकी थीं. मुझे अचरज हुआ कि बाजे वगैरह की कोई परीक्षा वगैरह भी होती है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क़रीब तीन मिनट तक पड़े इस व्यवधान के दौरान केवल लफ़त्तू ही अपना कॉन्फ़ीडेन्स बचाए रख सका था. लाल बैलबाटम की संभ्रान्तता ने हमारी हवा निकाल दी थी. उसका चमचमाता गिटार, पीतल की चेन लगी तीस इंची मोहरी वाली लाल बैलबाटम हमारे तसव्वुर से कहीं आगे की चीज़ें थीं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अब तलो बेते! इश्टाट!" कहते हुए खीझे-भुनभुनाए लफ़त्तू ने खेल शुरू कराया. पर खेल में मन किसका लगना था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"रुक ना एक मिनट! भइया का गिटार देख!" यह बहुत कम बोलने वाला बन्टू था जिसकी पूरे रामनगर में साख केवल इस वजह से थी कि उसके पापा मोटरसाइकिल चलाते थे और गरमियों में बाकायदा काला चश्मा पहन कर निकलते थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लफ़त्तू ने संभवतः अपमानित महसूस किया और मुझ से बोला: "बन्तू आउत! अब तेली बाली!"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने बैट सम्हाला पर बॉलिंग कौन करता. बन्टू ढाबू की छत पर पहुंच कर अपने नए-नए बने भइया को देखता मंत्रमुग्ध खड़ा था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक नाटकीय फ़ैसला लेते हुए लफ़त्तू ने कहा: "तू खेल, मेली बौलिंग"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे याद नहीं उस से पहले लफ़त्तू ने कभी खेल में हिस्सा लिया हो.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"तू दलना मत बेते, फ़ात्त नईं कलूंगा. इछपिन कलाऊंगा."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लफ़त्तू ने बहुत अदाएं झाड़ते हुए रबड़ की गेंद पर थूक लगाया, फ़िर उसे हवा में चूमा और "दै माता दी" कहते हुए रन अप चालू किया. ज़िगज़ैग लय में हौले हौले चलता हुआ वह पूरी मस्ती में गाता हुआ मेरी तरफ़ बढ़ रहा था: "बेल बातम ... बेल बातम ... &lt;a href="http://lapoojhanna.blogspot.com/2008/07/blog-post_28.html"&gt;भेल फ़ातम &lt;/a&gt;... भेल फ़ातम ... "&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;" ... ल्ल्ले बेते! " कहकर उसने गेंद फेंकी और जो मेरे बैट से टकरा कर लप्पा कैच बनकर हवा में ऊंची उठी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उधर लाल बैलबाटम का झांय झप्पा चालू था और इधर कैच लेने को नाचने की मुद्रा में बढ़ते लफ़त्तू की नवीन ज़िगज़ैग कविता: "बेल बातम ... बेल बातम ... भेल फ़ातम ... भेल फ़ातम ... "&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"आउत है इम्पायल!" कहकर उसने अनुपस्थित अम्पायर की तरफ़ अपील की, ख़ुद ही वापस बॉलिंग-एन्ड पर जाकर अम्पायर बना और उंगली उठाकर आउट दे दिया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"देखी मेली इछपिन! तल दुबाला खेल्ले बेते! आज तू पिड्डू पे पिड्डू ले ले!"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कमज़ोर खिलाड़ी के आउट हो जाने के बाद तक़रीबन भीख में दिया जाने वाला एक एक्स्ट्रा चान्स पिड्डू कहलाया जाता था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लफ़त्तू की अनखेलेबल स्पिन, और ज़िगज़ैग कविता और लाल बैलबाटम की झांयझप्पा की वजह से मेरा मन उखड़ सा गया और मैं कुछ बहाना बना कर नीचे घर चला गया. पांच मिनट बाद छत पर पहुंचा तो लफ़त्तू और बैलबाटम वाकयुद्ध में लीन थे. घबराया बन्टू वाक़ई घबराया हुआ दिख रहा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मसला यूं हुआ था कि मेरी अनुपस्थिति में लफ़त्तू की "बेल बातम ... बेल बातम ... भेल फ़ातम ... भेल फ़ातम ... " परफ़ॉर्मेन्स अपने क्रिसेन्डो पर पहुंचने के बाद बैलबाटम की समझ में आ सकी कि यह दो कौड़ी का गंवार छोकरा उसकी मज़ाक उड़ा रहा है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"मुदे पागल छमल्लिया तू! तू झांय झप्पा कल्लिया था तो मैंने कुत कई तुत्ते? मेला गाना ऐ, मुदे लोकने वाला तू कौन होता ऐ! तूतियम छल्फ़ेत! ... बी यो ओ ओ ओ ... ई"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लफ़त्तू ने मुझे देखकर बढ़े हुए हौसले के साथ नाचना चालू कर दिया: "बेल बातम ... बेल बातम ... भेल फ़ातम ... भेल फ़ातम ... "&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह शिर्क था, ब्लास्फ़ेमी थी, घोर पाप था. लाल बैलबाटम बोला: "ईडियट्स!" और गिटार को खोल में डालने लगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"ईदियत कितको बोल्लिया बे? इंग्लिछ मुदे बी आती ऐ! मैं ईदियत तो तू बिलैदी बाछ्केत! ..."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'इन कुत्तों के मुंह कौन लगे' की मुद्रा बना कर नैनीताल का हीरो जाने लगा तो लफ़त्तू ज़ोर से बोला: "&lt;a href="http://lapoojhanna.blogspot.com/2008/08/blog-post.html"&gt;लाल मूंग की तातली &lt;/a&gt;खागा बे, ... बिलैदी हुत्त!"  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लफ़त्तू के पापा यदा-कदा अंग्रेज़ी में उसे 'ब्लेडी बास्केट' और 'ब्लेडी हुस्स' कह कर गरियाते थे. विरासत में अर्जित उसी ज्ञान की बदौलत आज उसने हमारी लाज बचाई. हमें शिकायत किये जाने की सूरत में घरवालों द्वारा मारे-पीटे जाने का थोड़ा सा ख़ौफ़ हुआ पर लाल बैलबाटम उस के बाद रामनगर कभी नज़र नहीं आया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत समय नहीं बीता था जब अंग्रेज़ी मैडम की नूई पार्टी के बाद संभवतः पड़ोस के असंतुष्टों की मांग पर लफ़त्तू के पापा ने अपने घर पर गीतों की संध्या जैसा कोई आयोजन रखा. इस में मेरे घर से मेरे पापा और मैंने शिरकत की.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लफ़त्तू लोगों के बाहर वाले कमरे के सारे कुर्सी मेज़ बाहर सड़क पर रख दिए गए थे और गद्दों दरियों पर महफ़िल जमी थी. जब हम ने प्रवेश किया तो संध्या शुरू हो गई थी. हारमोनियम की पेंपें और तबले की भद्दभद्द के ऊपर एक अंकल जी "जै मां सारदे" गा रहे थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लफ़त्तू ने मुझे अन्दर बुला लिया और परदे से लगा कर रखे एक स्टूल पर अपने साथ बिठा लिया. भीतर रसोई में औरतें और बरतन खटपट कर रहे थे. पके हुए भोजन की ख़ुशबू तैर रही थी. लफ़त्तू के पापा के दफ़्तर में काम करने वाले चन्दू भईया नामक चपरासी विशेष ड्यूटी में लगाए गए थे और वे बड़ों के कमरों में कांच के गिलास, पकौड़ी इत्यादि की सप्लाई में मुब्तिला थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पेंपें और भद्दभद्द के ऊपर उठने की कोशिश में लगे गायन के बोल समझ में नहीं आ रहे थे क्योंकि भीतर हर कोई कुछ बोल रहा था. अचानक सब चुप हो गए और लफ़त्तू के पिता ने अपनी जगह से अधलेटे कहा: "अरे आइये आइये मास्साब आइए!"&lt;br /&gt;मुर्गादत्त मास्टर भीतर आ गए. उनके साथ दो लोग थे. एक सारस जैसे दीखता था दूसरा गोबर के निर्विकार-निर्लिप्त ढेर सा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अचानक मुझे लगा कि लफ़त्तू के पापा भी बहुत बड़े आदमी हैं. मुर्गादत्त मास्साब का इतना ख़ौफ़ था कि मुझे लगता था वे सोते हुए भी संटी बगल में रखे रहते होंगे. पर यहां तो वे कुर्ता पाजामा पहन कर आए थे और चन्दू भैया द्वारा प्रस्तुत किए गए पदार्थ को स्वीकार भी कर ले रहे थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पेंपें और भद्दभद्द कुछ देर ठहर गई. मास्साब का स्टाइल था तो देसी पर भीषण पहाड़ी एक्सेन्ट में रंगा. मुर्गादत्त मास्साब ने अपने साथी सारस का परिचय कराया: "आप पंडित रामलायक निर्जन जी" और "आप" इस बार गोबरश्रेष्ठ का तआर्रुफ़ हो रहा था "डाक्साब. अभी तबादला हो के आए हैं पसू अस्पताल में सिरीनगर से. पंडिज्जी प्रिंसीपल साब की बुआ के ममेरे भाई के साले हैं. अरे अपने छोटे भाई हैं साब. छुट्टी के बाद यहां अपने कालिज में बच्चों को संस्कृत सिखलावेंगे. बड़े महात्मा आदमी हैं. आप के सौभाग्य जो पंडिज्जी आपके यहां आए. पंडिज्जी गाने भतेरे जानते हैं और सायरी बनाते हैं जभी तो उपनाम धरा है निर्जन."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने ऊपर पढ़े जा रहे क़सीदे को सुनते ही पंडित रामलायक निर्जन के चेहरे पर वाक़ई निर्जनता छा गई. उन्होंने एक घूंट में गिलास समझा और अपने को निर्जन वन में पहुंचा लिया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आधे मिनट के बीतते न बीतते नाकदार, स्त्रैण आवाज़ में वे चालू थे: "मेरी जिन्नगानी पे तेरी याद का साया है पिरतमा!"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनके पिरतमा कहने में कुछ था कि कई लोगों की हल्की हंसी छूट जा रही थी पर निर्जन वन में बैठे नायिका की याद के मारे पंडिज्जी हर किसी से बेज़ार थे. उन्होंने ठीक आधे घन्टे तक श्रोताओं की खाल में भुस भरा, पांच बार चन्दूपेय को उदरस्थ किया और इकत्तीसवें मिनट में "वाक वाक" करते कमरे के बाहर नाली-वाक पर निकल लिए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गोबर डाक्टर जिस अनौपचारिक तरीके से भीतर के कमरों में आ-जा रहे थे, मुझे समझने में देर नहीं लगी कि वे लफ़त्तू लोगों के वही पूर्वपरिचित हैं जिनके तबादले के बारे में वह मुझे कुछ रोज़ पहले बता रहा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी अफ़रातफ़री में खाना लगा दिया गया. पिताजी घर से बुलावा आने पर जा चुके थे और मुझे देर होने की स्थिति में लफ़त्तू के साथ वहीं सो जाने को कहा गया था. हमारे पड़ोस के वैद्यजी भी नशे में आ चुके थे और "अहम लम्बामि! अहम लम्बामि!" कहते हुए लफ़त्तू के ऑलरेडी लधरे पापा पर लधरे जा रहे थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हारमोनियम मुर्गादत्त मास्साब ने थाम लिया था और वे रामलीला का "तेरा अभिमान सब  जाता रहेगा ओ रावण! नए दुख रोज़ तू पाता रहेगा!" वाला विभीषण का डायलाग गाने लगे थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैद्यजी अब हाल में आ गए थे. और खड़े हो कर झूमते हुए नाचने लगे थे. उनकी आंखों से आंसू गिर रहे थे. गाना ख़त्म होते ही उन्होंने एक बार हकबका कर मुर्गादत्त मास्साब को देखा फिर लफ़त्तू के पापा को. जैसे उन्हें कुछ याद आया और वे  "अहम लम्बामि! अहम लम्बामि!" कहते हुए प्री-डायलाग स्थिति में लधर गए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह सब बहुत देर चलता रहा. पसू अस्पताल के डाक्साब के इसरार पर अन्ततः मुर्गादत्त मास्साब वापस घर जाने को तैयार हुए. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"चलो बच्चो! चलो गमलू! चलो कुच्चू! "&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गमलू और कुच्चू हमारी उमर की दो बेहद सुन्दर जुड़वां बच्चियां निकलीं . दोनों ने गुलाबी स्कर्ट पहना हुआ था जिन पर गुड़िया बनी हुई थीं. "पापू, थक गया मैं!" कह कर उनमें से एक गोबर डाक्टर के पैरों से लिपट गई. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह मेरी दूसरी मौत थी &lt;a href="http://lapoojhanna.blogspot.com/2007/10/blog-post.html"&gt;सकीना&lt;/a&gt; के बाद!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत बाद में खाना खा चुकने के बाद, लफ़त्तू के पापा के इसरार  पर चन्दू भइया ने हारमोनियम सम्हाल कर जब एक सायरी गाना शुरू किया तो मुझे उनकी आवाज़ में गाए जा रहे "सूकड़ू होता है इन्सा ठूकड़े खाने के बाद" सुनते हुए एक एपोकैलिप्टिक आवेग में अगले एक खरब युगों तक का अपना मुस्तकबिल ठूकड़ें खाते हुए सूकड़ू बनने की जद्दोजहद में फंसा दिख गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह अलग बात है कि अगले कई सालों तक गमलू के चक्कर में लफ़त्तू द्वारा खाई गई ठूकड़ों का हिसाब आज भी किसी के पास नहीं है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/272678107746144576-3834246757680124749?l=lapoojhanna.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://lapoojhanna.blogspot.com/feeds/3834246757680124749/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=272678107746144576&amp;postID=3834246757680124749' title='18 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/272678107746144576/posts/default/3834246757680124749'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/272678107746144576/posts/default/3834246757680124749'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://lapoojhanna.blogspot.com/2008/10/blog-post.html' title='लाल बैलबॉटम और सूकड़ू का ठूकड़ू'/><author><name>लपूझन्ना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06722723246925370677</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>18</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-272678107746144576.post-7920117406695732017</id><published>2008-09-17T15:49:00.003+05:30</published><updated>2009-04-24T18:02:45.823+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बिग्यान'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='धलमेन्दल'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='टोड मास्साब'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्याली मात्तर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बास्पीकरण'/><title type='text'>बास्पीकरण और तत्तान के पीते थुपा धलमेन्दल</title><content type='html'>हैलन का डान्स देखने और बमपकौड़े का लुफ़्त उठाने के ऐवज में गोलू और लफ़त्तू की बच्चा पीठों को गोलू के इंग्लिछ मात्तर पापा उर्फ़ टोड मास्साब के बेशुमार सन्टी-प्रहार झेलने पड़े थे. इस सनसनीख़ेज़ घटना के उपरान्त कई दिनों तक कनिष्ठ व वरिष्ठ टोडद्वय स्कूल नहीं आए. इस बाबत लगातार फैलाई जा रही अफ़वाहों का बोगदा फूलता ही गया, हालांकि वस्तुस्थिति की ऑथेन्टिक जानकारी किसी को नहीं थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंग्रेज़ी की कक्षाएं बन्द हो गई थीं और उस पीरियड में सीनियर बच्चों को पढ़ाने वाले एक बहुत बूढ़े मास्साब अरेन्जमेन्ट के बतौर तशरीफ़ लाया करने लगे. वे बहु्त शरीफ़ और मीठे थे. वे एक प्रागैतिहासिक चश्मा पहनते जिसकी एक डण्डी थी ही नहीं. डण्डी के बदले वे एक सुतलीनुमा मोटा धागा बांधे रहते थे जो उनके एक कान के ऊपर से होकर खोपड़ी के पीछे से होता हुआ दूसरे कान पर सुसज्जित डण्डी के छोर पर किसी जुगाड़ से फंसाया जाता था. चश्मे के शीशे बहुत मोटे होते थे और लगता था कि शेरसिंह की दुकान वाले चाय के गिलासों की पेंदियों को लेन्स का काम करने हेतु फ़िट किया गया हो. उनके पास 'गंगाजी का बखान' नामक एक कल्याणनुमा किताब हमेशा रहती थी. किताब के लेखक का नाम गंगाप्रसाद 'गंगापुत्र' अंकित था. वे उसी को सस्वर पढ़ते और भावातिरेक में आने पर अजीब सी आवाज़ें निकाल कर गाने लगते.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह रहस्य कोई एक हफ़्ते बाद लालसिंह के सौजन्य से हम पर उजागर हुआ कि गंगाप्रसाद 'गंगापुत्र' कोई और नहीं स्वयं यही बूढ़े मास्साब हैं. मास्साब का शहर में यूं भी जलवा था कि 'गंगोत्री चिकित्सालय' नाम से वे  एक आयुर्वेदिक, यूनानी दवाख़ाना चलाते थे. गंगाप्रसाद 'गंगापुत्र' आकंठ गंगाग्रस्त थे और हर पीरियड में अपने महाग्रंथ से हमारी ऐसीतैसी किया करते. वे थोड़ा सा तुतलाते थे और संस्कृतनिष्ठ हिन्दी में लिखी अपनी ऋचाओं को सुनाने के उपरान्त उनकी संदर्भरहित व्याख्या किया करते: "कवि कैता है कि प्याली गंगे, मैं तो तेरा बच्चा हूं! और गंगामाता कवि से कैती है कि मेरे बच्चे मैं तो तेरी मां हूं! फिर कवि कैता है कि प्याली गंगे, हमने तुज पे कित्ते अत्याचार किए ..."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक साइड से लफ़त्तू की दबी सी आवाज़ आती: "जित का बत्ता इत्ता बुड्डा है वो गंगा कित्ती बुड्डी होगी बेते! दला पूतो तो प्याली मात्तर ते!" गंगाप्रसाद 'गंगापुत्र' के कानों पर जूं भी नहीं रेंगती और उनका प्याली गंगे पुराण रेंगता जाता. लालसिंह ने यह भी बाद में बताया कि मास्साब को दिखाई भी बहुत कम देता है और सुनाई भी. लफ़त्तू ने गंगाप्रसाद 'गंगापुत्र' का नामकरण 'प्याली मात्तर' कर दिया था और यह नाम सीनियर्स तक में चर्चा का और जूनियर्स में लफ़त्तूकेन्द्रित ईर्ष्या का विषय बन गया. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इधर कुछ व्यक्तिगत कारणों से दुर्गादत्त मास्साब लम्बे अवकाश पर चले गए थे और टोड मास्साब की क्लास के तुरन्त बाद पड़ने वाले उनके वाले पीरियड में भी यदा-कदा प्याली मात्तर हमारी क्रूरतापूर्ण हर-हर गंगे किया करते थे. लफ़त्तू लगातार बोलता रहता था और पिक्चरों की कहानी सुनाना सीख चुकने के अपने नवीन टेलेंट पर हाथ साफ़ किया करता: "... उत के बाद बेते, हौलीतौप्तल छे धलमेन्दल भाल आया और उतने अदीत छे का - तुम थब को तालों तलप छे पुलित ने घेल लिया ऐ, अपनी पित्तौल नीते गेल दो. ... उतके बाद बेते अदीत एक तत्तान के पीते थुप के धलमेन्दल छे कैता है - मुदे मालने ते पैले अपनी अम्मा की लाछ ले दा इन्पैत्तल! ... धलमेन्दल कैता है कुत्ते थाले, मैं तेला खून पी दाऊंगा ... "&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक तरफ़ से तोतली हर-हर गंगे, दूसरी तरफ़ से धरमेन्दर और अजीत के क्लाइमैक्स वाले तोतले ही डायलॉग्स और बाकी दिशाओं से स्याही में डूबी नन्ही गेंदों का फेंका जाना - यह नित्य बन गया दृश्य जब एक दिन हमारी कक्षा के पास से टहलते जा रहे प्रिंसीपल साहब ने देखा तो वे पीतल के मूठवाली अपनी आभिजात्यपूर्ण संटी लेकर हम पर पिल पड़े. जब तीन चार बच्चों ने दहाड़ें मार-मार कर रोना चालू किया, तब जाकर प्याली मात्तर ने गंगपुराण बन्द किया और आंखें उठाकर नवागंतुक प्रिंसीपल साहब की आकृति को श्रमपूर्वक पहचाना. कुछ औपचारिक बातचीत के बाद दोनों गुरुवर कुछ गहन विचार विमर्श करते हुए कक्षा के बाहर दरवाज़े पर खड़े हो गए. इतने में प्रिंसीपल साहब के मामा यानी मुर्गादत्त मास्साब उर्फ़ परसुराम वहां से पान चबाते निकले. क्लास के बाहर खड़े प्रिंसीपल साहब और प्याली मात्तर को वार्तालापमग्न देख उन्होंने पीक थूकी और उक्त सम्मेलन में भागीदार बनने की नीयत से उस तरफ़ आने लगे. &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;दरवाज़े पर मुर्गादत्त मास्साब ने "प्रणाम कक्का" कहते हुए प्याली मात्तर के पैर इस शैली में छुए मानो उनकी जेब काट रहे हों या होली के टाइम किया जाने वाला आकस्मिक मज़ाक कर रहे हों. प्रिंसीपल साहब की तरफ़ उन्होंने एक बार को भी नहीं देखा और आधे मिनट से कम समय में सारी बात समझ कर प्रिंसीपल साहब के हाथ से संटी छीनी और "अभी देखिये कक्का" कहते हुए हम पर दुबारा हाथ साफ़ किया. "अपनी मां-भैंनो से पूछना हरामज़ादो मैं तुम्हारे साथ क्या-क्या कर सकूं हूं. और खबरदार जो साला एक भी भूतनी का रोया तो!" एक हाथ से संटी को मेज पर पटकते और दुसरे से अपने देबानन-स्टाइल केशझब्ब को सम्हालते उन्होंने इतनी तेज़ आवाज़ निकाली कि अगल-बगल की सारी क्लासों के अध्यापक बाहर आकर कक्षा छः (अ) की दिशा में ताकीकरण-कर्म में तल्लीन तथा व्यस्त हो गए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घन्टा बजने के बाद मास्टरों के तिगड्डे के लिए हम जैसे मर गए. वे ख़रामा-ख़रामा मुर्गादत्त मास्साब का अनुसरण करते किसी दिशा में निकल पड़े. "छाला हलामी लाजेस्खन्ना का बाप!" औरों को बचाने के चक्कर में अपने पृष्ठक्षेत्र पर असंख्य संटियां खा चुके लफ़त्तू ने ज़मीन पर थूका. "इत्ते तो दुल्गादत्त मात्तर छई है याल!"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लफ़त्तू की दुआ सुनी गई और अगले रोज़ प्याली-गंगे की चाट का ठेला उठते ही अपने पुरातन धूल खाए कोट और हाथों मे सतत विराजमान कर्नल रंजीत समेत दुर्गादत्त मास्साब सशरीर उपस्थित थे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"टेस्टूपें कल ले आबें सारे बच्चे! और दस-दस पैसे भी!" अटैन्डेन्स से उपरान्त यह कहकर वे उपन्यास पढ़ने ही वाले थे कि उन्हें पता नहीं क्या सूझा. उन्होंने उपन्यास जेब के हवाले किया और कुर्सी पर लधर गए. "मैं मुर्दाबाद गया था बच्चो! मुर्दाबाद भौत बड़ा सहर है. और हमाये रामनगर जैसे, आप समल्लें, सौ सहर आ जावेंगे उस में."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुरादाबाद में दुर्गादत्त मास्साब की ससुराल थी जहां उनके ससुर दरोगा थे. इतनी सी बात बताने में उन्होंने बहुत ज़्यादा फ़ुटेज खाई और हमें छोटे क़स्बे का निवासी होने के अपराधभाव से लबरेज़ कर दिया. आख़िर में उन्होंने एक क़िस्सा सुनाया: "परसों मैं और मेरा साला जंगल कू गए सिकार पे. और सिकार पे क्या देखा तीन बब्बर सेर रस्ता घेरे खड़े हैं. जब तक कुछ समजते तो देखा कि दो बब्बर सेर पीछे से गुर्राने लगे. हमाये साले साब तो, आप समल्लें, व्हंई पे बेहोस हो गए. मैंने सोची कि दुर्गा आत्तो तेरी मौत हो गई. मुझे तुम सब बच्चों की याद भी आई. मैंने सोची अगर मैं मर गया तो तुमें बिग्यान कौन पढ़ाएगा. और टेस्टूपें भी बेकार जावेंगी. मैंने दो कदम आगे बढ़ाए तो सबसे बड़ा सेर बोला: 'मास्साब आप जाओ! हम तो सुल्ताना डाकू का रस्ता देख रये हैं.' अब मेरी जान में जान आई मगर साले साब तो बेहोस पड़े थे. तब उसी बड़े सेर ने हमाये पीछे खड़े एक सेर से कई कि साले साब को अपनी पीठ पे बिठा के  जंगल के कोने तक छोड़िआवे. तो आप समल्लें कि जंगल का छोर आने को था कि साले साब को होस आ गया. मेरे पीछे सेर ऐसे चलै था जैसे कोई पालतू कुत्ता होवे. साले साब की घिग्घी बंध गई जब उन्ने खुद को सेर की पीठ पे देखा. ..."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क़िस्सा ख़त्म होते न होते घण्टा बजा और मास्साब ने हमें बताया कि कैसे साले साहब की जान बचाने की वजह वे से मुरादाबाद में रामनगर का झंडा फ़हरा कर लौटे हैं. सारे बच्चे नकली ठहाके लगा कर ताली पीटने लगे. उनका क़िस्सा कोरी गप्प था पर दुर्गादत्त मास्साब जैसे ज़ालिमसिंह के मुंह से उसे सुनना ख़ुशनुमा था. इस पूरे पीरियड में लफ़त्तू मास्साब के नए जुमले "आप समल्लें" को पकड़ने वाला पहला बच्चा था: "आप छमल्लें मात्ताब छमज लये हम थब तूतियम छल्फ़ेत हैं."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तूतियम छल्फ़ेत यानी चूतियम सल्फ़ेट हमारे जीवन में अग्रजों के रास्ते पहुंची पहली कैमिकल गाली थी. अगले ही दिन पता चला कि दुर्गादत्त मास्साब भी इस गाली के दीवाने थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगले दिन अटैन्डेन्स दुर्गादत्त मास्साब ने ली. इस दौरान लालसिंह ने सारे बच्चों से दस-दस के सिक्के इकठ्ठे किये और बन्सल मास्साब की दुकान से जल्दी जल्दी दो थैलियां ले कर वापस लौटा. एक थैली में चीनी थी और दूसरी में नमक. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मास्साब के पीछे-पीछे हम सब क़तार बना कर परखनलियों की अपनी-अपनी जोड़ियां लेकर परजोगसाला की तरफ़ रवाना हुए. परजोगसाला-सहायक चेतराम ने मास्साब को नमस्ते की और हिकारत से हमें देखा. हलवाई के उपकरणों, भूतपूर्व बारूदा-बीकरों वाली मेज़ों और कंकाल वाली अल्मारियों के आगे एक बड़ा दरवाज़ा था. इसी के अन्दर थी परजोगसाला की रसायनविज्ञान-इकाई. विचित्रतम गंधों से भरपूर इस कमरे में तमाम शीशियों में पीले, हरे, नीले, लाल, बैंगनी द्रव भरे हुए थे. बीकर और कांच के अन्य उपकरणों की उपस्थिति में वह सचमुच साइंस सीखने वाली जगह लग रही थी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तनिक ऊंचे एक प्लेटफ़ॉर्म पर मास्साब खड़े हुए. लालसिंह के हाथ से चीनी-नमक लेकर उसे चेतराम को थमा कर मास्साब ने गला खंखार कर कहना शुरू किया: "बच्चो, आज से हम बास्पीकरण सीखेंगे. चाय बनाते हुए जब पानी गरम किया जावे है तो उसमें से भाप लिकलती है. इसी भाप को साइंस में बास्प कहा जावे है. और अंग्रेज़ी में आप समल्लें इस का नाम इश्टीम होता है. चाय की गरम पानी को कटोरी से ढंक दिया जावै तो भाप बाहर नईं आ सकती और कटोरी गीली हो जा है. और जो चीज़ गीली होवै उसे द्रब कया जावे. द्रब से भाप बने तो बिग्यान में उसे बास्पीकरण कैते हैं और जब भाप से द्रब बने तो द्रबीकरण. आज हम परजोग करेंगे बास्पीकरण का."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चेतराम चीनी और नमक को अलग-अलग ढक्कन कटे गैलनों में पानी में घोल चुका था और मास्साब को देख रहा था. "अब सारे बच्चे अपनी टेस्टूपों में अलग - अलग नमक और चीनी का घोला ले लेवें और चेतराम जी से सामान इसू करा लें."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चेतराम ने हर बच्चे को परखनली पकड़ने वाला एक चिमटा और एक स्पिरिट-लैम्प इसू किया. हमने इन उपकरणों की मदद से दोनों परखनलियों के घोले को सुखाना था. यह कार्य बहुत जल्दी-जल्दी किया गया. स्पिरिट लैम्प की नीली लौ पर टेस्टूप में खदबदाते पानी को देखना मंत्रमुग्ध कर लेने वाला था. मास्साब बता चुके थे कि परजोग की कक्षा दो पीरियड्स तक चलनी थी. लफ़त्तू जैसा बेचैन शख़्स तक मन लगा कर परखनली पर निगाहें टिकाए था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ देर बाद सारा पानी सूख गया और परखनलियों के पेंदों में बर्फ़ जैसी सफ़ेद तलछट बची. यह नमक और चीनी था जिसे हमने बरास्ता बास्पीकरण नमक और चीनी से ही बनाया था. दूसरा घन्टा बजने में बहुत देर थी और स्पिरिट लैम्पों के साथ कुछ और करने की इच्छा बहुत बलवती हो रही थी. लफ़त्तू ने यहां भी अवांगार्द का काम किया और रंगीन शीशियों से दो एक द्रब निकालकर परखनली में गरम करना शुरू किया. लफ़त्तू की देखादेखी एक-एक कर सारे बच्चों ने अलग - अलग रसायन-निर्माण का प्रोजेक्ट उठा लिया. हवा में अजीबोग़रीब गंधें और धुंए फैलना शुरू होने लगे. इस का पहला क्लाइमैक्स एक मुन्ना टाइप बच्चे की टेस्टूप के 'फ़टाक' से फूटने के साथ हुआ. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसे सुनते ही दुर्गादत्त मास्साब का "हरामज़ादो!" कहते हुए उपन्यास छोड़ना था और सारे बच्चों ने स्पिरिट लैम्पों से हटाकर अपनी टेस्टूपें लकड़ी के स्टैंडों में धंसा दीं. लाल आंखों से एक-एक बच्चे को घूरते दुर्गादत्त मास्साब सारी क्लास से कुछ कहने को जैसे ही लफ़त्तू के पास ठिठके, लफ़त्तू के बनाए रसायन वाली परखनली से तेज़-तेज़ धुंआ निकलना शुरू हुआ. मास्साब की पीठ उस तरफ़ थी. घबराया हुआ लफ़त्तू परजोगसाला से द्वार तक लपक चुका था. अचानक से परखनली और भी तेज़ फ़टाक के साथ चूर-चूर हो गई. मास्साब घबरा कर हवा में ज़रा सा उछले. पलटकर उन्होंने "साले चूतियम सल्फ़ेट! इधर आ हरामी!" कहकर लफ़त्तू को मारने को अपना हाथ उठाया पर तब तक लफ़त्तू संभवतः बौने के ठेले तक पहुंच चुका था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"जिस साले ने मुझ से पूछे बिना एक भी सीसी छुई तो सारी सीसियां उसकी पिछाड़ी में घुसा दूंगा. अब चलो सालो फ़ील्ड पे ..."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लतियाते-फटकारते  हमें  फ़ील्ड ले जाया गया जहां तेज़ धूप में मुर्गा बना कर हमारे भीतर बची-खुची वैज्ञानिक-आत्मा के बास्पीकरण का सफल परजोग सम्पन्न हुआ.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/272678107746144576-7920117406695732017?l=lapoojhanna.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://lapoojhanna.blogspot.com/feeds/7920117406695732017/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=272678107746144576&amp;postID=7920117406695732017' title='22 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/272678107746144576/posts/default/7920117406695732017'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/272678107746144576/posts/default/7920117406695732017'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://lapoojhanna.blogspot.com/2008/09/blog-post_17.html' title='बास्पीकरण और तत्तान के पीते थुपा धलमेन्दल'/><author><name>लपूझन्ना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06722723246925370677</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>22</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-272678107746144576.post-3987507615888026810</id><published>2008-09-11T14:59:00.002+05:30</published><updated>2008-09-12T12:33:05.359+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लफ़त्तू'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बम पकौड़ा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बैटमिन्डल'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बागड़बिल्ला'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='फ़ुच्ची कप्तान'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सकीना'/><title type='text'>फ़ुच्ची कप्तान की आसिकी</title><content type='html'>लफ़त्तू के साथ पढ़ाई-लिखाई से सम्बन्धित बहुत ज़्यादा बातें नहीं होती थीं. हां, यदि घर से कोई चीज़ स्कूल ले कर जानी होती जैसे बारूदा एक्स्पेरीमेन्ट के लिए बीकर या सिरीवास्तव मास्साब की सिलाई-कक्षा हेतु पिलाश्टिक का अंगुस्ताना तो लफ़त्तू के लिए वे चीज़ें मैं लेकर जाया करता. इस कार्य को मैं मित्रतापूरित उत्साह के साथ अंजाम देता. हम दोनों के बीच इस तरह की कोई समझौता वार्ता नहीं हुई थी पर एक आपसी अंडरस्टैंडिंग थी कि लफ़त्तू की चीज़ें ख़रीदने के लिए मैं मां से झूठ बोल लेता था जबकि बौने के ठेले पर होने वाले हमारे बमपकौड़ायोजनों में अपने पापा की जेब से चुराए पैसों से लफ़त्तू पेमेन्ट किया करता.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इधर के दिनों में टौंचा-उस्ताद बागड़बिल्ले का कार्यक्षेत्र खताड़ी से आगे भवानीगंज तक पसर चुका था. बागड़बिल्ले के कुशल नेतृत्व और निर्देशन में वरिष्ठ-कनिष्ठ दोनों प्रकार के लफ़ंडर लौंडे घुच्ची के खेल को रामनगर की गली-गली में फैला देने के महती अनुष्ठान में जान दे देने के हौसले के साथ तन-मन और पांच पैसे के सिक्कों के साथ जुट चुके थे. बड़े भाइयों-चाचाओं-मामाओं इत्यादि द्वारा कभी किसी लड़के के साथ सद्यःघटित सार्वजनिक मारपीटीकरण और अपमानीकरण की अफ़वाहें तमाम मसालों मे लपेटकर हमारे इन्टरवल-सम्मेलनों का विषय बनतीं पर इन सब से उदासीन और अभूतपूर्व जिजीविषा से लबालब ये जांबाज़ जिस खेल पर अपना सर्वस्व न्यौछावर करने का क़ौल उठा चुके थे, उस से उन्हें अब परमपिता भी विरत नहीं कर सकता था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही दिन थे जब अपने अनुभव-जगत की विस्तृतता के कारण लफ़त्तू मुझे, मेरा हमउम्र होने के बावजूद, अपने से बहुत-बहुत बड़ा लगने लगा था. इधर उसने नियमित रूप से क्लास गोल करने का रिवाज़ चलाया जो घुच्चीप्रेरित बच्चों में जल्दी पॉपुलर हो गया. लफ़त्तू बागड़बिल्ले का अच्छा दोस्त था और उसके कॉन्फ़ीडेन्स और तोतले किन्तु प्रभावकारी वाकचातुर्य के कारण उसकी उपस्थिति की क्लास में बास्पीकरण सीखने में नहीं बल्कि घुच्ची-अभियान के प्रचार-प्रसार में अधिक दरकार होती थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डरना लफ़त्तू ने अब और भी कम कर दिया था. अपने पापा की अंग्रेज़ी की उन्हीं के मुंह के सामने ऐसी-तैसी फेर चुकने के बाद से अब उसने गब्बर का डायलॉग मारना भी बन्द कर दिया था. वह इस मामले में अब बहुत कर्मठ हो चुका था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छत पर क्रिकेट खेलते हुए लफ़त्तू की उपस्थिति लगातार कम होती जा रही थी और हमें उसमें मज़ा आना क़रीब-क़रीब बन्द हो गया था. कभी-कभी मैं और बंटू बैट-बल्ला छोड़ छत से भावपूर्ण मुद्रा में खेल मैदान को देखा करते और फिर किसी क्षण सड़क पर आकर घासमण्डी का रुख़ करते.शाम के समय घूमने जाने को घर से थोड़ा दूर अवस्थित घासमण्डी को बंटू के पापा ने हमारी लिमिट तय किया हुआ था. घासमण्डी की सरहद पर मरियल कुत्तों की तरह खड़े, मजबूत आवारा कुत्तों को बेख़ौफ़ लड़ते-भौंकते देखते हुए से हम &lt;em&gt;'असफाक डेरी सेन्टर और केन्द्र'&lt;/em&gt; के सामने वाली गली की तरफ़ निगाह चिपका लेते. बहुत संजीदगी से अपने हाथों से भंगिमाएं बनाते, नवघुच्चीवादियों के लैक्चर देते या स्वयं घुच्ची खेलते लफ़त्तू की झलक देखने को मिल जाती तो हमें अजीब-अजीब लगने लगता. हमारी मानसिक हालत किसी असहाय, विवश ग़ुलाम की सी होती और हम बहुत मनहूस चेहरों के साथ, क़रीब-क़रीब रोते हुए वापस लौटते.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस दिन हमारे लिए ख़ास फ़ुरसत निकालकर लफ़त्तू क्रिकेट खेलने आता, उसके पास हमें बताने को बेतहाशा क़िस्से होते. खताड़ी में अपना झंडा गाड़ चुकने के बाद कैसे उसने भवानीगंज में अपना सिक्का जमा लिया था, यह हमारे लिए रश्क का विषय होता. उसके चमत्कार-लोक में प्रवेश कर पाने की हमारी आकुलता से भरपूर उत्कंठा और भी बलवती हो जाया करती.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इधर लफ़त्तू की अंतरंग मित्रमंडली का विस्तार हो चुका था. उसकी बातों से ज्ञात होता था कि फ़ुच्ची कप्तान नामक एक नए आए लड़के का उसके जीवन पर बहुत प्रभाव पड़ चुका था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ़ुच्ची के पापा रेडीमेड कपडों और प्लास्टिक के जूतों की रेहड़ी लगाते शहर-दर-शहर भटका करते थे. उसी क्रम में वे कुछ समय पहले रामनगर आ बसे थे. उनकी भाषा बहुत ज़्यादा देसी थी. फ़ुच्ची हमसे तीनेक साल बड़ा रहा होगा. शहर-शहर, नगर-नगर घूम चुकने के बाद उसका अनुभव-जगत बहुत संपन्न था और हम सबकी स्पृहा का बाइस भी. 'छठी फ़ेल' की उच्चतम शिक्षाप्राप्त फ़ुच्ची बहुत सांवला था और बात-बात पर "मने, मने" कहता था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसका नाम फ़ुच्ची धरे जाने का क़िस्सा लफ़त्तू ने हमें मौज ले ले कर सुनाया था. किसी गली में घुच्ची खेल रहे लौंड-समूह के पास जाकर उसने पूछा:"मने इस खेल की नाम बतइये तनिक!" नाम बताए जाने पर उसने किसी ख़लीफ़ा की तरह जेब से पांच के सिक्के निकालते हुए कहा: "हम भी खेलेंगे फ़ुच्ची!"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अबे फ़ुच्ची नहीं घुच्ची! घुच्ची ... घुच्ची!" लौंडसमूह के अंतरंगतापूर्ण सामूहिक अट्टहास में इस कलूटे देसी लड़के को फ़ुच्ची नाम से आत्मसात कर लिया गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ़ुच्ची के साथ 'कप्तान' की पदवी दिए जाने का कारण स्वयं फ़ुच्ची की एक आदत में छिपा हुआ था. अपनी वाकपटुता के कारण वह हर जगह दिखाई देने लगा था. बच्चे जहां कहीं कुछ भी खेल रहे होते थे, वह वहां पहुंच जाता और फट से दो टीमों का निर्माण कर देता. "अपनी टीम के कप्तान हम बन गए, बाकी वाले अपना छांट लें!" - यह उसका तकिया कलाम था और अन्ततः उसके नाम के साथ नेमेसिस की तरह जुड़ गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रामनगर में इतने समय से खेलते हुए हमें कभी कप्तानी जैसे विषय पर सोचने की प्रेरणा तक नहीं मिली थी और फ़ुच्ची ने आते ही खु़द को आधे बच्चों का कप्तान बना लिया. इस से उसका क़द, इज़्ज़त और नाम तीनों की लम्बाई बढ़ी. कप्तानी के साथ फ़ुच्ची ऑब्सेशन की हद तक जुड़ा हुआ था. हरिया हकले के मकान से होते हुए हमारी छत तक पहुंचने का रास्ता उसे लफ़त्तू बता चुका था. एकाध बार उसने मेरे साथ बैटमिन्डल भी खेली थी. छत पर हम दो ही थे. उसने कहा: "इधर वाले के कप्तान हम. और उधर वाले का मने आप छांट लें!" मेरा मन कुढ़न और खीझ से भर गया था पर मुझे चुप रहना पड़ा क्योंकि कुछ भी हो फ़ुच्ची उन दिनों मेरे उस्ताद लफ़त्तू का उस्ताद बना हुआ था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिन देर शाम को सियार की सी आवाज़ निकालते हुए लफ़त्तू ले घर के बाहर "बी ... यो ... ओ ... ओ ... ई" का लफ़ाड़ी-संकेत किया तो डरते-सहमते मैं ज़ीना उतर कर बाहर निकला. हांफ़ते हुए लफ़त्तू ने मुझे काग़ज़ का एक पर्चा थमाया और वापस भागता हुआ बोला: "इत को थीक कल देना याल. कल छुबै फ़ुत्ती को देना है!"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने वापस आकर होमवर्क में मुब्तिला होने का बहाना बनाया और पर्चा किताब के बीच छिपा लिया. हालात सामान्य होते ही मैंने पर्चा खोला. लफ़त्तू की अद्वितीय हैंडराइटिंग सामने थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसे बचा खुचा ज़रा सा भात आवारा बिल्लियों के लिए धूप में रखे जाने और न खाये जाने पर टेढ़े-मेढ़े कणों में बदल जाता है, कुछ वैसी ही हैंडराइटिंग में लफ़त्तू ने फ़ुच्ची के बदले लिखा था:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;"मेरी चीटडी पड के नराज न होना.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मे तुमरा आसिक हु.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सादी कर.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुमरा &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फुच्चि"&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उफ़! यानी लवलैटर! मेरे सामने जीवन में देखा गया पहला प्रेमपत्र पड़ा हुआ था - यह दीगर बात थी कि वह प्रॉक्सी था और मुझे उसे "थीक" करना था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहले तो मैंने लफ़त्तू के प्रति ज़रूरत से ज़्यादा कृतज्ञताभाव महसूस किया कि उसने इस अतिमहत्वपूर्ण प्रोजेक्ट के लिए मुझे छांटा. उसके बाद मैं उस बदनसीब पर्चे को अपना लिखा पहला प्रेमपत्र बनाने के प्रयासों में जुट गया. मैंने अपने मन में तब तक देखी गई सारी फ़िल्मों और सुने गए सारे गानों की फ़ेहरिस्त बनाई और रात को ज़्यादा होमवर्क मिले होने का झूठ बोलते हुए देर तक जग कर अन्ततः एक आलीशान इज़हार-ए-मोहब्बत लिख मारा. शुरू में मैंने सकीना को संबोधित किया, पर उसके बहुत छोटी होने के कारण मेरी कल्पना सीमित हो जा रहि थी, सो बाद का हिस्सा मेरी नई प्रेमिका मधुबाला मास्टरानी से मुख़ातिब था. अन्त में "आपका अपना फ़ुच्ची" लिखने से पहले मैंने चांद-तारे तोड़ लाने की बात लिखी थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुबह स्कूल जाते हुए कांपते हाथों से मैंने लफ़त्तू को उसकी "चीटडी" थमाई. उसने मुझे एक मिनट रुकने को कहा. वह भागता हुआ घासमंडी की तरफ़ गया और मिनट से पहले वापस आ गया. वापस भागते हुए वह बार-बार मुझे आंख मार रहा कि काम बन गया, चिट्ठी फ़ुच्ची को डिलीवर हो गई.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सांस थमने के बाद वह बोला "बले आतिक बन लए फ़ुत्ती! लौंदियाबाद छाले! तित्ती लिकाने को बोल्ल्या ता तो मैंने कया अतोक लिक देगा." उसने पहली बार अहसानमन्द होते हुए मेरा हाथ दबाया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्कूल आने पर उसने हाथी जैसा चेहरा बनाते हुए, ब्रह्मवाक्य जारी करते हुए कहा "बलबाद हो जागा फ़ुत्ती!"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;असेम्बली के बाद इन्टरवल के बीच चार पीरियड काटना मेरे लिए एक युग बिताने जैसा हुआ. यानी कोई लड़की है जो फ़ुच्ची को भा गई है. फ़ुच्ची जैसे कलूटे कप्तान का प्यार में गिर पड़ना मेरे लिए अविश्वसनीय था. कौन-कैसी होगी वह - विषय पर सोचते हुए मुझे कई विचार आए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहीं ऐसा तो नहीं कि फ़ुच्ची मेरा पत्ता काट कर मधुबाला को चिट्ठी दे आने की फ़िराक में हो. आजकल बैटमिन्डल खेलने वो जभी आता है जब मास्टरनी ट्यूशन पढ़ा रही होती है. और मधुबाला क्या जाने कि चिट्ठी फ़ुच्ची ने नहीं मैंने लिखी है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पछाड़ें मारती, बेकाबू रोती, गिरती-पड़ती, आत्महत्या का ठोस फ़ैसला ले चुकी हीरोइन का विम्ब अब मेरे मन में प्यार-मोब्बत की सघनतम इमेज के रूप में स्थापित हो चुका था. क्या मधुबाला वैसा कुछ करेगी?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरा मन फ़ुच्ची की शकल नोंच लेने का हो रहा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर मधुबाला तक वाक़ई फ़ुच्ची ने चिट्ठी पहुंचा दी और उसने ज़हर खा लिया तो लफ़त्तू इस सारे मामले पर कैसे रियेक्ट करेगा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन्टरवल का घन्टा बजते ही लफ़त्तू मुझे घसीट कर  बौने के ठेले पर ले गया. फ़ुच्ची हमें प्रतीक्षारत मिला. बिना किसी दुआ सलाम के लफ़त्तू ज़ोर से बोला: "आत के पैते फ़ुत्ती देगा!" उसने पहले मुझे, फिर क्रमशः बौने और फ़ुच्ची को आंख मारी. बौना पत्तल बनाने लगा और हमारा महाधिवेशन चालू हो गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"दखिये, इतना तो हम समझ लिए कि आप को अच्छा लिखना आती है. मगर आप मने ये क्या आपका अपना ढिम्मक ढमकणा लिखे! अरे जिन्दगानी का बात है. हम तो फैसला किए हैं के आज चिट्ठी और कल सादी. ... अरे तनी कोई सेर-ऊर तो लिखिए न! ... सायरी-दोहा वगेरा ..."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसने जेब से सलीके से मोड़ा हुआ पर्चा निकाला और वहीं नीचे बैठ कर अपनी जांघ पर फैला लिया. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे पत्र में यह सुधार किया गया था कि सबसे ऊपर पानपत्रद्वय अंकित कर दिए गए थे - एक के भीतर लिखा था 'एफ़' दूसरे के भीतर 'टी'. एक टेढ़ा तीर दोनों पत्रों को जोड़ रहा था और 'टी' वाले जोड़बिन्दु से दो बूंदें टपक रही थीं. इन विवरणों को मैंने चोर निगाह से ताड़ लिया और मन अचानक टनों बोझ उतर जाने जितना हल्का हो गया. 'एफ़' माने फ़ुच्ची. और 'टी' माने कोई भी, मधुबाला नहीं.&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;"याल बलिया छायली लिक कोई फ़ुत्ती भाई की तरप से. भाबी खुत हो जाए कैते बी! क्यों फ़ुत्ती बाई?" लफ़त्तू 'टी' को भाभी कह रहा था - यानी मामला वाक़ई संजीदा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं भी फ़ुच्ची का लाया लाल कलम ले कर संजीदा हो गया. "आपका अपना फ़ुच्ची" के नीचे 'दोहा' लिख कर मैंने अंडरलाइन कर दिया. मैं मधुबाला की याद और प्रेरणा की प्रतीक्षा कर रहा था . लफ़त्तू और फ़ुच्ची झल्लाहट, उम्मीद और बेकरारी से मेरा मुंह ताक रहे थे. आख़िरकार वह क्षण आ ही गया. दोहा लिखने के बाद प्रसन्नता के अतिरेक में कांपते सद्यःप्रेमग्रस्त फ़ुच्ची ने हमें एक-एक बमपकौड़ा और टिकवाया.    &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोहा था:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;"अजीरो ठकर अब कां जाइयेगा&lt;br /&gt;जां जाइयेगा मुजे पाइयेगा"&lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/272678107746144576-3987507615888026810?l=lapoojhanna.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://lapoojhanna.blogspot.com/feeds/3987507615888026810/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=272678107746144576&amp;postID=3987507615888026810' title='20 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/272678107746144576/posts/default/3987507615888026810'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/272678107746144576/posts/default/3987507615888026810'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://lapoojhanna.blogspot.com/2008/09/blog-post_11.html' title='फ़ुच्ची कप्तान की आसिकी'/><author><name>लपूझन्ना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06722723246925370677</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>20</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-272678107746144576.post-4944112398720466301</id><published>2008-09-04T20:57:00.002+05:30</published><updated>2008-09-04T21:03:53.319+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लफ़त्तू'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बम पकौड़ा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='टोड मास्साब'/><title type='text'>इंग्लिछ मात्तर का बेता हो के लोता है बेते!</title><content type='html'>टोड मास्साब की पढ़ाई अंग्रेज़ी ज़्यादातर बच्चों की समझ में नहीं आती थी. क्लास के अधिकतर बच्चे नॉर्मल स्कूल या बम्बाघेर नम्बर दो के सरकारी प्राइमरी स्कूल से पांचवीं पास थे. इन स्कूलों में अंग्रेज़ी नहीं सिखाई जाती थी. लफ़त्तू, मैं और क़रीब बीसेक बच्चे मान्टेसरी स्कूल या शिशु मन्दिर से आए थे जहां पहली ही कक्षा से इसे सिखाए जाने पर ज़ोर था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टोड मास्साब की कक्षा में अंग्रेज़ी वाली कापी में ए बी सी डी लिखाने से शुरुआत हुई. मास्साब का लड़का गोलू भी हमारे साथ था और उसकी पढ़ाई बम्बाघेर नम्बर दो में हुई थी. जाहिर है गोलू को भी ए बी सी डी नहीं आती थी. और यह सर्वज्ञात तथ्य टोड मास्साब के ग़ुस्से और झेंप का बाइस बना करता था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लफ़त्तू को गोलू से संभवतः इसलिए सहानुभूति थी कि गोलू हकलाता था. पहली बार कक्षा में पिता द्वारा सबके सामने पीटे जाने और जलील किए जाने के बाद गोलू इन्टरवल में रो रहा था. अपने पापा की जेब पर सफलतापूर्वक हाथ साफ़ करके आया लफ़त्तू मुझे बौने का बमपकौड़ा खिलाने ले जा रहा था जब उसकी निगाह गोलू पर पड़ी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"इंग्लिछ मात्तर का बेता हो के लोता है बेते!" कह कर उसने गोलू को मोहब्बतभरी तोतली डांट पिलाते हुए बमपकौड़ा अभियान का हिस्सा बना लिया. " मेले पापा तो मुदे लोज धूनते हैं, मैं कोई लोता हूं कबी! गब्बल छे छीक बेता गब्बल छे: जो दल ग्या वो मल ग्या बेते." किंचित सहमा हुआ, लार टपकाता गोलू कभी लफ़त्तू के कॉन्फ़ीडेन्स को देखता कभी हरे पत्ते में सजे दुनिया के सर्वश्रेष्ठ, स्वादिष्टतम बम-पकौड़े को. कभी उसकी निगाह स्कूल की तरफ़ उठ जाती. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"ततनी दालियो हली वाली औल लाल मिल्चा" कहकर उसने अपना पत्तल बौने के सामने किया. "अभी लेओ बाबूजी" बौना सदा की तरह तत्परता से बोला. यह लफ़त्तू की ख़ास अदा थी जब वह मिर्चा खा पाने की अपनी कैपेसिटी से सामने वाले को आतंकित किया करता. उसकी तनिक पिचकी नाक से एक अजस्र धारा बह रही होती थी पर वह बौने से कहता: "औल दो!"  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गोलू के हावभाव बता रहे थे कि वह पहली बार इस प्रकार के कार्यक्रम में हिस्सेदरी कर रह था. पिता की झाड़ और संटी की मार भूलकर वह ज्यों त्यों पकौड़ा निबटाने में लगा था. मैं और गोलू नए खेल के पोस्टर देखने में मशगूल थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"नया खेल लगा है बाबूजी! आज ही शुरू हुआ है." अपनी कलाई पर बंधी कोयले और धुंए जैसे डायल वाली, सुतली से कलाई में लपेटी घड़ी पर निगाह मारते हुए बौने ने आगामी बिज़नेस की प्रस्तावना बांधना चालू किया, "हैलन का डान्स हैगा इस में. अभी चल्लिया होगा. आपके इस्कूल में तो अभी टैम हैगा. देखोगे बाबूजी?" इस आश्वस्तिपूर्ण वक्तव्य में इसरार कम था नए ग्राहक को फंसाने की चालबाज़ी ज़्यादा. "नए वाले बाबूजी से क्या पैसा लेना."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लफ़त्तू ने जेब से दो का नोट निकाला और जब तक वह गोलू को &lt;a href="http://lapoojhanna.blogspot.com/2007/10/blog-post_16.html"&gt;पिक्चर देखने का तरीक़ा &lt;/a&gt;बताता, मेरी निगाह अपने घर की छत पर गई. मां कपड़े सुखाने डाल चुकने के बाद बाहर देख रही थी. मुझ डरपोक को लगा कि वह सीधा हमें ही देख रही है. मैं बिना बताए जल्दी-जल्दी क्लास की दिशा में बदहवास भाग चला. इस हड़बड़ी में कक्षा के दरवाज़े पर मैं सीधा अपने बड़े भाई से टकरा गया जो मुझे इन्टरवल के बाद घर बुलाने आया था. मेरे ध्यान में नहीं रहा था कि उस दिन हमें गर्जिया मंदिर लाना था. सामने से सिलाई वाले सिरीवास्तव मास्साब आते दिखे तो भाई ने उन्हें एक कागज़ दिखाया. उनके मुंडी हिलाने पर हम घर की दिशा में चल पड़े.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लफ़त्तू और गोलू के साथ क्या बीती होगी - यह मेरी कल्पना की उड़ान के लिए बहुत बड़ी थीम थी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम शाम को घर लौटे. थोड़ी ही देर बाद दरवाज़े पर लफ़त्तू के पापा मौजूद थे. मैं बेतरह डर गया और थरथर कांपने लगा. लेकिन वे मेरे लिए जोकर के मुंह वाला मीठी सौंफ़ का डिब्बा लाए थे. डब्बा लेकर मैं छत पर बंटू के साथ क्रिकेट खेलने चला गया. बंटू नई गेंद लाया था और हमारा स्वयंसेवक अम्पायर महान लफ़त्तू हरिया हकले की छत फांदता आ रहा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत ही अनौपचारिक तरीके "क्या कैलये मेले पापा" पूछते हुए उसने बंटू से गेंद ली और "खेल इश्टाट" का ऑर्डर दिया. मैं बैटिंग कर रहा था पर मेरा मन बेहद व्याकुल था. जाहिर है लफ़त्तू जानता था कि उसके पापा मेरे घर में बैठे पिताजी से बात कर रहे थे. स्कूल में गोलू के अन्जाम की खौ़फ़नाक कल्पनाओं में मैं रामनगर-गर्जिया-रामनगर यात्रा में चिन्ताग्रस्त रहा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं पहली बॉल पर आउट होता रहा और बंटू ख़ुशी ख़ुशी मेरी गेंदों की धुनाई करता रहा. देर से शुरू हुआ खेल जल्दी निबट गया. घर जाने से पहले लफ़त्तू ने कमीज़ ऊपर की और पीठ पर पड़े नीले निशानों की मारफ़त सूचना दी कि उसकी और गोलू की टोड मास्साब ने संटी मार-मार कर खाल उधेड़ डाली थी. उसके बाद लफ़त्तू के पापा को स्कूल बुलाया गया. और यह भी कि उसके पापा ने उस से कुछ नहीं कहा बल्कि उसे भी जोकर के मुंह वाला मीठी सौंफ़ का डिब्बा दिया. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगले दिन और उसके बाद के कई दिन तक न टोड मास्साब स्कूल आए न गोलू. कोई कहता था लफ़त्तू के पापा ने टोड मास्साब को जेल भिजवा दिया और गोलू को मरेलिया हो गया. हुआ जो भी हो, लफ़त्तू की और मेरी अपनी दिनचर्या में एक परिवर्तन यह आया कि हमें सुबह छः बजे लफ़त्तू के पापा ने अंग्रेज़ी पढ़ानी चालू कर दी. यह मेरे घर उनके आने के अगले दिन से शुरू हुआ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी ही तरह लफ़त्तू के भी बहुत सारे भाई-बहन थे और हमारी पढ़ाई के समय वे कभी-कभार परदों के पीछे नज़र आ जाया करते थे. इस पढ़ाई के दौरान उसकी बड़ी बहन हमें दूध-बिस्कुट भी परोसा करती थी. असल बात यह थी कि मैं एक ही दिन में ताड़ गया था कि लफ़त्तू के पापा की ख़ुद की अंग्रेज़ी कोई बहुत अच्छी नहीं थी. वे पिथौरागढ़ी कुमाऊंनी मिश्रित हिन्दी में हमें इंग्लिस पढ़ाते थे. 'वी' को 'भी' कहते थे, जो मुझे बहुत अटपटा लगता. लेकिन लफ़त्तू की दोस्ती के कारण मैं इस कार्यक्रम में बेमन से हिस्सा लेता और हां-हूं कहा करता. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बस अड्डे से माचिस की डिब्बियों के लेबल खोजने का प्रातःकालीन आयोजन बाधित हो गया था और कभी-कभार घुच्ची खेलने का भी. क़रीब एक हफ़्ता हुआ होगा जब एक रोज़ लफ़त्तू पर जैसे शैतान सवार हो गया. दूध-बिस्कुट आते ही लफ़त्तू ने कापी बन्द की, एक सांस में दूध पिया, जेब में चार बिस्कुट अड़ाए और कापी को ज़मीन पर पटक कर, बस अड्डे और उस से भी आगे भाग जाने से पहले अपने पापा से बोला: "वल्ब को तो भल्ब कहते हो आप! क्या खाक इंग्लिछ पलाओगे पापा?"&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/272678107746144576-4944112398720466301?l=lapoojhanna.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://lapoojhanna.blogspot.com/feeds/4944112398720466301/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=272678107746144576&amp;postID=4944112398720466301' title='12 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/272678107746144576/posts/default/4944112398720466301'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/272678107746144576/posts/default/4944112398720466301'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://lapoojhanna.blogspot.com/2008/09/blog-post.html' title='इंग्लिछ मात्तर का बेता हो के लोता है बेते!'/><author><name>लपूझन्ना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06722723246925370677</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>12</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-272678107746144576.post-3215392804501287382</id><published>2008-08-08T19:52:00.004+05:30</published><updated>2008-08-08T20:26:12.380+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लफ़त्तू'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लालसिंह'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इस्कूल'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हौलीकैप्टर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कर्नल रंजीत'/><title type='text'>बिग्यान का दूसरा सबक और टेस्टूप</title><content type='html'>एक महीने &lt;a href="http://lapoojhanna.blogspot.com/2007/11/blog-post.html"&gt;कछुआ देखने&lt;/a&gt; के बाद हुई सामूहिक धुनाई के बाद वाले रोज़ दुर्गादत्त मास्साब लालसिंह के साथ क्लास में घुसे. लालसिंह अंग्रेज़ी की क्लास में अनुपस्थित था. असेम्बली में टोड मास्साब और दुर्गादत्त मास्साब के बीच चली कोई एक मिनट की बातचीत के बाद उसे जल्दी जल्दी गेट से बाहर जाते देखा गया था. लालसिंह के हाथ में खादी आश्रम वाला गांठ लगा मैला-कुचैला थैला था. मास्साब आदतन कर्नल रंजीत में डूबे हुए थे. लालसिंह ने रोज़ की तरह हमारी अटैन्डेन्स ली. पिछले दिन की ख़ौफ़नाक याद के कारण सारे बच्चे चुपचाप थे. हमने दो कक्षाओं के बीच पड़ने वाले पांचेक मिनट के अन्तराल में स्याही में डुबो कर काग़ज़ की गेंदें फेंकने का खेल भी नहीं खेला.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अटैन्डेन्स के बाद मास्साब ने उपन्यास नीचे रखा और बहुत नाटकीय अन्दाज़ में बोले: "कल तक हम ने जीव बिग्यान याने कि जूलाजी के बारे में जाना. आज से हम बनस्पत बिग्यान माने बाटनी की पढ़ाई शुरू करेंगे."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तब तक लालसिंह मैले थैले से काग़ज़ में लिपटी कोई गोल गिलासनुमा चीज़, एक पुड़िया और पानी से भरा हुआ शेर छाप मसालेदार क्वाटर सजा चुका था. लफ़त्तू ने मुझे क्वाटर, अद्धे और बोतल का अन्तर पहले से ही बता रखा था. उसके पापा इन सब में भरे मटेरियल का नियमित सेवन करते थे और लफ़त्तू एकाधिक बार चोरी से उसे चख भी चुका था. "छाली बली थुकैन होती है. लुफ़्त का भौत मजा आता है छाली में मगल."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मास्साब ने और भी नाटकीय अदाओं के साथ मेज़ पर रखी इन वैज्ञानिक वस्तुओं को उरियां किया. कांच गिलासनुमा चीज़ बहुत साफ़ थी और पतली स्याही से लम्बवत उसमें नियत दूरी पर लकीरें बनी हुई थीं. उसके भीतर गै़रमौजूद धूल को एक अतिशयोक्त फूंक मार कर मास्साब ने दूर किया, उंगली को टेढ़ा कर उसमें दो-चार नाज़ुक सी कटकट की और ऊंचा उठाकर बोले: "देखो बच्चो ये है बीकर. आज श्याम को सारे बच्चे लच्छ्मी पुस्तक भंडार पे जा के इसे ख़रीद लावें. डेड़-दो रुपे का मिलेगा. घरवालों से कह दीजो कि मास्साब ने मंगवाया है."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुड़िया खोलकर उन्होंने उसके भीतर के भूरे जरजरे पाउडर को ज़रा सा लिया और लकड़ी के बारूदे से हमारा परिचय कराया. "जिस बच्चे के घर पे बारूदे की अंगीठी ना हो बो भवानीगंज जा के अतीक भड़ई के ह्यां से ले आवे. अतीक कुछ कये तो उस से कैना कि मास्साब ने मंगाया है"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शेर छाप का क्वाटर खोल कर उन्होंने हमें पानी दिखाया और पहली बार कोई मज़ाकिया बात बोली "और ये है दारू का पव्वा. दारू पीने से आदमी का बिग्यान बिगड़ जाता है. कोई बच्चा दारू तो नहीं पीता है ना?" बच्चों ने सहमते हुए खीसें निपोरीं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"सारे बच्चे कल को बिग्यान की बड़ी कापी में बीकर का चित्र बना के लावें. और अब बनस्पत बिग्यान का कमाल देखो." उन्होंने अपने गन्दे कोट की विशाल जेब में हाथ डाला और मुठ्ठी बन्द कर के बाहर निकाली." हमें पता था कि उसमें चने के दाने होंगे क्योंकि हमारी ठुकाई करने के बाद उन्होंने क्लास से बाहर जाते हुए यह अग्रिम सूचना जारी कर दी थी सो उनके इस नाटक को हम दर्शकों की ज़्यादा सराहना नहीं मिली.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"ये हैं चने के दाने. इस संसार में सब कुछ बिग्यान होता है जैसे ये दाने भी बिग्यान हैं. अब देखेंगे बनस्पत बिग्यान का जादू." उन्होंने बीकर में चने के दाने डाले, उसके बाद उन्हें बुरादे से ढंक दिया. बीकर में आधा बुरादा डाल चुकने के बाद उन्होंने आधा क्वाटर पानी उसमें उड़ेला. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"अब इस में से चने उगेंगे"   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लालसिंह को बीकर थमाते हुए उन्होंने उसके साथ कछुए वाला व्यवहार करने का आदेश दिया और उपन्यास में डूब गए. लालसिंह ने बीकर दिखाना शुरू किया ही था कि घन्टा बज गया. लालसिंह के हाथ से बीकर लेते हुए मास्साब ने पलटकर कहा: "सारे बच्चे आज श्याम को बाज़ार से बीकर लावें और ऐसा ही परजोग करें. कल सबको चने वाले बीकर लाने हैं."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घर पर हमेशा की तरह साइंस के इस प्रयोग की सामूहिक हंसी उड़ाई गई. लफ़त्तू के घरवालों ने उसे बीकर के पैसे देने से मना कर दिया था सो मैंने मां से यह झूठ बोलकर दो बीकर ख़रीदे कि सबको दो-दो बीकर लाने को कहा गया है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगले दिन असेम्बली में कक्षा छः (अ) के हर बच्चे के हाथ में एक बीकर था. केवल नई कक्षा के बच्चों ने इन में दिलचस्पी दिखाई. दुर्गादत्त मास्साब के इस बनस्पत बिग्यान परजोग से बाक़ी के अध्यापक-छात्र परिचित रहे होंगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मास्साब ने आकर लालसिंह से अटैन्डेन्स के बाद हर बच्चे का बीकर चैक करने को कहा. बीकर चैक करने के बाद हमारे लिए ख़ास बनाई गईं काग़ज़ की छोटी पर्चियां जेब से निकालकर मास्साब ने हम से उन पर अपना-अपना नाम लिखने और परजोगसाला से लालसिंह द्वारा लाई गई आटे की चिपचिप लेई से उन्हें अपने बीकरों पर चिपकाने को कहा. "जब चिप्पियां लग जावें तो सारे बच्चे बारी-बारी से नलके पे जाके हाथ धोवें औए साफ़ सूखे हाथों से बीकरों को परजोगसाला में रख के आवें" घड़ी की तरफ़ एक बार देख कर मास्साब ने एक उचाट निगाह डालते हुए हमें आदेश दिया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मोतीराम परशादीलाल इन्टर कालिज की परजोगसाला एक अजूबा निकली. एक बड़ा सा हॉल था, जिस में घुसते ही क़रीब सौएक टूटी कुर्सियां और मेज़ें औंधी पड़ी हुई थीं. उनके बीच से रास्ता बनाते हुए आगे जाने पर एक तरफ़ को बड़ी-बड़ी मेजें थीं - एक पर शादी का खाना बनाने में काम आने वाले बड़े डेग-कड़ाहियां-चिमटे-परातें बेतरतीब बिखरे हुए थे. एक मेज़ के ऊपर कर्नल रंजीत वाली एक अधफटी किताब धूल खा रही थी. वह दुर्गादत्त मास्साब की मेज़ थी. इसी पर हमने अपने बीकर क्रम से रखने थे. किताब मैंने दूर से ताड़ ली थी. मेरे त्वरित, गुपचुप, लालचभरे इसरार पर लफ़त्तू लपक कर गया और चौर्यकर्म में अपनी महारत का प्रदर्शन करते हुए किसी और बच्चे के मेज़ तक पहुंचने देने से पेशतर उसने किताब चाऊ की और कमीज़ के नीचे अड़ा ली और मुझे आंख भी मारी. बीकर रखने के बाद मेरी निगाह दूसरी तरफ़ गई. जहां-तहां टूटे कांच वाली कुछ अल्मारियां थीं जिनकी बग़ल खड़ा में चेतराम नामक लैब असिस्टैन्ट ऊंची आवाज़ में हम से जल्दी फूटने को कह रहा था. इतनी सारी व्यस्तताओं और हड़बड़ी के बावजूद मुझे भुस भरे हुए कुछ पशु-पक्षी इन अल्मारियों के भीतर दिख ही गए. और एक संकरी ताला लगी अल्मारी के भीतर खड़ा एक कंकाल भी जिसने कर्नल रंजीत के साथ अगले कई महीनों तक मेरे सपनों में आना था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगले बीसेक दिन बिग्यान की क्लास का रूटीन यह तय बताया गया कि अंग्रेज़ी की क्लास के तुरन्त बाद हमें परजोगसाला जाकर अपने - अपने बीकरों में पानी देना होता था, उसके बाद सम्हाल कर इन्हें क्लास में लाकर अपने आगे रख कर अटैन्डेन्स दी कर बीकर की परगती को ध्यान लगाकर देखना होता था. मास्साब के घड़ी देख कर बताने के बाद घन्टा बजने से दस मिनट पहले हमें इन बीकरों को वापस परजोगसाला जाकर रखना होता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहले तीन-चार दिन तो मुझे लगा यह भी मास्साब की कोई ट्रिक है जिस से बोर करने के बाद वे हमें एक बार पुनः मार-मार कर बतौर तिवारी मास्साब हौलीकैप्टर बनाने की प्रस्तावना बांध रहे हैं. पांचवें दिन बीकर के तलुवे में पड़े चने के दानों में कल्ले फूट पड़े और बीकर को नीचे से देखने पर वे शानदार नज़र आते थे. भगवानदास मास्साब इस घटना से इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने पांच मिनट तक उपन्यास नीचे रख कर हमें बनस्पत बिग्यान की माया पर एक लैक्चर दिया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परजोगसाला जाकर मैं सबसे पहले पानी न देकर कंकाल को देखता और उसे पास जा कर छूने का जोख़िमभरा कारनामा अंजाम देने की कल्पना किया करता. इधर मैंने चोरी छिपे ढाबू की छत के एक निर्जन कोने में कर्नल रंजीत के फटे उपन्यास के सारे पन्ने कई बार पढ़ लिए थे. उस के बारे में फिर कभी. चोरी-चोरी मास्साब के उपन्यासों के कवर देखते हुए अब मुझे कुछ कुछ समझ में आने लगा था और कर्नल का इन्द्रजाल सरीखे रहस्य लोक से परिचित क़िस्म की सनसनी होने लगी थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दस- बारह दिन बाद नन्हे से पौधे वाक़ई चार-पांच सेन्टीमीटर की बुरादे की परत फ़ोड़कर बाहर निकल आए. इन दिनों पूरी क्लास भर मास्साब के चेहरे पर परमानन्द की छटा झलकती रहती थी. लालसिंह सारे काम करता और ख़ुद उन्हें उपन्यास पढ़ने के सिवा कुछ नहीं करना होता था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चने के पौधे दो-तीन सेन्टीमीटर लम्बे हो गए थे और बुरादे से अब बदबू भी आने लगी थी. किसी-किसी बीकर के भीतर फफूंद उग आई थी. एक दिन उचित अवसर देख कर मास्साब क्लास से मुख़ातिब हुए: "चने का झाड़ कितने बच्चों ने देखा है?" कोई उत्साहजनक उत्तर न मिलने पर पहले उन्होंने लालसिंह से किसी खेत से चने का झाड़ लाने को कहा और अपना लैक्चर चालू रखते हुए कहना शुरू किया: "चने का झाड़  बड़े काम का होता है. उसमें पहले हौले लगते हैं फिर चने और चने को खाकर सारे बच्चे ताकतवर बनते हैं. सूखे चने को पीसकर बेसन बनता है जिसकी मदद से तलवार अपने होटल में स्वादिस्ट पकौड़ी बनाता है." पकौड़ी का नाम आने पर उन्होंने अपना थूक गटका, "सारे बच्चों के पौधे भी एक दिन चने के बड़े झाड़ों में बदल जावेंगे. तो आज हम आडीटोरियम के बगल में इन पौधों का खेत तैयार करेंगे. जब खूब सारे चने उगेंगे तो हम उन चनों को बन्सल मास्साब की दुकान पे बेच आवेंवे. उस से जो पैसा मिलेगा, उस से सारे बच्चे किसी इतवार को कोसी डाम पे जाके पिकनिक करेंगे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"लालसिंह हमें आडीटोरियम के बगल में इन पौधों को रोपाने ले गया और वहां जाकर भद्दी सी गाली देकर बोला: "मास्साब भी ना!"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके बावजूद हमारे उत्साह में क़तई कमी नहीं आई और आसपास पड़े लकड़ी-पत्थर की मदद से खेत खोदन-निर्माण और पौधारोपण का कार्य सम्पन्न हुआ. घन्टा बज चुका था और हम अपने-अपने बीकर साफ़ करने के उपरान्त उन्हें अपने बस्तों में महफ़ूज़ कर चुके थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छुट्टी के वक़्त स्कूल से लौटते हुए कुछेक बच्चे सद्यःनिर्मित खेत के निरीक्षणकार्य हेतु गए. बीच में बरसात की बौछार पड़ चुकी थी. लफ़त्तू भागता हुआ मेरे पास आया: "लालछिंग सई कैलिया था बेते. भैंते मात्तर ने तूतिया कात दिया. छाले तने बलछात में बै गए. अब बेतो तने औल कल्लो दाम पे पुकनिक". उस कब्रगाह पर जा पाने की मेरी हिम्मत नहीं हुई.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तीन हफ़्ते की मेहनत का यूं पानी में बह जाना मेरे लिए बहुत बड़ा हादसा था. इस वैज्ञानिकी त्रासदी से असंपृक्त दुर्गादत्त मास्साब ने अगले रोज़ न लालसिंह से चने के झाड़ के बाबत सवालात किए, जिसे लाना वह भूल गया था, न चनोत्पादन की उस महत्वाकांक्षी खेती-परियोजना का ज़िक्र किया. अपनी जेब से कर्नल की चमचमाती नई किताब के साथ उन्होंने जेब से परखनली निकाली और उसी नाटकीयता से पूछा: "इसका नाम कौन बच्चा जानता है?" लालसिंह ने भैंसे यानी दुर्गादत्त मास्साब को कल से भी बड़ी गाली देते हुए हमें बिग्यान की इस तीसरी  क्लास के बारे में एडवान्स सूचित कर दिया था. "परखनाली मास्साब!" उत्तर में एक कोरस उठा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"परखनाली नहीं सूअरो! परखनली कहा जावे है इसे! और कल हर बच्चा बाज़ार से दो-दो परखनलियां ले के आवेगा. कल से हम बास्पीकरण के बारे में सीखेंगे. आज श्याम को सारे बच्चे लच्छ्मी पुस्तक भंडार पे जा के ख़रीद लावें. आठ-बारह आने में आ जावेंगी ..."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लालसिंह की गुस्ताख़ी का उन्हें भान हो गया होगा. पहली बार उसकी तरफ़ तिरस्कार से  देखते हुए उन्होंने क़रीब-क़रीब थूकने के अन्दाज़ में हमसे कहा: "इंग्लिस में टेस्टूप कहलाती है परखनली. आई समझ में हरामियो?"&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/272678107746144576-3215392804501287382?l=lapoojhanna.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://lapoojhanna.blogspot.com/feeds/3215392804501287382/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=272678107746144576&amp;postID=3215392804501287382' title='28 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/272678107746144576/posts/default/3215392804501287382'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/272678107746144576/posts/default/3215392804501287382'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://lapoojhanna.blogspot.com/2008/08/blog-post_08.html' title='बिग्यान का दूसरा सबक और टेस्टूप'/><author><name>लपूझन्ना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06722723246925370677</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>28</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-272678107746144576.post-788351568260729085</id><published>2008-08-07T20:08:00.005+05:30</published><updated>2008-08-08T13:47:18.221+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='किलास में सुताई'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लाजेस्खन्ना'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='रामलीला'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मेरा रामनगर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='देबानन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गड़त'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='एडल्ट'/><title type='text'>दड़ी का छेत्रफल, परसुराम और मांबदौतल</title><content type='html'>हरेमोहन बन्सल मास्साब हमारे गड़त यानी मैथ्स के गुरूजी थे. परचूने की उनकी दुकान स्कूल के गेट से कोई बीस मीटर दूर थी. दुकान पर गालियां बकने में पी एच डी कर चुके उनके वयोवृद्ध पिताजी बैठा करते थे. इस लिहाज़ से हरेमोहन बन्सल मास्साब स्कूल में अक्सर पार्ट टाइम मास्टरी किया करते थे. वे जब बोलते थे तो लगता था उन्होंने मुंह में कुन्दन दी हट्टी की स्वादिष्ट रबड़ी ठूंस रखी हो. अलबत्ता उनके शब्द इस बेतरतीब और भद्दे तरीके से बाहर आया करते थे कि लगता उनकी सांस अब रुकी तब रुकी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनका एक बेहद मोटा बेटा था जो अक्सर दुकान के वास्ते थोक खरीदारी के सिलसिले में क्लास में आकर उनसे पैसे लेने आता था. मास्साब एक एक नोट गिन के उसे दिया करते थे और उसके साथ हमेशा बड़ी हिकारत से पेश आते थे. वह मुंह झुकाए सुनता रहता और अपनी धारीदार पाजामानुमा पतलून की जेब में हाथ डाले डोलता रहता. उसका आना हमारे लिए एक तरह का छोटा-मोटा इन्टरवल हो जाता क्योंकि मास्साब के हाथ से नोट लेकर वह सवालिया निगाहों से उन्हें देखता रहता. फूंफूं करते तनिक आगबबूला मास्साब उसे साथ लेकर क्लास से बाहर सड़क पर ले जाते और अपनी समझ में न आने वाली ज़ुबान में हिसाब समझाते - गड़तगुरुपुत्र एकाध बार नोटों को जेब में अन्दर-बाहर करता. क़रीब पन्द्रह मिनट तक चलने वाले इस कार्यक्रम के दौरान लालसिंह हमें मास्साब की दुकान के अद्भुत क़िस्से सुनाया करता. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्कूल पास कर चुकी कई पीढ़ियों ने मास्साब की दुकान में जाकर पहले दो-चार सौ का सामान तुलाने और उसके बाद लाल मूंग की टाटरी मांगने की परम्परा क़ायम की थी. इस अबूझ पदार्थ का नाम लेते ही दुकान में मौजूद मास्साब के पिताश्री का पारा चढ़ जाया करता था. वे लाठी-करछुल-तराजू-बाट उठा लेते और नकली गाहकों की टोली खीखी करती अपनी जान बचा कर भागने का जतन करने लगती थी. कभी कभी स्वयं मास्साब भी इस कार्य में संलग्न पाए जाते. दुकान से होने वाले इस साप्ताहिक गाली-पुराण में 'अपने बाप से मांग लाल मूंग की टाटरी' का जयघोष बुलन्द होते ही मास्साब पिता की सेवा करने हेतु क्लास छोड़ दुकान की तरफ़ लपक लेते थे. लालसिंह हमें इस जुमले का कोई साफ़ अर्थ नहीं बता पाया. न ही लफ़त्तू. इन दोनों को रामनगर की सारी गालियां याद थीं पर लाल मूंग की टाटरी को लेकर बहुत संशय था और निश्चय ही जिज्ञासा भी. यह दोनों भावनाएं अब भी जस की तस बरक़रार हैं. शायद वह कोई वस्तु न होकर बन्सल परिवार की छेड़ भर रही होगी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मास्साब ने हमें सबसे पहले बर्ग, आयत, त्रिकोड़ आदि के फ़ार्मूले रटाए और उसके बाद इन पर आधारित सवाल. हममें से कई बच्चों की 'फ़िक' से हंसी छूट जाती जब वे सवाल लिखाना शुरू करते: "चौबीस बर्ग फ़ुट के छेत्रफल की एक दड़ी की लम्बाई छै फ़ुट है. तो दड़ी की चौड़ाई बताइये." दरी को दड़ी कहने के कारण उन्हें दड़ी मास्साब के नाम से जाना जाता था. शुरू में दड़ी शब्द सुनकर हंसी आती थी पर बाद में आदत पड़ गई. संभवतः मास्साब को भी अपने इस दूसरे नाम का ज्ञान था. डंडा वे भी लेकर आते थे पर इस्तेमाल कभी नहीं करते थे. तिवारी मास्साब के मुकाबले वे बहुत शरीफ़ लगा करते थे. डंडे का इस्तेमाल करने की नौबत गड़त की किताब से सवाल लिखाते ही आई. इस में दड़ी के बदले खस की टट्टी की लम्बाई-चौड़ाई के बाबत सवालात थे. मास्साब के मुखारविन्द से इस द्विअर्थी 'टट्टी' शब्द का निकलना, हमारा हंसते हुए दोहरा और डंडे पड़ते ही तिहरा होना एक साथ घटा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दड़ी मास्साब गाली नहीं देते थे - न पढ़ाते वक़्त, न डांटते वक़्त, न पीटते वक़्त. गाली देने का कार्य आधिकारिक रूप से थोरी मास्साब और दुर्गादत्त मास्साब के अलावा एक और मास्साब के पास था. इन मास्साब को कुछ पढ़ाते हम ने कभी नहीं देखा. स्कूल कैम्पस में आवारा टहल रहे बच्चों के साथ मौखिक रूप से पिता और जीजा का रिश्ता बनाते भर देखे जाने वाले ये मास्साब भी रिश्ते में प्रिंसिपल साहब के मामा और दुर्गादत्त मास्साब के चचेरे-ममेरे भाई थे. पन्द्रह अगस्त को उन्होंने हारमोनियम पर 'दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल' (जिसके लफ़त्तूरचित  संस्करण की एक बानगी आप पिछली पोस्ट में देख चुके हैं) और 'इन्साफ़ की डगर पे बच्चों दिखाओ चलके' (यानी 'बौने का बम पकौड़ा बच्चो दिखाओ चख के') बजाया था. लफ़त्तू का कहना था कि अक्सर लौंडों जैसी पोशाक पहनने वाले और एक तरफ़ को सतत ढुलकने को तैयार बालों का झब्बा धारण करने वाले ये वाले मास्साब हारमोनियम बजाते हुए अपने को लाजेस्खन्ना का बाप समझते थे. यह तमीज़ तो हमें बड़ा होने पर आई कि वे असल में अपने को लाजेस्खन्ना का नहीं देबानन का बाप समझते थे. दुर्गादत्त मास्साब का भाई होने के कारण उन्हें मुर्गादत्त मास्साब की उपाधि प्रदत्त की गई थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुर्गादत्त मास्साब रामलीला में परसुराम का पाट खेलते थे. मुझे अल्मोड़ा की रामलीला की बहुत धुंधली याद थी. उस में भी बस सीता स्वयंवर में सदैव जोकर का पाट खेलने वाले कपूर नामक एक कपड़ाविक्रेता की. इसके अलावा वहां चलना और चढ़ना बहुत पड़ता था. पैंठपड़ाव में लगे विशाल शामियाने में प्लेन्स की पहली रामलीला देखना आधुनिक कलाजगत से मेरा पहला संजीदा परिचय था. रात को हम मोहल्ले के बच्चे किसी एक बड़े के निर्देशन में वहां पहुंचकर आगे की दरियों पर अपनी जगहें बना लेते. घर से थोड़ा बहुत पैसा मिलता था सो बौने की बम पकौड़ों, सिघाड़े की कचरी, जलेबी और काले नमक के साथ गरम मूंगफली की बहार रहती. रामलीला देखते देखते हमें 'मैं तो ताड़िका हूं, ताड़-तड़-तड़-ताड़ करती हूं' और 'रे सठ बालक, ताड़िका मारी!' बहुत अट्रैक्टिव डायलाग लगे और हम कई दिन तक लकड़ी की तलवारें बनाकर एक दूसरे पर इन की प्रैक्टिस करते रहे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुर्गादत्त मास्साब के अतिलोकप्रिय परसुराम-अभिनय के बाद क्लास के आधे लड़के उनके फ़ैन हो गए लेकिन लफ़त्तू ज़्यादा इम्प्रेस्ड नहीं हुआ. और उसकी टेक थी कि वे अपने को लाजेस्खन्ना का बाप समझते थे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रावण का पाट खेलने वाला रामनगर फ़िटबाल किलब का गोलकीपर शिब्बन लफ़त्तू का रोल मॉडल था. दीवाली की छुट्टियों के दिनों हम ढाबू की छत पर रामलीला खेलते थे. बंटू परसुराम बनता था, और सांईबाबा का छोटा भाई सत्तू  अंगद. इनकी डायलागबाज़ी के उपरान्त रावण का दरबार लगता. एक पिचके कनस्तर पर जांघ पर जांघ चढ़ाए बैठा, रावण बना लफ़त्तू बड़ी अदा से कहता था: "नातने वाली को पेत किया जाए". &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एकाध उपस्थित लड़कियां थोड़ा झेंप और ना नुकुर के बाद नाचने वाली के रोल के लिए खुद को तैयार करने लगतीं. 'केवल पुरुषों के लिए' वाले रामलीला-संस्करण में अभिनेता कम होने की सूरत में बंटू और सत्तू इन भूमिकाओं के लिए ख़ुशी-ख़ुशी तैयार हो रहते थे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्लास्टिक के एक पुराने टूटे मग में हवारूपी शराब भरे उसका मन्त्री यानी मैं सदैव तत्पर रहा करता था. &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;पहले वह 'मुग़ल-ए-आज़म' से सीखा हुआ एक डायलाग फेंकता: "मांबदौतल अब आलाम कलेंगे". इसके बाद वह जांघों को बदल कर हाथ से नृत्य चालू करने का इशारा करके मुझे आंख मारता और आदेश देता: "मन्त्ली मदला लाओ".&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/272678107746144576-788351568260729085?l=lapoojhanna.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://lapoojhanna.blogspot.com/feeds/788351568260729085/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=272678107746144576&amp;postID=788351568260729085' title='10 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/272678107746144576/posts/default/788351568260729085'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/272678107746144576/posts/default/788351568260729085'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://lapoojhanna.blogspot.com/2008/08/blog-post.html' title='दड़ी का छेत्रफल, परसुराम और मांबदौतल'/><author><name>लपूझन्ना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06722723246925370677</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-272678107746144576.post-5287275030822619947</id><published>2008-07-28T14:23:00.008+05:30</published><updated>2008-08-08T13:45:34.156+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पप्पी मान्टेसरी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मोब्बत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मेरा रामनगर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बैटमिन्डल'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ढाबू की छत'/><title type='text'>ब्रेस, ब्रेस, ब्रेसू टी यानी जो दल ग्या वो मल ग्या</title><content type='html'>किराए के जिस दोमंज़िला मकान में हम रहते थे वह तीन बराबर हिस्सों में बंटा हुआ था यानी तीन भाइयों के तीन हिस्से. हमारे और बगल वाले सैट के मालिक पास ही के चोरपानी नामक गांव में रहते थे. हिन्दुस्तान की तरफ़ के कोने वाले ही अपने मकान में रहते थे उनका बेटा बंटू मेरा हम उमर था और मेरा दोस्त था. हम लोग अक्सर छत पर खेला करते थे. अपनी खुराफ़ातों को अस्थाई निजात दे कर लफत्तू भी हमारे साथ हुआ करता था. छत का एक हिस्सा तीन बराबर हिस्सों में बंटा हुआ था और उन तीन हिस्सों के बीच दो-ढाई फ़ीट की दीवारें उठाई गई थीं. ये दीवारें बैडमिन्टन खेलते समय काम आती थीं. दीवारों के कारण खिलाड़ियों के लिए ऑटोमैटिकली पाले बन जाते थे. कभी-कभी तो इन तीन छतों पर एक साथ दो-दो मैच चल जाया करते थे. ऐसी स्थिति में बीच की छत कॉमन हो जाती. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शामों को बंटू की मम्मी, मेरी बहनें और पड़ोस में रहने वाली कुछ लड़कियां हमारे राकेट ले लेतीं और राकेट-चुड़िया का खेल खेलतीं. खेलने की उनकी शैली को बैडमिन्टन तो नहीं कहा जा सकता था. चुड़िया को राकेट से जैसे-तैसे मार पाने की कोशिश करती इन उत्साही खिलाड़िनों को देख कर लगता जैसे तनिक ऊंचे तार पर सुखाने के लिए उचक-उचक कर बरसात में भीग गया गद्दा या गलीचा फैलाने का जतन कर रही हों. वहां खड़ा होना आलस और बोरियत से भर देता था. सो हम लोग क्रिकेट खेलने लगते थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छत के तीन-पाला हिस्से के बाद तीनों सैटों के, तीन तरफ़ से खुले हुए तीन बड़े बड़े रोशनदान थे. रोशनदानों के बाद पानी की तीन ऊंची-ऊंची टंकियां थीं. इन टंकियों के बाद क़रीब चार फ़ुट चौड़ा और काफ़ी लम्बा हिस्सा था जो क्रिकेट खेलने के लिए बहुत मुफ़ीद था. यानी खेलने के पिच इतनी लम्बी थी कि बकौल लफ़त्तू वहां वेस्ट इंडिया के काले गेंदबाज़ों सरीखी फ़ाश्टमफ़ाश्टेश्ट बॉलिंग भी हो सकती थी. हमारी रसोई की चिमनी विकेट बनती जबकि बंटू वाली चिमनी से गेंदबाज़ी होती.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लफ़त्तू खेलता कभी नहीं था: न क्रिकेट, न फ़िटबाल न बैटमिन्डल. लेकिन वह मुझे अपना दोस्त मानता था और बावजूद इस तथ्य के कि मेरा बड़ा भाई उसे एकाधिक बार हमारे घर में उसे आया देख उसे अस्वीकृत और जलील कर चुका था, वह जैसे तैसे हर शाम हमारी छत पर पहुंच जाता था. वह अक्सर हरिया हकले की छत से होकर आया करता था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारी छत से इस वाली तरफ़ ढाबू की छत थी. ढाबू की छत के बारे में कभी विस्तार से बताऊंगा. उसके आगे एक तरफ़ साईंबाबा की छत थी. इस मकान का धार्मिक महत्व वहां साईंबाबा नाम से कुख्यात एक लफ़ंडरशिरोमणि की वजह से था जो हर महीने नींद की चार-पांच नकली गोलियां खा कर आत्महत्या करने के नाटक के मंचन और प्रदर्शन में निपुण हो चुका था. लम्बे घुंघराले बालों और सदैव काले पॉलीएस्टर की खरगोश-शर्ट और काली ही बेलबाटम पहनने वाले साईंबाबा के बारे में एक बार मुझे लफ़त्तू ने कॉन्फ़ीडेन्शियल सूचना दी थी कि वह "बला लौंदियाबाज" है और हर महीने आत्महत्या-मंचन के पहले भवानीगंज में एक "पैतेवाले" सरदार जी के घर बढ़िया से धुन कर आता है. मैं अक्सर ही लफ़त्तू के आत्मविश्वास और 'एडल्ट' ज्ञान के अपार भंडार पर अचरज किया करता था. ढाबू की छत के दूसरी तरफ़ हरिया हकले की छत थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लफ़त्तू खेलता नहीं था सो अपनी उपस्थिति को जस्टीफ़ाइ करने के लिए वह स्वयंसेवक अम्पायर बन जाने का आधिकारिक काम सम्हाल लेता था. एक उंगली उठाकर आउट देता और दो उंगलियां उठाकर नॉट आउट. पहली बॉल "ट्राई" होती थी और इस में "ट्राईबॉल - कैच आउट - नो रन" का सनातन नियम चला करता था. खेल शुरू होने से पहले वह एक छोटे गोल पत्थर के एक तरफ़ थूक कर टॉस करता था जिसमें "गील" या "सूख" से पहले बल्लेबाज़ी करने वाला तय होता था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://bp3.blogger.com/_v2c4N3c4u9k/SI2y-Dn8h0I/AAAAAAAAADE/qCt56-cg78E/s1600-h/Cricket.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://bp3.blogger.com/_v2c4N3c4u9k/SI2y-Dn8h0I/AAAAAAAAADE/qCt56-cg78E/s320/Cricket.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5228031521641498434" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;ज़्यादा समय नहीं होता था जब छत के महिला खेल-मैदान वाले हिस्से से लफ़त्तू को पुकार लग जाया करती. "अभी लाया आन्तीजी" कहता लफ़त्तू चीते की फ़ुर्ती से पहले हमारी गेंद अपने कब्ज़े में लेता और तुरन्त सीढ़ियां उतरकर चुड़िया ले आता. गेंद अपने साथ ले जाने के पीछे उसका तर्क होता था कि वह अम्पायर है. बस. चुड़िया अक्सर किसी एक रोशनदान से नीचे गई होती और डेढ़-दो मिनट में लफ़त्तू अपनी आधिकारिक पोज़ीशन पर होता और गेंद थमा कर "दुबाला इस्टाट!" का आदेश पारित करता. लेकिन जब कभी चुड़िया दूसरी तरफ़ यानी सड़क पर गिर जाया करती, लफ़त्तू को बहुत काम करना पड़ता था. कोई पांच मिनट तक खेल रुका रहता और जब लफ़त्तू चुड़िया समेत लौटता, उस का चेहरा लाल पड़ा होता. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गेंद साथ ले जाने की उसकी आदत के चलते हमारा बहुत बखत खराब होता था और हम ने इस बाबत एकाध बार असफल वाद-विवाद प्रतियोगिताएं भी आयोजित कीं पर लफ़त्तू हमेशा "बेता, लूल तो लूल होता है" कह कर हमें चुपा देता. हमें उसकी धौंस इस लिए भी सहनी पड़ती थी कि उसके पास एक और अतिरिक्त प्रभार था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बैटिंग करते हुए लेग साइड के शॉट तो टंकियों की दीवारों से टकराकर वापस पिच पर आ जाते पर ऑफ़ साइड वाले अक्सर ढाबू की छत पर पहुंच जाते या उससे भी आगे हरिया हकले या साईंबाबा की छत पर. छतों को अलग-अलग दिखाने भर मात्र की नीयत से बनीं दोएक फ़ुट की बाड़नुमा दीवारें थीं. लफ़त्तू की उपस्थिति हमारे खेल के लिए यों भी लाज़िम थी कि इन छतों से गेंद वापस लाने का काम भी उसी का था. कभी कभार वह हरिया हकले की छत के कोने पर जा कर कहता कि गेंद उछल कर सड़क से होती हुई दूधिए की गली में गोबर में जा गिरी है. हम दोनों परेशान हो कर उस के पास पहुंचते तो वह कुछ समय सस्पेन्स बनाने के बाद अपनी निक्कर के गुप्त हिस्से से गेंद बाहर निकाल कर दांत निपोरता, आंख मारता और ठठाकर हंसता: "तूतिया बना दिया छालों को ... तूतिया बना दिया छालों को".&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस खेल में दिक्कत शॉर्टपिच गेंदों पर होती थी. बैटिंग वाली चिमनी के पीछे ईंटों के खड़ंजे वाली दूधिये की बेहद संकरी गली थी. इस गली में स्थित पप्पी मान्टेसरी पब्लिक स्कूल हमारे विकेट के ठीक पीछे पड़ता था. स्कूल क्या था एक घर था जिसके पिछवाड़े हिस्से में चार-पांच कमरे निकाल कर कुछ बच्चों के बैठने की जगह बनाई गई थी. मकान के दूर वाले हिस्से में एक सिख परिवार रहता था. सरदारनी बहुत मुटल्ली थी और उनकी आधा या पौन दर्ज़न सुन्दर लड़कियां थीं. सबसे छोटी क़रीब पन्द्रह की रही होगी जबकी सबसे बड़ी कॉलेज पास कर चुकी थी और पप्पी मान्टेसरी पब्लिक स्कूल की प्रिंसीपल थी. सरदारनी की हर लड़की कोई न कोई उचित मौका देख कर घर से भाग चुकी थी. और रामनगर में यही इस घर का यू. एस. पी. माना जाता था. घर-पड़ोस की औरतें अक्सर इस घर की तारीफ़ में इतने क़सीदे काढ़ चुकी थीं कि उनसे कोई मेज़पोश बनाता तो सारे रामनगर के आसमान को उस से ढंका जा सकता था. लफ़त्तू उस घर के आगे से गुज़रता तो मुंह में दो उंगली घुसा कर सीटी बजाता और उन दिनों रामनगर में लोकप्रिय हुए लफ़ाड़ी-गान "बीयो ... ओ ... ओ ... ई" को ऊंचे स्वर में गाया करता. उसे किसी का ख़ौफ़ नहीं था. "जो दल ग्या बेते वो मल ग्या" - यह जुमला उसने इधर ही 'शोले' देखने के बाद से अपना अस्थाई तकियाक़लाम बना छोड़ा था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पप्पी मान्टेसरी पब्लिक स्कूल वाली इमारत को हम सरदारनी का घर कहते थे. इस एक मंज़िला मकान की छत पर बहुत-बहुत बड़ा रोशनदान था. हमारी छत से उस रोशनदान के भीतर देखा जा सकता था. स्कूल में पढ़ने वाले क़रीब चालीसेक बच्चों की वहां असेम्बली लगती थी. असेम्बली के बाद मधुबाला जैसी दिखने वाली एक बहुत सुन्दर मास्टरनी वहीं पर बच्चों को अंग्रेज़ी की कविताएं रटाती थी. शाम को यही सब बच्चे ट्यूशन पढ़ने वहां आते और मधुबाला द्वारा कविता घोटाए जाने का कार्य पुनः सम्पन्न किया जाता. बहती नाकों वाले, अलग-अलग तरीकों से रोने वाले ये बच्चे बरास्ते सरदारनी के रोशनदान सामूहिक रूप से आसमान गुंजाने का काम  किया करते:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"ब्रेस, ब्रेस, ब्रेसू टी&lt;br /&gt;ब्रेसू अब्री डे&lt;br /&gt;फ़ादर मदर ब्रादर सिस्टर&lt;br /&gt;ब्रेसू अब्री डे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भात, भात, भातू आल&lt;br /&gt;भातू अब्री डे&lt;br /&gt;फ़ादर मदर ब्रादर सिस्टर&lt;br /&gt;ब्रेसू अब्री डे ..."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(इन कालजयी महाकाव्यात्मक पंक्तियों में एक संस्कारी परिवार के समस्त संस्कारी सदस्यों से आयु-लिंग इत्यादि का भेद भुलाते हुए दन्तमंजन तथा स्नान में नित्य रत रहने का आह्वान किया जाता था)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब मैं सकीना से मोब्बत और सादी के खयालात नहीं रखता था सो मधुबाला से आसिकी कर रहा था.  इस दूसरे प्रेम प्रसंग में लफ़त्तू की बताई एडल्ट टिप्स के कुछ सुदूर रंग स्मृति में झलक दिखा जाते थे लेकिन समझ में ज़्यादा न आने के कारण वे अन्ततः किसी सलेटी किस्म के गुबार में ग़ायब हो जाते थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ख़ैर! शॉर्ट पिच गेंद सीधी उठती हुई सरदारनी के रोशनदान में घुस जाती थी: चाहे बल्ला लगे या ना लगे. इन गेंदों का रिट्रीवल असंभव होता था और हमें नई गेंदों के लिए बड़ों की चिरौरी करनी होती थी. दस पैसे देने से बड़ों के इन्कार कर दिये जाने की सूरत में मैं और बंटू गमी मनाने के मोड में आ जाते अलबत्ता लफ़त्तू का मूड बन जाता. वह गाने लगता. उसका तोतला गान मोम्म्द रफी के गाने "ताए कोई मुजे दंगली कए" से उठता हुआ किशोर दा के "मेले नेना छाबन बादो" से "दे दी हमें आज़ादी बिना लोती बिना दाल" जैसी पैरोडियों से होता नौटंकियों से सीखे "लौंदा पतवारी का" जैसे एडल्ट गानों तक पहुंचता. इस परफ़ॉरमेन्स का चरम, विकेटरूपी चिमनी से सटकर लफ़त्तू के खड़े हो जाने पर आता था. मैं और बंटू पीछे दुबक जाते. वहां पर खड़ा लफ़त्तू सरदारनी के घर की तरफ़ देखता हुआ बेशर्मी से ज़ोर-ज़ोर से गाता:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"खेल, खेल, खेलू बाल&lt;br /&gt;खेलू अब्री डे&lt;br /&gt;फ़ाद्ल मदल ब्लादल सिस्टल&lt;br /&gt;खेलू अब्री डे ... " &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगले स्टैज़ा में वह खेल के 'ख' को 'भ' में बदल देता. कुमाऊंनी में इस से बनने वाले शब्द से अभिप्राय मनुष्य देह के पृष्ठभाग में अवस्थित उस क्षेत्रविशेष से है जिस पर अक्सर लातें पड़ती हैं और जो उत्तर भारत की अंतरंग पुरुष-भाषा की शब्दावली का विशिष्ट घटक होता है.&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;इसी को गाता-गुनगुनाता वह हमसे विदा लेता. सरदारनी उस के पापा से उसकी शिकायत कर चुकी होगी: यह उसे पता रहता था. पर हमारी तरफ़ आंख मार कर वह कहता: "जो दल ग्या बेते वो मल ग्या"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;(यह पोस्ट 'आर्ट ऑफ़ रीडिंग' में कल लगी &lt;a href="http://artofreading.blogspot.com/2008/07/blog-post_4823.html"&gt;पोस्ट&lt;/a&gt; के कारण आज लिखी गई. इस लिहाज़ से &lt;a href="http://maykhaana.blogspot.com"&gt;मुनीश&lt;/a&gt; को इसका श्रेय दिया जाना चाहिए. कल रात लिए गए वायदे के मुताबिक यह पोस्ट हरी मिर्च वाले &lt;a href="http://bakaul.blogspot.com/"&gt;मनीष जोशी &lt;/a&gt; और उन मित्रों के लिए सप्रेम समर्पित है जो मुझे इस ब्लॉग पर नियमित होने को कहा करते हैं. उम्मीद है अब मैं ऐसा कर पाऊंगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ़ोटो 'आर्ट ऑफ़ रीडिंग' के सरगना &lt;a href="http://tooteehueebikhreehuee.blogspot.com/"&gt;इरफ़ान&lt;/a&gt; ने कुछ महीने पहले &lt;a href="http://kabaadkhaana.blogspot.com/2007/11/blog-post_23.html"&gt;कबाड़ख़ाने&lt;/a&gt; पर इसी ब्लॉग के वास्ते लगाई थी. इरफ़ान का सूखरिया ...)&lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/272678107746144576-5287275030822619947?l=lapoojhanna.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://lapoojhanna.blogspot.com/feeds/5287275030822619947/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=272678107746144576&amp;postID=5287275030822619947' title='12 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/272678107746144576/posts/default/5287275030822619947'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/272678107746144576/posts/default/5287275030822619947'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://lapoojhanna.blogspot.com/2008/07/blog-post_28.html' title='ब्रेस, ब्रेस, ब्रेसू टी यानी जो दल ग्या वो मल ग्या'/><author><name>लपूझन्ना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06722723246925370677</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://bp3.blogger.com/_v2c4N3c4u9k/SI2y-Dn8h0I/AAAAAAAAADE/qCt56-cg78E/s72-c/Cricket.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>12</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-272678107746144576.post-4252097317941993454</id><published>2008-03-14T13:29:00.009+05:30</published><updated>2008-08-08T13:44:03.578+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मोम्मद रफ़ी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पिक्चर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मेरा रामनगर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='एडल्ट'/><title type='text'>अइयइया सुकू सुकू और पटवारी का लौंडा</title><content type='html'>छमाही इम्त्यान पूरे होते न होते खेल मैदान और बस अड्डे से लगा सारा इलाका निमाईस और उरस के लिए तैयार होना शुरू कर देता था। निमाईस में बिजली का झूला लगता था, बुढ़िया के बाल खाने को मिलते थे, जलेबी-समोसे और अन्य लोकप्रिय व्यंजनों के असंख्य स्टाल लगते थे, रामनगर की जगत - विख्यात सिंघाड़े की कचरी और बाबा जी की टिक्की, बौने के बम-पकौडे के स्टाल से टक्कर लिया करते थे। खेल मैदान में बच्चों की भीड़ रहा करती। बस अड्डे से लगा इलाका वयस्कों के लिए टाइप बन जाया करता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस वयस्क इलाके में नौटंकी चला करती थी और अजीब - अजीब गाने बजा करते थे। ये गाने किसी भी फ़िल्मी गाने जैसे नहीं होते थे। न ही इनकी धुनें रामलीला के गीतात्मक वार्तालापों से मिला करतीं। अलबत्ता ये गाने बेहद 'कैची' होते थे और पहले ही दिन इन में से एक मेरी ज़ुबान पर चढ़ गया। "मैं हूं नागिन तू है संपेरा, संपेरा बजाए बीन। लौंडा पटवारी का बड़ा नमकीन ..." वाला गीत मैं एक बार घर में गुनगुनाने की ज़ुर्रत कर बैठा तो बढ़िया करके धुनाई हुई। शुरू में मुझे लगा कि पड़ोस में रहने वाले पटवारी जी का अपमान न करने की नसीहत मुझे दी गई है लेकिन लफ़त्तू ने मेरे ज्ञानचक्षु खोलते हुए बताया कि नौटंकी एडल्ट चीज़ होती है और उस में माल टाइप का सामान डांस किया करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एकाध दिन नौटंकी को लेकर मन में ढेरों बातें उबला कीं लेकिन खेल मैदान में चल रहे एक दूसरे शानदार तमाशे ने बचपन के एक पूरे हिस्से पर कब्ज़ा कर लिया। एक साहब गोल गोल घेरे में सात दिन तक लगातार साइकिल चलाया करते थे। दिन के वक्त कभी कभी साइकिल पर कई तरह के करतब दिखाए जाते थे और वे अपने एक असिस्टेन्ट की मदद से दोपहर किसी वाज़िब मौके पर साइकिल में बैठे बैठे जंग खाए तसले में भरे पानी से नहाते और बाकायदे कपड़े भी बदला करते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन साहब के पास बस एक ही रेकॉर्ड था। 'जंगली' फ़िल्म का यह रेकॉर्ड लगातार-लगातार बजता रहता था और उसके चलते "अइयइया सुकू सुकू" मेरे सर्वप्रिय गीतों में से एक बन गया था। मैंने तब तक सिर्फ़ चार पिक्चरें देखी थीं ('हाथी मेरे साथी', 'बनफूल', 'मंगू' और 'दोस्ती')। "अइयइया सुकू सुकू" सुनते हुए मुझे लगता था कोई खिलंदड़ा पक्षी किसी पेड़ की ऊंची डाल पर बैठा बहुत-बहुत ख़ुश है। आज भी जब कभी 'जंगली' के गाने सुनता हूं, मुझे रामनगर में निमाइस के दिनों साइकिल चलाने वाले उन सज्जन की याद आ जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे लिए ये साहब बहुत बड़े हीरो थे। जहां हम बच्चे कैची चलाने में दिक्कत महसूस करते थे, ये जनाब सारे के सारे काम साइकिल पर किया करते थे। लफ़त्तू के ख्याल से एक काम साइकिल पर बैठ कर कभी नहीं किया जा सकता था : "तत्ती कैते कल पागा कोई छाकिल में बेते!"&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/272678107746144576-4252097317941993454?l=lapoojhanna.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://lapoojhanna.blogspot.com/feeds/4252097317941993454/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=272678107746144576&amp;postID=4252097317941993454' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/272678107746144576/posts/default/4252097317941993454'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/272678107746144576/posts/default/4252097317941993454'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://lapoojhanna.blogspot.com/2008/03/blog-post_14.html' title='अइयइया सुकू सुकू और पटवारी का लौंडा'/><author><name>लपूझन्ना</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06722723246925370677</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-272678107746144576.post-8859914116377317607</id><published>2008-03-11T11:05:00.003+05:30</published><updated>2008-08-08T13:42:44.937+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इस्कूल'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बच्चों की चड्ढी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='होस्यार सुतरा'/><title type='text'>बच्चों की चड्ढी और होस्यार सुतरा</title><content type='html'>गुलाबी रंग का तोता बनाते बनाते हमें क़रीब दो महीने बीते. पहले छमाही इम्त्यान की अफ़वाह हवा में थी. आल्ट की क्लास के चलते चित्र बनाने में मेरी दिलचस्पी समाप्त होने लगी थी. प्राइमरी स्कूल के ज़माने में मेरी ड्राइंग अच्छी समझी जाती थी और मुझे शिवाजी और महाराणा प्रताप के चित्र बनाने में महारत हासिल थी. लेकिन तिवारी मास्साब की आल्ट के चक्कर में मेरी अपनी आल्ट की ऐसी तैसी हो चुकी थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आल्ट के अलावा मुझे जिन दो विषयों से ऊब सी होने लगी थी वे थे बाणिज्ज और सिलाई-कढ़ाई. बाणिज्ज तो तब भी ठीक था पर सिलाई की क्लास का खास मतलब मेरी समझ में नहीं आता था. ऊपर से यह विषय पूरे तीन साल तक खेंचे जाने थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिलाई की क्लास भूपेस सिरीवास्तव मास्साब लेते थे. सिरीवास्तव मास्साब देखने में किसी भी एंगल से दर्ज़ी नज़र नहीं आते थे. सिलाई की पहली क्लास के बाद जब मैं आवश्यक चीजों की लिस्ट लेकर घर पहुंचा तो जाहिर है मेरे नए स्कूल और वहां पढ़ाए जाने वाले विषयों को लेकर तमाम तरह के मज़ाक किए गए. मुझे अच्छा नहीं लगा पर मजबूरी थी. प्लास्टिक का अंगुस्ताना, धागे की रील, कैंची इत्यादि लेकर रोज़ स्कूल जाने की जलालत वही समझ सकता है जिसे साईंस की क्लास में पन्द्रह दिन तक कछुवा देखना पड़े या दो माह तक गुलाबी तोता बनाना पड़े.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भूपेस सिरीवास्तव मास्साब ने शुरू में हमें एक सफ़ेद कपड़े पर सुई धागे की मदद से कई कारनामे करने सिखाए. इन कारनामों में मुझे धीरे धीरे तुरपाई के काम में मज़ा आने लगा था. बहनों के लतीफ़ों के बावजूद मुझे अपनी पुरानी पतलूनों और घुटन्नों की मोहरियों की तुरपाई उखाड़ना और नए सिरे से उसे करना अच्छा लगता था. एकाध माह तक हमें फ़न्दों की बारीकियां सिखाई गईं. अंगुस्ताना काफ़ी आकर्षित करने लगा था. सिरीवास्तव मास्साब ने क्लास में उस के इस्तेमाल का तरीका सिखा दिया था सो मैं जान बूझ कर तुरपाई करने में सुई को अंगुस्ताने से लैस अपनी उंगली में खुभाने का वीरतापूर्ण कार्य किया करता था. पड़ोस में रहने वाली सिलाई बहन जी के नाम से विख्यात एक आंटी मेरे इस टेलेन्ट से बहुत इम्प्रेस्ड हो गई थीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक रोज़ सिरीवास्तव मास्साब ने हमसे अगली क्लास के लिए पुराने अख़बार लाने को कहा. लफ़त्
